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हाईकोर्ट वीकली राउंड अप : पिछले सप्ताह के खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र

LiveLaw News Network
26 Sep 2021 5:00 AM GMT
हाईकोर्ट वीकली राउंड अप : पिछले सप्ताह के खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र
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देशभर के विभिन्न हाईकोर्ट में पिछले सप्ताह (20 सितंबर 2021 से 24 सितंबर 2021 तक) क्या कुछ हुआ, जानने के लिए देखते हैं हाईकोर्ट वीकली राउंड अप। पिछले सप्ताह हाईकोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र।

"आपने वर्दी पहनी है सिर्फ इसलिए बहाना नहीं बना सकते": दिल्ली हाईकोर्ट ने पुलिस अधिकारी से पूछा कि किसने गलत स्टेटस रिपोर्ट दर्ज की

दिल्ली हाईकोर्ट ने शुक्रवार को दिल्ली पुलिस के एक अधिकारी को फटकार लगाई। इस अधिकारी ने अदालत के समक्ष दायर की जाने वाली गलत स्टेटस रिपोर्ट पर हस्ताक्षर किए थे।

दिल्ली हाईकोर्ट की न्यायमूर्ति रेखा पल्ली ने टिप्पणी की, "आपने काला-सफेद करके एक रिपोर्ट दर्ज की है। वह जो हुआ है उसके ठीक विपरीत दावा करते हुए। आपने वर्दी पहनी है सिर्फ इसलिए बहाना नहीं बना सकते।" उन्होंने संबंधित अधिकारी को भविष्य में सावधान रहने की चेतावनी दी और यह सुनिश्चित किया कि वह अदालत को जानकारी देने से पहले ठीक से सत्यापित कर ले।

केस टाइटल: तरुण कृष्ण अग्रवाल बनाम एसएचओ, पीएस हौज काजी

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रोहिणी कोर्ट में गोलीबारी- दिल्ली हाईकोर्ट में जिला न्यायालयों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पुलिस, बीसीडी को निर्देश देने की मांग वाली याचिका दायर

दिल्ली हाईकोर्ट में रोहिणी कोर्ट में कल (शुक्रवार) की गोलीबारी की घटना के मद्देनजर एक याचिका दायर कर दिल्ली पुलिस और दिल्ली बार काउंसिल को दिल्ली जिला न्यायालयों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के उपाय करने के निर्देश देने की मांग की गई है।

एडवोकेट दीपा जोसेफ द्वारा एडवोकेट रॉबिन राजू और एडवोकेट ब्लेसन मैथ्यूज के माध्यम से दायर याचिका फायरिंग की चौंकाने वाली घटना पर चिंता व्यक्त करती है, जबकि यह उजागर करती है कि जो वकील जिला अदालतों में दैनिक आधार पर प्रैक्टिस कर रहे हैं, वे असुरक्षित हैं, जिसका एक उदाहरण एक युवा कानूनी पेशेवर है जो उक्त घटना में भी गंभीर रूप से घायल हो गया।

केस का शीर्षक: दीपा जोसेफ बनाम पुलिस आयुक्त एंड अन्य।

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हाथरस सामूहिक बलात्कार मामला: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति अधिनियम के तहत पीड़ितों के राहत और पुनर्वास के लिए योजना का विवरण मांगा

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 15-ए की उप धारा 11 के साथ पठित अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति नियम, 1995 की धारा 14 के तहत योजना का विवरण निर्दिष्ट करने के लिए कहा।

यह विशेष उपखंड न्याय प्राप्त करने में पीड़ितों और गवाहों के कुछ अधिकारों के कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने के लिए एक उपयुक्त योजना निर्दिष्ट करने के लिए संबंधित राज्य का कर्तव्य बनाता है।

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"नाबालिग होना कोई बाधा नहीं", 17 साल के किशोर ने बीमार पिता को लिवर दान करने के लिए मांगी थी अनुमति, दिल्ली हाईकोर्ट ने की टिप्पणी

दिल्ली हाईकोर्ट ने शुक्रवार को मौखिक रूप से कहा कि केवल इसलिए कि कोई व्यक्ति नाबालिग है, इसका मतलब यह नहीं है कि वह मानव अंग और ऊतक प्रत्यारोपण अधिनियम 1994 के तहत अपना अंग दान करने के लिए अयोग्य है।

