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जानिए ज़मानत (Bail) का मूल अर्थ

Shadab Salim
14 Aug 2020 4:00 AM GMT
जानिए ज़मानत (Bail) का मूल अर्थ
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आपराधिक मामलों के संदर्भ में ज़मानत प्रचलित शब्द है। जब भी कोई व्यक्ति किसी प्रकरण में अभियुक्त बनाया जाता है तथा अन्वेषण (Investigation), जांच (Inquiry) और विचारण (Trial) के लंबित रहते हुए उस व्यक्ति को कारावास में परिरुद्ध किया जाता है तब ज़मानत शब्द, उस अभियुक्त के लिए सबसे अधिक उपयोग में लाया जाता है। इस सारगर्भित लेख के माध्यम से ज़मानत के मूल अर्थ को समझा जा रहा है। ज़मानत क्या है ? यह कहां से आई है ?

ज़मानत शब्द जिसे अंग्रेजी में बेल (Bail) कहा जाता है, दंड प्रक्रिया संहिता 1973 (सीआरपीसी) के अध्याय 33 में प्राप्त होती। दंड प्रक्रिया संहिता 1973 के प्रावधानों में कहीं भी ज़मानत शब्द की परिभाषा नहीं है तथा अध्याय 33 में ज़मानत शब्द अवश्य प्राप्त होता है।

जब भी किसी अभियुक्त को जेल में रखा जाता है तब उस पर अन्वेषण, जांच और विचारण या अपील की कार्यवाही लंबित रहती है। ऐसी स्थिति में यह तय नहीं होता है कि किसी प्रकरण में यदि किसी व्यक्ति को अभियुक्त बनाया है तो वह अभियुक्त दोषमुक्त होगा या दोषसिद्ध होगा। यदि अभियुक्त किसी प्रकरण में दोषमुक्त हो जाता है और लंबे समय तक उस व्यक्ति को कारावास में रखा जाता है तो यह उस व्यक्ति के प्रति अन्याय ही होगा।

इस अन्याय से बचने हेतु अभियुक्त को दंड प्रक्रिया संहिता 1973 के अध्याय 33 की विभिन्न धाराओं के अंतर्गत ज़मानत दी जा सकती है। ज़मानत से तात्पर्य कैदी की हाजिरी सुनिश्चित करने हेतु ऐसी प्रतिभूति से है, जिसको देने पर अभियुक्त को अन्वेषण अथवा विचारण के लंबित होने की स्थिति में छोड़ दिया जाता है।

गोविंद प्रसाद बनाम पश्चिम बंगाल राज्य 1975 क्रिमिनल लॉ जर्नल 1249 कलकत्ता के मामले में कहा गया है कि इस प्रकार के ज़मानत में बंधपत्र में यह शर्त शामिल होती है कि वह बंधपत्र में निर्दिष्ट तिथि एवं समय पर स्वयं को न्यायालय के समक्ष हाजिर करेगा।

ज़मानत के अधीन प्रतिभूति देने पर कोई भी व्यक्ति अपराध तथा विचारण की लंबित स्थिति में निरोध से स्वयं को मुक्त करके एक सामान्य नागरिक की भांति समाज में स्वतंत्रता पूर्वक विचरण करता है। ज़मानत संबंधी उपबंध अवधारणा पर आधारित है कि किसी भी व्यक्ति की स्वाधीनता में आयुक्तियुक्त एवं अन्याय पूर्ण हस्तक्षेप न किया जाए। इस अध्याय की समस्त धाराओं के अधीन ज़मानत पर छोड़े जाने, ज़मानत निरस्त किए जाने, उच्च न्यायालय तथा सेशन न्यायालय द्वारा जमानत जारी करने संबंधी शक्ति बंधपत्र के हरण आदि के बारे में विस्तृत प्रावधान किए गए।

