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संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 भाग 27: बंधककर्ता का मोचन का अधिकार (धारा 60)

Shadab Salim
16 Aug 2021 1:59 PM GMT
संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 भाग 27: बंधककर्ता का मोचन का अधिकार (धारा 60)
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संपत्ति अन्तरण अधिनियम की धारा 60 बंधककर्ता के मोचन के अधिकार का उल्लेख करती है। यह ऐसा अधिकार है जो बंधककर्ता को बंधक रखी गई संपत्ति पर उपलब्ध होता है। इस आलेख के अंतर्गत बंधककर्ता के इस अधिकार का उल्लेख किया जा रहा है। मोचन का अधिकार बंधक संपत्ति अन्तरण में सर्वाधिक महत्वपूर्ण अधिकार है। इससे पूर्व के आलेख में बंधक के संबंध में इस अधिनियम में प्रस्तुत किए गए प्रावधानों पर चर्चा की गई थी।

मोचनाधिकार से तात्पर्य बन्धककर्ता के उस अधिकार से है जिसके माध्यम से वह बन्धकधन के भुगतान हेतु प्रतिभूत रखी गयी सम्पत्ति, बन्धक धन की अदायगी होते ही बन्धकदार से वापस प्राप्त करता है।

'रिडीम' शब्द से तात्पर्य है सम्पत्ति को वापस प्राप्त करना या दायित्व से मुक्त कराना। इंग्लिश विधि के अन्तर्गत इस अधिकार को मोचन की साम्या के नाम से जाना जाता है। इसका कारण यह है कि यह अधिकार साम्या न्यायालयों की देन है। बन्धकदार के जप्तीकरण के अधिकार के विरुद्ध बन्धककर्ता को उपचार प्रदान करते हुए न्यायालयों ने यहाँ तक मत व्यक्त किया है।

निश्चित तिथि पर बन्धक धन का भुगतान न होने की दशा में भी यह अधिकार जीवित रहता है, नष्ट नहीं होता है। इसके विपरीत भारत में मोचनाधिकार एक विधिक अधिकार है क्योंकि वह संविधि में उल्लिखित है।

बन्धक के सम्व्यवहार में बन्धककर्ता, जो कि बन्धक सम्पत्ति का स्वामी होता है तथा अपने स्वामित्व के कतिपय हितों को बन्धकदार को हस्तान्तरित करता है एवं कतिपय हितों को स्वयं धारित किए रहता है, मोचन का अधिकार स्वयं धारित किए हुए हितों में से एक है जिसका प्रयोग वह (बन्धककर्ता) अपने अवशिष्ट स्वामित्व (हितों) के फलस्वरूप उन हितों को प्राप्त करने के लिए करता है जिन्हें उसने बन्धकदार को हस्तान्तरित कर दिया था।

मोचन का अधिकार एक संविधि अधिकार है। इसका अन्त केवल उन्हीं रीतियों से हो सकता है जिन्हें विधि में मान्यता दी गयी है, यह रीतियां निम्न है-

(क) पक्षकारों के बीच करार द्वारा।

(ख) विलयन द्वारा।

(ग) विधिक उपबन्ध द्वारा जो बन्धककर्ता को बन्धक का मोचन करने से रोकता हो।

यदि ऐसा नहीं है तो मोचन का अधिकार अस्तित्ववान रहेगा भले बन्धककर्ता निर्धारित तिथि पर बन्धक धन का भुगतान करने में विफल रहा हो। बन्धक विलेख में अन्तर्विष्ट कोई प्रावधान जो मोचन को रोकने या गतिरोध उत्पन्न करने या उसका अपवंचन करने के उद्देश्य से है, शून्य होगा।

यदि बन्धककर्ता बन्धक धन का भुगतान करने में विफल रहता है और बन्धकदार बन्धक सम्पत्ति को बेचने का निर्णय लेता है तथा कोई व्यक्ति उक्त बन्धक सम्पत्ति को विक्रय द्वारा प्राप्त करने हेतु प्रस्थापना करता है एवं बन्धकदार उक्त प्रस्थापना को स्वीकार कर लेता है किन्तु प्रस्थापक एवं बन्धकदार के बीच विक्रय विलेख का निष्पादन नहीं हुआ है, तो इस अवस्था में भी यह नहीं कहा जा सकेगा कि बन्धककर्ता का मोचन का अधिकार समाप्त हो गया है। इस अवस्था में भी बन्धककर्ता अपने मोचन के अधिकार का प्रयोग करने में समर्थ होगा।

