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संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 भाग 29: पुर्विक बंधकदार का मुल्तवी होना (धारा 78)
संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 की धारा 29 के अंतर्गत एक संपत्ति को अनेक व्यक्तियों के पास बंधक रखने के परिणामस्वरूप नियमों का उल्लेख किया गया है। किसी भी संपत्ति को एक से अधिक व्यक्तियों के समक्ष भी बंधक रखा जा सकता है तथा उन पर ऋण लिया जा सकता है। ऐसी परिस्थितियां होती है कि एक से अधिक व्यक्तियों के पास कोई संपत्ति बंधक रखी गई है उसका बंधक के अंतर्गत अंतरण किया गया है तब इस धारा की सहायता ली जाती है। इस आलेख के अंतर्गत संपत्ति अंतरण अधिनियम की धारा- 29 से संबंधित समस्त प्रावधानों पर चर्चा की जा...
संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 भाग 28: बंधकदार के अधिकार और कर्तव्य
संपत्ति अंतरण अधिनियम के अंतर्गत जिस प्रकार इससे पूर्व के आलेख में एक बंधककर्ता के मोचन के अधिकार का उल्लेख किया गया था इसी प्रकार इस आलेख के अंतर्गत बंधकदार के अधिकार और कर्तव्यों का उल्लेख किया जा रहा है। एक बंधकदार के अधिकार और कर्तव्य संपत्ति अंतरण अधिनियम कि किसी एक धारा में समाहित नहीं किए गए हैं अपितु धारा 67 से लेकर धारा 77 तक बंधकदार के अधिकारों एवं कर्तव्यों से संबंधित है तथा उनकी विवेचना प्रस्तुत कर रही है। इस आलेख के अंतर्गत उन सभी धाराओं के प्रावधानों पर सारगर्भित टिप्पणी प्रस्तुत...
संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 भाग 27: बंधककर्ता का मोचन का अधिकार (धारा 60)
संपत्ति अन्तरण अधिनियम की धारा 60 बंधककर्ता के मोचन के अधिकार का उल्लेख करती है। यह ऐसा अधिकार है जो बंधककर्ता को बंधक रखी गई संपत्ति पर उपलब्ध होता है। इस आलेख के अंतर्गत बंधककर्ता के इस अधिकार का उल्लेख किया जा रहा है। मोचन का अधिकार बंधक संपत्ति अन्तरण में सर्वाधिक महत्वपूर्ण अधिकार है। इससे पूर्व के आलेख में बंधक के संबंध में इस अधिनियम में प्रस्तुत किए गए प्रावधानों पर चर्चा की गई थी।मोचनाधिकार से तात्पर्य बन्धककर्ता के उस अधिकार से है जिसके माध्यम से वह बन्धकधन के भुगतान हेतु प्रतिभूत रखी...
संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 भाग 26: संपत्ति अंतरण अधिनियम के अंतर्गत बंधक क्या होता है (धारा 58)
संपत्ति अन्तरण अधिनियम, 1882 की धारा 58 संपत्ति अंतरण अधिनियम के अंतर्गत बंधक की परिभाषा और उसकी अवधारणा को प्रस्तुत करती है। यह अधिनियम संपत्तियों के अंतरण से संबंधित है। जिस प्रकार इससे पूर्व के आलेख में संपत्ति के विक्रय के संबंध में समझा गया है इसी प्रकार बंधक भी संपत्ति अंतरण अधिनियम का एक महत्वपूर्ण भाग है। बंधक भी एक प्रकार से संपत्ति का अंतरण करता है तथा बंधक में किया गया संपत्ति का अंतरण सीमित अधिकार के अंतर्गत होता है जबकि विक्रय में किया गया संपत्ति का आत्यंतिक अधिकार के रूप में होता...
संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 भाग 25: विक्रय के पूर्व और पश्चात क्रेता और विक्रेता के अधिकार तथा दायित्व (धारा 55)
संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 धारा 55 विक्रय के पश्चात और उसके पहले क्रेता और विक्रेता के अधिकार तथा दायित्व का उल्लेख करती है। यह धारा एक प्रकार से क्रेता और विक्रेता के अधिकारों तथा उनके एक दूसरे के विरुद्ध दायित्व को स्पष्ट रूप से उल्लखित कर देती है जिससे किसी भी विक्रय में उसके पूर्व तथा उसके बाद किसी भी प्रकार की कोई कठिनाई नहीं आए। लेखक इस आलेख के अंतर्गत इन्हीं अधिकारों पर तथा दायित्व पर टीका प्रस्तुत कर रहे है। इससे पूर्व के आलेख के अंतर्गत विक्रय की समस्त अवधारणा पर टीका किया गया था जिसके...
संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 भाग 23: भागिक पालन {धारा 53 (क)}
संपत्ति अंतरण अधिनियम 1882 की धारा 53 (क) भागिक पालन के संबंध में उल्लेख कर रहे हैं यह धारा संपत्ति अंतरण अधिनियम में सन 1929 में जोड़ी गई है तथा इस अधिनियम के महत्वपूर्ण कारणों में से एक धारा है। भागिक पालन धारा 53 (क) का उद्देश्य किसी ऐसे अन्तरिती के हितों को संरक्षण प्रदान करना है जिसने किसी संव्यवहार में सद्भावनापूर्वक हिस्सा लिया हो, पर अन्तरणकर्ता ने सामान्य व्यवस्था के किसी तकनीकी तत्व का बहाना लेकर उसे परेशान करने या सम्पत्ति न देने की योजना बना रखी हो। धारा 53 क के गर्भ में स्थित...
संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 भाग 22: कपटपूर्ण अन्तरण (धारा 53)
संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 की धारा 53 कपट पूर्ण अंतरण के संबंध में उल्लेख कर रही है। यह सर्वमान्य नियम है कि यदि कोई व्यक्ति किसी संपत्ति का स्वामी है तब भी वे व्यक्ति उस संपत्ति का आत्यंतिक अधिकारी नहीं होता है। कपट पूर्ण अंतरण ऐसे अंतरण के मामले में लागू होता है जहां लेनदारों के भय से उनके साथ कपट करने के उद्देश्य से संपत्ति का अंतरण कर दिया जाए। लेनदारों से बचने के लिए इस प्रकार के अंतरण सामान्य रूप से देखने को मिलते हैं जहां व्यक्ति लेनदारों से बचने हेतु अपनी संपत्ति का अंतरण कपट पूर्वक...
वाद-पत्र कौन सी परिस्थितियों में ख़ारिज किया जा सकता है?
किसी भी सिविल दावे को दायर करने का औपचारिक चरण वाद-पत्र पेश करना होता है और इसी के साथ सिविल कानून के तहत सारी प्रक्रिया की शुरुआत होती है। सीपीसी की धारा 26 के अनुसार कोई भी दावा वाद-पत्र के पेश करने से दाखिल किया जायेगा। सीपीसी के अंतर्गत "वाद-पत्र" शब्द को कही भी परिभाषित नहीं किया गया है। किन्तु इसे दावे का वर्ण या एक दस्तावेज, जिसकी प्रस्तुति के द्वारा मुकदमा स्थापित किया जाता है, कहा जा सकता है। इसका उद्देश्य उन आधारों को बताना है जिन पर वादी द्वारा न्यायालय की सहायता मांगी गई है। यह वादी...
संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 भाग 24: स्थावर संपत्ति के विक्रय के विषय में (धारा 54)
संपत्ति अंतरण अधिनियम की धारा 54 अचल संपत्ति के विक्रय के संबंध में प्रावधान प्रस्तुत करती है। इस धारा के अंतर्गत विक्रय की परिभाषा भी प्रस्तुत की गई है, अंतरण का ढंग भी बताया गया है और विक्रय संविदा के संबंध में भी उल्लेख किया गया है। अचल संपत्ति का विक्रय इस अधिनियम की इस धारा के अंतर्गत ही अधिशासी होता है तथा चल संपत्तियों का विक्रय वस्तु विक्रय अधिनियम के अंतर्गत अधिशासी होता है। इससे पूर्व के आलेख में संपत्ति अंतरण अधिनियम की धारा 53 (क) जोकि भागिक पालन के संबंध में प्रावधान करती है का...
संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 भाग 21: संपत्ति संबंधी वाद के लंबित रहते हुए संपत्ति का अंतरण (धारा 52)
संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 की धारा 52 किसी संपत्ति के ऐसे अंतरण पर रोक लगाती है जिस के संबंध में कोई वाद न्यायालय में लंबित है। इस धारा का मूल अर्थ यह है कि जब भी किसी संपत्ति पर कोई विवाद न्यायालय के समक्ष पंजीकृत हो तब उस संपत्ति का अंतरण नहीं किया जाए और यदि ऐसा अन्तरण किया जाता है तब उस अंतरण को अवैध और शून्य करार दिया जाएगा। अधिनियम कि यह धारा 52 इसकी अवधारणा पर स्पष्ट रूप से प्रावधान करती है तथा उससे संबंधित नियमों को प्रस्तुत करती है। इस आलेख के अंतर्गत लेखक इस धारा की विस्तारपूर्वक...
संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 भाग 20: त्रुटियुक्त हकों के अधीन सद्भावना से धारकों द्वारा किए गए सुधार (धारा 51)
संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 की धारा 51 त्रुटि युक्त हकों के अधीन सद्भावना से किए जाने वाले सुधार कार्यों के संबंध में उल्लेख करती है। इस आलेख के अंतर्गत धारा 51 से संबंधित प्रावधानों पर सारगर्भित टिप्पणी की जा रही है। यह धारा का मूल लक्ष्य यह है कि यदि किसी व्यक्ति को कोई संपत्ति अंतरित की जाती है और वह संपत्ति का स्वयं को आत्यंतिक स्वामी मानकर उसमें कोई बढ़ोतरी करता है या उसमें कोई सुधार करता है और इस प्रकार के सुधार में वह कोई खर्च करता है तब वह खर्चे का प्रतिकर पाने का अधिकारी होता है। इस...
संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 भाग 19: अप्राधिकृत व्यक्ति द्वारा अंतरण (धारा 43)
संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 की धारा 43 अप्राधिकृत व्यक्ति द्वारा अंतरण के विषय में उल्लेख कर रही है। इस धारा का अर्थ यह है कि यदि कोई व्यक्ति किसी संपत्ति का अंतरण उस समय कर देता है जिस समय वह इस प्रकार का अंतरण करने के लिए अधिकृत नहीं है परंतु बाद में वह संपत्ति का अंतरण करने के लिए अधिकृत हो जाता है तब इस अधिनियम के क्या प्रावधान होंगे वे सभी प्रावधान इस धारा में समाहित किए गए हैं। इनसे संबंधित टीका इस आलेख पर प्रस्तुत किया जा रहा है। इससे पूर्व के आलेख में दृश्यमान स्वामी अर्थात धारा 41 से...
संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 भाग: 18 दृश्यमान स्वामी (ostensible owner) क्या होता है (धारा 41)
संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 की धारा 41 दृश्यमान स्वामी के संबंध में प्रावधान उपलब्ध करती है। जैसा कि शब्द से प्रतीत होता है दृश्यमान का अर्थ होता है ऐसा व्यक्ति जो संपत्ति का असल स्वामी नहीं है परंतु वे संपत्ति का स्वामी प्रतीत होता है। साधारण भाषा पर इसे संपत्ति का नकली स्वामी कहा जा सकता है। इसके संबंध में भारत में बेनामी संपत्ति प्रतिषेध अधिनियम 1988 भी निर्माण किया गया है। इस धारा के अंतर्गत इस प्रकार के सिद्धांत पर पूर्ण विवेचन प्रस्तुत की गयी है। आलेख के अंतर्गत इस धारा की व्याख्या...
संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 भाग: 17 भूमि के उपयोग पर निर्बंधन लगाने वाली बाध्यता का बोझ (धारा 40)
संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 की धारा 40 भूमि के उपयोग पर निर्बंधन लगाने वाली बाध्यता के बोझ के संबंध में उल्लेख करती है। इस आलेख के अंतर्गत धारा 40 से संबंधित सभी महत्वपूर्ण बातों को प्रस्तुत किया जा रहा है। धारा 40 ऐसी धारा है जो संपत्ति अंतरण अधिनियम के अंतर्गत संविदा में होने वाली चूक को भी स्पष्ट कर रही है और यह भी तथ्य प्रस्तुत कर रही है कि केवल संविदा के पक्षकारों एवं आश्रित पर ही संविदा बाध्यकारी होती है और इसी के साथ नकारात्मक शर्त या निर्बन्धात्मक संविदाएं किसी भी पक्षकार के विपरित...
संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 भाग: 16 निर्वाचन का सिद्धांत क्या है
संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 की धारा 35 निर्वाचन के सिद्धांत के संबंध में उल्लेख कर रही है। इस अधिनियम के अंतर्गत निर्वाचन क्या होता है और धारा 35 का उद्देश्य क्या है इन सभी जानकारियों से संबंधित यह आलेख है। इस आलेख के अंतर्गत संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 की धारा 35 पर टीका प्रस्तुत किया जा रहा है तथा उसकी सारगर्भित व्याख्या प्रस्तुत की जा रही है। इससे पूर्व के आलेख में संपत्ति अंतरण अधिनियम की कुछ धाराओं की व्याख्या प्रस्तुत की गई थी। इस अधिनियम की धारा 35 महत्वपूर्ण धाराओं में से एक धारा...
संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 भाग: 15 संपत्ति अंतरण अधिनियम के धारा 27 से लेकर 34 तक के महत्वपूर्ण प्रावधानों पर व्याख्या
संपत्ति अंतरण अधिनियम अंतर्गत लगभग तो सभी धाराएं महत्वपूर्ण है। कुछ धाराएं महत्वपूर्ण होने के साथ छोटी भी हैं पर इस अधिनियम में उनका उनका स्थान बड़ी धाराओं के समक्ष ही है। इस आलेख के अंतर्गत संपत्ति अंतरण अधिनियम की धारा 27 से लेकर 34 तक की व्याख्या प्रस्तुत की जा रही है। पिछले आलेख के अंतर्गत पूर्ववर्ती शर्त और पुरोभाव्य शर्त की पूर्ति पर टीका किया गया था।धारा 27:-इस धारा का उद्देश्य अन्तरक के आशय को तब प्रभावी बनाना है जबकि पूर्विक हित विफल हो गया हो। इसे इंग्लिश कानून के अन्तर्गत त्वरिताप्ति...
संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 भाग: 14 सशर्त अन्तरण और पुरोभाव्य शर्त की पूर्ति
संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 की धारा 25 सशर्त अंतरण के संबंध में प्रावधान करती है तथा धारा 26 पुरोभाव्य शर्त की पूर्ति के संबंध में प्रावधान कर रही है। यह इस अधिनियम की दो महत्वपूर्ण धाराएं हैं। इस आलेख के अंतर्गत लेखक इन दोनों ही धाराओं पर व्याख्या प्रस्तुत कर रहे हैं। इससे पूर्व के आलेख में संपत्ति अंतरण अधिनियम की धारा 21 के अंतर्गत समाश्रित हित के संबंध में उल्लेख किया गया था। सशर्त अंतरण कुछ शर्तों का निर्धारण करता है और किन शर्तों पर अंतरण होता नहीं है या अवैध होता है उनका उल्लेख करता...
संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 भाग: 13 संपत्ति अंतरण अधिनियम के अंतर्गत समाश्रित हित क्या होता है
संपत्ति अंतरण अधिनियम 1882 की धारा 21 समाश्रित हित के संबंध में उल्लेख करती है। इस धारा में समाश्रित घटना पर आधारित होने वाले अंतरण के संबंध में विस्तार से नियम दिए गए हैं। इस आलेख में उन्हीं नियमों पर चर्चा की जा रही है इससे पूर्व के आलेख में इस अधिनियम की धारा 19 से संबंधित निहित हित पर प्रकाश डाला गया था। समाश्रित हित पर अंतरण इस अधिनियम की महत्वपूर्ण धाराओं में से एक है जिसकी जानकारी इस अधिनियम को समझने के लिए अति आवश्यक है।संपत्ति अंतरण अधिनियम की "धारा 21" समाश्रित हित के प्रावधान को कुछ...
संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 भाग: 12 संपत्ति अंतरण अधिनियम के अंतर्गत निहित हित क्या होता है
संपत्ति अंतरण अधिनियम की धारा 19 निहित हित से संबंधित प्रावधानों को उल्लेखित करती है। इस आलेख के अंतर्गत निहित हित पर सारगर्भित प्रस्तुति दी जा रही है तथा इससे पूर्व के आलेख में इस अधिनियम से संबंधित धारा 17 जो किसी संपत्ति के अंतरण पर आय के संचयन से संबंधित है पर उल्लेख किया गया था।निहित हित- धारा 19इस धारा में निहित हित की परिभाषा प्रस्तुत की गयी है। निहित हित सम्पत्ति में एक ऐसा हित होता है जो अन्तरितों को तुरन्त सम्पत्ति का अधिकारी बना देता है और अन्तरितो या तो तुरन्त या भविष्य में सम्पत्ति...
संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 भाग: 11 अंतरण की जाने वाली संपत्ति की आय को एक निश्चित समय के लिए स्टॉक करने से संबंधित निर्देश
संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 की धारा-17 संपत्ति के संचयन के निर्देश से संबंधित है यह धारा इस अधिनियम की धारा 14 जिसका उल्लेख पिछले आलेख में किया गया था जो शाश्वतता के नियम के विरुद्ध प्रावधान कर रही है उसका एक अपवाद है। इस आलेख के अंतर्गत अंतरण के समय संपत्ति की आय के संचयन की एक निश्चित अवधि से संबंधित जानकारियों को प्रस्तुत किया जा रहा है। इस आलेख का संबंध संपत्ति अंतरण अधिनियम की धारा 17 से है।संचयन के लिए निर्देश (धारा-17)संपत्ति अंतरण अधिनियम 1882 इस धारा को कुछ इन शब्दों में प्रस्तुत करती...