एक सामान्य सिद्धांत यह है कि 'ज़मानत न कि जेल' (बेल एंड नॉट जेल) के नाम से संबोधित किया जाता है। कोई व्यक्ति जिसके विरुद्ध केवल यह संभावना या आशंका है कि उसने अपराध किया होगा, सीधे न्यायालय के समक्ष हाजिर होकर ज़मानत के लिए याचना कर सकता है। जब तक कि उसे वास्तव में गिरफ्तार न कर लिया गया हो या उसके विरुद्ध गिरफ्तारी वारंट जारी न किया गया हो। गिरफ्तारी वारंट के आधार पर उसके गिरफ्तार किए जाने की संभावना उत्पन्न न हुई हो।

ज़मानत कब दी जा सकती है

यदि अपराध ज़मानतीय हो तो ज़मानत पर रिहाई का अभियुक्त का अधिकार होता है। इस प्रकार की ज़मानत अभियुक्त पुलिस अधिकारी या न्यायालय इनमें से किसी के द्वारा भी अधिकारपूर्वक मांग सकता है। न्यायालय और पुलिस अधिकारी को उन अपराधों में ज़मानत देना ही होती है, जिन अपराधों में ज़मानत दिया जाना अभियुक्त का अधिकार होता है।

भारतीय दंड संहिता 1860 (आईपीसी) के कौन से अपराध ज़मानतीय हैं यह दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की प्रथम अनुसूची में उपबंधित किया गया है।

ज़मानत के प्रावधानों से संबंधित दंड प्रक्रिया संहिता 1973 (सीआरपीसी) के अध्याय 33 की निम्न चार धाराएं विशेष धाराएं हैं। इन धाराओं पर सारगर्भित टिप्पणी लेखक इस लेख के माध्यम से कर रहा है।

सीआरपीसी की धारा 436

सीआरपीसी (Crpc) की यह धारा यह उपबंधित करती है कि जहां किसी ज़मानती अपराध के अभियुक्त को गिरफ्तारी व निरुद्ध किया जाता है तो वह अधिकार के रूप में ज़मानत पर छोड़े जाने का दावा कर सकता है।

यह धारा ऐसे सभी मामलों के प्रति लागू होती है, जिनमें अभियुक्त किसी ज़मानतीय अपराध का दोषी है या वह ऐसा व्यक्ति है, जिसने कोई अपराध नहीं किया है लेकिन इसके विरुद्ध संहिता के अध्याय 8 के अंतर्गत प्रतिभूति की कार्रवाई की गयी है।

यह धारा किसी अन्य गिरफ्तारी या निरोध के मामले में भी लागू होगी बशर्ते कि वह किसी गैर ज़मानतीय अपराध से संबंधित नहीं है। जब कोई गैर ज़मानतीय अपराध के अभियुक्त से कोई व्यक्ति पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी द्वारा बिना वारंट के गिरफ्तार व निरुद्ध किया जाता है या न्यायालय के समक्ष हाजिर होता है तो उसे ज़मानत पर छोड़ दिया जाएगा। पुलिस थाने का भारसाधक अधिकारी या न्यायालय उस व्यक्ति को ज़मानत पर छोड़ने के बजाय उससे प्रतिभूतियों सहित या रहित बंधपत्र निष्पादित करवाकर उसे अभिरक्षा से उन्मोचित कर सकता है।

वीरेंद्र बनाम राजस्थान राज्य 1988 क्रिमिनल केसेस 431 के प्रकरण में यह सुनिश्चित किया गया है कि जब अभियुक्त को किसी ज़मानतीय अपराध के अभियोग की दशा में धारा 436 के अधीन जमानत पर छोड़ दिया जाता है उसके के बाद पुलिस द्वारा उसकी रिहाई पर उसके विरुद्ध एक गैर जमानतीय अपराध और जोड़ दिया जाता है। उस दशा में जारी की गई ज़मानत को निरस्त नहीं किया जा सकता। ज़मानत तो धारा 439 (2) या 437 (5) के अधीन ही रद्द की जा सकती है।