मोचनाधिकार विद्यमान बन्धक का एक अनुसंग है और तब तक अस्तित्व में रहता है जब तक कि बन्धक स्वयं अस्तित्व में रहता है। यह स्वयं इस धारा में वर्णित रीति से ही समाप्त हो सकता है। और यदि यह अभिकथित किया जाता है कि न्यायालय की डिक्री द्वारा अधिकार समाप्त हो गया है, तो वह आवश्यक है कि डिक्री मोचनाधिकार के समापन हेतु वर्णित रीति के अनुसार ही मोचनाधिकार एक विधिक अधिकार है।

इसे ऐसी किसी भी शर्त द्वारा प्रतिबन्धित नहीं किया जा सकता है जो इस पर रोक लगाती हो या बाधा उत्पन्न करती हो यह कथन इस तथ्य से सुस्पष्ट है कि इस धारा में किसी प्रतिकूल संविदा के अभाव में पदावलि का प्रयोग नहीं किया गया है। यदि ऐसी कोई शर्त लगायी गयी है तो वह शून्य होगी।

मोचन का सिद्धान्त प्रारम्भ में प्रत्येक बन्धक संविदा में यह शर्त हुआ करती थी कि यदि निश्चित तिथि पर बन्धककर्ता, बन्धकधन का भुगतान करने में विफल रहता है तो बन्धक सम्पत्ति आत्यन्तिक रूप से बन्धकदार को हो जाएगी।

पर इंग्लैण्ड में साम्या न्यायालयों ने यह महसूस किया कि बन्धक के अधिकांश मामलों में बन्धकदार अनेक प्रकार से यह प्रयत्न करता है कि बन्धक सम्पत्ति उसी के पास बनी रहे। इस प्रकार पहले से ही शोषित बन्धककर्ता को, बन्धकदार सम्पत्ति से भी वंचित करने का प्रयास करते हैं यह प्रक्रिया प्रतिभूति को सम्पूर्ण अवधारणा को हो समाप्त कर देती है।

इस समस्या से बन्धककर्ता को मुक्ति दिलाने हेतु साम्या न्यायालयों ने यह घोषित किया कि बन्धक लिखत में जब्ती का प्रावधान होने के बावजूद भी बन्धककर्ता को यह अधिकार होगा कि बन्धक धन तथा खचों का भुगतान कर बन्धक सम्पत्ति बन्धकदार से वापस प्राप्त कर सके।

न्यायालय ने अपनी मान्यता को निम्नलिखित पदावलि में व्यक्त किया : 'एक बार बन्धक सदैव बन्धक और बन्धक के अतिरिक्त कुछ नहीं।'

सिद्धान्त "एक बार बन्धक, सदैव बन्धक" सर्वप्रथम हॅरिस बनाम हैरिस के बाद में लाई नाट्टियम द्वारा दृढ़ता पूर्वक स्थापित किया गया था। यह सिद्धान्त बन्धककर्ता के मोचनाधिकार को संरक्षण देने हेतु है।

यह सिद्धान्त बन्धक विलेख में उल्लिखित समस्त करारों को जो मोचन के अधिकार को जब्त करते हैं तथा विल्लंगमों को या बन्धकदार द्वारा सम्पत्ति के संव्यवहारों, जो कि बन्धककर्ता के मोचनाधिकार के प्रयोग में व्यवधान उत्पन्न करते हों, को शून्य घोषित करता है।

सन् 1902 में एक इंग्लिश एक वाद में कहा गया है कि,

"और बन्धक के सिवाय कुछ नहीं। अतः वर्तमान में यह सूत्र अपने पूर्ण रूप में इस प्रकार है, "एक बार बन्धक, सदैव बन्धक और बन्धक के सिवाय कुछ नहीं।"

