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जानिए अभियुक्त द्वारा भोगी गई कारावास की अवधि को कारावास के दंडादेश की अवधि से मुजरा (Set Off) कैसे किया जाता है

Shadab Salim
13 Aug 2020 4:15 AM GMT
जानिए अभियुक्त द्वारा भोगी गई कारावास की अवधि को कारावास के दंडादेश की अवधि से मुजरा (Set Off) कैसे किया जाता है
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अन्वेषण ( Investigation), जांच (Inquiry) और विचारण (Trial) किसी भी दंडादेश के पूर्व की प्रक्रिया है। अनेक संज्ञेय अपराधों के अंतर्गत अभियुक्त को अन्वेषण, जांच और विचारण के अंतराल में कारागार में निरूद्ध रहना पड़ सकता है। किसी आरोपी व्यक्ति को उसके दोषसिद्ध (Convicted) होते होते संज्ञेय अपराध के मामले में लंबे समय तक कारावास में रहना पड़ सकता है। न्यायालय द्वारा अभियुक्त को ज़मानत पर छोड़ दिए जाने का अधिकार प्राप्त होता है। विचारण की समाप्ति के पश्चात अभियुक्त को दंडादेश दिया जाता है। अपील के निपटारे तक भी अभियुक्त को ज़मानत पर छोड़ा जाता है तथा उसके दंड का निलंबन अपील के निपटारे तक किया जाता है।

दंड प्रक्रिया संहिता 1973 (सीआरपीसी) की धारा 428 ऐसी व्यवस्था का उल्लेख करती है, जिसके अंतर्गत कोई अभियुक्त जांच ,अन्वेषण और विचारण तथा अपील के निपटारे तक जिस कारावास को भोग लेता है, उस कारावास की अवधि को उसे दिए गए कारावास के दंडादेश की संपूर्ण अवधि में से घटा दिया जाता है। इस प्रक्रिया को निरोध की अवधि का कारावास के दंडादेश के विरुद्ध मुजरा ( Set Off) किया जाना कहा जाता है।

जहां अभियुक्त के दोषसिद्ध होने पर उसे किसी अवधि के लिए कारावास से दंडित किया गया है वहां उसी मामले में जांच, अन्वेषण और विचारण के दौरान और दोषसिद्धि के पहले उसके द्वारा भोगे गए निरोध यदि कोई हो की अवधि को उसे दिए गए कारावास की अवधि से मुजरा किया जाता है।

सीआरपीसी की धारा 428 का एक महत्वपूर्ण उपबंध यह भी है कि यदि कोई व्यक्ति निवारक निरोध (प्रिवेंशन डिटेंशन) में था तो इस अवधि की मुजरा अपराधी के दोषसिद्ध होने पर कारावास के दंड के विरुद्ध नहीं की जा सकती है।

राज्य को अपराध रोकने हेतु अनेक मामलों में अभियुक्तों को निवारक निरोध (Preventive Detention) के अंतर्गत निरुद्ध रखना होता है। ऐसे निवारक निरोध के अंतर्गत यदि किसी अभियुक्त को निरुद्ध रखा जाता है, जितने समय के लिए उस अभियुक्त को निरुद्ध रखा गया है उस समय अवधि को किसी दोषसिद्धि के दंडादेश की समय अवधि में से नहीं घटाया जाता है।

करतार सिंह बनाम हरियाणा राज्य एआईआर 1982 सुप्रीम कोर्ट 1439 के प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने आजीवन कारावास के कैदी को धारा 428 के अधीन मुजरा के फायदे का हकदार नहीं माना है, लेकिन इस निर्णय को सुप्रीम कोर्ट ने भागीरथी बनाम दिल्ली प्रशासन एआईआर 1985 एससी 1050 के मामले में उलट दिया।

आजीवन कारावास भोग रहे कैदी को धारा 428 के अधीन मुजरा का हक प्राप्त है। इस वाद में अभिनिर्धारित किया गया कि प्रायः आजीवन कारावास के दंडादेश से दंडित होने योग्य अभियुक्तगण ज़मानत पर मुक्त नहीं किए जाते हैं, उन्हें धारा 428 के लाभ से वंचित रखने का अर्थ एक हितेषी प्रावधान का उपयोग अधिकांश प्रकरणों में जिनमें ऐसा लाभ देना आवश्यक है सीमित करना है।