गुडी कांति नरसिंहुलु बनाम लोक अभियोजक आंध्र प्रदेश 1978 उच्चतम न्यायालय के एक विशेष प्रकरण में जमानत संबंधी कुछ मार्गदर्शक सिद्धांत प्रतिपादित किए। लेखक उन सिद्धांतों का उल्लेख लेख में कर रहा है।

1)- मजिस्ट्रेट द्वारा ज़मानत मंज़ूर किए जाने अथवा नहीं किए जाने का निर्णय पूर्व सावधानी बरतते हुए युक्तियुक्तता के आधार पर किया जाना चाहिए।

2)- ज़मानत नामंज़ूर की जाने के फलस्वरूप अभियुक्त को स्वतंत्रता के अधिकार से वंचित किया जाता है इसलिए मजिस्ट्रेट द्वारा इसका प्रयोग दाण्डिक उद्देश्य से नहीं किया जाना चाहिए अपितु अभियुक्त और समाज दोनों के हितों को ध्यान में रखते हुए किया जाना चाहिए।

3)- ज़मानत के आवेदन पर विचार करते समय मजिस्ट्रेट को इस बात पर विशेष ध्यान देना चाहिए कि ज़मानत पर छोड़ दिए जाने पर अभियुक्त गवाहों के लिए खतरा उत्पन्न तो नहीं करेगा या न्यायिक कार्यवाही के संचालन में बाधा उत्पन्न नहीं करेगा।

4)- ज़मानत के आवेदन पर विचार करते समय मजिस्ट्रेट को अभियुक्त के पूर्व वृतांत को भी ध्यान में रखना चाहिए और यह सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि अभियुक्त की आपराधिक गतिविधियों में लिप्त होने की संभावना तो नहीं है।

5)- सामान्यता अभ्यस्त और घोर अपराधियों की ज़मानत मंजूर नहीं की जानी चाहिए।

सीआरपीसी की धारा 437

सीआरपीसी (Crpc) 1973 की धारा 437 गैर ज़मानतीय अपराध की दशा में कब ज़मानत ली जा सकेगी, इस संदर्भ में उल्लेख कर रही है।

दंड प्रक्रिया संहिता की यह धारा उस न्यायालय को अधिकार दे रही है, जिसके समक्ष अभियुक्त को पेश किया जाता है। इस धारा के अंतर्गत गैर जमामतीय अपराध के ऐसे मामलों में जो मृत्युदंड या आजीवन कारावास से दंडित न हो न्यायालय या पुलिस द्वारा अभियुक्त को ज़मानत पर छोड़े जाने के संबंध में प्रावधान है। धारा 437 के अंतर्गत न्यायालय के साथ ही पुलिस को भी यह शक्ति दी गई है कि वह भी किसी व्यक्ति को जमानत पर छोड़ सकती है पर उसके लिए कुछ शर्ते निहित की गई है। यदि अभियुक्त-

1)- 16 वर्ष से कम आयु का है।

2)- महिला या बीमार है।

3)- असक्षम और शिथलांग व्यक्ति है।

अपराध मृत्युदंड आजीवन कारावास से दंडित होने पर भी उसे ज़मानत पर छोड़ा जा सकता है यदि ऊपर वर्णित निम्न शर्तों की पूर्ति होती है तो।

ज़मानतीय अपराध के अभियुक्त को न्यायालय या पुलिस द्वारा ज़मानत पर छोड़े जाने के लिए अपनी विवेक शक्ति का प्रयोग करते समय न्यायालय या पुलिस यथास्थिति को कतिपय सामान्य सिद्धांतों को ध्यान में रखना होगा।

उच्चतम न्यायालय ने अपने अनेक निर्णय में अभिकथन किया कि अभियुक्त को ज़मानत पर छोड़ने का उद्देश्य यह है कि वह जांच या विचारण के दौरान आवश्यकता अनुसार अभियुक्त की न्यायालय में उपस्थिति सुनिश्चित कराई जा सके और उसे विचाराधीन अवधि में दंड स्वरूप कारावास में न रहना पड़े।

