इलाहाबाद हाईकोट
वकीलों के आपसी विवाद में ट्रिब्यूनल का हस्तक्षेप अस्वीकार्य: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मोटर वाहन अधिनियम, 1988 से जुड़े मुआवजा मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि वकीलों के आपसी विवाद में ट्रिब्यूनल का हस्तक्षेप बिल्कुल भी उचित नहीं है।मामले में वर्ष 2019 में लोक अदालत के आदेश के बावजूद याचिकाकर्ता को अब तक मुआवजा राशि नहीं मिली थी। वर्ष 2026 में MACT सुल्तानपुर के पीठासीन अधिकारी ने आदेश दिया कि याचिकाकर्ता के पूर्व वकील को सुने बिना राशि जारी नहीं की जा सकती। इस आदेश को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।जस्टिस जसप्रीत...
दिल्ली स्थित ट्रिब्यूनल के आदेश को चुनौती देने का अधिकार उसी क्षेत्र के हाईकोर्ट को: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए स्पष्ट किया कि नई दिल्ली स्थित सशस्त्र बल ट्रिब्यूनल (प्रधान पीठ) के आदेशों को चुनौती देने का अधिकार उसी क्षेत्राधिकार वाले हाईकोर्ट को है, न कि किसी अन्य हाईकोर्ट को।चीफ जस्टिस अरुण भंसाली और जस्टिस क्षितिज शैलेन्द्र की पीठ ने कहा कि जब आदेश नई दिल्ली स्थित ट्रिब्यूनल की प्रधान पीठ द्वारा पारित किया गया तो इलाहाबाद हाईकोर्ट के पास ऐसे आदेश को सुनने का क्षेत्राधिकार नहीं है।खंडपीठ ने कहा, “जब विवादित आदेश नई दिल्ली की प्रधान पीठ से पारित हुआ तो...
इलाहाबाद हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला: धोखाधड़ी और आपराधिक न्यासभंग साथ-साथ लग सकते हैं
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि एक ही मामले में 'धोखाधड़ी' और 'आपराधिक न्यासभंग' जैसे अपराध एक साथ लगाए जा सकते हैं, यदि परिस्थितियों से यह स्पष्ट न हो कि वास्तव में कौन सा अपराध बना है।जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की पीठ ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए आरोपी की जमानत याचिका खारिज की, जिस पर स्वयं सहायता समूह की गरीब महिलाओं से पैसा लेकर हड़पने का आरोप था।अदालत के सामने मुख्य सवाल यह था कि क्या भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 420 (धोखाधड़ी) और धारा 406 (आपराधिक न्यासभंग) को एक साथ लगाने...
म्यूटेशन कार्यवाही में नहीं तय होगा मालिकाना हक: इलाहाबाद हाईकोर्ट का स्पष्ट निर्देश
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि म्यूटेशन (नामांतरण) की कार्यवाही का उद्देश्य संपत्ति के मालिकाना हक का फैसला करना नहीं है। ऐसे विवादों का समाधान केवल सिविल कोर्ट में ही किया जा सकता है।जस्टिस जे.जे. मुनीर ने यह फैसला सुनाते हुए नायब तहसीलदार के उस आदेश को सही ठहराया, जिसमें 34 साल बाद दायर नामांतरण निरस्तीकरण की अर्जी को खारिज कर दिया गया।अदालत ने कहा,“याचिकाकर्ता और प्रतिवादी के बीच का विवाद जटिल मालिकाना हक से जुड़ा है, जिसे म्यूटेशन अधिकारी तय नहीं कर सकते।”मामले में...
मृत व्यक्ति के खिलाफ अपील दाखिल करने पर फटकार: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी सरकार की अपील खारिज की
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गंभीर लापरवाही का मामला सामने आने पर उत्तर प्रदेश सरकार को कड़ी फटकार लगाई। अदालत ने उस अपील को खारिज किया, जो सरकार ने ऐसे व्यक्ति के खिलाफ दाखिल की थी, जिसकी पहले ही मृत्यु हो चुकी है और उसके कानूनी वारिसों को पक्षकार भी नहीं बनाया गया।जस्टिस संदीप जैन ने कहा कि राज्य की ओर से अपील दाखिल करने में घोर लापरवाही बरती गई और केवल यह कहकर देरी को माफ नहीं किया जा सकता कि अपील दाखिल करने की अनुमति देर से मिली।अदालत ने टिप्पणी की,“राज्य की ओर से मृत प्रतिवादी के खिलाफ अपील दाखिल...
