जानिए हमारा कानून
हिंदू विधि भाग 11 : जानिए पति पत्नी के बीच मुकदमेबाज़ी के दौरान बच्चों की अभिरक्षा (Child Custody) कैसे निर्धारित की जाती है
वैवाहिक बंधन आपसी सूझबूझ पर निर्भर करता है। जब किसी वैवाहिक बंधन में ऐसी आपसी सूझबूझ का अभाव होता है तथा वैचारिक मत मिल नहीं पाते हैं तब मतभेद का जन्म होता है। ऐसे मतभेद से पति पत्नी के बीच अलगाव का भी जन्म हो जाता है। इस अलगाव के परिणामस्वरूप पति-पत्नी न्यायालय की शरण लेते हैं तथा दांपत्य अधिकारों की प्रत्यास्थापन, न्यायिक पृथक्करण और तलाक के मुकदमों का जन्म होता है। जब इस प्रकार की कार्यवाही अदालतों में चलती रहती है, उस समय विवाह से उत्पन्न होने वाली संतानों पर संकट आ जाता है। किसी भी बच्चे...
हिन्दू विधि भाग 10 : विवाह विच्छेद (Divorce) के बाद पुनः विवाह कब किया जा सकता है? हिंदू विवाह अधिनियम के अंतर्गत क्या दाण्डिक प्रावधान है
हिंदू विवाह अधिनियम 1955 तलाक की संपूर्ण व्यवस्था करता है। धारा 13 के अंतर्गत उन आधारों का उल्लेख किया गया है, जिनके आधार पर तलाक की डिक्री पारित की जाती है और धारा 13b के अंतर्गत पारस्परिक तलाक का उल्लेख किया गया है। अब प्रश्न आता है कि न्यायालय से किसी विवाह विच्छेद की डिक्री पारित हो जाने के बाद विवाह कब किया जा सकता है? लेखक इस लेख के माध्यम से पुनर्विवाह के संबंध में और हिंदू विवाह अधिनियम 1955 के अंतर्गत जो दाण्डिक प्रावधान है उनका उल्लेख कर रहा है। पुनर्विवाह विवाह एक पवित्र...
हिन्दू विधि भाग 9 : जानिए हिन्दू मैरिज एक्ट के अधीन पत्नी को तलाक के क्या विशेषाधिकार प्राप्त हैं और पारस्परिक सम्मति से विवाह-विच्छेद क्या होता है
हिंदू विवाह अधिनियम 1955 ( (The Hindu Marriage Act, 1955) की धारा 13 के अंतर्गत तलाक की व्यवस्था की गई है। लेखक द्वारा इससे पूर्व का लेख धारा 13 के अंतर्गत विवाह के पक्षकार पत्नी और पत्नी दोनों को समान रूप से प्राप्त विवाह के आधारों पर विस्तारपूर्वक लिखा गया था। हिन्दू विधि भाग 8 : जानिए हिंदू मैरिज एक्ट के अधीन विवाह विच्छेद (Divorce) कैसे होता हैयह लेख केवल पत्नी को प्राप्त तलाक के कुछ विशेषाधिकार और पारस्परिक विवाह विच्छेद के संबंध में लिखा जा रहा है। हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 की...
हिन्दू विधि भाग 8 : जानिए हिंदू मैरिज एक्ट के अधीन विवाह विच्छेद (Divorce) कैसे होता है
प्राचीन शास्त्री हिंदू विधि के अधीन हिंदू विवाह एक संस्कार है। विवाह हिंदुओं का एक धार्मिक संस्कार है, जिसके अंतर्गत प्रत्येक पुरुष को तब ही पूर्ण माना गया है, जब उसकी पत्नी और उसकी संतान हो। प्राचीन शास्त्रीय हिंदू विधि के अधीन हिंदू विवाह में संबंध विच्छेद जैसी कोई व्यवस्था नहीं थी, तलाक शब्द मुस्लिम विधि में प्राप्त होता है तथा रोमन विधि में डायवोर्स शब्द प्राप्त होता है परंतु शास्त्रीय हिंदू विधि के अधीन विवाह विच्छेद जैसी कोई उपधारणा नहीं रही है, क्योंकि हिंदुओं में विवाह एक पवित्र संस्कार...
