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संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 भाग: 11 अंतरण की जाने वाली संपत्ति की आय को एक निश्चित समय के लिए स्टॉक करने से संबंधित निर्देश

Shadab Salim
9 Aug 2021 4:00 AM GMT
संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 भाग: 11 अंतरण की जाने वाली संपत्ति की आय को एक निश्चित समय के लिए स्टॉक करने से संबंधित निर्देश
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संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 की धारा-17 संपत्ति के संचयन के निर्देश से संबंधित है यह धारा इस अधिनियम की धारा 14 जिसका उल्लेख पिछले आलेख में किया गया था जो शाश्वतता के नियम के विरुद्ध प्रावधान कर रही है उसका एक अपवाद है। इस आलेख के अंतर्गत अंतरण के समय संपत्ति की आय के संचयन की एक निश्चित अवधि से संबंधित जानकारियों को प्रस्तुत किया जा रहा है। इस आलेख का संबंध संपत्ति अंतरण अधिनियम की धारा 17 से है।

संचयन के लिए निर्देश (धारा-17)

संपत्ति अंतरण अधिनियम 1882 इस धारा को कुछ इन शब्दों में प्रस्तुत करती है-

"(1) जहाँ कि सम्पत्ति के किसी अन्तरण के निर्बन्धन निर्दिष्ट करते हैं कि उस सम्पत्ति से उद्भूत आय

(क) अन्तरक के जीवन से, या

(ख) अन्तरण की तारीख से, अठारह वर्ष की कालावधि से अधिक कालावधि तक पूर्णत: या भागतः संचित की जाएगी, वहाँ एतस्मिन्पश्चात् यथा उपबंधित के सिवाय ऐसा निदेश वहाँ तक शून्य होगा, जहाँ तक कि वह कालावधि, जिसके दौरान संचय करना निर्दिष्ट है, पूर्वोक्त कालावधियों में से दीर्घतर कालावधि से अधिक हो और ऐसी अन्तिम वर्णित कालावधि का अन्त होने पर वह सम्पत्ति और उसकी आय इस प्रकार व्ययनित की जाएगी मानो वह कालावधि, जिसके दौरान में संचय करना निर्दिष्ट किया गया है, बीत गई है।

(2) यह धारा ऐसे किसी निदेश पर प्रभाव न डालेगी जो-

(1) अन्तरण के ऋणों का या अन्तरण के अधीन कोई हित पाने वाले किसी अन्य व्यक्ति के ऋणों का संदाय करने के, अथवा

(2) अन्तरक के या अन्तरक के अधीन कोई हित पाने वाले किसी अन्य व्यक्ति के पुत्र-पुत्रियों या दूरतर संतति के लिये भागों का उपबन्ध करने के, अथवा अन्तरित सम्पत्ति के परिरक्षण या अनुरक्षण के प्रयोजन से संचय करने के लिये हो और ऐसा निदेश तदनुकूल किया जा सकेगा।"

इस धारा में उल्लिखित सिद्धान्त भी उसी सिद्धान्त पर आधारित है जिस पर शाश्वतता के विरुद्ध सिद्धान्त, कि धन का किसी असंगत अवधि के लिए संचयन समाज के लिए हानिकारक है। विधि, सम्पत्ति के अन्तरण पर बल देती है, अतः ऐसा कोई भी उपाय जो सम्पत्ति के सामान्य अन्तरण पर प्रतिबन्ध लगाता है विधिमान्य नहीं होगा।

इसी प्रकार यदि सम्पत्ति से उद्भूत होने वाली आय को अनिश्चितकाल के लिए संचित किया जाता है तो ऐसा संचयन अवैध होगा। किन्तु यदि ऐसा संचयन युक्तियुक्त अवधि के लिए है तो विधिमान्य होगा। इस धारा में वर्णित सिद्धान्त धारा 11 में वर्णित सिद्धान्त का एक अपवाद प्रस्तुत करता है।

यह धारा उस अवधि का उल्लेख करती है जिससे अधिक की अवधि के लिए किया गया संचयन का निर्देश अवैध होगा। इसमें उल्लिखित अवधि इस प्रकार है-

(1) अन्तरक के जीवनकाल के लिए या (ii) अन्तरण को तिथि से 18 वर्ष तक की अवधि के लिए।

अन्तरक इस धारा के अन्तर्गत सम्पत्ति के संचयन हेतु उपरोक्त में से किसी एक कालावधि के लिए निर्देश कर सकेगा। ये वैकल्पिक परिसीमाएँ हैं। यदि संचयन के लिए निर्देश उपरोक्त में से किसी भी कालावधि से अधिक की अवधि के लिए होता है तो निर्धारित अवधि से अधिक के लिए किया गया निर्देश शून्य होगा।

यह धारा सम्पूर्ण अन्तरण को शून्य नहीं घोषित करती है कि उपरोक्त में से अन्तिम उल्लिखित अवधि के पश्चात् मूल सम्पत्ति तथा उससे उद्भूत आय दोनों हो इस प्रकार अन्तरित हो सकेंगों जैसे कि संचयन के लिए निर्देश इसी अवधि के लिए किया गया रहा हो और वह अवधि पूर्ण हो चुकी हो।