हैबियस कॉर्पस का इस्तेमाल पति को पेश कराने के लिए नहीं किया जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि मेंटेनेंस (भरण-पोषण) के मामले में वारंट से बच रहे पति को कोर्ट में पेश कराने के लिए हैबियस कॉर्पस याचिका का उपयोग नहीं किया जा सकता।जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में संबंधित फैमिली कोर्ट को ही आवश्यक कठोर (coercive) कदम उठाने का अधिकार है।मामला क्या था?आजमगढ़ की फैमिली कोर्ट ने जनवरी 2021 में पति को पत्नी और बेटी को भरण-पोषण देने का आदेश दिया था। लेकिन पति भुगतान से बच रहा था और उसके खिलाफ वारंट जारी होने के...
ग्रांट-इन-एड संस्थानों में कार्यरत कार्यवाहक प्रिंसिपल को मिलेगा समान वेतन, लेकिन पद पर बने रहने का अधिकार नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए कहा है कि ग्रांट-इन-एड (अनुदानित) संस्थानों में कार्यरत कार्यवाहक (ऑफिसिएटिंग) प्रिंसिपल को नियमित प्रिंसिपल के बराबर वेतन दिया जाना चाहिए। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि लंबे समय तक इस पद पर कार्य करने से उन्हें केवल वेतन का अधिकार मिलेगा, पद पर बने रहने का नहीं।जस्टिस सुमित्रा दयाल सिंह और जस्टिस स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने कहा कि जब कोई शिक्षक प्रिंसिपल के रूप में कार्य करता है और अधिक जिम्मेदारियां निभाता है, तो उसे उसी के...
यूपी ज़मींदारी उन्मूलन अधिनियम की धारा 122-B (4-F) की शर्तें पूरी होने पर भी भूमिधर का दर्जा नहीं बदला जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फिर से दोहराया कि अगर यूपी ज़मींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार अधिनियम की धारा 122-B (4-F) के तहत दी गई शर्तें पूरी होती हैं तो अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति (जैसा भी मामला हो) से संबंधित मज़दूर को उस ज़मीन का भूमिधर माना जाएगा, और किसी भी अधिकारी द्वारा इस भूमिधरी की समीक्षा नहीं की जा सकती।यूपी ज़मींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार अधिनियम की धारा 122-B(4-F) में यह प्रावधान है कि जहां कोई भी कृषि मज़दूर, जो अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से संबंधित है, 13.05.2007 से पहले से ही...
दीवानी मामलों के लिए पुलिस के पास जाने की प्रवृत्ति कानून के शासन को कमज़ोर करती है: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 'दिखावटी' FIRs की कड़ी आलोचना की
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में इस बात को 'परेशान करने वाला' बताया कि जनता दीवानी मामलों के समाधान के लिए पुलिस और कलेक्टरों के पास जाती है, क्योंकि यह प्रवृत्ति कानून के शासन की बुनियाद को कमज़ोर करती है। ऐसे मामलों में समाधान के लिए उन गैर-कानूनी एजेंसियों को बढ़ावा देती है, जिनका उन मामलों पर कोई अधिकार क्षेत्र नहीं होता।जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने दलजीत सिंह और एक अन्य व्यक्ति द्वारा दायर एक आपराधिक रिट याचिका की सुनवाई करते हुए ये टिप्पणियां कीं।उनकी याचिका में...
Ex-Parte भरण-पोषण आदेश को चुनौती देने से पहले धारा 145(2) BNSS के तहत रिकॉल अर्जी जरूरी: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि धारा 144 BNSS/धारा 125 CrPC के तहत पारित एकतरफा (ex parte) भरण-पोषण आदेश को चुनौती देने के लिए सीधे हाईकोर्ट में आपराधिक पुनरीक्षण (criminal revision) दाखिल नहीं किया जा सकता।जस्टिस जय कृष्ण उपाध्याय की पीठ ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में पहले संबंधित फैमिली कोर्ट या न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष धारा 145(2) BNSS/धारा 126(2) CrPC के तहत आवेदन देकर आदेश को निरस्त (recall) कराने का प्रयास करना होगा।मामला क्या था?मामले में पति ने देवरिया की फैमिली कोर्ट द्वारा पारित...