हिन्दू विधि भाग 7 : जानिए हिंदू मैरिज एक्ट के अधीन विवाह कब शून्यकरणीय (Voidable marriage) होता है, शून्य विवाह और शून्यकरणीय विवाह में क्या अंतर है
हिंदू विवाह अधिनियम 1955 (The Hindu Marriage Act, 1955) के अधीन हिंदू विवाह के संविदा के स्वरूप को ध्यान में रखते हुए संविदा की भांति ही इस विवाह में शून्य और शून्यकरणीय विवाह (Voidable marriage) जैसी व्याख्या की गई है। अधिनियम की धारा 12 हिंदू विवाह शून्यकरणीय के संबंध में उल्लेख करती। इसके पूर्व के लेख में किसी हिंदू विवाह के शून्य (Void) होने के संदर्भ में उल्लेख किया गया था। इस लेख में हिंदू विवाह के शून्यकरणीय होने के संदर्भ में उल्लेख किया जाएगा तथा शून्य विवाह और शून्यकरणीय विवाह...
हिन्दू विधि भाग 6 : जानिए हिंदू मैरिज एक्ट के अधीन विवाह कब शून्य (Void marriage) होता है
हिंदू विवाह अधिनियम 1955 के अंतर्गत विवाह को संस्कार तथा संविदा दोनों का मिश्रित रूप दिया गया है। प्राचीन शास्त्रीय विधि के अधीन हिंदू विवाह संस्कार है और उसमे तलाक जैसी कोई व्यवस्था नहीं थी। इस हेतु कुछ प्रावधान आधुनिक हिंदू विवाह अधिनियम 1955 में भी सम्मिलित किए गए हैं, यदि हिंदू विवाह को एक संविदा के स्वरूप में देखा जाए तो एक संविदा के भांति ही इस विवाह में शून्य विवाह (Void marriage) और शून्यकरणीय विवाह (Voidable marriage) का समावेश किया गया है। इस आलेख के माध्यम से शून्य विवाह के संदर्भ...
हिन्दू विधि भाग 5 : जानिए हिंदू मैरिज एक्ट के अधीन न्यायिक पृथक्करण ( Judicial Separation) क्या होता है
हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 9 के अधीन जिस प्रकार विवाह के पक्षकारों के आपसी मतभेद होने पर पुनर्मिलन के प्रयास किए गए हैं| इसी प्रकार धारा 10 के अधीन विवाह को बचाए रखते हुए विवाह के पक्षकारों को अलग अलग रहने के उपचार प्रदान किए गए हैं। प्राचीन शास्त्री हिंदू विधि के अधीन हिंदू विवाह एक संस्कार है तथा यह जन्म जन्मांतरों का संबंध है। ऐसे प्रयास होने चाहिए कि कोई भी हिंदू विवाह के संपन्न होने के बाद पति और पत्नी जहां तक संभव हो सके विवाह को सफल बनाएं तथा साथ-साथ साहचर्य का पालन करें। इस विचार...
हिन्दू विधि भाग 4 : जानिए दांपत्य अधिकारों का प्रत्यास्थापन (Restitution of Conjugal Rights) क्या होती है
हिंदू विधि के अधीन विवाह एक संविदा तथा संस्कार दोनों का मिश्रित रूप है। यदि हिंदू लॉ के अधीन विवाह को संस्कार माना भी जाए तो वर्तमान हिंदू विवाह अधिनियम 1955 (The Hindu Marriage Act, 1955) के अधीन यह एक पारिवारिक संविदा मालूम होता है। जब दो पक्षकार आपस में विवाह संपन्न करते हैं तो ऐसे विवाह के संपन्न होने के पश्चात उन दोनों के भीतर कुछ सामाजिक अधिकार तथा दायित्वों का जन्म होता है। विवाह के उपरांत विवाह के पक्षकार पति तथा पत्नी एक साथ रहते हैं तथा एक दूसरे के प्रति दोनों को साहचर्य का अधिकार...