विचाराधीन( Undertrial) बंदियों की कारावास अवधि को उनकी दोषसिद्धि के पश्चात दी गई कारावास की सजा में से मुजरा करने का यह प्रावधान कारागृह में कैदियों की भीड़ को कम करने का एक प्रभावी उपाय माना गया है। धारा 428 के उपबंध को दंड प्रक्रिया संहिता संशोधन अधिनियम 1978 द्वारा संशोधित किया गया है ताकि यह स्पष्ट किया जा सके कि यह धारा जुर्माने के विकल्प में दिए गए कारावास के दंड के प्रति लागू नहीं होगी।

बाउचर पियरे एंड्री विरुद्ध अधीक्षक केंद्रीय जेल एआईआर 1975 सुप्रीम कोर्ट 164 के मामले में महत्वपूर्ण मार्गदर्शक सिद्धांत प्रतिपादित किए गए हैं वह सिद्धांतों में निम्न हैं-

1)- इस धारा के उपबंध तभी लागू होंगे जब विचाराधीन कैदी को दोषसिद्धि के फलस्वरुप किसी अवधि के कारावास के दंड से दंडित किया गया हो।

2)- अभियुक्त की दोषसिद्धि भले ही पुरानी दंड प्रक्रिया संहिता के अधीन हुई हो लेकिन यदि उसकी करावधि चल रही हो तो इस धारा के उपबंध लागू होंगे।

3)- यदि करावधि संहिता के लागू होने के पूर्व ही समाप्त हो चुकी हो तो इस धारा के उपबंधों को लागू होने का प्रश्न ही नहीं उठता।

4)- निरोध की अवधि को कारावास की अवधि में से मुजरा न किए जाने के लिए यह कारण पर्याप्त नहीं होगा कि अभियुक्त को कारावास का दंडादेश देते समय उसकी दोषसिद्धि के पूर्व निरोध की अवधि को ध्यान में रखा गया है।

धारा 428 के अधीन मुजरा का फायदा ऐसे व्यक्ति को नहीं दिया जा सकेगा जो सेना न्यायालय

(कोर्ट मार्शल) द्वारा सिद्धदोष किया गया है। अतः सेना न्यायालय में विचारण के दौरान उसके निरोध को कारावास की अवधि में से मुजरा नहीं किया जाएगा। सेना, नौसेना तथा वायु सेना अधिनियम विशेष विधियां हैं जिन पर इस संहिता के प्रावधान लागू नहीं होते।

अपील के दौरान अभियुक्त द्वारा भोगी गई सज़ा की अवधि का मुजरा उसकी सजा में से की जा सकेगी यह बात मध्य प्रदेश राज्य बनाम मोहनदास के मामले में कही गई थी।

मीरधन सिदा बनाम गुजरात राज्य एआईआर 1985 उच्चतम न्यायालय 386 के वाद में अभियुक्त की दोषसिद्धि पुरानी दंड प्रक्रिया संहिता के अधीन हुई थी लेकिन उसने नई दंड प्रक्रिया संहिता 1973 लागू होने के बाद अपील दायर की थी।

उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि उक्त मामले में अभियुक्त धारा 428 के अधीन मुजराई का फायदा लेने का हकदार था। यदि किसी करवासित को एक निश्चित अवधि की फर्लो पर छोड़ा गया है और वह इस अवधि की समाप्ति के बाद स्वयं को अभ्यर्पित (Surrender) नहीं करता है तो उसके कारावास की अवधि गिरफ्तारी के दिन से प्रारंभ होगी। कारावास की अवधि इस आधार पर समाप्त नहीं मानी जाएगी कि उसके कारावास के दंड की अवधि पूरी हो चुकी है तथा वह गिरफ्तार नहीं किया गया।

