इलाहाबाद हाईकोट
चीनी नागरिक ने धोखाधड़ी से हासिल की भारतीय नागरिकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट का केंद्र को याचिका पर फैसला करने का निर्देश
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह 4 हफ़्तों के भीतर याचिका पर उचित कारणों के साथ आदेश पारित करे। इस याचिका में ऐसे पूर्व चीनी नागरिक के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई, जिस पर धोखाधड़ी से भारतीय नागरिकता हासिल करने का आरोप है।जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने यह आदेश 'महाबोधि सोसाइटी ऑफ़ इंडिया' द्वारा दायर एक रिट याचिका पर दिया।याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि प्रतिवादी नंबर 6 (जो पहले चीन का नागरिक था और अब नैचुरलाइज़ेशन के ज़रिए भारत का...
जांच के अधीन सस्पेंशन ऑर्डर ब्लैकलिस्टिंग नहीं है, राज्य गुणवत्ता संबंधी चिंताओं के आधार पर बोली खारिज करने के लिए स्वतंत्र: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला दिया कि सस्पेंशन ऑर्डर को यूं ही ब्लैकलिस्टिंग ऑर्डर नहीं माना जा सकता, खासकर तब जब सस्पेंशन ऑर्डर किसी जांच के अधीन हो।हालांकि, कोर्ट ने एक तकनीकी बोली खारिज किए जाने के फैसले को सही ठहराया, क्योंकि कोर्ट ने पाया कि पिछला खराब प्रदर्शन जनहित में बोली खारिज करने का एक वैध आधार है।जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी की बेंच ने फैसला दिया:"हमारी राय में जांच के अधीन सस्पेंशन ऑर्डर ब्लैकलिस्टिंग ऑर्डर के बराबर नहीं होता। हम उन तमाम मिसालों (Precedents) को...
'शर्मनाक, बेबुनियाद और खोखले': इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पत्नी और बेटियों पर सेक्स रैकेट चलाने का झूठा आरोप लगाने वाले व्यक्ति को फटकारा
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मंगलवार को व्यक्ति की क्रिमिनल रिट याचिका खारिज की। इस व्यक्ति ने कानपुर नगर में चल रहे कथित सेक्स रैकेट में शामिल लोगों के खिलाफ FIR दर्ज कराने की मांग की।हालांकि, याचिकाकर्ता ने शुरू में अपनी पत्नी और बेटी के अश्लील वीडियो ऑनलाइन अपलोड किए जाने पर चिंता जताई, लेकिन बाद की सुनवाई में उसने अपने परिवार के सदस्यों पर अनैतिकता का आरोप लगाते हुए उनके खिलाफ अपमानजनक और झूठे आरोप लगाए।इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की बेंच ने याचिकाकर्ता...
'आरोप तय करने के चरण में केवल प्रथम दृष्टया मामला देखा जाता है': इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 'कुरान का अपमान' करने के आरोपी एडिटर को राहत देने से किया इनकार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पिछले हफ़्ते किताब के संपादक द्वारा दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका (Criminal Revision Petition) खारिज की। इस याचिका में संपादक ने इस्लाम और कुरान के खिलाफ कथित तौर पर अपमानजनक शब्द प्रकाशित करने के एक मामले में खुद को आरोपमुक्त करने की मांग की थी।यह देखते हुए कि आरोप तय करने के चरण में केवल प्रथम दृष्टया मामला ही देखा जाता है, जस्टिस सुभाष चंद्र शर्मा की पीठ ने ट्रायल कोर्ट का उस आदेश बरकरार रखा, जिसमें याचिकाकर्ता-डॉ. मदन गोपाल सिन्हा (जो विचाराधीन किताब के नामित संपादक हैं)...
पूर्व साजिश साबित बिना साझा मंशा नहीं: 1985 हत्या मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आरोपी को किया बरी
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 34 के तहत दोषी ठहराने के लिए यह साबित करना जरूरी है कि आरोपी के बीच पहले से कोई साझा योजना या साजिश थी। इस आधार पर अदालत ने 1985 के हत्या मामले में एक आरोपी को बरी किया।जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने 1989 में पारित सत्र अदालत का फैसला रद्द करते हुए कहा कि बिना “पूर्व सहमति या साजिश” (प्रायर कॉन्सर्ट) साबित किए धारा 34 लागू नहीं की जा सकती।अदालत ने कहा,“धारा 302 के साथ धारा 34 के तहत...