जस्टिस रेखा पल्ली ने कहा, "नाबा‌लिग होना कोई बाधा नहीं है।" उन्होंने मानव अंगों और ऊतकों के प्रत्यारोपण नियम, 2014 के नियम 5(3) (जी) का जिक्र करते हुए कहा, जिसमें प्रावधान है कि असाधारण चिकित्सा आधार के अलावा नाबालिग द्वारा जीवित अंग या ऊतक दान की अनुमति नहीं है। उस आधार को पूर्ण औचित्य के साथ और सक्षम प्राधिकारी के पूर्वानुमोदन के साथ विवरण में दर्ज किया जाए।

केस शीर्षक: सौरव सुमन अपनी मां के माध्यम से बनाम जीएनसीटीडी और अन्य।

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शादी के जरिए समझौता पॉक्सो के तहत बलात्कार के आरोपी के खिलाफ कार्यवाही रद्द करने का आधार नहीं: केरल हाईकोर्ट

केरल हाईकोर्ट ने कहा कि पक्षकारों के बीच विवाह के जरिए समझौता POCSO (यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम) के प्रावधानों के तहत बलात्कार के आरोपी के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने का आधार नहीं है।

न्यायमूर्ति वी. शिरसी ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के तहत एक याचिका को खारिज करते हुए टिप्पणी की, "बलात्कार न केवल पीड़िता के प्रति किया गया एक बहुत ही गंभीर और अमानवीय अपराध है, बल्कि यह उसके रिश्तेदारों और पूरे समाज पर भी बहुत गंभीर प्रभाव डालता है। जब अपराध की भयावहता इतनी गंभीर और जघन्य है कि न्याय की भावना सदमे में है और इसलिए पक्षों के बीच समझौता और बाद में उनके बीच विवाह एक आपराधिक मामले में कार्यवाही को रद्द करने के लिए विचार का विषय नहीं है।"

केस का शीर्षक: राहुल पीआर एंड अन्य बनाम केरल राज्य

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"अवैध खनन में लिप्त व्यक्तियों में भय की भावना पैदा करने की आवश्यकता": मद्रास हाईकोर्ट ने सरकार से मुआवजा वसूलने को कहा

मद्रास हाईकोर्ट ने राज्य में अवैध खनन पर चिंता व्यक्त करते हुए गुरुवार को कहा कि जब तक राज्य में अवैध खनन में लिप्त व्यक्तियों में भय की भावना पैदा नहीं होती तब तक अवैध खनन की बीमारी को खत्म नहीं किया जा सकता है।

चीफ जस्टिस संजीब बनर्जी और जस्टिस पीडी ऑदिकेसवालु की खंडपीठ ने राज्य सरकार से कहा कि वह कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया का पालन करते हुए अवैध खनिकों के खिलाफ अपनी मशीनरी का कड़ाई से इस्तेमाल करे।

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न्यूनतम मजदूरी अधिनियम मंदिरों और मठों पर लागू नहीं होता: आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि न्यूनतम मजदूरी अधिनियम मंदिरों या मठों पर लागू नहीं होता है। एपी धर्मार्थ और हिंदू धार्मिक संस्थान और बंदोबस्ती अधिनियम, 1987 के संदर्भ में अदालत ने कहा कि मंदिर और मठ के बीच अंतर है।

जस्टिस डीवीएसएस सोमयाजुलु ने श्री राघवेंद्र स्वामी मठ की ओर से दायर रिट याचिका की अनुमति देते हुए कहा, "मठ एक ऐसी संस्‍था है, जिसका अध्यक्ष एक व्यक्ति होता है, जिसका प्रमुख कार्य शिक्षण, धार्मिक दर्शन के प्रचार आदि में संलग्न रहना और धार्मिक प्रशिक्षण आदि प्रदान करना है। दूसरी ओर, मंदिर एक ऐसा स्थान है, जो धार्मिक पूजा के स्थान के रूप में उपयोग किया जाता है और समर्पित होता है।",

मामला: श्री राघवेंद्र स्वामी मठ बनाम आंध्र प्रदेश राज्य

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प्रथागत तलाक एक सामाजिक बुराई, जो बीमार दिमाग वाले पुरुषवादी रवैये के कारण होते हैं: गुजरात हाईकोर्ट

गुजरात हाईकोर्ट ने यह रेखांकित करते हुए कि प्रथागत तलाक एक सामाजिक बुराई है, हाल ही में एक जोड़े के प्रथागत तलाक के आधार पर उनके विवाह के विघटन की घोषणा करने से इनकार कर दिया।

