जानिए हमारा कानून
कम गंभीर अपराधों में क्या होती है न्यायालय की संज्ञान (cognizance) लेने की परिसीमा अवधि (Limitation)
किसी भी सिविल प्रकरण में परिसीमा अधिनियम 1961 के अधीन प्रकरण को परिसीमा से बांधा गया है। इसी प्रकार दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत कम गंभीर प्रकृति के अपराधों को परिसीमा की अवधि से बांधने का प्रयास किया गया है। दंड विधि का यह सामान्य सिद्धांत है कि अपराध कभी समाप्त नहीं होता और यदि किसी व्यथित पक्षकार के विरुद्ध कोई अपराध घटित हुआ है तो ऐसी परिस्थिति में उस व्यथित पक्षकार को न्याय मिलना ही चाहिए। परंतु छोटे अपराध तथा कम गंभीर प्रकृति के अपराधों के संबंध में परिसीमा की अवधि निर्धारित की गई...
जानिए क्यों अदालतें किसी गवाह की गवाही/साक्ष्य को हलफनामे (Affidavit) पर प्राप्त करने से कर देती हैं इनकार?
हमने 'लाइव लॉ हिंदी' के पोर्टल पर गवाहों को लेकर ऐसे तमाम लेख आपके समक्ष प्रस्तुत किये हैं जहाँ हमने अदालत के समक्ष किसी मामले में प्रस्तुत होने वाले गवाह और उसके साक्ष्य/गवाही के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की है। इसी क्रम में, आज के इस लेख में हम इस बात को संक्षेप में समझने का प्रयास करेंगे कि आखिर क्यों अदालतें, किसी भी गवाह की गवाही/साक्ष्य को एफिडेविट पर प्राप्त करने से इनकार कर देती हैं। मौजूदा लेख में हम इस बात को भी समझने का प्रयास करेंगे कि आखिर क्यों, अदालतें यह जोर देकर हर मामले में...
जानिए दाण्डिक न्यायिक प्रक्रिया में अनियमित कार्यवाही ( Irregular Proceedings) क्या होती है?
कभी-कभी दाण्डिक प्रक्रिया के अंतर्गत दंड न्यायालय अपनी शक्तियों के बाहर जाकर कोई काम करता है। जब दंड न्यायालय अपनी शक्तियों के बाहर जाकर कोई कार्यवाही करता है ऐसी कार्यवाही को अनियमित कार्यवाही (Irregular Proceedings) कहा जाता है। साधारण अर्थों में ऐसी कार्यवाही, जिसे करने के लिए कोई दंड न्यायालय सशक्त नहीं है उसके उपरांत भी उन कार्यवाहियों को कर देता है। दंड प्रक्रिया संहिता 1973 के अंतर्गत अध्याय 35 में इस प्रकार की अनियमित कार्यवाही का उल्लेख किया गया है। यह अनियमित कार्यवाहियां कब...
धारा 146 (1) CrPC: जानिए क्या है कार्यपालक मजिस्ट्रेट की विवादित संपत्ति कुर्क करने की विशेष शक्ति?
जैसा कि हम जानते हैं कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 145, अचल संपत्ति से जुड़े विवादों से संबंधित है, और जब इस विवाद से शांति भंग होने की संभावना हो सकती है, तो इस धारा की उपधारा (1) के तहत कार्यवाही करते हुए एक कार्यकारी मजिस्ट्रेट के लिए पार्टियों को एक विशिष्ट तिथि और समय पर बुलाने करने की आवश्यकता होती है, ताकि वे उक्त संपत्ति पर अपने संबंधित दावे उसके समक्ष रखें, जिसके संबंध में लोक शांति के उल्लंघन की आशंका है। धारा 145 का यह उद्देश्य है कि यह धारा केवल कानून और व्यवस्था बनाए रखने के लिए...
जानिए ज़मानत (Bail) का मूल अर्थ
आपराधिक मामलों के संदर्भ में ज़मानत प्रचलित शब्द है। जब भी कोई व्यक्ति किसी प्रकरण में अभियुक्त बनाया जाता है तथा अन्वेषण (Investigation), जांच (Inquiry) और विचारण (Trial) के लंबित रहते हुए उस व्यक्ति को कारावास में परिरुद्ध किया जाता है तब ज़मानत शब्द, उस अभियुक्त के लिए सबसे अधिक उपयोग में लाया जाता है। इस सारगर्भित लेख के माध्यम से ज़मानत के मूल अर्थ को समझा जा रहा है। ज़मानत क्या है ? यह कहां से आई है ? ज़मानत शब्द जिसे अंग्रेजी में बेल (Bail) कहा जाता है, दंड प्रक्रिया संहिता 1973 (सीआरपीसी) के...