इस सूत्र वाक्य को इस प्रकार अभिव्यक्त किया गया है-'एक बन्धक को अमोचनीय नहीं बनाया जा सकता है और ऐसे उपबन्ध जो मोचन को अमोचनीय बनाते हों, शून्य होंगे। भारत के सन्दर्भ में इस सूत्र की अभिव्यक्ति सेठ गंगाधर बनाम शंकर लाल के बाद में न्यायमूर्ति सरकार ने की है कि "बन्धक सदैव मोचनीय है"।

इस सिद्धान्त का उद्देश्य यह है कि संव्यवहार को जो वस्तुतः ऋण का संव्यवहार था और जिसके भुगतान के लिए प्रतिभूति दी गयी थी, अन्तरिती के चातुर्यपूर्ण प्रयत्नों के बावजूद, स्वामित्व विषयक संव्यवहार में परिवर्तित न किया जा सके या ऐसे संव्यवहार में परिवर्तित न किया जा सके जिसका प्रभाव स्वामित्व के अन्तरण के तुल्य हो।"

धारा 60 में वर्णित सिद्धान्त सभी प्रकार के बन्धकों पर लागू होता है चाहे वह प्रतिभूत बन्धक या अप्रतिभूत बन्धक हो।

मोचनाधिकार तथा जब्तीकरण का अधिकार- मोचनाधिकार बन्धककर्ता को प्राप्त है, जब कि जब्तीकरण अथवा विक्रय का अधिकार बन्धकदार को प्राप्त है किन्तु दोनों ही अधिकारों का विस्तार समान है।

जब बन्धककर्ता का मोचन का अधिकार शोध्य होता है, उसी समय बन्धकदार का अपनी प्रतिभूति को प्रवर्तित कराने का अधिकार भी शोध्य होता है। किन्तु इस सिद्धान्त को बन्धक की शर्तों द्वारा सीमित किया जा सकता है और यदि परिसीमन (Limitation) अनुचित या दमनकारी नहीं है तो उसे प्रभावी बनाया सकेगा।

इस धारा में वर्णित मोचनाधिकार के निम्नलिखित तत्व हैं :-

1. बन्धक धन का भुगतान या भुगतान हेतु निविदा

2. भुगतान या निविदा उचित समय पर हो।

3. भुगतान या निविदा उचित स्थान पर हो।

4. अधिकार के प्रवर्तन हेतु वाद दायर किया जायें।

5. अधिकार के प्रवर्तन की सूचना।

1)- बन्धक धन का भुगतान या भुगतान हेतु निविदा- मोचनाधिकार के प्रयोग हेतु आवश्यक है कि बन्धककर्ता, बन्धकधन का ब्याज़ के साथ भुगतान बन्धकदार या उसके द्वारा प्राधिकृत व्यक्ति को करे या भुगतान करने की निविदा करे। यदि अनेक बन्धकदार हैं, तो सभी को संयुक्त रूप से भुगतान किया जाना चाहिए, किन्तु बन्धककर्ता, बन्धकदार के निष्पादकों को तब तक भुगतान करने के लिए बाध्य नहीं है जब तक कि वे इच्छा पत्र प्रमाण न प्राप्त कर लें।।

बन्धक धन का भुगतान न होने की दशा में भुगतान हेतु निविदा आवश्यक है। निविदा से आशय न हैं, बन्धक धन एवं ब्याज़ के भुगतान हेतु बन्धककर्ता द्वारा शर्त रहित प्रस्ताव ऐसा होना चाहिए जिसमें बन्धकदार को बन्धक धन प्राप्त होने की पूरी सम्भावना हो निविदा शर्तरहित होनी चाहिए तथा देय धन से कम की नहीं होनी चाहिए।

वैध निविदा से ब्याज़ लगना बन्द हो जाता है। किन्तु अवैध निविदा से यह लाभ बन्धककर्ता को नहीं मिलता है। निविदा, बन्धकदार से या तो व्यक्तिगत तौर पर की जा सकती है या धारा 83 के अन्तर्गत न्यायालय में जमा जा सकती है।

