सुप्रीम कोर्ट
क्या दोषी को सरेंडर किए बिना अपील/रिवीजन सुनी जा सकती है? सुप्रीम कोर्ट ने मामला बड़ी बेंच को भेजा
सुप्रीम कोर्ट ने यह महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न बड़ी बेंच को भेजा कि क्या हाईकोर्ट किसी दोषी को जेल में आत्मसमर्पण किए बिना उसकी आपराधिक अपील या पुनरीक्षण याचिका सुन सकता है?जस्टिस पामिडिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की खंडपीठ ने कहा कि इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट की विभिन्न पीठों के फैसलों में मतभेद है, इसलिए स्पष्टता के लिए बड़ी पीठ का निर्णय आवश्यक है।यह मामला उस याचिका से जुड़ा है, जिसमें एक दोषी ने राजस्थान हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी थी। राजस्थान हाईकोर्ट ने उसकी पुनर्विचार याचिका...
मस्जिद से जुड़ी 'सर्विस इनाम' ज़मीन वक्फ़ संपत्ति, इसे बेचा नहीं जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (24 अप्रैल) को कहा कि मस्जिदों से जुड़ी जिन ज़मीनों को 'सर्विस इनाम' कहा जाता है, वे वक्फ़ संपत्ति का हिस्सा होती हैं, और इसलिए उन्हें बेचा नहीं जा सकता।जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने कहा,"यह बात बिना किसी विवाद के तय है कि धार्मिक या चैरिटी के कामों के लिए 'सर्विस इनाम' के तौर पर दी गई ज़मीनें दान की गई संपत्ति (Endowed Property) का रूप ले लेती हैं और उन पर सार्वजनिक या धार्मिक ट्रस्ट का अधिकार होता है, जिससे उन्हें बेचने या किसी और को...
दूसरी शादी की सिर्फ़ जानकारी होना, रिश्तेदारों को द्विविवाह के अपराध में आरोपी बनाने के लिए काफ़ी नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (24 अप्रैल) को फ़ैसला सुनाया कि रिश्तेदारों पर द्विविवाह (दो शादियां करने) के अपराध की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ इस आधार पर नहीं डाली जा सकती कि उन्हें दूसरी शादी के बारे में जानकारी थी। कोर्ट ने कहा कि जब तक यह साबित न हो जाए कि रिश्तेदारों ने दूसरी शादी करवाने में सक्रिय रूप से हिस्सा लिया, मदद की या उसे बढ़ावा दिया, तब तक उन्हें द्विविववाह के लिए ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A और...
WB SIR: तात्कालिकता साबित होने पर अपीलीय न्यायाधिकरण कर सकते हैं प्राथमिकता से सुनवाई: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची में नाम शामिल/हटाए जाने से जुड़ी शिकायतों पर शुक्रवार को महत्वपूर्ण आदेश देते हुए कहा कि प्रभावित व्यक्ति अपनी शेष शिकायतों के निवारण के लिए कलकत्ता हाईकोर्ट या राज्य में गठित अपीलीय न्यायाधिकरणों का रुख कर सकते हैं। चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की खंडपीठ ने कहा कि 13 अप्रैल के आदेश में अधिकांश मुद्दों का समाधान किया जा चुका है, लेकिन रोजमर्रा के आधार पर कुछ नए मुद्दे सामने आ सकते हैं, जिनके लिए हाईकोर्ट के मुख्य...
जल्द सुनवाई का अधिकार NDPS Act की धारा 37 के तहत ज़मानत की शर्तों की जगह नहीं ले सकता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि अनुच्छेद 21 के तहत जल्द सुनवाई का अधिकार, नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्सटेंसेस एक्ट, 1987 (NDPS Act) के तहत ज़मानत देने के लिए तय सख्त कानूनी ज़रूरतों को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता।कोर्ट ने कहा,"संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जल्द सुनवाई का अधिकार निस्संदेह एक कीमती संवैधानिक गारंटी है। हालांकि, NDPS Act जैसे खास कानून के संदर्भ में, जो कमर्शियल मात्रा से जुड़े मामलों से निपटता है, इस अधिकार को धारा 37 के आदेश के साथ-साथ पढ़ा जाना चाहिए, न कि उसकी जगह पर।" ...