हत्या के मामले में गले की हायॉइड हड्डी का टूटना जरूरी नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट, पति को जमानत देने से किया इनकार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अहम फैसले में कहा कि गला दबाकर हत्या के मामलों में हायॉइड हड्डी (गर्दन की छोटी यू-आकार की हड्डी) का टूटना अनिवार्य नहीं है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि गवाहों के बयान दर्ज करने में देरी हमेशा अभियोजन के खिलाफ नहीं जाती, यदि उसके पीछे उचित कारण हो।जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की पीठ ने पत्नी की गला दबाकर हत्या के आरोपी पति की जमानत याचिका खारिज करते हुए ये टिप्पणियां कीं।सुनवाई के दौरान आरोपी पक्ष ने दलील दी थी कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में गला दबाने की बात कही गई, लेकिन...
कब्जे में मौजूद व्यक्ति को BNSS के तहत बेदखल नहीं किया जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया कि यदि किसी संपत्ति पर किसी पक्ष का वास्तविक कब्जा है तो उसे BNSS की धाराओं 164/165 के तहत बेदखल नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि ऐसी कार्यवाही कानून के अनुरूप सक्षम न्यायालय के आदेश से ही संभव है।जस्टिस बृज राज सिंह ने कहा,“राज्य का दायित्व है कि वह पक्षकारों की सुरक्षा करे, लेकिन यदि वास्तविक कब्जा किसी पक्ष के पास है तो उसे BNSS की धाराओं 164/165 के तहत बेदखल नहीं किया जा सकता, जब तक कि विधि अनुसार अदालत का आदेश न हो।” मामले में...
कस्टडी मांगने वाली हेबियस कॉर्पस याचिका पर 'गार्जियंस एंड वार्ड्स एक्ट' की रोक नहीं, बच्चे के हित में रिट जारी की जा सकती है: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सिंगल जज का आदेश रद्द किया, जिसमें एक मां की हेबियस कॉर्पस याचिका खारिज की गई थी। इस याचिका में मां ने पिता से अपने बच्चे की कस्टडी मांगी थी। कोर्ट ने कहा कि मां की याचिका को इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता कि 'गार्जियंस एंड वार्ड्स एक्ट' के तहत उसके पास दूसरा कानूनी उपाय मौजूद था।ऐसा करते हुए कोर्ट ने कहा कि अगर यह बच्चे के सबसे अच्छे हित में हो तो रिट कोर्ट अपने असाधारण क्षेत्राधिकार का इस्तेमाल कर सकती है।मामले की पृष्ठभूमि यह है कि मां ने एक हेबियस कॉर्पस याचिका के...
S. 482 CrPC | पहले से उपलब्ध, लेकिन छोड़े गए आधारों पर लगातार रद्द करने वाली याचिकाएं स्वीकार्य नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बुधवार को एक आरोपी द्वारा उसी आपराधिक कार्यवाही के संबंध में दायर 'तीसरी' रद्द करने वाली याचिका खारिज की। इस याचिका में ऐसा आधार उठाया गया, जो पहले से उपलब्ध था, लेकिन उस समय नहीं उठाया गया।जस्टिस समित गोपाल की बेंच ने स्पष्ट रूप से फैसला दिया कि CrPC की धारा 482 के तहत लगातार दायर की गई ऐसी रद्द करने वाली याचिकाएं स्वीकार्य नहीं हैं, जिनमें उन आधारों पर आपराधिक कार्यवाही रद्द करने की मांग की गई हो जो पहले से उपलब्ध थे।सिंगल जज ने टिप्पणी करते हुए कहा,"आवेदक द्वारा पिछली दो...
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पेमेंट ऑफ़ बोनस (संशोधन) अधिनियम, 2015 के पूर्वव्यापी (retrospective) लागू होने को सही ठहराया
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पेमेंट ऑफ़ बोनस (संशोधन) अधिनियम, 2015 के पूर्वव्यापी रूप से लागू होने की वैधता को इस आधार पर सही ठहराया कि इस संशोधन से कर्मचारियों के लिए कोई नया अधिकार नहीं बनाया जा रहा था और न ही यह नियोक्ताओं के किसी मौजूदा अधिकार को कम कर रहा था।यह संशोधन अधिनियम, अधिनियम के तहत 'कर्मचारी' की पात्रता सीमा को उन लोगों से, जो अधिकतम 10,000 रुपये प्रति माह कमाते थे, बढ़ाकर उन लोगों तक कर देता है, जो 21,000 रुपये प्रति माह कमाते हैं। इसने पेमेंट ऑफ़ बोनस अधिनियम, 1965 की धारा 12 में भी...
