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हिंदू विधि भाग- 17 : कोई हिंदू वारिस उत्तराधिकार से कब बेदखल होता है
हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 किसी बगैर वसीयत के स्वर्गीय होने वाले हिंदू पुरुष और स्त्री की संपत्ति के उत्तराधिकार के संबंध में नियमों को प्रस्तुत करता है। इस अधिनियम के अंतर्गत वारिसों का निर्धारण किया गया है। कौन से वारिस किस समय संपत्ति में उत्तराधिकार का हित रखते हैं। इस अधिनियम के अंतर्गत किसी संपत्ति में उत्तराधिकार रखने वाले वारिसों के बेदखल के संबंध में भी प्रावधान किए गए।कुछ परिस्थितियां ऐसी है जिनके आधार पर विधि वारिसों को उत्तराधिकार के हित से अयोग्य कर देती है। उत्तराधिकार के संबंध...
हिंदू विधि भाग 16 : बगैर वसीयत के स्वर्गवासी होने वाली हिंदू नारी की संपत्ति का उत्तराधिकार (Succession) कैसे तय होता है
हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 ( Hindu Succession Act, 1956) हिंदू पुरुष और हिंदू स्त्रियों में किसी प्रकार का उत्तराधिकार के संबंध में कोई भेदभाव नहीं करता है। यह विधि प्राकृतिक स्नेह और वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर आधारित है। भारत की संसद द्वारा इसका निर्माण सामाजिक समरसता और समानता के आधार पर किया है। इस अधिनियम के अंतर्गत हिंदू पुरुष की संपत्ति को उत्तराधिकार में बांटने का अलग वैज्ञानिक तरीका है जिसका वर्णन इस अधिनियम की धारा 8 के अंतर्गत किया गया है। लेखक द्वारा इस अधिनियम की धारा 8 पर...
हिंदी विधि भाग-15: बगैर वसीयत के स्वर्गवासी होने वाले हिंदू पुरुष के उत्तराधिकारियों में संपत्ति के बंटवारे का क्रम क्या होता है?
इससे पूर्व के आलेख में किसी बगैर वसीयत के मरने वाले हिंदू पुरुष की संपत्ति के उत्तराधिकार के निर्धारण के संबंध में उल्लेख किया गया था तथा उन वारिसों को बताया गया था जिन्हें इस प्रकार बगैर वसीयत के मरने वाले हिंदू पुरुष की संपत्ति हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 की धारा 8 के अंतर्गत उत्तराधिकार में प्राप्त होती है। इस आलेख में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 के अनुसार संपत्ति जब उत्तराधिकारियों को प्राप्त होती है तो वह किस क्रम में प्राप्त होगी! इस संबंध में चर्चा की जा रही है।हिंदू उत्तराधिकार...
हिंदू विधि भाग 14 : जानिए बगैर वसीयत के स्वर्गवासी होने वाले हिंदू पुरुष की संपत्ति का उत्तराधिकार (Succession) कैसे तय होता है
हिंदू विधि (Hindu Law) किसी भी हिंदू पुरुष को यह अधिकार देती है कि वह अपनी कोई भी अर्जित संपत्ति को कहीं पर भी वसीयत कर सकता है। हिंदू विधि के अंतर्गत किसी भी हिंदू पुरुष को इस बात की बाध्यता नहीं है कि वह अपनी संपत्ति अपने परिवारजनों को ही वसीयत करे या उन्हें ही उत्तराधिकार में दे, स्वतंत्रतापूर्वक हिंदू पुरुष को यह अधिकार दिया गया है कि वह उसकी कमाई हुई संपत्ति को अपनी इच्छा के अनुरूप कहीं भी उत्तराधिकार में दे सकता है या उसे दान कर सकता है, उसे अपना उत्तराधिकार चुनने की स्वतंत्रता है।मुस्लिम...