गुजरात की न्यायिक अधिकारी की बहाली का आदेश; पहली जांच रिपोर्ट के बाद डी नोवो जांच रद्द: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात की एक न्यायिक अधिकारी को बड़ी राहत देते हुए उनके पुनर्बहाली (reinstatement) का आदेश दिया है और कहा है कि विभागीय कार्यवाही में उनके खिलाफ डी नोवो (नई) जांच कराना नियमों के विरुद्ध था। जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की खंडपीठ ने गुजरात हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें न्यायिक अधिकारी के खिलाफ नई जांच को रोकने से इनकार किया गया था, जबकि प्रारंभिक जांच रिपोर्ट में अधिकांश आरोपों को खारिज कर दिया गया था।मामले में अपीलकर्ता, जो गुजरात राज्य न्यायिक सेवा...
महिला की इच्छा सर्वोपरि; गोद देने का विकल्प बताकर अवांछित गर्भ जारी रखने को मजबूर नहीं कर सकते : सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा कि किसी महिला को उसकी इच्छा के विरुद्ध गर्भावस्था जारी रखने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता, केवल इस आधार पर कि जन्म के बाद बच्चे को गोद दिया जा सकता है। जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की खंडपीठ ने 15 वर्षीय नाबालिग, जो सात महीने से अधिक गर्भवती थी, को मेडिकल टर्मिनेशन की अनुमति देते हुए कहा कि ऐसे मामलों में प्राथमिकता गर्भवती महिला की इच्छा को दी जानी चाहिए, न कि उस अजन्मे बच्चे के हितों को। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि...
पुलिस शिकायत वाले मामलों में आरोपी को तब तक गिरफ्तार नहीं कर सकती, जब तक समन के साथ-साथ गैर-जमानती वारंट जारी न हो जाए: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (23 अप्रैल) को बिहार और झारखंड में गंभीर प्रक्रियात्मक अनियमितता की ओर ध्यान दिलाया। कोर्ट ने पाया कि शिकायत वाले मामलों में मुकदमेबाज़ इस आशंका से सेशंस कोर्ट / हाई कोर्ट में अग्रिम ज़मानत के लिए जाते हैं कि केवल प्रक्रिया (process) जारी होने से ही उनकी गिरफ्तारी हो जाएगी।कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एक बार प्रक्रिया जारी हो जाने के बाद मुकदमेबाज़ को केवल उस प्रक्रिया का पालन करना होता है, क्योंकि शिकायत वाले मामले में तब तक गिरफ्तारी नहीं हो सकती, जब तक प्रक्रिया को लागू...
अपील कोर्ट आरोपी की अपील के बिना भी सज़ा को पलट/बदल सकता है: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि अगर आरोपी सज़ा को चुनौती देने वाली अपील नहीं भी करता है तो भी अपील कोर्ट को सज़ा पलटने से रोका नहीं जा सकता।जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा,“अपील कोर्ट को यह अधिकार है कि वह ट्रायल कोर्ट द्वारा दर्ज किए गए नतीजों और सज़ा की सच्चाई की जांच करे और न्याय के हित में उसे पलटे, बदले या पक्का करे।” यह बात असम राज्य की तरफ से एक मर्डर-रेप केस में रेस्पोंडेंट को बरी किए जाने के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई करते हुए कही। हाईकोर्ट, जिसने आरोपी को मर्डर और रेप...
IBC प्रक्रिया, डिक्री के निष्पादन या वसूली की कार्यवाही का विकल्प नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (23 अप्रैल) को फिर दोहराया कि कॉर्पोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (CIRP) का इस्तेमाल, पैसे से जुड़ी किसी डिक्री को लागू करने के विकल्प के तौर पर नहीं किया जा सकता, खासकर तब जब कंपनी आर्थिक रूप से सक्षम हो और काम कर रही हो।जस्टिस पामिदिघंतम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच कॉर्पोरेट देनदार द्वारा NCLAT के उस फैसले के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें देनदार के खिलाफ CIRP शुरू करने की अनुमति दी गई।विवाद का मुख्य मुद्दा यह था कि क्या कोई डिक्री-धारक लेनदार...