हिन्दू विधि भाग- 3 : जानिए हिन्दू मैरिज एक्ट के अंतर्गत हिन्दू विवाह की शर्तें
हिंदू शास्त्रीय विवाह के अधीन विवाह एक महत्वपूर्ण संस्कार है। इस संस्कार को पूरा करने के लिए प्राचीन विधि में भी शर्ते अधिरोपित की गई थी। वर्तमान हिंदू विवाह अधिनियम 1955 ( The Hindu Marriage Act, 1955) आधुनिक हिंदू विधि है, जिसे प्राचीन शास्त्रीय विधि तथा आधुनिक परिक्षेप को ध्यान में रखते हुए भारत की संसद द्वारा बनाया गया है। इस अधिनियम के अंतर्गत हिंदू विवाह किए जाने के लिए कुछ महत्वपूर्ण शर्तों का समावेश किया गया है। हिंदू विवाह के अधीन इन शर्तों की पूर्ति की जाना अति आवश्यक है। अधिनियम...
हिन्दू विधि भाग 2 : जानिए हिंदू विवाह अधिनियम का विस्तार, यह अधिनियम कहां तक लागू होता है
हिंदू विवाह अधिनियम 1955 (The Hindu Marriage Act, 1955) के प्रारंभ होते ही सबसे पहले प्रश्न यह आते हैं कि इस अधिनियम का विस्तार कहां तक होगा अर्थात यह अधिनियम कहां तक लागू होगा और कौन से लोगों पर यह लागू होगा और इस अधिनियम के अंतर्गत दी गई विशेष परिभाषाओं का क्या अर्थ है?हिन्दू विधि भाग 1 : जानिए हिन्दू विधि (Hindu Law) और हिंदू विवाह (Hindu Marriage Act) से संबंधित आधारभूत बातेंइस लेख के माध्यम से हिंदू विवाह अधिनियम का विस्तार उसकी परिभाषाएं तथा अधिनियम किन लोगों पर लागू होगा इस संबंध में...
हिन्दू विधि भाग 1 : जानिए हिन्दू विधि (Hindu Law) और हिंदू विवाह (Hindu Marriage) से संबंधित आधारभूत बातें
भारतीय लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के अंतर्गत भारत के समस्त नागरिकों को उनके धार्मिक तथा जातिगत रीति-रिवाजों और परंपराओं के अनुसार अपने व्यक्तिगत मामलों (विवाह, तलाक, भरण पोषण,उत्तराधिकार, दत्तक ग्रहण) से संबंधित मामले अधिनियमित किए गए। भारत के सभी नागरिकों को अपनी धार्मिक तथा जातिगत परंपराओं और रिवाजों को अपने व्यक्तिगत मामलों में कानून का दर्जा दिया गया है। इन परंपराओं और रीति-रिवाजों को अधिनियम के माध्यम से समय-समय पर बल दिया गया है तथा इन प्रथाओं को सहिंताबद्ध किया गया है। भारत के...
सीआरपीसी की धारा 482 : जानिए उच्च न्यायालय की अंतर्निहित शक्ति (Inherent Power) का अर्थ और उससे संबंधित कुछ विशेष प्रकरण
दंड प्रक्रिया संहिता 1973 (CrPC) के अंतर्गत धारा 482 के अधीन उच्च न्यायालय को अंतर्निहित शक्ति (Inherent Power) प्रदान की गई है। इस धारा के अधीन उच्च न्यायालय को एक विशेष शक्ति दी गई है। यह शक्ति दिए जाने का उद्देश्य न्यायालय की कार्यवाही को दुरुपयोग से बचाना है तथा न्याय के उद्देश्यों को बनाए रखना है। कोई भी संहिता, अधिनियम, नियम, अपने आप में पूर्ण नहीं होते हैं क्योंकि समय, परिस्थितियां, क्षेत्र, काल के अनुरूप सब कुछ बदलता रहता है तथा अधिनियम नियमों एवं सहिंता को बनाने वाली विधायिका में...