हिन्दू विधि भाग 13: हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के अंतर्गत परिभाषाएं और इस अधिनियम का अध्यारोही प्रभाव
हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम ( Hindu Succession Act) 1956 किसी निर्वसीयती हिंदू की मृत्यु के बाद उसकी अर्जित संपत्ति उत्तराधिकार से संबंधित एक संहिताबद्ध अधिनियम है। इस अधिनियम के अंतर्गत कुछ विशेष शब्दों की परिभाषाएं दी गई हैं तथा यह अधिनियम कहां-कहां और किन-किन विधियों को अध्यारोही कर सकता है, उस संबंध में भी उल्लेख किया गया है। इस लेख के माध्यम से लेखक हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 से संबंधित धारा 3 एवं धारा 4 के प्रावधानों पर चर्चा कर रहा है। अधिनियम के अंतर्गत कुछ विशेष शब्दों की...
कोर्ट की अवमानना के लिए एक वकील को प्रैक्टिस से रोकने की न्यायालयों की शक्ति
एडवोकेट प्रशांत भूषण के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए अवमानना के फैसले के संदर्भ में, कई पाठकों ने अदालतों की शक्ति के बारे में प्रश्न पूछा था, क्या कोर्ट एक वकील को प्रैक्टिस करने से रोक सकती है। उस मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने एक रुपए के जुर्माने की सजा दी थी और कहा था कि यदि जुर्माना अदा नहीं किया जाता है तो भूषण को तीन महीने की कैद से गुजरना होगा और तीन साल के लिए सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस करने से रोक दिया जाएगा। यहां सुप्रीम कोर्ट के उदाहरणों के आधार पर इस मुद्दे पर कानून की...
हिन्दू विधि भाग 12 : हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 और उससे संबंधित महत्वपूर्ण बातें
लेखक द्वारा लाइव लॉ पर हिंदू विधि के अंतर्गत हिंदू विवाह अधिनियम 1955 के समस्त महत्वपूर्ण प्रावधानों पर सारगर्भित टीका टिप्पणी के साथ आलेख लिखे गए हैं। इसके आगे भाग 12 से हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 के महत्वपूर्ण प्रावधान पर टीका टिप्पणी सहित आलेख लिखे जाएंगे। इस लेख भाग -12 में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 से संबंधित महत्वपूर्ण बातों का समावेश किया जा रहा है तथा इस अधिनियम की प्रस्तावना को प्रस्तुत किया जा रहा है। हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 हिंदू पर्सनल लॉ (Hindu Personal Law)...
हिंदू विधि भाग 11 : जानिए पति पत्नी के बीच मुकदमेबाज़ी के दौरान बच्चों की अभिरक्षा (Child Custody) कैसे निर्धारित की जाती है
वैवाहिक बंधन आपसी सूझबूझ पर निर्भर करता है। जब किसी वैवाहिक बंधन में ऐसी आपसी सूझबूझ का अभाव होता है तथा वैचारिक मत मिल नहीं पाते हैं तब मतभेद का जन्म होता है। ऐसे मतभेद से पति पत्नी के बीच अलगाव का भी जन्म हो जाता है। इस अलगाव के परिणामस्वरूप पति-पत्नी न्यायालय की शरण लेते हैं तथा दांपत्य अधिकारों की प्रत्यास्थापन, न्यायिक पृथक्करण और तलाक के मुकदमों का जन्म होता है। जब इस प्रकार की कार्यवाही अदालतों में चलती रहती है, उस समय विवाह से उत्पन्न होने वाली संतानों पर संकट आ जाता है। किसी भी बच्चे...