नगर सीमा निर्धारण का विवाद सिविल कोर्ट नहीं तय कर सकता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा है कि नगर सीमा (Municipal Limits) के निर्धारण से जुड़े विवादों पर सिविल कोर्ट सुनवाई नहीं कर सकते, क्योंकि यह विषय संबंधित कानूनों के तहत तय किया जाता है और विधायी क्षेत्राधिकार में आता है।जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस के. वी. विश्वनाथन की खंडपीठ ने बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए यह स्पष्ट किया।मामला क्या है?यह मामला महाराष्ट्र के कोल्हापुर से जुड़ा है, जहां 2013 में नगर निगम ने एक सार्वजनिक नोटिस जारी कर दावा किया कि उचगांव...
सरकारी अनुदान वाली संपत्तियों पर किराया कानून लागू नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र के खिलाफ बेदखली आदेश रद्द किया
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि Government Grants Act, 1895 के तहत दी गई संपत्तियों पर किराया नियंत्रण कानून लागू नहीं होते और ऐसे मामलों में पक्षकारों के अधिकार केवल लीज (अनुदान) की शर्तों से तय होंगे। इसी आधार पर अदालत ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें भारत सरकार को किराया न चुकाने के कारण बेदखल करने का निर्देश दिया गया था।जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाते हुए कहा कि यदि लीज डीड में किराया न देने पर बेदखली का स्पष्ट प्रावधान नहीं है, तो...
अगर घायल चश्मदीद की गवाही बहुत मज़बूत हो तो स्वतंत्र गवाह की जांच न होना केस के लिए घातक नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को हत्या के मामले में सज़ा को सही ठहराते हुए कहा कि अगर घायल चश्मदीद की अकेली गवाही भरोसेमंद, विश्वसनीय और एक जैसी हो तो किसी स्वतंत्र गवाह की जाँच न होना अभियोजन पक्ष के केस के लिए घातक साबित नहीं होगा।जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की बेंच ने टिप्पणी की,"...सिर्फ़ एक चश्मदीद की गवाही के आधार पर भी सज़ा देना जायज़ है। आख़िरकार, रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों को उनकी गुणवत्ता के आधार पर मापा जाना चाहिए, न कि उनकी संख्या के आधार पर।" बेंच ने यह टिप्पणी करते हुए...
'समाधान समारोह' पहल: 45,098 लंबित मामलों को मध्यस्थता से निपटाने की तैयारी, सुप्रीम कोर्ट ने वकीलों से मांगा सहयोग
सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने लंबित मामलों के निपटारे के लिए एक बड़ी पहल करते हुए 45,098 मामलों की पहचान की है, जिन्हें मध्यस्थता (Mediation) और लोक अदालत के माध्यम से आपसी सहमति से सुलझाया जा सकता है।यह पहल 'समाधान समारोह' (Samadhan Samaroh) के तहत शुरू की गई है, जिसका उद्देश्य बड़े पैमाने पर विवादों का सौहार्दपूर्ण समाधान सुनिश्चित करना है। यह कार्यक्रम 21, 22 और 23 अगस्त 2026 को आयोजित किया जाएगा।सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) द्वारा 22 अप्रैल 2026 को जारी सर्कुलर के अनुसार, यह पहल भारत के...
S. 225 BNSS | मजिस्ट्रेट को अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर रहने वाले आरोपी के खिलाफ कार्रवाई करने से पहले जांच का आदेश देना चाहिए: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि मजिस्ट्रेट को अपने क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र से बाहर रहने वाले आरोपी के खिलाफ कार्रवाई करने से पहले भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 225 के तहत जांच करनी चाहिए या जांच का निर्देश देना चाहिए।दूसरे शब्दों में, यदि किसी व्यक्ति पर किसी आपराधिक शिकायत में आरोप लगाया गया और वह अदालत के अधिकार क्षेत्र से बाहर रहता है तो अदालत ने कहा कि मैजिस्ट्रेट धारा 225 BNSS के आदेश का पालन किए बिना तुरंत समन जारी नहीं कर सकता।बेंच ने कहा,"...मजिस्ट्रेट के लिए यह...