2)- उपयुक्त समय पर- उपयुक्त समय पर से तात्पर्य उस दिन से है जिसके पश्चात् मोचनाधिकार शोध्य हो गया है। बन्धक धन का भुगतान या भुगतान की निविदा कारोबार के सामान्य कालावधि के दौरान की जानी चाहिए। यदि यह क्रिया इस कालावधि के उपरान्त की जाती है तो भुगतान की निविदा वैध नहीं मानी जाएगी।

3. उपयुक्त स्थान पर - बन्धक धन का भुगतान उपयुक्त स्थान पर होना चाहिए। उपयुक्त स्थान से अभिप्राय उस स्थान से है जहाँ बन्धकदार साधारणतया निवास करता है, किन्तु यदि बन्धककर्ता और बन्धकदार के बीच संविदा द्वारा किसी अन्य स्थान का चयन किया गया है तो भुगतान चयनित स्थान पर होना चाहिए।

4. मोचनाधिकार वाद का दायर किया जाना—बन्धक का मोचन, इस धारा के अन्तर्गत न्यायालय से बाहर किया जा सकता है, अथवा धारा 82 के अन्तर्गत न्यायालय में न्यायालय से बाहर का मोचन बहुप्रचलित प्रक्रिया है, किन्तु यदि इस अधिकार का प्रयोग धारा 82 के अन्तर्गत किया जा रहा है तो धारा 91 के अर्न्तगत न्यायालय में इस आशय का वाद दायर करना आवश्यक होगा।

वाद बन्धककर्ता के अतिरिक्त धारा 91 में वर्णित व्यक्ति भी दायर करने के हकदार हैं। वाद दायर करने वाले व्यक्ति को यह सिद्ध करना होगा बन्धक अभी समाप्त नहीं हुआ है। वह अस्तित्व में है। मोचनाधिकार रखने वाले सभी व्यक्तियों को संयुक्त रूप से वाद दायर करना होगा।

वाद केवल तब दायर होगा जब मोचनाधिकार शोध्य हो गया हो। यदि बन्धक धन के भुगतान की निविदा की जाती है निविदा का वाद दायर होने से पहले किया जाना आवश्यक नहीं है।

मोचनाधिकार शोध्य होने की तिथि से 30 वर्ष की अवधि समाप्त होने तक वाद दायर हो जाना चाहिए। पर यह आवश्यक है कि इस कालावधि में बन्धकदार ने अपने जब्तीकरण के अधिकार का प्रयोग न किया हो। 30 वर्ष की अवधि का परिकलन उस तिथि से किया जाएगा जिस तिथि को बन्धककर्त्ता मोचन करने के लिए प्राधिकृत हुआ था।

यदि बन्धक एक निश्चित कालावधि के लिये किया गया था तो उस तिथि के समापन के पश्चात् कभी भी 30 वर्ष की अवधि पूर्ण होने से पूर्व मोचनाधिकार का प्रयोग किया जाना चाहिए। पर यदि बन्धक किसी निश्चित कालावधि के लिए नहीं किया गया था तो बन्धककर्ता कभी भी अपने मोचनाधिकार का प्रयोग कर सकेगा।

बन्धककर्ता के मोचनाधिकार के प्रयोग पर किसी प्रकार का परिसीमन लागू नहीं होगा। कालावधि रहित बन्धक सामान्य सिद्धान्त "एक बार बन्धक सदैव बन्धक" द्वारा विनियमित होगा।

मर्यादा अधिनियम, 1963 के अन्तर्गत मोचन हेतु वाद बन्धक को तिथि से 30 वर्ष के अन्दर कभी भी दाखिल किया जा सकता है और इस अवधि में यदि वाद संस्थित कर दिया गया है तो यह नहीं समझा जाएगा कि मोचन का अधिकार परिसीमा के कारण कालबाधित हो गया है। एक वाद में 'क' ने अपनी सम्पत्ति 'ख' के पक्ष में सन् 1912 में बन्धक रखा।

तत्पश्चात् 'ख' ने उक्त सम्पत्ति तथा कुछ अन्य सम्पत्ति 'ग' के पक्ष में सन् 1940 में बन्धक कर दिया। यह बन्धक रजिस्ट्रीकृत विलेख द्वारा किया गया था जिसमें यह अभिस्वीकृति की गयी थी कि 'ग' के पक्ष में बन्धक की गयी सम्पत्ति में वह सम्पत्ति भी सम्मिलित है जिसका बन्धक 'क' ने 'ख' के पक्ष में किया था।