हिन्दू विधि भाग 10 : विवाह विच्छेद (Divorce) के बाद पुनः विवाह कब किया जा सकता है? हिंदू विवाह अधिनियम के अंतर्गत क्या दाण्डिक प्रावधान है
हिंदू विवाह अधिनियम 1955 तलाक की संपूर्ण व्यवस्था करता है। धारा 13 के अंतर्गत उन आधारों का उल्लेख किया गया है, जिनके आधार पर तलाक की डिक्री पारित की जाती है और धारा 13b के अंतर्गत पारस्परिक तलाक का उल्लेख किया गया है। अब प्रश्न आता है कि न्यायालय से किसी विवाह विच्छेद की डिक्री पारित हो जाने के बाद विवाह कब किया जा सकता है? लेखक इस लेख के माध्यम से पुनर्विवाह के संबंध में और हिंदू विवाह अधिनियम 1955 के अंतर्गत जो दाण्डिक प्रावधान है उनका उल्लेख कर रहा है। पुनर्विवाह विवाह एक पवित्र...
हिन्दू विधि भाग 9 : जानिए हिन्दू मैरिज एक्ट के अधीन पत्नी को तलाक के क्या विशेषाधिकार प्राप्त हैं और पारस्परिक सम्मति से विवाह-विच्छेद क्या होता है
हिंदू विवाह अधिनियम 1955 ( (The Hindu Marriage Act, 1955) की धारा 13 के अंतर्गत तलाक की व्यवस्था की गई है। लेखक द्वारा इससे पूर्व का लेख धारा 13 के अंतर्गत विवाह के पक्षकार पत्नी और पत्नी दोनों को समान रूप से प्राप्त विवाह के आधारों पर विस्तारपूर्वक लिखा गया था। हिन्दू विधि भाग 8 : जानिए हिंदू मैरिज एक्ट के अधीन विवाह विच्छेद (Divorce) कैसे होता हैयह लेख केवल पत्नी को प्राप्त तलाक के कुछ विशेषाधिकार और पारस्परिक विवाह विच्छेद के संबंध में लिखा जा रहा है। हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 की...
हिन्दू विधि भाग 8 : जानिए हिंदू मैरिज एक्ट के अधीन विवाह विच्छेद (Divorce) कैसे होता है
प्राचीन शास्त्री हिंदू विधि के अधीन हिंदू विवाह एक संस्कार है। विवाह हिंदुओं का एक धार्मिक संस्कार है, जिसके अंतर्गत प्रत्येक पुरुष को तब ही पूर्ण माना गया है, जब उसकी पत्नी और उसकी संतान हो। प्राचीन शास्त्रीय हिंदू विधि के अधीन हिंदू विवाह में संबंध विच्छेद जैसी कोई व्यवस्था नहीं थी, तलाक शब्द मुस्लिम विधि में प्राप्त होता है तथा रोमन विधि में डायवोर्स शब्द प्राप्त होता है परंतु शास्त्रीय हिंदू विधि के अधीन विवाह विच्छेद जैसी कोई उपधारणा नहीं रही है, क्योंकि हिंदुओं में विवाह एक पवित्र संस्कार...
हिन्दू विधि भाग 7 : जानिए हिंदू मैरिज एक्ट के अधीन विवाह कब शून्यकरणीय (Voidable marriage) होता है, शून्य विवाह और शून्यकरणीय विवाह में क्या अंतर है
हिंदू विवाह अधिनियम 1955 (The Hindu Marriage Act, 1955) के अधीन हिंदू विवाह के संविदा के स्वरूप को ध्यान में रखते हुए संविदा की भांति ही इस विवाह में शून्य और शून्यकरणीय विवाह (Voidable marriage) जैसी व्याख्या की गई है। अधिनियम की धारा 12 हिंदू विवाह शून्यकरणीय के संबंध में उल्लेख करती। इसके पूर्व के लेख में किसी हिंदू विवाह के शून्य (Void) होने के संदर्भ में उल्लेख किया गया था। इस लेख में हिंदू विवाह के शून्यकरणीय होने के संदर्भ में उल्लेख किया जाएगा तथा शून्य विवाह और शून्यकरणीय विवाह...