'माई लॉर्ड' या 'योर ऑनर'? भारत में जजों को कैसे संबोधित करें
अशोक किनी13 अगस्त 2020 को सुप्रीम कोर्ट मे चीफ जस्टिस एसए बोबडे और एक वकील के बीच रोचक बातचीत हुई। विषय था कि अदालत को कैसे संबोधित किया जाए। सीजेआई की अध्यक्षता में पीठ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए एक मामलों की सुनवाई कर रही थी, जिसमें एक वकील ने उन्हें संबोधित किया, 'योर ऑनर'। जिस पर सीजेआई बोबडे ने पूछा, "क्या आप अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट में हैं?", सीजेआई के अनुसार, 'योर ऑनर' का प्रयोग भारतीय नहीं, बल्कि अमेरिकी है। वकील ने दलील दी कि कानून में ऐसा कुछ भी नहीं है, जिससे यह तय हो कि वकील अदालत...
कम गंभीर अपराधों में क्या होती है न्यायालय की संज्ञान (cognizance) लेने की परिसीमा अवधि (Limitation)
किसी भी सिविल प्रकरण में परिसीमा अधिनियम 1961 के अधीन प्रकरण को परिसीमा से बांधा गया है। इसी प्रकार दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत कम गंभीर प्रकृति के अपराधों को परिसीमा की अवधि से बांधने का प्रयास किया गया है। दंड विधि का यह सामान्य सिद्धांत है कि अपराध कभी समाप्त नहीं होता और यदि किसी व्यथित पक्षकार के विरुद्ध कोई अपराध घटित हुआ है तो ऐसी परिस्थिति में उस व्यथित पक्षकार को न्याय मिलना ही चाहिए। परंतु छोटे अपराध तथा कम गंभीर प्रकृति के अपराधों के संबंध में परिसीमा की अवधि निर्धारित की गई...
जानिए क्यों अदालतें किसी गवाह की गवाही/साक्ष्य को हलफनामे (Affidavit) पर प्राप्त करने से कर देती हैं इनकार?
हमने 'लाइव लॉ हिंदी' के पोर्टल पर गवाहों को लेकर ऐसे तमाम लेख आपके समक्ष प्रस्तुत किये हैं जहाँ हमने अदालत के समक्ष किसी मामले में प्रस्तुत होने वाले गवाह और उसके साक्ष्य/गवाही के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की है। इसी क्रम में, आज के इस लेख में हम इस बात को संक्षेप में समझने का प्रयास करेंगे कि आखिर क्यों अदालतें, किसी भी गवाह की गवाही/साक्ष्य को एफिडेविट पर प्राप्त करने से इनकार कर देती हैं। मौजूदा लेख में हम इस बात को भी समझने का प्रयास करेंगे कि आखिर क्यों, अदालतें यह जोर देकर हर मामले में...
जानिए दाण्डिक न्यायिक प्रक्रिया में अनियमित कार्यवाही ( Irregular Proceedings) क्या होती है?
कभी-कभी दाण्डिक प्रक्रिया के अंतर्गत दंड न्यायालय अपनी शक्तियों के बाहर जाकर कोई काम करता है। जब दंड न्यायालय अपनी शक्तियों के बाहर जाकर कोई कार्यवाही करता है ऐसी कार्यवाही को अनियमित कार्यवाही (Irregular Proceedings) कहा जाता है। साधारण अर्थों में ऐसी कार्यवाही, जिसे करने के लिए कोई दंड न्यायालय सशक्त नहीं है उसके उपरांत भी उन कार्यवाहियों को कर देता है। दंड प्रक्रिया संहिता 1973 के अंतर्गत अध्याय 35 में इस प्रकार की अनियमित कार्यवाही का उल्लेख किया गया है। यह अनियमित कार्यवाहियां कब...