अतः यह कहा जा सकेगा कि 'ख' ने 'क' की सम्पत्ति का एक उपबन्धक 'ग' के पक्ष में सृजित कर दिया था। 'क' की तरफ से अपनी सम्पत्ति के मोचन हेतु एक वाद संस्थित किया गया। 20-11-1967 को 'ग' ने इस वाद का विरोध इस आधार पर किया कि यह अब कालबाधित हो चुका है अतः यह न्यायालय में पोषणीय नहीं है।

न्यायालय ने इस तर्क को इस आधार पर अस्वीकार कर दिया कि 'ख' ने सम्पत्ति का उपपट्टा सन् 1940 में किया था। परिसीमन अधिनियम, 1908 के अन्तर्गत 60 वर्ष का परिसीमन था किन्तु परिसीमन अधिनियम, 1963 के अन्तर्गत इस अवधि को घटा कर 30 वर्ष कर दिया गया है और यह 30 वर्ष की अवधि 1970 में समाप्त होगी।

सन् 1940 से गणना करने पर मोचन हेतु वाद सन् 1967 में ही संस्थित किया गया था जो कि परिसीमन अवधि की समाप्ति से दो वर्ष पहले ही है। अतः मोचनाधिकार के प्रयोग हेतु न्यायालय की डिक्री प्राप्त करने हेतु संस्थित वाद कालबाधित नहीं माना जाएगा।

क्या पूर्विक वाद का उत्सर्जन (dismisal) पाश्चिक वाद को प्रभावित करेगा- किसी पूर्विक वाद का उत्सर्जन, चाहे वाह अवसान द्वारा या वापसी द्वारा या व्यतिक्रम द्वारा हुआ हो, बन्धककर्ता को नवीन वाद दायर करने से प्रतिषिद्ध नहीं करेगा, और इसलिए जब तक बन्धक अस्तित्व में रहेगा, क्रमशः पाश्चिक वाद दायर किये जा सकेंगे, बशर्ते मोचनाधिकार समाप्त न हुआ

5)- मोचन की सूचना- यह धारा स्वयं यह अपेक्षा नहीं करता है कि मोचन से पूर्व बन्धककर्ता, बन्धकदार को निश्चित रूप से मोचन की सूचना दे। पर बन्धकदार यदि चाहे तो इस आशय का करार कर सकता है। इससे उसे अपने धन के पुनर्विनियोग में सहायता प्राप्त होगी। सूचना के लिए कोई कालावधि निश्चित नहीं है।

इंग्लैण्ड में 6 माह की अवधि, इस प्रयोजन हेतु स्वीकार की गयी है। यदि 6 माह की सूचना नहीं दी गयी है तो 6 महीने का ब्याज देना होगा किन्तु भारत में नोटिस न देने मात्र से बन्धककर्ता को मोचनाधिकार के प्रयोग से रोका नहीं जा सकेगा। पर यह उचित होगा, कि भारत में भी 6 महीने की कालावधि को इस निमित्त स्वीकार कर लिया जाए।

मोचनाधिकार के प्रयोग पर बन्धककर्ता के अधिकार-विमोचन करने पर बन्धककर्ता के निम्नलिखित अधिकार होंगे :-

1. बन्धक विलेख तथा स्वत्व विलेख को वापस पाने का अधिकार।

2. बन्धक सम्पत्ति का कब्जा प्राप्त करने का अधिकार तथा

3. पुनर्हस्तान्तरण और अभिस्वीकृति।

विमोचन की प्रक्रिया पूर्ण होने पर बन्धकदार का यह दायित्व होता है कि वह भूमि का कब्जा बन्धककर्ता को प्रदान करें। इसके साथ ही साथ अन्य सभी भूमियों का कब्जा भी उसे वापस करना होगा जो बन्धक के दौरान उसके पास आयी थी। बन्धक सम्पत्ति के पुनर्हस्तान्तरण का व्यय बन्धककर्ता को वहन करना पड़ेगा।