किन्तु यदि संचयन के लिए निर्देश उपरोक्त में से कोई भी अवधि उल्लिखित किए बिना किया गया हो तो यह देखा जाएगा कि अन्तरण की तिथि के उपरान्त घटनाक्रम किस प्रकार घटित होता है। यदि अन्तरण की तिथि से 18 वर्ष से अधिक की अवधि व्यतीत होने के पश्चात् अन्तरक को मृत्यु होती है तो निर्देश अन्तरक की मृत्यु के पश्चात् शून्य हो जाएगा।

यदि उसकी मृत्यु 18 वर्ष को अवधि व्यतीत होने से पूर्व ही हो जाती है तो निर्देश 18 वर्ष की अवधि व्यतीत होने के साथ हो शून्य हो जाएगा और सम्पत्ति तथा उससे उद्भूत आय स्वतंत्ररूप से अन्तरणीय होगी।

'अ' ने अपनी सम्पत्ति 'व' के पक्ष में सन् 1950 में इस निर्देश के साथ अन्तरित किया कि सम्पत्ति से उद्भूत आय सन् 1975 तक संचित की जाएगी। 'अ' को मृत्यु सन् 1970 में हो गयो अन्तरक चॉक 18 वर्ष से अधिक की अवधि तक अन्तरण की तिथि से जीवित था। अतः अन्तरण के लिए निर्देश सन् 1970 तक वैध रहेगा।

दूसरे शब्दों में यह अन्तरक के जीवनकाल के लिए वैध होगा किन्तु यदि अन्तरक की मृत्यु सन् 1960 में हुई होतो तो अधिकतम अवधि अन्तरण की तिथि से 18 वर्ष की हुई होती और निर्देश आठ वर्ष के लिए और वैध होता अर्थात् निर्देश सन् 1968 तक वैध रहता।

इस धारा में उल्लिखित अवधि वैकल्पिक है। अतः संचयन के लिए निर्देश इन दोनों अवधियों के संयुक्त काल के लिए नहीं हो सकेगा अर्थात् अन्तरक के जीवनकाल और 18 वर्ष के लिए।

संचयन के लिए निर्देश अभिव्यक्त अथवा विवक्षित हो सकेगा। यदि अन्तरक अन्तरण विलेख में केवल संकेत मात्र करता है तो संकेत संचयन के लिए पर्याप्त निर्देश होगा।

अवधि की परिगणना-

(1) अन्तरक के जीवनकाल के लिए किसी सम्पत्ति से उद्धृत आय का संचयन अन्तरक के जीवनकाल तक के लिए वैध और प्रवर्तनीय होता है। यदि अ' निर्देश दे कि मैं अपना मकान ब को उसके जीवनकाल के लिए देता हूँ, लेकिन उससे उद्भूत आय मेरी जिंदगी तक संचित होती रहेगी और इस प्रकार संचित आय मेरी मृत्यु के पश्चात् 'स' को दी जाएगी तो ऐसा निर्देश वैध होगा।

(2) 18 वर्ष की कालावधि के लिए- यदि उद्भूतः आय का संचयन अन्तरक के जीवनकाल के लिए विनिर्दिष्ट नहीं है तो 15 वर्ष को वैकल्पिक अवधि के लिए विनिर्दिष्ट किया जा सकेगा। इस अवधि का प्रारम्भ अन्तरण की तिथि से माना जाएगा, परन्तु वास्तविक परिगणना में उस तिथि की गणना नहीं की जाएगी जिस तिथि को अन्तरण किया गया था है

यदि आय का संचयन 18 वर्ष की कालावधि के लिए भविष्य को किसी तिथि से किया जाना है। तो संचयन केवल उस कालावधि के लिए प्रभावी होगा जो उक्त तिथि से 18 वर्ष तक की अवधि पूर्ण करने के लिए आवश्यक होगा तथा अवधि के लिए किया गया अन्तरण अवैध होगा। उदाहरणार्थ 'अ' अपनी सम्पत्ति ब को सन् 1970 में अन्तरित करता है।

अन्तरण इस निर्देश के साथ किया जाता है कि सन् 1975 से सम्पत्ति से उद्भूत होने वाली आय 18 वर्ष के लिए संचित की जाएगी। संचयन का आदेश केवल 18 वर्ष के लिए हो प्रभावी होगा अर्थात् सन् 1988 तक ही प्रभावी रहेगा। 18 वर्ष की कालावधि की गणना अन्तरण की तिथि से ही की जाएगी न कि उस तिथि से जिस तिथि से उसे प्रभावित होना आशयित है।

संचयन के नियम का अपवाद- धारा 17 (2)