स्टांप शुल्क की कमी की वसूली केवल विरासत में मिली संपत्ति तक ही सीमित: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि भारतीय स्टांप अधिनियम, 1899 के तहत स्टांप शुल्क की कमी (deficiency) की वसूली मृत व्यक्ति के कानूनी वारिसों से केवल उतनी ही की जा सकती है, जितनी संपत्ति उन्हें विरासत में मिली हो।जस्टिस क्षितिज शैलेन्द्र ने स्पष्ट किया कि U.P. Revenue Code, 2006 की धारा 181 के प्रावधान लागू होंगे, जिसके अनुसार वसूली की कार्रवाई वारिसों के खिलाफ जारी रह सकती है, लेकिन उनकी जिम्मेदारी केवल विरासत में मिली संपत्ति तक सीमित होगी।मामला क्या था?याचिकाकर्ताओं के पिता ने 2020 में एक बिक्री...
'उचित सहायता नहीं मिल रही': इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सरकारी पैनल वाले वकीलों द्वारा दी जा रही अपर्याप्त सहायता पर चिंता जताई
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में राज्य सरकार के पैनल में शामिल वकीलों द्वारा दी जा रही अपर्याप्त सहायता पर चिंता व्यक्त की।U.P. Minor Minerals (Concession) Rules, 1963 के तहत बिना किसी कारण बताओ नोटिस के वसूली से जुड़े एक मामले में, जस्टिस अजीत कुमार और जस्टिस देवेंद्र सिंह-I की बेंच ने यह टिप्पणी की:“हम एडवोकेट जनरल-सह-राज्य विधि अधिकारी के कार्यालय में मौजूदा स्थिति को लेकर गंभीर रूप से चिंतित हैं। इसका कारण यह है कि कार्यालय का कामकाज इतने निचले स्तर पर पहुंच गया है कि अदालतों को उचित सहायता...
छोटी टाइपिंग गलती पर पेट्रोल पंप आवंटन रद्द करना गलत: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने BPCL को फटकारा
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा कि केवल टाइपिंग की मामूली गलती के आधार पर पेट्रोल पंप का आवंटन रद्द करना न सिर्फ अनुचित है बल्कि कानूनन भी गलत है।इसके साथ ही अदालत ने भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड द्वारा किया गया आवंटन रद्द करने का फैसला निरस्त किया।जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने यह टिप्पणी करते हुए कहा कि जब आवेदक ने लेटर ऑफ इंटेंट मिलने के बाद भारी निवेश कर दिया हो तब इस तरह का निर्णय पूरी तरह अन्यायपूर्ण है।मामले के अनुसार भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन...
NBW पर IO को सस्पेंड करना भारी पड़ा: हाईकोर्ट ने बस्ती SP को दी अवमानना की चेतावनी
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बस्ती के पुलिस अधीक्षक द्वारा एक जांच अधिकारी को निलंबित किए जाने पर कड़ी नाराजगी जताते हुए इसे प्रथम दृष्टया अदालत की अवमानना करार दिया।बता दें, यह मामला उस समय सामने आया, जब जांच अधिकारी ने आरोपियों की पेशी सुनिश्चित कराने के लिए गैर-जमानती वारंट प्राप्त किया था।जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने कहा कि एसपी द्वारा जारी निलंबन आदेश अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट-2, बस्ती के आदेश की अवहेलना जैसा प्रतीत होता है। मजिस्ट्रेट ने जांच अधिकारी के आवेदन पर...
बीमारी का बहाना बनाकर दूसरी अदालत में पेश हुआ वकील, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लगाया 20 हजार का जुर्माना
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अदालत को गुमराह करने की कोशिश करने वाले वकील पर सख्त रुख अपनाते हुए 20 हजार रुपये का जुर्माना लगाया। वकील ने एक मामले में बीमारी का पर्चा भेजकर अनुपस्थित रहने की सूचना दी, जबकि उसी दिन वह दूसरी अदालत में पेश हो रहा था।जस्टिस गौतम चौधरी ने मामले की सुनवाई के दौरान पाया कि संबंधित वकील ने न केवल बीमारी का गलत बहाना बनाया बल्कि यह भी नहीं बताया कि आवेदकों को पहले ही एक अन्य मामले में गिरफ्तारी से अंतरिम राहत मिल चुकी है।अदालत ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा,“वकील का आचरण यह...