गुरुचरण सिंह बनाम दिल्ली प्रशासन 1978 सुप्रीम कोर्ट आफ इंडिया 118 के मामले में यह कहा गया है कि-

विधि के अधीन अभियुक्त को ज़मानत पर छोड़ा जाना एक नियम है, जबकि ज़मानत देने से इनकार किया जाना एक अपवाद है।

कोई अपराध ज़मानतीय है या गैर ज़मानतीय है, इसका निर्धारण दंड प्रक्रिया संहिता की प्रथम अनुसूची से होता है या फिर उस अधिनियम के माध्यम से होता है जिस अधिनियम के अंतर्गत किसी कार्य या लोप को अपराध बनाया गया है।

साधारण तौर पर अजमानतीय अपराध के मामले में अभियुक्त को ज़मानत पर छोड़े जाने के लिए न्यायालय या पुलिस यथास्थिति निम्नलिखित बिंदुओं पर विचार अवश्य करेगी-

1)- अभियुक्त के विरुद्ध अभियोग तथा आरोप।

2)- आरोप की पुष्टि में उपलब्ध साक्ष्य की प्रकृति और प्रकार।

3)- सिद्धदोष होने पर दिए जाने वाले दंड की गुरुता।

4)- ज़मानत मंजूर की जाने की दशा में अभियुक्त के भाग जाने की संभावना।

5)- अभियुक्त द्वारा ज़मानत के दौरान साक्ष्य मिटाने या गवाहों को धमकाने, प्रलोभित करने या तोड़ने आदि की क्या संभावना है।

6)- विचारण के लिए लगने वाली अनुमानित समय अवधि।

7)- अभियुक्त का व्यक्तिगत वृतांत या पृष्ठभूमि जैसे स्वास्थ्य, लिंग, आयु,पारिवारिक स्थिति, प्रतिष्ठा इत्यादि।

8)- अपराध घटित होने की परिस्थितियां।

दंड प्रक्रिया संहिता 437 के अंतर्गत कोई अभियुक्त अधिकारपूर्वक पुलिस अधिकारी या न्यायालय से अन्वेषण, विचारण के लंबित रहते हुए ज़मानत नहीं मांग सकता। किंतु कुछ दशाओं में न्यायालय को यह विवेकाधिकार प्राप्त है की वह अभियुक्त को ज़मानत पर छोड़ सकता है। उन दशाओं में प्रमुख है-

16 वर्ष से कम आयु।

अभियुक्त का स्त्री होना।

रोगी या शरीर का कोई अंग खराब होना।

ऊपर वर्णित सिद्धांतों की भी दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 437 के अंतर्गत जमानत दिए जाने में महती भूमिका होती है।

धारा 438 (अग्रिम ज़मानत)

अग्रिम ज़मानत ( Anticipatory Bail) की अवधारणा इस तथ्य पर आधारित है कि कोई गैर ज़मानतीय अपराध घटित होने पर यदि किसी व्यक्ति को गिरफ्तारी की युक्तियुक्त आशंका हो तो न्यायालय में आवेदन करके उस संभावित परेशानी लांछन से बच सके जो गिरफ्तारी के कारणों से भुगतनी पड़ती है।

अग्रिम ज़मानत के आवेदन पर विचार करते समय न्यायालय समाधान कर लेगा कि किसी ज़मानत मंज़ूर किए जाने पर आवेदक द्वारा उसे दी गई आजादी का दुरुपयोग किए जाने की कोई आशंका तो नहीं है। दांडिक कार्यवाही से बचने के लिए वह फरार तो नहीं होना चाहता।