शास्त्रीय हिंदू कानून में बेटियों के साथ किए गए अन्याय को हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम में संशोधन के बाद समाप्त किया गया, सुप्रीम कोर्ट ने की हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम की व्याख्या
अशोक किनीसुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में सहदायिकी (पुश्तैनी) संपत्ति में बेटियों के समान अधिकार को मान्यता दी है। सुप्रीम कोर्ट ने सहदायिकी संपत्ति के हस्तांतरण से संबधित कानून और साथ ही बेटियों पर हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम में 2005 किए गए संशोधन के प्रभाव की व्याख्या की है। जस्टिस अरुण मिश्रा, एस अब्दुल नज़ीर और एमआर शाह की पीठ ने कहा है कि शास्त्रीय हिंदू कानून में बेटी को संपत्ति में सहभागी नहीं बनाया गया है। 2005 में संविधान की भावना के अनुसार, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम में...
धारा 451 सीआरपीसी: जानिए कब जब्त की गयी संपत्ति को उसके मालिक/किसी अन्य को सौंप दिया जाना चाहिए
उड़ीसा हाईकोर्ट ने बुधवार (5 अगस्त) को सुनाये एक आदेश में इस ओर इशारा किया कि जब्त वाहनों को थानों में लंबे समय तक धूप, बारिश और उचित रखरखाव के बिना नुकसान की स्थिति में रखने का कोई फायदा नहीं होता है। न्यायमूर्ति एस. के. पाणिग्रही की पीठ ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किये गए मामले, सुंदरभाई अंबालाल देसाई बनाम गुजरात सरकार 2002 (10) SCC 283 एवं उड़ीसा हाईकोर्ट द्वारा तय किये गए मामले दिलीप दास बनाम उड़ीसा राज्य 2019 (III) ILR-CUT 386 की राय के मद्देनजर, मौजूदा मामले में याचिकाकर्ता को उनकी जब्त...
जानिए अभियुक्त द्वारा भोगी गई कारावास की अवधि को कारावास के दंडादेश की अवधि से मुजरा (Set Off) कैसे किया जाता है
अन्वेषण ( Investigation), जांच (Inquiry) और विचारण (Trial) किसी भी दंडादेश के पूर्व की प्रक्रिया है। अनेक संज्ञेय अपराधों के अंतर्गत अभियुक्त को अन्वेषण, जांच और विचारण के अंतराल में कारागार में निरूद्ध रहना पड़ सकता है। किसी आरोपी व्यक्ति को उसके दोषसिद्ध (Convicted) होते होते संज्ञेय अपराध के मामले में लंबे समय तक कारावास में रहना पड़ सकता है। न्यायालय द्वारा अभियुक्त को ज़मानत पर छोड़ दिए जाने का अधिकार प्राप्त होता है। विचारण की समाप्ति के पश्चात अभियुक्त को दंडादेश दिया जाता है। अपील के...
जब अभियुक्त के पास ज़मानतदार नहीं हो तब क्या करें, क्या है प्रावधान
संपूर्ण भारत में कोई अभियुक्त किसी अन्य स्थान पर निवास करता है और किसी अन्य स्थान पर कोई अपराध घटित हो जाता है, जहां अपराध घटित होता है वहां अभियुक्त पर अन्वेषण ( Investigation), जांच (Inquiry) और विचारण (Trial) की कार्यवाही होती है। ऐसे में दूरस्थ स्थानों के व्यक्तियों को भी अभियुक्त बनाया जा सकता है। उदाहरण के लिए कोई व्यक्ति कलकत्ता में रहता है और उसे चेन्नई में किसी अपराध में अभियुक्त बनाकर कार्यवाही की जा रही है। ज़मानत नियम है तथा जेल अपवाद है। किसी भी व्यक्ति को जब किसी प्रकरण में...