यदि बन्धक, पंजीकृत विलेख द्वारा प्रभावी किया गया था तथा पुनर्हस्तान्तरण आवश्यक नहीं है, तो ऐसी स्थिति में बन्धकदार पंजीकृत अभिस्वीकृति की माँग कर सकेगा। अभिस्वीकृति यह सुस्पष्ट करेगी कि बन्धक धन का भुगतान हो चुका है।

मोचनाधिकार का समापन-मोचनाधिकार का समापन इस धारा में वर्णित किसी रीति से हो सकेगा। इस धारा के अन्तर्गत निम्नलिखित विधियों का उल्लेख किया गया है:

(1) जब्तीकरण।

(2) विक्रय।

(3) कालावधि का समापन।

(4) बन्धकदार के पक्ष में अभित्यजन।

(5) विमोचन।

मोचनाधिकार वाद में अन्तिम डिक्री पारित होने के पश्चात् समाप्त हो जाता है। परन्तु यह आवश्यक है कि वाद जब्तीकरण हेतु अथवा मोचनाधिकार के प्रयोग हेतु संस्थित किया गया हो। जप्तीकरण हेतु आदेश तभी पारित किया जा सकेगा जब न्यायालय बन्धक की प्रकृति तथा बन्धक के अध्यधीन पक्षकारों के अधिकारों को सुनिश्चित कर लें।

प्रस्तुत प्रकरण में फ्रैंसिस परेरा, जो कि एडविन परेरा के पूर्वज थे, ने अपनी सम्पत्ति भोग बन्धक द्वारा कुमारन केशवन नामक एक व्यक्ति के पक्ष में अन्तरित किया था। कुमारन केशवन के विलासिनों के पूर्वज थे। फॅसिस परेरा ने एक वसीयत भी लिखा था जिसके अनुसार मोचन को साम्या अन्ततः उसके कतिपय बच्चों को मिलनी थी।

बन्धक के मोचन हेतु सम्पत्ति स्वामियों को ओर से वाद प्रस्तुत किया गया एवं न्यायालय ने डिक्री पारित किया कि इस निमित्त 6 मास को अवधि के अन्दर रु० 41,33,508.70 मात्र जमा किए जाएं। पर उपरोक्त रकम निर्धारित अवधि के अन्तर्गत जमा न की जा सकी। अतः कथित रकम को जमा करने हेतु न्यायालय से अतिरिक्त समय की माँग की गयी।

न्यायालय ने पुनः समय प्रदान किया पर इस बार भी रकम जमा न हो सकी। पुनः 6 मास का समय देने हेतु आवेदन प्रस्तुत किया गया किन्तु न्यायालय ने समय देने से इन्कार कर दिया। पर एक अन्य आवेदन, निरसित आवेदन को पुनः स्थापित करने हेतु संस्थित किया गया जिसे न्यायालय ने स्वीकार कर लिया तथा उपरोक्त रकम जमा करने हेतु अतिरिक्त समय प्रदान कर दिया।

ऐसी स्थिति में प्रश्न उठा कि मोचन का अधिकार कब तक विद्यमान रहता है एवं कब समाप्त जाता है। स्थिति को सुस्पष्ट करते हुए न्यायालय ने कहा कि मोचन का अधिकार तब समाप्त हो जाता है जब कि सिविल प्रक्रिया संहिता के,

(1) आदेश 34 नियम 3 (2) के अन्तर्गत जब्तीकरण हेतु अन्तिम डिक्री पारित हो जाती है या फिर

(2) आदेश 34 नियम 8 (3) के अन्तर्गत मोचनाधिकार के प्रयोग हेतु संस्थित वाद पर अन्तिम डिक्री पारित हो जाती है।

प्रस्तुत मामले में न्यायालय द्वारा आदेशित रकम को जमा करने के लिए बार-बार अतिरिक्त समय की माँग की गयी थी तथा सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 34 नियम 5 के अन्तर्गत न्यायालय ने समय प्रदान किया था। अतः ऐसी स्थिति में अपीलार्थी अपने जब्तीकरण के दावे को माँग नहीं कर सकेगा।

