जानिए हमारा कानून
जानिए लिव इन रिलेशनशिप से संबंधित भारतीय कानून
आधुनिक समय में लिव इन रिलेशनशिप का चलन बढ़ता जा रहा है। कामकाजी युवा शादी के स्थान पर लिव इन रिलेशनशिप को भी महत्व दे रहे हैं। लिव इन... बड़े नगरों में अधिक उपयोग में लाया जाता है। महिला-पुरुष का बगैर विवाह के एक साथ रहने की वाली व्यवस्था को लिव इन रिलेशनशिप कहा जाता है।लिव इन... पश्चिम की जीवन शैली है तथा भारतीयों ने इसे तेजी से अपनाना शुरू किया है। विवाह में जाति तथा धार्मिक बंधन तथा अन्य बंधन होने के कारण युवक-युवती लिव इन में साथ रहने को प्राथमिकता देने लगे हैं। इस प्रकार की व्यवस्था जब समाज...
राजस्थान सियासी संकट: जानिए कब यह माना जाता है कि सदन सदस्य ने अपनी पार्टी की सदस्यता छोड़ दी है?
राजस्थान विधानसभा स्पीकर ने 14 जुलाई को कथित बागी विधायकों (सचिन पायलट एवं 18 अन्य विधायक) को अयोग्य ठहराए जाने के नोटिस जारी किए, जिसमें यह कहा गया कि उन्होंने 13 जुलाई और 14 जुलाई को विधायक दल की बैठक में भाग लेने के पार्टी के मुख्य व्हिप डॉक्टर महेश जोशी द्वारा जारी किए गए निर्देश का उल्लंघन किया है। यह नोटिस, संविधान की दसवीं अनुसूची के पैराग्राफ 2 (1) (ए) के तहत जारी किए गए हैं, जो प्रावधान "स्वेच्छा से एक राजनीतिक पार्टी की सदस्यता छोड़ने वाले व्यक्ति" (voluntarily giving up membership...
धारा 154 साक्ष्य अधिनियम: पक्षद्रोही गवाह (Hostile Witness) कौन होता है और कब उसे बुलाने वाला पक्ष उसका प्रति परीक्षण कर सकता है?
किसी मामले में जब किसी पक्ष द्वारा एक गवाह अदालत के समक्ष पेश किया जाता, तो ऐसा माना जाता है कि जिस पक्ष ने उस गवाह को बुलाया है, वह गवाह उस पक्ष के हित में अदालत के समक्ष गवाही/साक्ष्य देगा। आम तौर पर वह ऐसा कुछ भी अदालत के समक्ष नहीं कहेगा, जोकि विरोधी पक्ष (Adverse Party) के हित में हो या उसे फायदा पहुंचाए। यह बात तार्किक भी मालूम होती है कि जो पक्ष अपनी तरफ से किसी गवाह को अदालत के समक्ष गवाही देने के लिए बुला रहा है वह उसके पक्ष में ही बोलेगा, इसलिए धारा 145 r/w धारा 146 के अंतर्गत,...
कौन होता है सरकारी गवाह और कैसे मिलता है उसे क्षमादान
संयुक्त रूप से किए गए अपराध में कभी-कभी यह परिस्थिति होती है कि इस संयुक्त षड्यंत्र के साथ किसी अपराध को कारित करने वाले लोगों में कोई एक भेदी गवाह (approver) बन जाता है, जिसे सरकारी गवाह भी कहा जाता है। कभी-कभी गंभीर प्रकृति के अपराधों के मामले में अभियोजन पक्ष को यथेष्ट साक्ष्य नहीं मिल पाते हैं, जिस कारण आरोपी को दोषमुक्त होने का अवसर मिल सकता है। अभियोजन पक्ष प्रकरण की सभी वास्तविक बातों को न्यायालय के सामने लाने हेतु अभियुक्तों में से किसी एक अभियुक्त को सरकारी गवाह बना देता है। यह...
हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम से पहले और बाद में हिंदू का वसीयत करने का अधिकार
अशोक किनीएलआरएस द्वारा वी कल्याणस्वामी (डी) बनाम एलआरएस द्वारा एल भक्तवत्सलम (डी) मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला वसीयत के निष्पादन से जुड़े कानूनी सिद्धांतों की विस्तृत चर्चा करता है। यह माना जाता है कि, ऐसी स्थिति में, जब वसीयत के दोनों उपस्थित गवाह मर चुके हों , तब यह साबित करने के लिए पर्याप्त है कि कम से कम एक उपस्थित गवाह का सत्यापन उसका लिखावट में हो। जब दोनों उपस्थित गवाहों की मृत्यु हो चुकी हो, तो यह माना जाता है कि भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 63 के तहत आवश्यक रूप से सत्यापन की...