भवन निर्माण कार्य विनियमन अधिनियम | अनुमति प्राप्त करने में धोखाधड़ी साबित होने पर शिकायतकर्ता का अधिकार क्षेत्र (Locus) अप्रासंगिक: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यह फैसला दिया कि भवन निर्माण कार्य विनियमन अधिनियम, 1958 की धारा 7-A के तहत कार्यवाही के उद्देश्य से शिकायतकर्ता का अधिकार क्षेत्र (locus) अप्रासंगिक है, जब प्रथम दृष्टया यह स्पष्ट हो कि अधिनियम के तहत विकास की अनुमति धोखाधड़ी और गलत बयानी से प्राप्त की गई थी।भवन निर्माण कार्य विनियमन अधिनियम, 1958 की धारा 7-A में यह प्रावधान है कि यदि विकास की अनुमति धोखाधड़ी से प्राप्त की गई हो तो निर्धारित प्राधिकारी द्वारा लिखित रूप में कारण दर्ज करने के बाद उस अनुमति को रद्द किया जा...
22 महीने की सजा पर हाईकोर्ट का हस्तक्षेप, भरण-पोषण न देने पर जेल भेजे गए पति की तत्काल रिहाई का आदेश
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भरण-पोषण राशि न देने के मामले में 22 महीने की सजा काट रहे व्यक्ति की तत्काल रिहाई का आदेश दिया। अदालत ने कहा कि इस तरह लंबी अवधि के लिए सिविल जेल में रखना कानून के अनुरूप नहीं है।जस्टिस प्रवीण कुमार गिरी ने यह राहत देते हुए स्पष्ट किया कि चूंकि व्यक्ति सिविल कारावास में है, इसलिए उसकी रिहाई के लिए जमानत बांड या जमानतदार की आवश्यकता नहीं है।मामले में पति (ताहिर उर्फ बबलू) को झांसी के फैमिली कोर्ट ने पत्नी को 22 महीने तक भरण-पोषण राशि न देने पर जेल भेज दिया था। वह 3 दिसंबर...
केंद्रीय मंत्री के नाम के आगे सम्मानसूचक शब्द क्यों नहीं, हाईकोर्ट ने यूपी सरकार से मांगा जवाब
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक FIR में केंद्रीय मंत्री के नाम के साथ सम्मानसूचक शब्द न लगाए जाने पर सख्त रुख अपनाते हुए उत्तर प्रदेश सरकार से स्पष्टीकरण मांगा।जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने राज्य के अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) को हलफनामा दाखिल कर इस चूक का कारण बताने का निर्देश दिया।अदालत ने पाया कि FIR में एक स्थान पर केंद्रीय मंत्री का नाम बिना किसी सम्मानसूचक शब्द जैसे 'माननीय' या 'श्री' के सीधे लिखा गया।इस पर हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि भले ही शिकायतकर्ता ने मंत्री का उल्लेख इस...
यूपी की गन कल्चर पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त, आर्म्स लाइसेंस डेटा मांगा
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने समाज में बढ़ती “गन कल्चर” पर सख्त रुख अपनाते हुए उत्तर प्रदेश में जारी किए गए हथियार लाइसेंसों का व्यापक डेटा मांगा है। जस्टिस विनोद दिवाकर की पीठ ने कहा कि बिना नियंत्रण के हथियारों की उपलब्धता समाज के लिए गंभीर खतरा बन रही है।अदालत ने टिप्पणी की कि कई लोग, खासकर राजनीतिक महत्वाकांक्षा रखने वाले या संदिग्ध पृष्ठभूमि वाले व्यक्ति, लाइसेंसी हथियारों का इस्तेमाल “प्रभाव और दबदबा दिखाने” के लिए कर रहे हैं, जिससे समाज में डर का माहौल बनता है।कोर्ट ने सोशल मीडिया, खासकर...
नाबालिग की उम्र दस्तावेज़ से साबित हो जाए तो बोन ऑसिफिकेशन टेस्ट जरूरी नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा कि यदि उपलब्ध दस्तावेज़ों से यह स्पष्ट हो जाए कि आरोपी घटना के समय नाबालिग था तो उसकी उम्र निर्धारित करने के लिए बोन ऑसिफिकेशन टेस्ट (हड्डी परीक्षण) कराने की कोई आवश्यकता नहीं है।जस्टिस मनीष कुमार ने किशोर न्याय (बालकों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 (POCSO Act) की धारा 94 का हवाला देते हुए यह स्पष्ट किया।अदालत ने कहा,“यदि उपलब्ध दस्तावेज़ों से ही यह साबित हो रहा है कि आरोपी घटना के समय 16 वर्ष से कम उम्र का था तो ऐसे में जुवेनाइल जस्टिस...

