अग्रिम ज़मानत किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी के पूर्व होती है। जहां तक धारा 438 के अधीन व्यक्ति को अग्रिम ज़मानत पर छोड़े जाने का प्रश्न है यह आधिकारिकता केवल सेशन न्यायालय एवं उच्च न्यायालय को ही प्राप्त है।

गुरबख्श सिंह सिब्बिया बनाम पंजाब राज्य 1980 सुप्रीम कोर्ट क्रिमिनल 465 के प्रकरण में दिए गए निर्णय के पश्चात उच्चतम न्यायालय का रुख यह रहा है कि अग्रिम ज़मानत केवल एक सीमित समय के लिए ही दी जाए ताकि अभियुक्त विचारण न्यायालय में नियमित ज़मानत हेतु आवेदन कर उसका लाभ ले सके।

न्यायालय के अनुसार अग्रिम ज़मानत केवल उसी समय तक वैध मानी जानी चाहिए जब तक कि अभियुक्त न्यायालय में नियमित ज़मानत हेतु आवेदन प्रस्तुत नहीं करता है।

हालांकि इस निर्णय के बाद भी सिद्ध राम सदलिंगप्पा महेतरे बनाम महाराष्ट्र राज्य 2010 के वाद में कहा गया है कि अग्रिम ज़मानत की अवधि पर कोई समय सीमा लगाना उचित नहीं होगा तथा अग्रिम ज़मानत स्वीकार करने वाले न्यायालय को चाहिए कि वह इसकी अवधि निर्णय मामले का विचारण कर रहे न्यायालय पर छोड़ दे। न्यायालय में इस बात से सहमति दर्शायी की अग्रिम ज़मानत पर छोड़ने की न्यायालय शक्ति एक विशेष शक्ति होने के कारण इसका प्रयोग यथासंभव विरले प्रकरणों में ही किया जाना चाहिए।

साधारण ज़मानत और अग्रिम ज़मानत में अंतर केवल इतना है कि साधारण ज़मानत किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी के बाद होती है जब की अग्रिम जमानत किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी की आशंका पर होती है।

सीआरपीसी की धारा 439

सीआरपीसी 1973 की धारा 439 सेशन न्यायालय, उच्च न्यायालय की ज़मानत संबंधी विशेष शक्तियों का उल्लेख कर रही है। इस धारा के अनुसार उच्च न्यायालय सेशन न्यायालय किसी ऐसे व्यक्ति को जिसके विरुद्ध किसी अपराध का अभियोग है तथा अभिरक्षा में है ज़मानत पर छोड़े जाने के निर्देश दे सकता है। अपराध धारा 437 (3) में वर्णित प्रकृति का है तो न्यायालय उन्मोचित कर सकता है। इस प्रकार न्यायालय उचित समझे तो किसी व्यक्ति को जमानत पर छोड़ सकता है।

दंड प्रक्रिया संहिता की इस धारा के अंतर्गत सत्र न्यायालय और उच्च न्यायालय को ज़मानत के संबंध में अपार शक्तियां दी गई हैं। धारा 439 की उपधारा (2) के अधीन उच्च न्यायालय, सेशन न्यायालय किसी भी ऐसे व्यक्ति को जिसे इस अध्याय के अंतर्गत ज़मानत पर छोड़ा गया हो, गिरफ्तार करने अभिरक्षा के लिए सुपुर्द किए जाने के निर्देश भी दे सकती है।

इस धारा के अधीन सेशन न्यायालय एवं उच्च न्यायालय को प्राप्त ज़मानत मंजूर करने की शक्ति मजिस्ट्रेट की शक्ति की समवर्ती है। अंतर केवल यह है कि मजिस्ट्रेट ज़मानत स्वीकार या अस्वीकार करने संबंधी शक्ति का प्रयोग धारा 437 के अधीन प्रारंभिक स्तर पर करेगा, जबकि उच्च न्यायालय शक्ति का प्रयोग अपनी अपील या पुनरीक्षण अधिकारिता के अधीन कर सकेगा।

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