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 1999 के चारहरे हत्याकांड में माँ और उसके 'प्रेमी' के खिलाफ नाबालिग बेटों की गवाही के आधार पर सज़ा बरकरार रखी
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मंगलवार को व्यक्ति की सज़ा और आजीवन कारावास बरकरार रखी। इस व्यक्ति ने 1999 में अपनी कथित प्रेमिका (सह-आरोपी, अब मृत) के साथ मिलकर एक क्रूर चारहरे हत्याकांड को अंजाम दिया था।जस्टिस रजनीश कुमार और जस्टिस ज़फीर अहमद की बेंच ने 2 नाबालिग बच्चों की 'स्वाभाविक' और 'लगातार' गवाही पर काफी भरोसा किया। इन बच्चों ने अपराध को अपनी आँखों से देखा था और अपनी माँ (सह-आरोपी, अब मृत) और उसके कथित प्रेमी (अपीलकर्ता) के खिलाफ गवाही दी थी।अभियोजन पक्ष के मामले के अनुसार, 18 और 19 मई, 1999 की...
राहुल गांधी की नागरिकता विवाद: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड देखने से किया इनकार, FIR की मांग पर सुनवाई जारी
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की कथित ब्रिटिश नागरिकता से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि वह आरोपों की सच्चाई की जांच नहीं करेगा और न ही गृह मंत्रालय के रिकॉर्ड की पड़ताल करेगा।यह टिप्पणी उस याचिका पर सुनवाई के दौरान की गई, जिसमें लखनऊ ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी गई, जिसमें राहुल गांधी के खिलाफ FIR दर्ज करने से इनकार किया गया था।याचिकाकर्ता एक राजनीतिक कार्यकर्ता हैं। उसने आरोप लगाया कि राहुल गांधी ने ब्रिटिश नागरिकता ली थी और इस संबंध में विभिन्न...
'कोई अपराधी इरादा नहीं', पति के खिलाफ सिर्फ़ 'झूठे' केस दर्ज करना आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दी पत्नी को राहत
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि किसी पत्नी और उसके रिश्तेदारों को उसके पति की आत्महत्या के लिए उकसाने का दोषी सिर्फ़ इसलिए नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि उन्होंने वैवाहिक विवाद को लेकर उसके खिलाफ केस दर्ज कराए।कोर्ट ने कहा कि सिर्फ़ केस दर्ज कराने से, भले ही वे झूठे होने का आरोप हो, IPC की धारा 306 के तहत अपराध साबित करने के लिए ज़रूरी 'Mens Rea' (अपराधी इरादा) साबित नहीं होता।समीर जैन की बेंच ने इस तरह पत्नी और उसके परिवार वालों के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द की। बेंच ने कहा कि रिकॉर्ड में...
वकीलों के लिए व्यापक मेडिकल इंश्योरेंस योजना बनाने का मामला: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए दर्ज की PIL
एक अहम कदम उठाते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पिछले हफ़्ते स्वतः संज्ञान लेते हुए जनहित याचिका (PIL) दर्ज करने का निर्देश दिया, ताकि पूरे उत्तर प्रदेश राज्य में प्रैक्टिस करने वाले वकीलों के लिए एक व्यापक इंश्योरेंस योजना बनाने की संभावनाओं को तलाशा जा सके।यह कदम तब उठाया गया, जब कोर्ट ने ऐसे कई मामले देखे जिनमें वकीलों को गंभीर और जानलेवा मेडिकल इमरजेंसी के दौरान इलाज करवाने में भारी आर्थिक दिक्कतों का सामना करना पड़ा।जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस मनजीव शुक्ला की बेंच ने यह आदेश 2024 में दायर एक PIL...
'जांच में गंभीर चूक': इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नाबालिग के रेप के मामले में 11 साल जेल में बिताने वाले व्यक्ति को बरी किया
इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ बेंच) ने हाल ही में ऐसे व्यक्ति को बरी किया, जिसने 2010 के एक मामले में, जिसमें 14 साल की लड़की के साथ रेप का आरोप था, 11 साल जेल में बिताए। बेंच ने टिप्पणी की कि पुलिस ने एक "गंभीर चूक" की थी, क्योंकि वे पीड़िता के शरीर पर मिले मानव वीर्य (semen) का मिलान आरोपी से करने में नाकाम रहे थे।जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस बृज राज सिंह की बेंच ने 2018 के उस ट्रायल कोर्ट का फैसला रद्द किया, जिसमें अपीलकर्ता को IPC की धारा 376 के तहत आजीवन कारावास और 50,000 रुपये के जुर्माने की सज़ा...