जब्तीकरण के अधिकार को प्रभावी बनाने हेतु विशिष्ट रूप से वाद संस्थित करना अनिवार्य होगा। यदि बन्धकी ने बन्धक सम्पत्ति पर कोई सुधार किया है और उस सुधार कार्य को करने में उसने धन व्यय किया है तो उस रकम को वापसी हेतु उसका विशिष्ट रूप से उल्लेख होता आवश्यक होगा यदि मोचनाधिकार के प्रयोग हेतु वाद संस्थित किया गया है।

यदि बन्धक ऋण की अदायगी हेतु बन्धक सम्पत्ति का विक्रय नीलामी के माध्यम से कर दिया जाता है तो बन्धककर्ता का मोचन का अधिकार उस समय समाप्त हो जाता है जब नीलामी क्रेता के पक्ष में विक्रय प्रमाणपत्र निर्गत कर दिया जाता है। बन्धककर्ता का मोचन का अधिकार तत्समय समाप्त हो जाता है। इस प्रकार किये गये विक्रय को साम्या को संतुलित करने या मात्र इस कारण से कि बन्धककर्ता सम्पूर्ण देयता का भुगतान करने को तैयार है, रद्द नहीं किया जा सकता है।

आंशिक मोचन - बन्धक सम्पत्ति किसी ऋण की अविभाजनीय प्रतिभूति होती, अत: इसे मोचन के प्रयोजनार्थ खण्डों में विभक्त नहीं किया जा सकता है। किसी भी बन्धक को खण्डों या टुकड़ों में मोचित नहीं किया जा सकता है। यह सिद्धान्त इस धारा के अन्तिम पैरा में स्पष्ट रूप से वर्णित है।

जो कोई भी बन्धक का मोचन करना चाहता है उसे सम्पूर्ण बन्धक को मोचित करना होगा, न कि किसी एक अंश को यदि कोई बन्धककर्ताओं में से किसी एक ने सम्पूर्ण बन्धकधन का भुगतान कर दिया है तो उसे अन्य बन्धककर्ताओं से अंशदान का अधिकार होगा। ऐसे बन्धककर्ताओं के सन्दर्भ में वह बन्धकदार की कोटि में रहेगा।

शेष बन्धककर्ता अपने मोचनाधिकार का प्रयोग उसके विरुद्ध करने के लिए सक्षम होंगे। सिद्धान्त यह है कि बन्धक सम्पत्ति में सभी हित रखने वाले व्यक्तियों को विमोचन वाद का पक्षकार होना चाहिए, किन्तु यह सिद्धान्त निम्नलिखित परिस्थितियों में लागू नहीं होता है-

(1) जहाँ सह बन्धकदारों के हित स्वतंत्र एवं भिन्न हैं ।

(2) जहाँ बन्धकदार बन्धक सम्पत्ति के एक अंश को सहबन्धकदारों के पक्ष में स्वीकार कर लेता है।

(3) जहाँ बन्धकदार बन्धक सम्पत्ति के एक अंश को क्रय कर लेता है।

उक्त सिद्धान्त का उद्देश्य बन्धकदार को अनेक कठिनाइयों से बचाना है। किन्तु जहाँ एक अंश को बन्धकदार की सम्मति से प्रभावित किया जा रहा है, आंशिक मोचन सम्भव है।

संयुक्त पारिवारिक सम्पत्ति की स्थिति - यदि एक संयुक्त पारिवारिक सम्पत्ति बन्धक की विषयवस्तु है तथा एक सहधारक अकेले ही समस्त बन्धक धन का भुगतान कर बन्धक सम्पत्ति का मोचन करता है तो ऐसे सहधारकों का अधिकार उक्त सम्पत्ति में समाप्त नहीं होता है।

मोचन के फलस्वरूप उन्मुक्त हुई सम्पत्ति सभी सहधारकों के लिए उपलब्ध रहती है तथा वे सभी जिन्होंने मोचन में भाग नहीं लिया था न्यायालय के माध्यम से सम्पत्ति का बँटवारा कर अपना अंश प्राप्त कर सकेंगे। केवल मोचन के अधिकार के प्रयोग के कारण मोचनकर्ता सम्पत्ति का एकमात्र स्वामी नहीं बन सकेगा। सहधारकों से उपयुक्त अंशदान की अपेक्षा मोचनकर्ता कर सकेगा।

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