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कम गंभीर अपराधों में क्या होती है न्यायालय की संज्ञान (cognizance) लेने की परिसीमा अवधि (Limitation)
कम गंभीर अपराधों में क्या होती है न्यायालय की संज्ञान (cognizance) लेने की परिसीमा अवधि (Limitation)

किसी भी सिविल प्रकरण में परिसीमा अधिनियम 1961 के अधीन प्रकरण को परिसीमा से बांधा गया है। इसी प्रकार दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत कम गंभीर प्रकृति के अपराधों को परिसीमा की अवधि से बांधने का प्रयास किया गया है। दंड विधि का यह सामान्य सिद्धांत है कि अपराध कभी समाप्त नहीं होता और यदि किसी व्यथित पक्षकार के विरुद्ध कोई अपराध घटित हुआ है तो ऐसी परिस्थिति में उस व्यथित पक्षकार को न्याय मिलना ही चाहिए। परंतु छोटे अपराध तथा कम गंभीर प्रकृति के अपराधों के संबंध में परिसीमा की अवधि निर्धारित की गई...

जानिए क्यों अदालतें किसी गवाह की गवाही/साक्ष्य को हलफनामे (Affidavit) पर प्राप्त करने से कर देती हैं इनकार?
जानिए क्यों अदालतें किसी गवाह की गवाही/साक्ष्य को हलफनामे (Affidavit) पर प्राप्त करने से कर देती हैं इनकार?

हमने 'लाइव लॉ हिंदी' के पोर्टल पर गवाहों को लेकर ऐसे तमाम लेख आपके समक्ष प्रस्तुत किये हैं जहाँ हमने अदालत के समक्ष किसी मामले में प्रस्तुत होने वाले गवाह और उसके साक्ष्य/गवाही के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की है। इसी क्रम में, आज के इस लेख में हम इस बात को संक्षेप में समझने का प्रयास करेंगे कि आखिर क्यों अदालतें, किसी भी गवाह की गवाही/साक्ष्य को एफिडेविट पर प्राप्त करने से इनकार कर देती हैं। मौजूदा लेख में हम इस बात को भी समझने का प्रयास करेंगे कि आखिर क्यों, अदालतें यह जोर देकर हर मामले में...

धारा 146 (1) CrPC: जानिए क्या है कार्यपालक मजिस्ट्रेट की विवादित संपत्ति कुर्क करने की विशेष शक्ति?
धारा 146 (1) CrPC: जानिए क्या है कार्यपालक मजिस्ट्रेट की विवादित संपत्ति कुर्क करने की विशेष शक्ति?

जैसा कि हम जानते हैं कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 145, अचल संपत्ति से जुड़े विवादों से संबंधित है, और जब इस विवाद से शांति भंग होने की संभावना हो सकती है, तो इस धारा की उपधारा (1) के तहत कार्यवाही करते हुए एक कार्यकारी मजिस्ट्रेट के लिए पार्टियों को एक विशिष्ट तिथि और समय पर बुलाने करने की आवश्यकता होती है, ताकि वे उक्त संपत्ति पर अपने संबंधित दावे उसके समक्ष रखें, जिसके संबंध में लोक शांति के उल्लंघन की आशंका है। धारा 145 का यह उद्देश्य है कि यह धारा केवल कानून और व्यवस्था बनाए रखने के लिए...

शास्त्रीय हिंदू कानून में बेटियों के साथ किए गए अन्याय को हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम में संशोधन के बाद समाप्त किया गया, सुप्रीम कोर्ट ने की हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम की व्याख्या
शास्त्रीय हिंदू कानून में बेटियों के साथ किए गए अन्याय को हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम में संशोधन के बाद समाप्त किया गया, सुप्रीम कोर्ट ने की हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम की व्याख्या

अशोक किनीसुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में सहदाय‌िकी (पुश्तैनी) संपत्त‌ि में बेटियों के समान अधिकार को मान्यता दी है। सुप्रीम कोर्ट ने सहदाय‌िकी संपत्त‌ि के हस्तांतरण से संबधित कानून और साथ ही बेटियों पर हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम में 2005 किए गए संशोधन के प्रभाव की व्याख्या की है। जस्टिस अरुण मिश्रा, एस अब्दुल नज़ीर और एमआर शाह की पीठ ने कहा है कि शास्त्र‌ीय हिंदू कानून में बेटी को संपत्त‌ि में सहभागी नहीं बनाया गया है। 2005 में संविधान की भावना के अनुसार, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम में...

जानिए अभियुक्त द्वारा भोगी गई कारावास की अवधि को कारावास के दंडादेश की अवधि से मुजरा (Set Off) कैसे किया जाता है
जानिए अभियुक्त द्वारा भोगी गई कारावास की अवधि को कारावास के दंडादेश की अवधि से मुजरा (Set Off) कैसे किया जाता है

अन्वेषण ( Investigation), जांच (Inquiry) और विचारण (Trial) किसी भी दंडादेश के पूर्व की प्रक्रिया है। अनेक संज्ञेय अपराधों के अंतर्गत अभियुक्त को अन्वेषण, जांच और विचारण के अंतराल में कारागार में निरूद्ध रहना पड़ सकता है। किसी आरोपी व्यक्ति को उसके दोषसिद्ध (Convicted) होते होते संज्ञेय अपराध के मामले में लंबे समय तक कारावास में रहना पड़ सकता है। न्यायालय द्वारा अभियुक्त को ज़मानत पर छोड़ दिए जाने का अधिकार प्राप्त होता है। विचारण की समाप्ति के पश्चात अभियुक्त को दंडादेश दिया जाता है। अपील के...

जानिए कब किसी सिद्धदोष अपराधी को बगैर कारावास के सदाचरण की परिवीक्षा ( Probation) और भर्त्सना (Admonition) पर छोड़ा जा सकता है
जानिए कब किसी सिद्धदोष अपराधी को बगैर कारावास के सदाचरण की परिवीक्षा ( Probation) और भर्त्सना (Admonition) पर छोड़ा जा सकता है

भारतीय दंड प्रणाली का अधिकांश स्वरूप सुधारात्मक प्रकृति का है। इस विचार पर बल दिया गया है कि आंख के बदले आंख लेने से सारी दुनिया अंधी हो जाएगी, इसीलिए भारतीय दंड प्रणाली को भी सुधारात्मक प्रकृति का बनाया गया है। इस दंड प्रणाली में किसी अपराधी को सुधारने के प्रयास किए जाते हैं न कि उसके किए गए अपराध के बदले, उससे बदला लिया जाता है। भारतवर्ष एक लोकतांत्रिक देश है, जहां बदले जैसा न्याय नहीं होता है तथा सुधार के आधुनिक विचार को अपनाया गया है, परंतु ये सुधार केवल छोटे मामलों में और ऐसे अपराध...