हिन्दू विधि भाग 6 : जानिए हिंदू मैरिज एक्ट के अधीन विवाह कब शून्य (Void marriage) होता है
हिंदू विवाह अधिनियम 1955 के अंतर्गत विवाह को संस्कार तथा संविदा दोनों का मिश्रित रूप दिया गया है। प्राचीन शास्त्रीय विधि के अधीन हिंदू विवाह संस्कार है और उसमे तलाक जैसी कोई व्यवस्था नहीं थी। इस हेतु कुछ प्रावधान आधुनिक हिंदू विवाह अधिनियम 1955 में भी सम्मिलित किए गए हैं, यदि हिंदू विवाह को एक संविदा के स्वरूप में देखा जाए तो एक संविदा के भांति ही इस विवाह में शून्य विवाह (Void marriage) और शून्यकरणीय विवाह (Voidable marriage) का समावेश किया गया है। इस आलेख के माध्यम से शून्य विवाह के संदर्भ...
हिन्दू विधि भाग 5 : जानिए हिंदू मैरिज एक्ट के अधीन न्यायिक पृथक्करण ( Judicial Separation) क्या होता है
हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 9 के अधीन जिस प्रकार विवाह के पक्षकारों के आपसी मतभेद होने पर पुनर्मिलन के प्रयास किए गए हैं| इसी प्रकार धारा 10 के अधीन विवाह को बचाए रखते हुए विवाह के पक्षकारों को अलग अलग रहने के उपचार प्रदान किए गए हैं। प्राचीन शास्त्री हिंदू विधि के अधीन हिंदू विवाह एक संस्कार है तथा यह जन्म जन्मांतरों का संबंध है। ऐसे प्रयास होने चाहिए कि कोई भी हिंदू विवाह के संपन्न होने के बाद पति और पत्नी जहां तक संभव हो सके विवाह को सफल बनाएं तथा साथ-साथ साहचर्य का पालन करें। इस विचार...
हिन्दू विधि भाग 4 : जानिए दांपत्य अधिकारों का प्रत्यास्थापन (Restitution of Conjugal Rights) क्या होती है
हिंदू विधि के अधीन विवाह एक संविदा तथा संस्कार दोनों का मिश्रित रूप है। यदि हिंदू लॉ के अधीन विवाह को संस्कार माना भी जाए तो वर्तमान हिंदू विवाह अधिनियम 1955 (The Hindu Marriage Act, 1955) के अधीन यह एक पारिवारिक संविदा मालूम होता है। जब दो पक्षकार आपस में विवाह संपन्न करते हैं तो ऐसे विवाह के संपन्न होने के पश्चात उन दोनों के भीतर कुछ सामाजिक अधिकार तथा दायित्वों का जन्म होता है। विवाह के उपरांत विवाह के पक्षकार पति तथा पत्नी एक साथ रहते हैं तथा एक दूसरे के प्रति दोनों को साहचर्य का अधिकार...
हिन्दू विधि भाग- 3 : जानिए हिन्दू मैरिज एक्ट के अंतर्गत हिन्दू विवाह की शर्तें
हिंदू शास्त्रीय विवाह के अधीन विवाह एक महत्वपूर्ण संस्कार है। इस संस्कार को पूरा करने के लिए प्राचीन विधि में भी शर्ते अधिरोपित की गई थी। वर्तमान हिंदू विवाह अधिनियम 1955 ( The Hindu Marriage Act, 1955) आधुनिक हिंदू विधि है, जिसे प्राचीन शास्त्रीय विधि तथा आधुनिक परिक्षेप को ध्यान में रखते हुए भारत की संसद द्वारा बनाया गया है। इस अधिनियम के अंतर्गत हिंदू विवाह किए जाने के लिए कुछ महत्वपूर्ण शर्तों का समावेश किया गया है। हिंदू विवाह के अधीन इन शर्तों की पूर्ति की जाना अति आवश्यक है। अधिनियम...