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फ़र्ज़ी PhD धोखाधड़ी FIR में राहत से किया इनकार, 'रिश्वत से कुछ भी खरीदा जा सकता है' पर लगाई फटकार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में आम लोगों के बीच बढ़ती इस धारणा पर कड़ी आपत्ति जताई कि रिश्वत देकर कुछ भी खरीदा जा सकता है, जिसमें अकादमिक डिग्रियां और यूनिवर्सिटी की नौकरियां भी शामिल हैं।जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की बेंच ने इस तरह महिला के खिलाफ FIR रद्द करने से इनकार किया। इस महिला पर एक उम्मीदवार से PhD डिग्री और असिस्टेंट प्रोफेसर की नौकरी दिलाने के बहाने ₹22 लाख से ज़्यादा की धोखाधड़ी करने का आरोप है।एक सख़्त आदेश में हाईकोर्ट ने कहा कि FIR में लगाए गए आरोप समाज में एक बहुत...
इनक्वेस्ट रिपोर्ट में आरोपी का नाम जरूरी नहीं, सिर्फ मौत का कारण दर्ज करना उद्देश्य: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 194 के तहत तैयार की जाने वाली इनक्वेस्ट रिपोर्ट का उद्देश्य केवल मृत्यु के प्रथमदृष्टया कारण और चोटों का विवरण दर्ज करना है, न कि आरोपी का नाम लिखना।जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की पीठ ने यह टिप्पणी हत्या के आरोपी की जमानत याचिका खारिज करते हुए की।मामले में आरोपी ने दलील दी थी कि उसे एक अंधे हत्या मामले में झूठा फंसाया गया। प्रारंभिक पुलिस डायरी और अस्पताल रिकॉर्ड में हमलावर को अज्ञात बताया गया। आरोपी की ओर से यह भी...
करंट हादसे में बिजली विभाग की सख्त जिम्मेदारी, लापरवाही साबित करना जरूरी नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा कि करंट लगने (इलेक्ट्रोक्यूशन) के मामलों में बिजली विभाग की सख्त जिम्मेदारी तय होती है और पीड़ित को मुआवजा पाने के लिए विभाग की लापरवाही साबित करने की आवश्यकता नहीं है।जस्टिस संदीप जैन की खंडपीठ ने स्पष्ट किया,“ऐसे मामलों में सख्त जिम्मेदारी का सिद्धांत लागू होता है और वादी को यह साबित करने की जरूरत नहीं कि बिजली लाइन के रखरखाव में विभाग के कर्मचारियों की लापरवाही थी। उसे केवल यह साबित करना है कि उसे करंट से चोट लगी।”मामला एक मजदूर से जुड़ा था,...
लोन की समयपूर्व वसूली विवाद में सिविल कोर्ट का अधिकार नहीं, केवल NCLT ही करेगा फैसला: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अहम निर्णय देते हुए कहा कि लोन की समयपूर्व वसूली (प्रीमैच्योर रिपेमेंट) से जुड़े विवादों का निपटारा सिविल अदालत नहीं कर सकती। ऐसे मामलों में अधिकार केवल राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण (NCLT) को है।जस्टिस संदीप जैन की बेंच ने कहा कि कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 430 स्पष्ट रूप से सिविल अदालतों के अधिकार क्षेत्र पर रोक लगाती है, जहां मामला NCLT के अधिकार क्षेत्र में आता है।अदालत ने कहा, “जहां किसी मामले का निर्णय NCLT द्वारा किया जाना है वहां किसी भी अदालत को हस्तक्षेप करने या...
वैवाहिक विवाद से जुड़े मामूली आपराधिक मामले के आधार पर नौकरी से इनकार नहीं किया जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा कि केवल वैवाहिक विवाद से जुड़े आपराधिक मामले के लंबित होने के आधार पर किसी अभ्यर्थी को नौकरी देने से इनकार नहीं किया जा सकता।जस्टिस करुणेश सिंह पवार की पीठ ने स्पष्ट किया कि सामान्य और अस्पष्ट आरोपों वाले ऐसे मामलों को नियुक्ति से वंचित करने का आधार नहीं बनाया जा सकता।अदालत ने कहा,“वैवाहिक विवाद से उत्पन्न सामान्य आरोपों पर आधारित आपराधिक मामले का लंबित होना याचिकाकर्ता को नियुक्ति देने से इनकार करने का वैध आधार नहीं है।”मामले में याचिकाकर्ता ने...


