Order 7 Rule 11 CPC | मूल्यांकन या कोर्ट फीस में कमी के आधार पर वाद-पत्र को बिना सुधार का मौका दिए खारिज नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में यह फैसला दिया कि किसी वाद के मूल्यांकन में कमी या कोर्ट फीस के भुगतान में कमी के आधार पर किसी वादी को CPC के आदेश 7 नियम 11 के तहत अपने आप ही खारिज (Non-Suited) नहीं किया जा सकता। चूंकि ये दोनों कमियां सुधारी जा सकने वाली हैं, इसलिए वादी को सुधार का मौका दिया जाना चाहिए। साथ ही वाद को तभी खारिज किया जाना चाहिए, जब वह इस मौके का पालन न करे।कोर्ट ने कहा,"आदेश VII नियम 11(b) या (c) के तहत किसी वाद-पत्र खारिज करना, केवल कम मूल्यांकन या कोर्ट फीस में कमी पाए जाने पर अपने...
जरूरी पक्षकारों को शामिल किए बिना और तथ्य छुपाकर लिया गया प्रोबेट रद्द होगा: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा है कि यदि किसी वसीयत (Will) का प्रोबेट जरूरी पक्षकारों को शामिल किए बिना और महत्वपूर्ण तथ्यों को छुपाकर प्राप्त किया गया हो, तो उसे रद्द (revoked) किया जा सकता है।जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाते हुए कहा कि जिस व्यक्ति का मृतक की संपत्ति में थोड़ा भी हित (interest) हो, उसे प्रोबेट कार्यवाही में सुना जाना जरूरी है।मामले का विवरणमामला कोयंबटूर की एक संपत्ति से जुड़ा है, जिसे एक व्यक्ति ने 1976 में अपनी बेटी...
यूपी ज़मींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार अधिनियम के तहत ज़मीन का वर्गीकरण बदलने का SDO के पास कोई अधिकार नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि उत्तर प्रदेश ज़मींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार अधिनियम, 1950 के तहत एक उप-विभागीय अधिकारी (SDO) के पास सार्वजनिक उपयोग की ज़मीन के तौर पर दर्ज ज़मीन का वर्गीकरण बदलने का कोई अधिकार नहीं है, ताकि उस पर भूमिधरी अधिकार दिए जा सकें।कोर्ट ने टिप्पणी की,"वैसे भी, उन्मूलन अधिनियम उप-विभागीय अधिकारी को ज़मीन की श्रेणी बदलने का कोई अधिकार नहीं देता है ताकि उसे धारा 132 के निषेधात्मक दायरे से बाहर लाया जा सके। ज़मीन की श्रेणी में किसी भी बदलाव के लिए उन्मूलन अधिनियम में...
हाईकोर्ट सिर्फ़ देरी की वजह से वैधानिक अपीलीय प्राधिकरण के सामने लंबित अपील पर फ़ैसला नहीं दे सकता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में फ़ैसला दिया कि हाईकोर्ट वैधानिक अपीलीय प्राधिकरणों की भूमिका नहीं निभा सकते, सिर्फ़ इसलिए कि कार्यवाही में देरी हो रही है। कोर्ट ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के उन आदेशों को रद्द किया, जिनमें हाईकोर्ट ने वैधानिक अपील पर फ़ैसला होने देने के बजाय सीधे ही म्यूटेशन (नाम परिवर्तन) विवाद पर फ़ैसला दे दिया था।जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने कहा कि जब आंध्र प्रदेश भूमि में अधिकार और पट्टादार पास बुक अधिनियम, 1971 के तहत वैधानिक अपील का विकल्प मौजूद था तो...
बचाव का उचित अवसर दिए बिना पारित विदेशी फैसला भारत में लागू नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि अगर किसी विदेशी अदालत ने संक्षिप्त कार्यवाही (Summary Proceedings) में कोई फैसला सुनाया, जिसमें बचाव का कोई सार्थक अवसर नहीं दिया गया, जबकि मामले में विचारणीय मुद्दे (Triable Issues) मौजूद थे तो ऐसा फैसला भारत में 'दीवानी प्रक्रिया संहिता, 1908' (CPC) की धारा 13 के तहत लागू नहीं किया जा सकता।जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की खंडपीठ ने मेसर ग्रीशाइम GmbH (एयर लिक्विड डॉयचलैंड GmbH) द्वारा दायर दीवानी अपील खारिज की। खंडपीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला...



