जहां अभियुक्त को हत्या तथा नशाखोरी के लिए अलग-अलग अपराधों के लिए दोषसिद्ध किया गया है और उसे हत्या के अपराध के विचारण के लिए निरुद्ध रखा गया है तथा नशाखोरी के अपराध के मामले में ऐसा मुजरा की मांग नहीं कर सकेगा। रफीक अहमद रहमान बनाम महाराष्ट्र राज्य 1978 के मामले में यह बात कही गई है।

चिन्नास्वामी बनाम तमिलनाडु राज्य 1984 के मामले में कहा गया है कि यदि अभियुक्त कई अपराधों के लिए दोषसिद्धि हुई हो तथा उन सभी की सजाएं साथ-साथ चल रही हो तो उसे तीनों अपराधों की सजा के विरुद्ध मुजरा का अधिकार होगा।

विचारण और अन्वेषण की अवधि में अभियुक्त यदि उतने समय तक कारागार में निरुद्ध होता है जितने समय का उसे सिद्धदोष होने पर दंडादेश दिया गया है तो ऐसी परिस्थिति में अभियुक्त को किसी भी अवधि के लिए परिरुद्ध नहीं रखा जा सकता है, अर्थात यदि अभियुक्त को 6 माह का कारावास दोषसिद्ध होने पर दिया जाता है और अभियुक्त ऐसे दंडादेश के पूर्व ही अन्वेषण और जांच की अवधि में 6 माह का कारावास काट चुका है तो उसे पुनः कारावास में नहीं भेजा जाएगा।

रघुवीर सिंह बनाम हरियाणा राज्य के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अभिनिश्चित किया कि किसी पूर्ववर्ती मामले में कारावास का दंड भोगते हुए जो कारावास अवधि किसी अन्य मामले की जांच या विचारण में व्यतीत होती है पश्चातवर्ती मामले में दी गई करावधि से मुजरा नहीं किया जा सकेगा।

अभियुक्त को मुजरा का अधिकार केवल उस ही प्रकरण में प्राप्त होता है, जिस प्रकरण में उसे दोषसिद्ध किया गया है तथा उसी प्रकरण में उसे अन्वेषण और जांच के अंतराल में कारावास भेजा गया था। दो अलग-अलग प्रकरणों में मुजरा नहीं की जाएगी।

अब्दुल अजीज बनाम सहायक कलेक्टर केरल के वाद में यह अभिनिर्धारित किया गया कि कारावास के दंड में से उसकी निवारक निरोध की अवधि का मुजरा धारा 428 इसके अंतर्गत अनुज्ञेय नहीं है, क्योंकि निवारक निरोध को कारावास की अवधि नहीं माना गया है।

किसी भी व्यक्ति को निवारक निरोध के अंतर्गत कारावास इसलिए नहीं भेजा जाता है क्योंकि उसे कोई कोई दंडादेश दिया गया है अपितु उसे कारावास में इसलिए भेजा जाता है क्योंकि राज्य उस के संदर्भ में उसके द्वारा किसी अपराध के घटित होने का संदेह रखता है तथा निवारक निरोध कानून अपराधों को रोकने के लिए होता है तथा कोई दंडादेश किसी व्यक्ति द्वारा किए गए अपराध के पश्चात दिया जाता है।

चंपालाल शाह बनाम महाराष्ट्र राज्य के मामले में अभियुक्तों को न्यायालय द्वारा दोषमुक्त कर दिया गया था। इसके पश्चात उसे निवारक निरोध में रखा गया इसके बाद राज्य द्वारा अभियुक्त की दोषसिद्धि के विरुद्ध अपील की जाने पर उसे सिद्धदोष ठहराया गया। अभियुक्त ने निवारक निरोध की अवधि को कारावास की सजा में से मुजरा की मांग की थी। इस पर कोर्ट ने यह अभिनिर्धारित किया गया कि अभियुक्त का निरोध ना तो दोषसिद्धि के अनुसरण में था और ना ही विचारण की अवधि में था तथा उसे धारा 428 के अधीन कारावास के दंड में से मुजरा नहीं किया जा सकता।

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