जानिए परिशांति बनाए रखने के लिए निष्पादित किए जाने वाले बंधपत्र की प्रक्रिया
जब कभी कार्यपालक मजिस्ट्रेट द्वारा परिशांति बनाए रखने के लिए बंधपत्र लिए जाते हैं तो ऐसे बंधपत्र लेने के लिए दंड प्रक्रिया संहिता 1973 के अध्याय 8 में प्रक्रिया भी बताई गई है तथा बंधपत्रो को निष्पादित नहीं करने के कारण होने वाले परिणामों का भी उल्लेख किया गया है। पूर्व के लेख में इस विषय पर वर्णन किया गया था कि किन लोगों के लिए इस तरह के बंधपत्र निष्पादित किए जाने का आदेश किया जा सकता है तथा इस लेख में बंधपत्र निष्पादित किए जाने की प्रक्रिया का उल्लेख किया जा रहा है। प्रतिभूति के लिए आदेशित...
सीआरपीसी : जानिए निर्णय (Judgement) क्या होता है और कैसे लिखा जाता है
साधारण तौर पर निर्णय (Judgement)से आशय किसी विवाद के तथ्यों पर कोई निष्कर्ष से लगाया जाता है। भारतीय दंड प्रणाली के अंतर्गत किसी व्यक्ति का विचारण करने के उपरांत उस पर निर्णय दिया जाता। इसके अंदर अभियुक्त जिसका विचारण किया गया था या तो दोषसिद्ध होता है या फिर दोषमुक्त होता है। न्यायालय अपने समक्ष विचारण के लिए प्रेषित अभियुक्त के दोषी होने या निर्दोष होने के बारे में अपना निर्णय देता है। यदि अभियुक्त दोषी पाया जाता है तो उसके दंड का निर्धारण करना तथा उसे युक्तिसंगत निर्णय के रूप में अभिलिखित...
जानिए मजिस्ट्रेट के समक्ष कार्यवाही कैसे प्रारंभ होती है
दंड प्रणाली में पुलिस द्वारा किया जाने वाला अन्वेषण एक महत्वपूर्ण स्तर का होता है। इस स्तर पर पुलिस द्वारा किसी प्रकरण में अन्वेषण कर अपनी अंतिम रिपोर्ट मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत की जाती है। जिस समय तक पुलिस अपना अन्वेषण करती है, तब तक किसी मजिस्ट्रेट द्वारा कोई कार्यवाही प्रारंभ नहीं की जाती है। दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 167 के अंतर्गत पुलिस को अपना इन्वेस्टिगेशन समाप्त करने के लिए एक समय सीमा दी गयी है। इस समय अवधि के भीतर पुलिस द्वारा अपना इन्वेस्टिगेशन प्रस्तुत कर दिया जाता...
महिलाओं का पीछा करना, उनके चित्र उतारना, उन्हें अश्लील तस्वीरें भेजना गंभीर अपराध, जानिए क्या हैं प्रावधान
अक्सर हम समाज में महिलाओं के प्रति अपराधों को देखते हैं तथा स्कूल कॉलेज से लेकर कार्यस्थल तक महिलाओं से संबंधित ऐसे अपराध जिन्हें बहुत छोटा मानकर नजरअंदाज कर दिया जाता है, वह घटित होते रहते हैं। कानून की जानकारी के अभाव में महिलाएं भी ऐसे अपराधों को नजरअंदाज करती रहती हैं तथा अपराधियों को महिलाओं द्वारा इस तरह नजरअंदाज किए जाने पर अपराध को पुनः कारित करने के लिए उत्प्रेरणा मिलती है। इस तरह के अपराधों पर महिलाओं को सतर्क रहना चाहिए तथा इस प्रकार के अपराधियों के विरुद्ध खुलकर दांडिक कार्यवाही...
धारा 357 सीआरपीसी: जानिए क्या है अदालत द्वारा प्रतिकर (Compensation) का आदेश देने सम्बन्धी प्रावधान?
एक आपराधिक अदालत का यह कर्त्तव्य है कि वह दोषियों को सजा दे, वहीँ एक सिविल कोर्ट का यह कर्त्तव्य है कि वह दोषकर्ता द्वारा किसी पक्ष को हुए नुकसान या क्षति के लिए हर्जाना वसूले। हालाँकि कई बार कुछ आपराधिक मामलों में आपराधिक और सिविल, दोनों अदालतों के इस कार्य को एक साथ करने की आवश्यकता होती है, जिससे मामले में समुचित प्रकार से न्याय किया जा सके। दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 357 इसी बात को ध्यान में रखते हुए संहिता में मौजूद है। यह धारा आपराधिक अदालत को यह शक्ति प्रदान करती है कि वह पीड़ित...
