सुप्रीम कोर्ट

SC ने जनजातीय आयकर छूट में क्रीमी लेयर लागू करने की मांग पर सुनवाई से किया इनकार, संसद से संपर्क करने को कहा
SC ने जनजातीय आयकर छूट में 'क्रीमी लेयर' लागू करने की मांग पर सुनवाई से किया इनकार, संसद से संपर्क करने को कहा

सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जनजातियों (ST) को आयकर अधिनियम, 2025 के तहत मिलने वाली आयकर छूट में "क्रीमी लेयर" व्यवस्था लागू करने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि यह मुद्दा विधायी और नीतिगत निर्णयों से जुड़ा है, इसलिए इसके लिए संसद और संबंधित संसदीय समिति से संपर्क किया जाना चाहिए।चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस वी. मोहन की खंडपीठ ने याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय को याचिका वापस लेने की अनुमति देते हुए उन्हें संसदीय याचिका समिति और केंद्र सरकार के समक्ष...

सरकारी कर्मचारी की हत्या के आरोपी परिजन को मिलने वाली दया के आधार पर आर्थिक सहायता पर रोक: सुप्रीम कोर्ट ने सही ठहराया नियम
सरकारी कर्मचारी की हत्या के आरोपी परिजन को मिलने वाली 'दया के आधार पर आर्थिक सहायता' पर रोक: सुप्रीम कोर्ट ने सही ठहराया नियम

सुप्रीम कोर्ट ने 'हरियाणा सिविल सेवा (दया के आधार पर आर्थिक सहायता या नियुक्ति) नियम, 2019' के नियम 23(1) की संवैधानिक वैधता बरकरार रखी। यह नियम मृतक सरकारी कर्मचारी के परिवार को मिलने वाली दया के आधार पर आर्थिक सहायता को तब रोक देता है, जब परिवार का कोई पात्र सदस्य कर्मचारी की हत्या या हत्या के लिए उकसाने का आरोपी हो। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह प्रावधान दया के आधार पर नियुक्ति के दावों पर लागू नहीं होता है।जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की बेंच ने यह फैसला अतुल...

लोकायुक्त की एसपीई को RTI से बाहर नहीं रखा जा सकता: सुप्रीम कोर्ट ने रद्द की एमपी सरकार की अधिसूचना
लोकायुक्त की एसपीई को RTI से बाहर नहीं रखा जा सकता: सुप्रीम कोर्ट ने रद्द की एमपी सरकार की अधिसूचना

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि मध्य प्रदेश लोकायुक्त संगठन की स्पेशल पुलिस एस्टैब्लिशमेंट (SPE) को सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम से छूट नहीं दी जा सकती। अदालत ने राज्य सरकार की वर्ष 2011 की उस अधिसूचना को रद्द कर दिया, जिसके तहत एसपीई को RTI कानून के दायरे से बाहर रखा गया था।जस्टिस जे.के. महेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की खंडपीठ ने कहा कि एसपीई भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों की जांच करती है और इसे RTI अधिनियम की धारा 24(4) के तहत "खुफिया एवं सुरक्षा संगठन" नहीं माना...

आधार नागरिकता का प्रमाण नहीं? सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र, राज्यों और चुनाव आयोग से मांगा जवाब
आधार नागरिकता का प्रमाण नहीं? सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र, राज्यों और चुनाव आयोग से मांगा जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने आधार कार्ड को नागरिकता, मूल निवास, पता और जन्मतिथि के प्रमाण के रूप में इस्तेमाल किए जाने के खिलाफ दायर याचिका पर केंद्र सरकार, राज्य सरकारों और चुनाव आयोग को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया।चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने वकील अश्विनी उपाध्याय की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया।याचिका में कहा गया कि आधार अधिनियम, 2016 की धारा 9 स्पष्ट रूप से बताती है कि आधार संख्या किसी व्यक्ति को नागरिकता या मूल निवास का अधिकार प्रदान नहीं करती और न...