जानिए मृत्युदंड, कारावास और जुर्माने के दंड का निष्पादन (Execution) कैसे किया जाता है
भारतीय दंड प्रणाली में वर्तमान समय में दंड के प्रारूप में मुख्यतः ये तीन प्रकार के दंड प्रचलन में है। मृत्युदंड (Death Sentence) कारावास (Imprisonment) जुर्माना (Fine) यह तीन प्रकार के दंड सामान्यतः भारत में किए गए किसी भी अपराध के संबंध में दिए जा रहे हैं। भारत के संविधान का अनुच्छेद 21 किसी भी व्यक्ति को प्राण और दैहिक स्वतंत्रता देता है तथा विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के माध्यम से ही किसी व्यक्ति से प्राण और दैहिक स्वतंत्रता को छीना जा सकता है। जब कोई व्यक्ति भारत की सीमा में...
जानिए सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट की आपराधिक (Criminal) प्रकरण ट्रांसफर करने की शक्ति
दंड प्रक्रिया संहिता 1973 (Crpc 1973) आपराधिक प्रकरणों को अंतरण (Transfer) करने की शक्ति भारत के उच्चतम न्यायालय, उच्च न्यायालय और सेशन न्यायालय को देती है। कोई आपराधिक प्रकरण एवं अपील को न्यायालय अंतरण कर सकता है। दंड प्रक्रिया संहिता 1973 का अध्याय '31' इस संदर्भ में संपूर्ण व्यवस्था देता है। इस अध्याय में आपराधिक मामलों के अंतरण के बारे में स्पष्ट प्रावधान दे दिए गए हैं। कभी-कभी न्याय हित में यह प्रश्न खड़ा हो जाता है कि किसी प्रकरण में न्याय नहीं हो पाएगा तथा न्याय के उद्देश्यों के लिए...
[आदेश 7 नियम 11 (a) सीपीसी] जानिए कब वाद-हेतुक (Cause of Action) के अभाव में प्लेंट को नामंजूर किया जा सकता है?
हम इस बात को भलीभांति समझते हैं कि अदालत में एक सिविल सूट की शुरुआत एक वाद-पत्र (Plaint) की फाइलिंग/प्रस्तुति से होती है। एक वाद-पत्र (Plaint), वास्तव में दावों का एक बयान है, जिसे अदालत द्वारा तथ्यों के भंडार के रूप में देखा और माना जाता है। इस प्रकार, प्रत्येक अदालत वादपत्र (Plaint) का विश्लेषण करके यह तय करती है कि उसे एडमिट किया जाना चाहिए अथवा नहीं। सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 7 नियम 11 के तहत कुछ आधार/ग्राउंड्स अधिनियमित किये गए हैं, जिसके तहत अदालत "एक वादपत्र" को अस्वीकार कर सकती...
जानिए मूल अधिकारों (Fundamental Rights) के संदर्भ में राज्य (State) किसे कहा जाता है?
भारत के संविधान (Constitution of India) के भाग 3 के अंतर्गत मूल अधिकारों (Fundamental Rights) का वर्णन किया गया है। यह मूल अधिकार नागरिकों तथा अन्य व्यक्तियों को ग्यारंटी के रूप में प्राप्त होते हैं। इस बात पर यह प्रश्न खड़ा होता है कि इस प्रकार के मूल अधिकार किसके विरुद्ध प्राप्त होते हैं! आम लोगों को इस बारे में जानकारी सरलता से प्राप्त नहीं हो पाती है कि मूल अधिकार प्राप्त तो है परंतु यह अधिकार किस के विरुद्ध प्राप्त हैं। संविधान के भाग 3 में निहित मूल अधिकार 'राज्य' के विरुद्ध प्राप्त होते...
जानिए अपराध विधि (Criminal Law) में पुनरीक्षण (Revision) क्या होता है
अपर न्यायालय को अपील के साथ पुनरीक्षण (Revision) की शक्ति भी प्राप्त होती है। पुनरीक्षण के अंतर्गत अधीनस्थ न्यायालय द्वारा पारित किए गए निष्कर्ष, दंडादेश, आदेश की शुद्धता एवं वैधता और औचित्य के संबंध में अपर न्यायालय को अधिकारिता प्राप्त होती है। भारतीय अपराध विधि के अंतर्गत दंड प्रक्रिया संहिता 1973 के अध्याय 30 में पुनरीक्षण (Revision) के संबंध में प्रावधान किए गए हैं। दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 397 के अंतर्गत उच्च न्यायालय और सेशन न्यायालय को पुनरीक्षण की शक्तियां दी गयी हैं। इस...