हाईकोर्ट ने कहा कि पत्नी द्वारा इसे पर्याप्त रूप से साबित नहीं किया गया (जिसने एक अपील दायर कर ऐसी घोषणा करने की मांग की थी)। पीठ ने,हालांकि स्पष्ट किया कि दोनों पक्ष हिंदू विवाह अधिनियम के प्रासंगिक प्रावधान के तहत एक उपयुक्त आवेदन दायर करने और सहमति से तलाक की एक डिक्री के लिए प्रार्थना करने के लिए स्वतंत्र हैं और अदालत को इस तरह के आवेदन पर जल्द से जल्द सुनवाई करने का निर्देश दिया है।

केस का शीर्षक - भारतीबेन (पत्नी अमितभाई विट्ठलभाई और बेटी रविजीभाई कवानी) बनाम अमितभाई विट्ठलभाई सोजित्रा

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"जांच एजेंसी पूरक बयान दर्ज करके दोष को कवर नहीं कर सकती": दिल्ली कोर्ट ने दंगों के मामले में गंभीर अपराध में गिरफ्तार 10 आरोपियों को डिस्चार्ज किया

दिल्ली की एक अदालत ने यह देखते हुए कि जांच एजेंसी पूरक बयान दर्ज करके मामले में दोष को कवर नहीं कर सकती है, उत्तर पूर्वी दिल्ली दंगों से संबंधित एक मामले में दस आरोपियों को डिस्चार्ज (उन्मोचन) कर दिया।

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश विनोद यादव ने मोहम्मद शाहनवाज, शाहरुख, राशिद, आजाद, अशरफ अली, परवेज, मोहम्मद फैसल, राशिद @ मोनू और मोहम्मद नाम के आरोपियों को आरोपमुक्त कर दिया। उक्त आरोपियों को आम आमदी पार्टी के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन के साथ घर आदि को नष्ट करने के इरादे से आग या विस्फोटक पदार्थ को इस्तेमाल करने के लिए भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 436 के तहत गिरफ्तार किया गया था।

शीर्षक: राज्य बनाम मो. शाहनवाज व अन्य।

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जंतर मंतर पर नारेबाज़ी का मामला : दिल्ली हाईकोर्ट ने प्रीत सिंह की ज़मानत मंज़ूर की

दिल्ली हाईकोर्ट ने जंतर-मंतर पर कथित रूप से भड़काऊ और मुस्लिम विरोधी नारेबाजी के मामले में आरोपी प्रीत सिंह को शुक्रवार को जमानत दे दी।

न्यायमूर्ति मुक्ता गुप्ता ने इस महीने की शुरुआत में आरोपी सिंह की ओर से पेश अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन और अभियोजन पक्ष की ओर से पेश तरंग श्रीवास्तव की सुनवाई के बाद इसे सुरक्षित रखने के बाद आदेश सुनाया। दिल्ली हाईकोर्ट ने जंतर-मंतर पर कथित भड़काऊ और मुस्लिम विरोधी नारेबाजी के मामले में आरोपी प्रीत सिंह की नियमित जमानत याचिका पर बुधवार को आदेश सुरक्षित रख लिया था।

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ऐसे पुजारी की प्रार्थना कौन भगवान स्वीकार करेगा? पुजारी द्वारा किशोरी का बार-बार रेप किये जाने पर केरल हाईकोर्ट ने जताई नाराजगी

एक युवा लड़की के यौन उत्पीड़न के आरोपी एक पुजारी द्वारा दायर आपराधिक अपील पर सुनवाई करते हुए, केरल हाईकोर्ट ने गुरुवार को परित्यक्ता महिलाओं, विशेष रूप से असहाय बच्चों की बदनसीबी पर अपनी चिंता व्यक्त की।

"जब कोई पुरुष अपनी पत्नी और बच्चों को छोड़ देता है, तो मंडराते गिद्ध न केवल परित्यक्त महिला, बल्कि असहाय बच्चों को भी अपना शिकार करने के लिए इंतजार करते हैं। इस मामले में हमारे समक्ष एक 'पुजारी'/'कोमाराम' (मंदिर में दैवज्ञ) है, जिसने परित्यक्त महिला और उसके तीन बच्चों को अपने पास इसलिए रखा था कि वह केवल बड़ी लड़की के साथ बार-बार छेड़छाड़ करना चाहता था और वह भी उसके भाई-बहनों की उपस्थिति में। हमें आश्चर्य है कि कौन भगवान ऐसे पुजारी की पूजा और प्रसाद स्वीकार करेगा या उसे माध्यम बनाएगा? "