जानिए मजिस्ट्रेट द्वारा अभियुक्तों को मुकदमे में हाजिरी से कब मिल सकती है छूट
भारत की न्यायालयीन प्रक्रिया जिसमें दंड प्रणाली भी है, यह एक लंबी और विषाद प्रक्रिया है। किसी भी व्यक्ति को न्याय देने तथा अपराधी को दंडित किए जाने की इस विषाद और लंबी प्रक्रिया से गुजरना होता है। हालांकि यह प्रक्रिया न्याय के मूल लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए इतनी विषाद और लंबी रखी गयी है। यदि त्वरित न्याय पर विचार किया जाने लगे तो इस प्रकार के मामलों में न्याय के स्थान पर अभियुक्त के साथ अन्याय भी हो सकता है। दंड प्रणाली अभियुक्त तथा अभियोजन पक्ष दोनों के साथ न्याय का लक्ष्य निर्धारित करती है।...
क्या है विचारण के जारी रहते हुए न्यायालय की नए अभियुक्तों को जोड़ने की शक्ति
दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत प्रकरण में विचारण की कार्यवाही की जाती है तथा किसी न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट द्वारा विचारण किया जाता है। कभी-कभी परिस्थितियां ऐसी होती है, जिनके अनुसार कुछ साक्ष्य ऐसे होते जिन का अवलोकन करने से विचारण के जारी रहते हुए न्यायाधीश को यह लगता है कि मामले में और अन्य अभियुक्त हो सकते हैं तथा वह मामले में नए अभियुक्तों को जोड़ देता है।इस शक्ति का अर्थ यह है कि न्यायालय मामले में अभियुक्तों को जोड़ देने की शक्ति रखता है। निजी परिवाद पर या पुलिस द्वारा किए गए अन्वेषण के...
जानिए सेशन ट्रायल का अर्थ और उसकी प्रक्रिया
जब भी किसी व्यक्ति को दंडित किया जाता है तब न्यायालयीन प्रक्रिया में विचारण करना होता है। बगैर विचारण के किसी भी अपराधी को दंडित नहीं किया जा सकता। यदि ऐसा किया जाता है तो यह मानव अधिकारों एवं नैसर्गिक अधिकारों के विरुद्ध होगा। दंडित करने के लिए अभियुक्त पर विचारण करना होता है।दंड प्रक्रिया संहिता 1908 के अंतर्गत जो प्रक्रिया विधि अधिनियमित की गयी है उसके अनुसार किसी आपराधिक मामले में चार प्रकार के विचारण किए जा सकते है।1) सेशन ट्रायल (सत्र विचारण)2) मजिस्ट्रेट द्वारा वारंट मामलों का...
जानिए समरी ट्रायल (संक्षिप्त विचारण) के बारे में विशेष बातें
दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत सत्र न्यायाधीश तथा मजिस्ट्रेट किसी भी अपराध के मामले में विचारण करता है। मजिस्ट्रेट द्वारा विचारण को समन या वारंट मामले के आधार पर किया जाता है। वृहद मामलों का विचारण मजिस्ट्रेट तथा सत्र न्यायाधीश दोनों के माध्यम से किया जाता है। मजिस्ट्रेट द्वारा वारंट मामलों और समन मामलों के विचारण किए जाने वाले मामले की न्यायिक प्रक्रिया थोड़ी वृहद रहती है। ऐसी विषाद प्रक्रिया से गुजरने के बाद न्याय के लक्ष्य को प्राप्त किया जाता है। मजिस्ट्रेट द्वारा छोटे मामलों में भी वारंट...
जानिए किस हद तक आरोपी को आपराधिक मामले की केस-डायरी के निरीक्षण/इस्तेमाल की होती है अनुमति?
यदि हम दंड प्रक्रिया संहिता 1973 (सीआरपीसी) की धारा 172 (1) की बात करें तो हम यह पाएंगे कि हर अन्वेषण अधिकारी (Investigation Officer) को किसी मामले में किये जा रहे अन्वेषण (Investigation) की प्रति दिन की कार्यवाही को एक डायरी में लिखते रहना होता है (जब वह दंड प्रक्रिया संहिता के अध्याय 12 के तहत अन्वेषण करता है)। गौरतलब है कि इस डायरी को बनाये रखने का मुख्य उद्देश्य यह होता है कि इसके जरिये सबूतों से छेड़छाड़ को और अन्वेषण के कालक्रम/घटनाक्रम को मनचाहे ढंग से बदलने जैसी घटनाओं को रोका जा सके।...