जानिए कब अपील करने पर दोषसिद्ध व्यक्ति ज़मानत पर छोड़ा जा सकता है
अपील का अधिकार दोषसिद्ध किए गए व्यक्ति को दंड प्रक्रिया संहिता 1973 के अध्याय 29 के अपील से दिया गया है। दोषसिद्ध हुए व्यक्ति को अपील करने का यह अधिकार सांविधिक (Statute) अधिकार है अर्थात भारत की संसद द्वारा अधिनियमित अधिनियम के माध्यम से दिया गया अधिकार है। जब तक किसी दोषसिद्ध व्यक्ति को अपील न्यायालय द्वारा दोषसिद्ध या दोषमुक्त नहीं कर दिया जाता तब तक आरंभिक न्यायालय के निर्णय को अंतिम निर्णय नहीं माना जाता है। अपीलीय न्यायालय को दी गयी शक्तियों में एक सर्वाधिक बड़ी शक्ति दोषसिद्ध किए गए...
जानिए कब किसी सिद्धदोष अपराधी को बगैर कारावास के सदाचरण की परिवीक्षा ( Probation) और भर्त्सना (Admonition) पर छोड़ा जा सकता है
भारतीय दंड प्रणाली का अधिकांश स्वरूप सुधारात्मक प्रकृति का है। इस विचार पर बल दिया गया है कि आंख के बदले आंख लेने से सारी दुनिया अंधी हो जाएगी, इसीलिए भारतीय दंड प्रणाली को भी सुधारात्मक प्रकृति का बनाया गया है। इस दंड प्रणाली में किसी अपराधी को सुधारने के प्रयास किए जाते हैं न कि उसके किए गए अपराध के बदले, उससे बदला लिया जाता है। भारतवर्ष एक लोकतांत्रिक देश है, जहां बदले जैसा न्याय नहीं होता है तथा सुधार के आधुनिक विचार को अपनाया गया है, परंतु ये सुधार केवल छोटे मामलों में और ऐसे अपराध...
जानिए अपीलीय न्यायालय की शक्तियां और पक्षकारों को अपील का अधिकार
दंड प्रक्रिया संहिता 1973 के अध्याय 29 के अंतर्गत किसी प्रकरण के पक्षकारों को अपील का अधिकार दिया गया है। परिवादी, अभियोजन पक्ष और अभियुक्त ये तीनों ही अपील कर सकते हैं। परिवाद द्वारा संस्थित मामलों में परिवादी को भी अपील करने का अधिकार उपलब्ध होता है। ऐसी परिस्थिति में दंड प्रक्रिया संहिता 1973 (सीआरपीसी) के अंतर्गत अपीलीय न्यायालय की शक्तियों का उल्लेख भी आवश्यक हो जाता है। संहिता के अध्याय अपील के अंतर्गत सीआरपीसी की धारा 386 अपीलीय न्यायालय की शक्तियों के संदर्भ में विस्तार पूर्वक प्रावधान...
दंड प्रक्रिया संहिता की प्रसिद्ध धारा 151 का व्यावहारिक रूप समझिए
दंड प्रक्रिया संहिता 1973 (Code of Criminal Procedure 1973) की धारा 151 जनसाधारण के बीच में अत्यंत चर्चित धारा मानी जाती है। यह धारा बड़े बड़े अपराधों को भी रोकने की शक्ति रखती है, लेकिन कई परस्थितियां ऐसी भी देखने को मिलती हैं, जब बगैर अपराध किए लोगों को इस धारा के अंतर्गत जेल जाना पड़ा है। वैधानिक दृष्टि से देखें तो यह दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 151 की अपराध से निपटने के लिए एक निवारक विधि है, जो समाज में होने वाले अपराधों को उनके हो जाने के पहले ही समाप्त कर देने के लिए उपयोगी है। ...
अपील क्या होती है तथा दोषसिद्धि से अपील के संदर्भ में कुछ विशेष बातें
भारतीय दंड प्रणाली में अपील का अधिकार प्रकरण के पक्षकारों को दिया जाता है। अपील का अधिकार कोई मूल अधिकार या नैसर्गिक अधिकार नहीं है अपितु यह अधिकार एक सांविधिक अधिकार है। यह ऐसा अधिकार जो किसी कानून के अंतर्गत पक्षकारों को उपलब्ध कराया जाता है। यदि किसी विधि में अपील संबंधी किसी प्रावधान का उल्लेख नहीं किया गया है तो ऐसी परिस्थिति में अपील का अधिकार प्राप्त नहीं होता है। किसी भी पक्षकार को अपील का अधिकार नैसर्गिक अधिकार की तरह नहीं मिलेगा। किसी व्यक्ति को अपील का अधिकार कानून के माध्यम से ही...

