RTE Act के तहत EWS बच्चों के लिए 25% आरक्षण लागू न होने के आरोप पर सुप्रीम कोर्ट का पंजाब सरकार को नोटिस
RTE Act के तहत EWS बच्चों के लिए 25% आरक्षण लागू न होने के आरोप पर सुप्रीम कोर्ट का पंजाब सरकार को नोटिस

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को उस याचिका पर नोटिस जारी किया, जिसमें आरोप लगाया गया है कि पंजाब सरकार ने बच्चों को निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 (RTE Act) के महत्वपूर्ण प्रावधानों को प्रभावी ढंग से लागू नहीं किया है। विशेष रूप से याचिका में कहा गया है कि अधिनियम की धारा 12(1)(c) के तहत निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) और वंचित समूहों के बच्चों के लिए प्रवेश स्तर पर 25 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने की व्यवस्था का पालन नहीं किया जा रहा है।चीफ़...

नौकरी से निकालना सबसे कड़ी सज़ा, यह सिर्फ़ गंभीर कदाचार के लिए ही दी जानी चाहिए: सुप्रीम कोर्ट
नौकरी से निकालना सबसे कड़ी सज़ा, यह सिर्फ़ गंभीर कदाचार के लिए ही दी जानी चाहिए: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कहा कि नौकरी से निकालना सज़ा के सबसे कठोर तरीकों में से एक है; इसलिए अनुशासनात्मक अधिकारी को संबंधित बातों—जैसे कदाचार की प्रकृति और गंभीरता, लंबी सेवा, रिकॉर्ड, उम्र, कंपनी को कोई आर्थिक नुकसान न होना आदि—पर ठीक से विचार करने के बाद ही यह सज़ा देनी चाहिए। कोर्ट ने यह भी कहा कि जांच के दौरान सस्पेंशन (निलंबन) की अवधि को नौकरी से निकालने के अलावा दूसरी सज़ा के तौर पर नहीं लगाया जा सकता।इस मामले में अपीलकर्ता सुरेखा डोमाजी बेले 1985 में महाराष्ट्र स्टेट इलेक्ट्रिसिटी...

सक्सेशन एक्ट में कोई समय-सीमा न बताए जाने के कारण प्रोबेट रद्द करने का मामला लिमिटेशन एक्ट के आर्टिकल 137 के तहत आएगा: सुप्रीम कोर्ट
सक्सेशन एक्ट में कोई समय-सीमा न बताए जाने के कारण प्रोबेट रद्द करने का मामला लिमिटेशन एक्ट के आर्टिकल 137 के तहत आएगा: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चूंकि इंडियन सक्सेशन एक्ट, 1925 में वसीयत के प्रोबेट के लिए या पहले से जारी प्रोबेट को रद्द करने की अर्ज़ी दाखिल करने के लिए कोई समय-सीमा तय नहीं की गई, इसलिए ऐसी कार्यवाही लिमिटेशन एक्ट, 1963 के आर्टिकल 137 के तहत आएगी। यह आर्टिकल उन अर्जियों के लिए तीन साल की समय-सीमा तय करता है, जिनके लिए कोई खास समय-सीमा नहीं बताई गई।जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने धीरज दत्ता की अपील को मंज़ूरी देते हुए यह बात कही। उन्होंने माना कि 1995 में जारी प्रोबेट रद्द...

पश्चिम एशिया के निजी विद्यार्थियों के परिणाम पर नई नीति बना रहा केंद्र, सुप्रीम कोर्ट को दी जानकारी
पश्चिम एशिया के निजी विद्यार्थियों के परिणाम पर नई नीति बना रहा केंद्र, सुप्रीम कोर्ट को दी जानकारी

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि पश्चिम एशिया के उन निजी विद्यार्थियों के लिए एक नीति तैयार की जा रही है, जिनके कक्षा 12 के परिणाम अब तक घोषित नहीं किए जा सके हैं। क्षेत्र में युद्ध और सुरक्षा संबंधी परिस्थितियों के कारण परीक्षाएं प्रभावित हुई थीं।मामला सऊदी अरब में रहने वाले एक भारतीय छात्र द्वारा दायर याचिका से जुड़ा है जिसमें केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) को उसका कक्षा 12 सुधार परीक्षा परिणाम घोषित करने का निर्देश देने की मांग की गई।इस मामले की अगली सुनवाई अगले शुक्रवार को...