हिन्दू विधि भाग 2 : जानिए हिंदू विवाह अधिनियम का विस्तार, यह अधिनियम कहां तक लागू होता है
हिंदू विवाह अधिनियम 1955 (The Hindu Marriage Act, 1955) के प्रारंभ होते ही सबसे पहले प्रश्न यह आते हैं कि इस अधिनियम का विस्तार कहां तक होगा अर्थात यह अधिनियम कहां तक लागू होगा और कौन से लोगों पर यह लागू होगा और इस अधिनियम के अंतर्गत दी गई विशेष परिभाषाओं का क्या अर्थ है?हिन्दू विधि भाग 1 : जानिए हिन्दू विधि (Hindu Law) और हिंदू विवाह (Hindu Marriage Act) से संबंधित आधारभूत बातेंइस लेख के माध्यम से हिंदू विवाह अधिनियम का विस्तार उसकी परिभाषाएं तथा अधिनियम किन लोगों पर लागू होगा इस संबंध में...
हिन्दू विधि भाग 1 : जानिए हिन्दू विधि (Hindu Law) और हिंदू विवाह (Hindu Marriage) से संबंधित आधारभूत बातें
भारतीय लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के अंतर्गत भारत के समस्त नागरिकों को उनके धार्मिक तथा जातिगत रीति-रिवाजों और परंपराओं के अनुसार अपने व्यक्तिगत मामलों (विवाह, तलाक, भरण पोषण,उत्तराधिकार, दत्तक ग्रहण) से संबंधित मामले अधिनियमित किए गए। भारत के सभी नागरिकों को अपनी धार्मिक तथा जातिगत परंपराओं और रिवाजों को अपने व्यक्तिगत मामलों में कानून का दर्जा दिया गया है। इन परंपराओं और रीति-रिवाजों को अधिनियम के माध्यम से समय-समय पर बल दिया गया है तथा इन प्रथाओं को सहिंताबद्ध किया गया है। भारत के...
सीआरपीसी की धारा 482 : जानिए उच्च न्यायालय की अंतर्निहित शक्ति (Inherent Power) का अर्थ और उससे संबंधित कुछ विशेष प्रकरण
दंड प्रक्रिया संहिता 1973 (CrPC) के अंतर्गत धारा 482 के अधीन उच्च न्यायालय को अंतर्निहित शक्ति (Inherent Power) प्रदान की गई है। इस धारा के अधीन उच्च न्यायालय को एक विशेष शक्ति दी गई है। यह शक्ति दिए जाने का उद्देश्य न्यायालय की कार्यवाही को दुरुपयोग से बचाना है तथा न्याय के उद्देश्यों को बनाए रखना है। कोई भी संहिता, अधिनियम, नियम, अपने आप में पूर्ण नहीं होते हैं क्योंकि समय, परिस्थितियां, क्षेत्र, काल के अनुरूप सब कुछ बदलता रहता है तथा अधिनियम नियमों एवं सहिंता को बनाने वाली विधायिका में...
'माई लॉर्ड' या 'योर ऑनर'? भारत में जजों को कैसे संबोधित करें
अशोक किनी13 अगस्त 2020 को सुप्रीम कोर्ट मे चीफ जस्टिस एसए बोबडे और एक वकील के बीच रोचक बातचीत हुई। विषय था कि अदालत को कैसे संबोधित किया जाए। सीजेआई की अध्यक्षता में पीठ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए एक मामलों की सुनवाई कर रही थी, जिसमें एक वकील ने उन्हें संबोधित किया, 'योर ऑनर'। जिस पर सीजेआई बोबडे ने पूछा, "क्या आप अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट में हैं?", सीजेआई के अनुसार, 'योर ऑनर' का प्रयोग भारतीय नहीं, बल्कि अमेरिकी है। वकील ने दलील दी कि कानून में ऐसा कुछ भी नहीं है, जिससे यह तय हो कि वकील अदालत...