इस सिद्धान्त के कतिपय अपवादों को संस्वीकृति प्रदान करती है-

(i) ऋण का भुगतान-

धारा 17 (1) में वर्णित सिद्धान्त ऐसे संचयन पर प्रभावी नहीं होगा जिसके अन्तर्गत अन्तरक ने स्वयं अपने अथवा अपने अधीन सम्पत्ति प्राप्त करने वाले किसी अन्य व्यक्ति के ऋणों के भुगतान के लिए संचयन का निर्देश दिया हो। ऐसे मामलों में संचयन किसी भी अवधि के लिए वैध होगा।

ऐसा निर्देश सम्पति को आत्यन्तिक रूप से इस प्रकार बाध्य नहीं करता है कि उसका अन्तरण न हो सके, क्योंकि ऋणदाता किसी भी समय ऋण के भुगतान के लिए बाध्य कर सकता है। ऋणों व्यक्ति किसी भी समय अपने प्रभार का भुगतान कर सकता है।

'अ' ने अपना 'पट्टाजन्य हित 'ब' के लाभ के लिए न्यासियों को अन्तरित किया और यह निर्देश दिया कि सम्पत्ति से उद्भूत आय पट्टे की अवधि के लिए संचित की जाएगी जिससे पट्टे की संविदा से उत्पन्न प्रभार यदि कोई उत्पन्न होता है की पूर्ति की जा सके। यह अभिनित हुआ कि ऐसा निर्देश वैध है।

देय ऋण वर्तमान हो सकता है अथवा भविष्य में उत्पन्न होने वाला मूलनिधि से ऋण का एक बार भुगतान एवं सन्तुष्टि होने के उपरान्त उस मूल निधि को पूर्ण करने के उद्देश्य से आय का संचयन ऋण के भुगतान हेतु प्रावधान नहीं माना जाएगा। ऋऋण के भुगतान हेतु प्रावधान को वैध होने के लिए उसका वास्तविक होना आवश्यक है

(ii) अंश (हिस्सा) के लिए उपबन्ध -

अंश का अर्थ है पुत्रों या उनके वंशजों के प्रलाभ के लिए सम्पत्ति का बन्दोवस्त या व्यवस्था। इसका अर्थ है किसी व्यक्ति के वंशजों, वंशजों के वंशजों तथा अन्य दूरस्थ सम्बन्धियों के लाभ के लिए अचल सम्पत्ति से उद्भूत आय का संचयन। 'ऐसा संचयन इस अपवाद के अन्तर्गत शाश्वतता के नियम से प्रभावित नहीं होगा और वैध होगा।

यह अपवाद उन परिस्थितियों में लागू नहीं होगा जहाँ कोई वर्तमान दायित्व नहीं है एक केवल विवेकाधीन भावी अधिकार है। इसी प्रकार यदि संचयन का निर्देश अन्तरक की सम्पूर्ण सम्पत्ति से किया गया है तो भी यह वैध नहीं होगा, क्योंकि इसे संचयन का निर्देश नहीं कहा जा सकेगा। यह बंदोबस्त के तुल्य नहीं होगा, अपितु सब कुछ देने के तुल्य होगा।

(iii) परिरक्षण तथा अनुरक्षण-

अन्तरित सम्पत्ति के परिरक्षण और अनुरक्षण के लिए निर्दिष्ट संचयन भी वैध होगा। इस अपवाद को इंग्लिश विधि में मान्यता नहीं प्रदान की गयी है।

अपवाद का आधार वाइन बनाम फैल नामक बाद माना जाता है। परिरक्षण तथा सुधार का आधार यह होना चाहिए कि सम्पत्ति को उसके वर्तमान मूल्य के बराबर बनाये रखा जाये। अतः जर्जर सम्पत्ति को उसको वर्तमान स्थिति में बनाये रखने के लिए आय का संचयन वैध है।

किन्तु अतिरिक्त आय का उपयोग सम्पति को वर्तमान स्थिति में बनाये रखने या सम्पत्ति की बीमा पॉलिसी द्वारा मूलधन में हुई कमी को पूर्ण करने हेतु निर्देश वास्तविक संचयन नहीं माना जाएगा। इन्हें शाश्वतता की अवधि के अन्तर्गत होना चाहिए।

दीघंतर अवधि- यदि संचयन का निर्देश अन्तरक के जीवनकाल के लिए या अन्तरण की तिथि से 18 वर्ष के लिए किया गया है तो वैध होगा। इन दोनों अवधियों में से जो भी अवधि अधिक होगी उसी के लिए संचयन वैध होगा।

अगर अन्तरक को अन्तरण की तिथि से 16 वर्ष बाद ही मृत्यु हो जाती है तो भी संचयन अवशिष्ट दो वर्ष के लिए जारी रहेगा, किन्तु यदि अन्तरक अन्तरण की तिथि से 20 वर्ष बाद तक जीवित रहता है तो संचयन अन्तरक के जीवनकाल के लिए वैध होगा।

दूसरे शब्दों में जिस दिन अन्तरक को मृत्यु होगी संचयन के लिए निर्देश समाप्त हो जाएगा। यदि उसके बाद भी संचयन होना है तो वह अवैध होगा, यदि संचयन के लिए निर्देश इस धारा में उल्लिखित किसी अपवाद के अन्तर्गत नहीं आता है।

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