वसीयत के प्रमाणीकरण रद्द कराने की याचिका पर तीन वर्ष की सीमा लागू होगी, उत्तराधिकार कानून में अलग प्रावधान नहीं: सुप्रीम कोर्ट
वसीयत के प्रमाणीकरण रद्द कराने की याचिका पर तीन वर्ष की सीमा लागू होगी, उत्तराधिकार कानून में अलग प्रावधान नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए कहा कि भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 में वसीयत के प्रमाणीकरण (प्रोबेट) रद्द कराने के लिए कोई अलग समय-सीमा निर्धारित नहीं की गई। ऐसे मामलों में परिसीमा अधिनियम, 1963 के अनुच्छेद 137 के तहत तीन वर्ष की समय-सीमा लागू होगी।जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने यह टिप्पणी करते हुए धीरज दत्ता की अपील स्वीकार की और वर्ष 1995 में दिए गए प्रोबेट को रद्द कराने के लिए वर्ष 2022 में दायर आवेदन को समय-सीमा से परे बताया।अदालत ने कहा,"भारतीय...

खड़ी गाड़ी पर पेड़ गिरने से लगी चोट मोटर दुर्घटना नहीं; MACT क्लेम नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
खड़ी गाड़ी पर पेड़ गिरने से लगी चोट 'मोटर दुर्घटना' नहीं; MACT क्लेम नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि भारी बारिश के दौरान सड़क किनारे खड़े ऑटो-रिक्शा पर पेड़ की टहनी गिरने से लगी चोटें, मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की धारा 166 के तहत क्लेम के मकसद से "मोटर वाहन के इस्तेमाल" से हुई दुर्घटना नहीं मानी जाएंगी। फिर भी पीड़ित को लगी गंभीर चोटों को देखते हुए कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए उसे मिलने वाले मुआवज़े को ₹17.10 लाख से बढ़ाकर ₹25 लाख कर दिया।जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की बेंच बृहत् बेंगलुरु...

पत्नी से बात न करना क्रूरता नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने पत्नी की आत्महत्या के मामले में पति की धारा 498A के तहत सज़ा रद्द की
'पत्नी से बात न करना क्रूरता नहीं': सुप्रीम कोर्ट ने पत्नी की आत्महत्या के मामले में पति की धारा 498A के तहत सज़ा रद्द की

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कहा कि सिर्फ़ इसलिए कि पति ने 13 दिनों तक अपनी पत्नी से बात करने से इनकार किया, इसे किसी भी तरह से क्रूरता नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि वैवाहिक जीवन में मतभेद होना आम बात है और ऐसे मतभेदों के कारण बातचीत बंद हो सकती है।इसके बाद जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की बेंच ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A (पति या रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता) के तहत पति की सज़ा और दोषसिद्धि रद्द की। कोर्ट ने उसका पासपोर्ट उसे वापस करने का आदेश भी दिया।कोर्ट ने...

सुप्रीम कोर्ट ने कस्टडी विवादों में बच्चों के मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन के लिए सिद्धांत तय किए
सुप्रीम कोर्ट ने कस्टडी विवादों में बच्चों के मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन के लिए सिद्धांत तय किए

सुप्रीम कोर्ट ने आज कस्टडी, मुलाक़ात और माता-पिता के संपर्क से जुड़े विवादों में बच्चों के मनोवैज्ञानिक या मनोरोग संबंधी मूल्यांकन के अनुरोधों से निपटने वाली अदालतों के लिए कुछ व्यापक सिद्धांत तय किए। कोर्ट ने कहा कि बच्चे की ज़िंदगी में "कम-से-कम दखल" ही नियम होना चाहिए और अदालतों को दोबारा सदमा लगने (री-ट्रॉमेटाइज़ेशन) के जोखिम के प्रति संवेदनशील रहना चाहिए।जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की बेंच ने कस्टडी विवाद से जुड़े मामले में ये बातें कहीं, जिसमें बच्चा कथित तौर पर यौन शोषण...

POCSO पीड़ित बच्चों की मनोवैज्ञानिक जांच केवल जरूरत पड़ने पर हो: सुप्रीम कोर्ट
POCSO पीड़ित बच्चों की मनोवैज्ञानिक जांच केवल जरूरत पड़ने पर हो: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अभिरक्षा (कस्टडी), मुलाकात और माता-पिता के पहुंच अधिकार से जुड़े मामलों में बच्चों की मनोवैज्ञानिक जांच केवल आवश्यकता पड़ने पर ही कराई जानी चाहिए। विशेष रूप से यौन शोषण के कथित पीड़ित बच्चों के मामलों में उनके जीवन में न्यूनतम हस्तक्षेप ही सामान्य नियम होना चाहिए।जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिस्वर सिंह की पीठ ने यह टिप्पणी बॉम्बे हाईकोर्ट के उस आदेश में संशोधन करते हुए की, जिसमें एक नाबालिग बच्ची की मनोवैज्ञानिक जांच के लिए विशेषज्ञों के पैनल के गठन का निर्देश...