धारा 146 (1) CrPC: जानिए क्या है कार्यपालक मजिस्ट्रेट की विवादित संपत्ति कुर्क करने की विशेष शक्ति?
जैसा कि हम जानते हैं कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 145, अचल संपत्ति से जुड़े विवादों से संबंधित है, और जब इस विवाद से शांति भंग होने की संभावना हो सकती है, तो इस धारा की उपधारा (1) के तहत कार्यवाही करते हुए एक कार्यकारी मजिस्ट्रेट के लिए पार्टियों को एक विशिष्ट तिथि और समय पर बुलाने करने की आवश्यकता होती है, ताकि वे उक्त संपत्ति पर अपने संबंधित दावे उसके समक्ष रखें, जिसके संबंध में लोक शांति के उल्लंघन की आशंका है। धारा 145 का यह उद्देश्य है कि यह धारा केवल कानून और व्यवस्था बनाए रखने के लिए...
जानिए ज़मानत (Bail) का मूल अर्थ
आपराधिक मामलों के संदर्भ में ज़मानत प्रचलित शब्द है। जब भी कोई व्यक्ति किसी प्रकरण में अभियुक्त बनाया जाता है तथा अन्वेषण (Investigation), जांच (Inquiry) और विचारण (Trial) के लंबित रहते हुए उस व्यक्ति को कारावास में परिरुद्ध किया जाता है तब ज़मानत शब्द, उस अभियुक्त के लिए सबसे अधिक उपयोग में लाया जाता है। इस सारगर्भित लेख के माध्यम से ज़मानत के मूल अर्थ को समझा जा रहा है। ज़मानत क्या है ? यह कहां से आई है ? ज़मानत शब्द जिसे अंग्रेजी में बेल (Bail) कहा जाता है, दंड प्रक्रिया संहिता 1973 (सीआरपीसी) के...
शास्त्रीय हिंदू कानून में बेटियों के साथ किए गए अन्याय को हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम में संशोधन के बाद समाप्त किया गया, सुप्रीम कोर्ट ने की हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम की व्याख्या
अशोक किनीसुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में सहदायिकी (पुश्तैनी) संपत्ति में बेटियों के समान अधिकार को मान्यता दी है। सुप्रीम कोर्ट ने सहदायिकी संपत्ति के हस्तांतरण से संबधित कानून और साथ ही बेटियों पर हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम में 2005 किए गए संशोधन के प्रभाव की व्याख्या की है। जस्टिस अरुण मिश्रा, एस अब्दुल नज़ीर और एमआर शाह की पीठ ने कहा है कि शास्त्रीय हिंदू कानून में बेटी को संपत्ति में सहभागी नहीं बनाया गया है। 2005 में संविधान की भावना के अनुसार, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम में...
धारा 451 सीआरपीसी: जानिए कब जब्त की गयी संपत्ति को उसके मालिक/किसी अन्य को सौंप दिया जाना चाहिए
उड़ीसा हाईकोर्ट ने बुधवार (5 अगस्त) को सुनाये एक आदेश में इस ओर इशारा किया कि जब्त वाहनों को थानों में लंबे समय तक धूप, बारिश और उचित रखरखाव के बिना नुकसान की स्थिति में रखने का कोई फायदा नहीं होता है। न्यायमूर्ति एस. के. पाणिग्रही की पीठ ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किये गए मामले, सुंदरभाई अंबालाल देसाई बनाम गुजरात सरकार 2002 (10) SCC 283 एवं उड़ीसा हाईकोर्ट द्वारा तय किये गए मामले दिलीप दास बनाम उड़ीसा राज्य 2019 (III) ILR-CUT 386 की राय के मद्देनजर, मौजूदा मामले में याचिकाकर्ता को उनकी जब्त...

