क्या होती है न्यायालय की उन्मोचन ( डिस्चार्ज) की शक्ति, ट्रायल के पहले ही कब छोड़ा जा सकता है आरोपी
जब कभी कोई व्यक्ति अपराध करता है तो न्यायालय में उस व्यक्ति पर अभियोजन चलाया जाता है। जिस व्यक्ति के ऊपर आयोजन चलाया जाता है उस व्यक्ति को अभियुक्त कहा जाता है। पुलिस रिपोर्ट पर संस्थित मामले में न्यायालय में अभियुक्त का विचारण होता है। विचारण के उपरांत अभियुक्त की दोषमुक्ति या दोषसिद्धि तय होती है। परंतु अभियुक्त के पास विचारण के पूर्व ही मामले में उन्मोचित ( डिस्चार्ज) हो जाने का अवसर होता है। उन्मोचन ( डिस्चार्ज) दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 227 उन्मोचन का उल्लेख करती है। इस धारा के...
जानिए शांति भंग होने के संदेह में मजिस्ट्रेट (प्रशासन) कौन से लोगों से बांड (ज़मानत) मांग सकता है
कुछ परिस्थितियां ऐसी होती हैं, जिनमें शांति बनाए रखे जाना नितांत आवश्यक हो जाता है। समाज में कुछ ऐसे व्यक्ति होते हैं, जिनके कार्यों से समाज के भीतर परिशांति भंग हो जाने का खतरा होता है। समय-समय पर राज्य प्रशासन ऐसे लोगों से प्रतिभूति सहित या रहित बंधपत्र लेता है। प्रशासन का मुख्य उद्देश्य राज्य में शांति की स्थापना करना होता है। इस शांति की स्थापना हेतु ही प्रतिभूति ली जाती है। समाज में ऐसे कई अभ्यस्त अपराधी होते हैं जो बार बार अपराध करते हैं तथा अपराध का दोहराव करते हैं। इनके अपराधों से...
धारा 37 एनडीपीएस एक्ट: वाणिज्यिक मात्रा से संबंधित अपराधों के लिए जमानत के सिद्धांत
विश्वजीत आनंदकानून की एक सुलझी हुई स्थिति है यह है कि नार्कोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्स्टंस एक्ट से संबंधित मामले में उदार दृष्टिकोण अनुचित है (केरल राज्य बनाम राजेश, 24 जनवरी 2020 को सुप्रीम कोर्ट का निर्णय) और कई फैसलों में सुप्रीम कोर्ट ने व्यापक मानदंड तय किए हैं, जिनका नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्स्टंस एक्ट, 1985 (एनडीपीएस एक्ट) के तहत अपराध में शामिल अभियुक्तों की जमानत याचिकाओं पर विचार करते हुए पालन करना चाहिए। "…यह ध्यान में रखना चाहिए कि हत्या के मामले में, अभियुक्त एक...
अचल संपत्ति को लेकर होने वाले विवाद में क्या हैं कार्यपालक मजिस्ट्रेट की शक्तियां
किसी स्थावर संपत्ति जैसे भूमि या जल को लेकर विवाद उत्पन्न होते रहते हैं। इससे उत्पन्न विवादों से समाज के भीतर शांति भंग होने और लोक व्यवस्था भंग होने का खतरा होता है। ऐसे खतरे से निपटने के लिए दंड प्रक्रिया संहिता में धारा 145, 146, 147 का प्रावधान किया गया है। इस धारा में स्थावर संपत्ति विषयक विवादों के संबंध में जिससे लोक शांति भंग होने की संभावना हो, निस्तारण की प्रक्रिया का उल्लेख है। धारा 145 की उपधारा (1) के अनुसार इस संबंध में रिपोर्ट पर या किसी अन्य प्रकार से प्राप्त इत्तिला के आधार...
जानिए मजिस्ट्रेट के समक्ष परिवाद कैसे पेश किया जाता है
किसी भी अपराध के घटित होने के बाद व्यथित पक्षकार के पास आरोपी के विरुद्ध आपराधिक कार्यवाही चलाने के दो मार्ग हैं। इन दोनों रास्तों से कोई भी व्यथित पक्षकार न्याय प्राप्त कर सकता है। किसी भी संज्ञेय अपराध के मामले में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 154 के अंतर्गत पुलिस को सूचना देकर एफआईआर दर्ज करवाने का अधिकार पीड़ित पक्षकार को प्राप्त है। हालांकि अपराध की रिपोर्ट पक्षकार ही दर्ज करवाए यह आवश्यक नहीं है। जब FIR दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 154 के अंतर्गत दर्ज नहीं की जाती है, तब व्यथित...




