बेटे की चाहत वाली पितृसत्तात्मक सोच अभी भी जारी: सुप्रीम कोर्ट ने सेक्स-सेलेक्शन पर रोक लगाने वाले कानूनों को सख्ती से लागू करने को कहा
'बेटे की चाहत वाली पितृसत्तात्मक सोच अभी भी जारी': सुप्रीम कोर्ट ने सेक्स-सेलेक्शन पर रोक लगाने वाले कानूनों को सख्ती से लागू करने को कहा

भारत में सेक्स-सेलेक्शन (लिंग-चयन) की प्रथाओं के अभी भी जारी रहने पर ध्यान देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आज ज़ोर दिया कि 'प्री-कन्सेप्शन एंड प्री-नेटल डायग्नोस्टिक टेक्नीक्स (लिंग-चयन पर रोक) एक्ट, 1994' (PCPNDT Act) जैसे कल्याणकारी कानूनों को सख्ती से लागू किया जाना चाहिए।कोर्ट ने कहा,"यह सच है कि आम तौर पर लिंगानुपात (sex ratio) की गिरती स्थिति में काफी सुधार हुआ है, लेकिन कानून के प्रावधानों को कमजोर करना या उनके उल्लंघन को नजरअंदाज करना बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।" जस्टिस संजय करोल और जस्टिस...

फोरम नॉन कन्वेनियंस का सिद्धांत आर्टिकल 226(1) के तहत रिट अधिकार क्षेत्र को अस्वीकार करने का शायद ही कभी आधार बनता है: सुप्रीम कोर्ट
'फोरम नॉन कन्वेनियंस' का सिद्धांत आर्टिकल 226(1) के तहत रिट अधिकार क्षेत्र को अस्वीकार करने का शायद ही कभी आधार बनता है: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 'फोरम नॉन कन्वेनियंस' का सिद्धांत आमतौर पर तब लागू नहीं होगा, जब कोई वादी संविधान के आर्टिकल 226(1) के तहत हाईकोर्ट के अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करता है। यह आर्टिकल उस हाईकोर्ट के अधिकार क्षेत्र में आने वाले अधिकारियों के खिलाफ रिट याचिका दायर करने की अनुमति देता है।'फोरम नॉन कन्वेनियंस' का सिद्धांत किसी ऐसी अदालत को, जिसके पास विवाद पर सुनवाई का अधिकार क्षेत्र है, मामले की सुनवाई से इनकार करने की अनुमति देता है यदि किसी अन्य अदालत को मामले के निपटारे के लिए अधिक उपयुक्त...

BREAKING| होममेकर देश निर्माता हैं: सुप्रीम कोर्ट ने होममेकर के योगदान को ₹30,000 प्रति माह आंका
BREAKING| 'होममेकर देश निर्माता हैं': सुप्रीम कोर्ट ने होममेकर के योगदान को ₹30,000 प्रति माह आंका

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मोटर दुर्घटना के दावों में होममेकर (घर संभालने वाली महिला) द्वारा दी जाने वाली घरेलू देखभाल का नुकसान हर्जाने का एक अलग और मुआवजा-योग्य आधार है। कोर्ट ने ऐसी घरेलू सेवाओं का मूल्य कम-से-कम ₹30,000 प्रति माह तय किया।मोटर दुर्घटना के दावों से जुड़ी अपील पर फैसला सुनाते हुए जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एनके सिंह की बेंच ने कहा कि होममेकर का योगदान घर से कहीं आगे तक जाता है और देश-निर्माण में अहम भूमिका निभाता है। कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि मोटर वाहन अधिनियम के तहत मुआवज़ा...

क्या बंटे हुए फ़ैसले के बाद आपराधिक अपील की सुनवाई करने वाले तीसरे जज पिछली बेंच की राय मानने के लिए बाध्य हैं? सुप्रीम कोर्ट ने मामला बड़ी बेंच को भेजा
क्या बंटे हुए फ़ैसले के बाद आपराधिक अपील की सुनवाई करने वाले तीसरे जज पिछली बेंच की राय मानने के लिए बाध्य हैं? सुप्रीम कोर्ट ने मामला बड़ी बेंच को भेजा

सुप्रीम कोर्ट ने 'सज्जन सिंह बनाम मध्य प्रदेश राज्य (1999) 1 SCC 315' मामले में अपने पहले के फ़ैसले की सही होने पर संदेह जताते हुए एक अहम सवाल बड़ी बेंच को भेजा है। यह सवाल 'कोड ऑफ़ क्रिमिनल प्रोसीजर, 1973' की धारा 392 के तहत आपराधिक अपील की सुनवाई करने वाले तीसरे जज की शक्तियों से जुड़ा है।कोर्ट ने बड़ी बेंच को यह सवाल भेजा है कि क्या 'कोड ऑफ़ क्रिमिनल प्रोसीजर, 1973' की धारा 392 के तहत आपराधिक अपील की सुनवाई करने वाला तीसरा जज उन निष्कर्षों को पलट सकता है, जिन पर डिवीज़न बेंच के दो जजों ने...

सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार के मामलों में आरोप तय करने से पहले मंज़ूरी देने वाले अधिकारी की जांच करने का निर्देश रद्द किया
सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार के मामलों में आरोप तय करने से पहले मंज़ूरी देने वाले अधिकारी की जांच करने का निर्देश रद्द किया

सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के उस निर्देश को रद्द किया, जिसमें ट्रायल कोर्ट को 'भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम' (PC Act) के तहत मामलों में आरोप तय करने से पहले CrPC की धारा 311 के तहत मंज़ूरी देने वाले अधिकारियों की जांच करने के लिए कहा गया था। कोर्ट ने कहा कि अदालतें आपराधिक कानून में शामिल न की गई कोई नई प्रक्रियात्मक स्टेज नहीं बना सकतीं।जस्टिस पीके मिश्रा और जस्टिस अतुल चंदुरकर की बेंच ने कहा कि CrPC आपराधिक मुकदमों के संचालन के लिए एक पूरी प्रक्रिया तय करती है और अदालतें न्यायिक...

पति-पत्नी की तरह साथ रहने की आज़ादी: दोषी और पीड़िता की शादी के बाद सुप्रीम कोर्ट ने POCSO Act के तहत मिली सज़ा रद्द की
'पति-पत्नी की तरह साथ रहने की आज़ादी': दोषी और पीड़िता की शादी के बाद सुप्रीम कोर्ट ने POCSO Act के तहत मिली सज़ा रद्द की

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में 'बच्चों को यौन अपराधों से संरक्षण अधिनियम' (POCSO Act), 2012 के तहत मिली सज़ा रद्द की। यह फ़ैसला तब लिया गया, जब आरोपी और पीड़िता ने शादी करके समझौता कर लिया और आरोपी ने पीड़िता को मुआवज़ा देने की पेशकश की।जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चंडुरकर की बेंच ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए सज़ा रद्द की। कोर्ट ने मामले की खास परिस्थितियों पर ध्यान दिया कि पीड़िता के बालिग होने के बाद आरोपी और पीड़िता ने शादी कर ली थी।...

दुष्कर्म मामले में बरी होने से पितृत्व का सवाल खत्म नहीं होता, DNA जांच जरूरी हो सकती है: सुप्रीम कोर्ट
दुष्कर्म मामले में बरी होने से पितृत्व का सवाल खत्म नहीं होता, DNA जांच जरूरी हो सकती है: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि किसी व्यक्ति का दुष्कर्म के आपराधिक मामले में बरी हो जाना पितृत्व संबंधी विवाद के निपटारे में बाधा नहीं बन सकता।अदालत ने स्पष्ट किया कि जब जैविक पिता की पहचान का प्रश्न अन्य साक्ष्यों से निर्णायक रूप से हल नहीं हो सकता, तब DNA जांच आवश्यक और अपरिहार्य हो जाती है।जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेकापम कोटिश्वर सिंह की खंडपीठ ने एक व्यक्ति की अपील खारिज करते हुए उसे DNA जांच कराने का निर्देश दिया।यह विवाद एक 27 वर्षीय युवक द्वारा दायर दीवानी...