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'कारण बताएं कि अदालत का अनादर करने के लिए तुरंत कार्रवाई क्यों नहीं की जानी चाहिए': मद्रास हाईकोर्ट ने मंदिर की जमीन पर अतिक्रमण मामले में HR&CE विभाग के संयुक्त आयुक्त को कड़ी फटकार लगाई

मद्रास हाईकोर्ट ने तिरुवरूर जिला स्थिति तिरुकन्नमंगई में भक्तवत्सला पेरुमल मंदिर की लगभग 400 एकड़ भूमि के अतिक्रमण के खिलाफ दायर जनहित याचिका के मामले में हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती (एचआर एंड सीई) विभाग के संयुक्त आयुक्त की ओर से "अशीष्ट तरीके से" जवाब दाखिल करने पर उन्हें कड़ी फटकार लगाई है।

कोर्ट ने मामले में राज्य से स्थिति रिपोर्ट मांगी थी। चीफ ज‌‌स्टिस संजीब बनर्जी और जस्टिस पीडी ऑद‌िकेसवालु की पीठ ने संयुक्त आयुक्त के 'अशीष्ट तरीके' जवाबी हलफनामा दायर करने पर कड़ी आपत्ति व्यक्त की।

केस शीर्षक: हाथी जी राजेंद्रन बनाम सचिव और अन्य

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लॉटरी पुरस्कार से केवल इसलिए इनकार नहीं किया जा सकता क्योंकि विजेता एक निलंबित लॉटरी एजेंट की पत्नी हैः केरल हाईकोर्ट

केरल हाईकोर्ट ने राज्य को निर्देश दिया है कि वह उसकी 'विनविन' लॉटरी ड्रॉ जीतने वाली महिला को प्रथम पुरस्कार की 40.95 लाख रुपये की राशि का भुगतान करे।

न्यायमूर्ति पीवी कुन्हीकृष्णन ने पी शिथा की तरफ से दायर याचिका पर यह आदेश दिया है। उसने लॉटरी विभाग द्वारा उसके दावे को अस्वीकृत करने के निर्णय को चुनौती दी थी। इस याचिका में आरोप लगाया गया कि यह आदेश अनुरक्षणीय है क्योंकि सरकार को इस तरह के आदेश को पारित करने की अनुमति देने वाला कोई कानून नहीं है।

केस का शीर्षक-शिथा पी. बनाम केरल राज्य

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पीएम केयर्स फंड ट्रस्ट के कामकाज में केंद्र या राज्य सरकारों का कोई नियंत्रण नहीं: पीएमओ ने दिल्ली हाईकोर्ट को बताया

दिल्ली हाईकोर्ट के समक्ष पीएम केयर्स फंड ट्रस्ट की ओर से दायर हलफनामे में दावा किया गया है कि यह एक सार्वजनिक धर्मार्थ ट्रस्ट है और यह भारतीय संविधान या किसी अन्य कानून द्वारा या उसके तहत नहीं बनाया गया है और इसमें प्राप्त राशि भारत की संचित निधि में नहीं जाती है। प्रधानमंत्री कार्यालय में अवर सचिव की ओर से दायर हलफनामे में कहा गया है कि पीएम केयर्स ट्रस्ट के कामकाज में केंद्र सरकार या राज्य सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है।

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केरल हाईकोर्ट एक और नाबालिग बलात्कार पीड़िता की सहायता के लिए सामने आया: प्रेग्नेंसी टर्मिनेशन की अनुमति दी

केरल हाईकोर्ट ने बुधवार को एक अन्य नाबालिग बलात्कार पीड़िता की मदद के लिए उसके पिता की याचिका को स्वीकार कर लिया। इसके साथ ही उसके लिए उसके द्वारा किए गए यौन हमले के परिणामस्वरूप उसको प्रेग्नेंसी टर्मिनेशन की अनुमति दी।

पिछले एक सप्ताह के भीतर हाईकोर्ट द्वारा पारित यह ऐसा तीसरा आदेश है। पहले के दो मामलों में पीड़िता 26 सप्ताह से अधिक की गर्भवती थी और संबंधित मेडिकल बोर्ड से प्राप्त सिफारिशों के आधार पर उसको प्रेग्नेंसी टर्मिनेशन की अनुमति दी गई थी।

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'न्यायालयों को संवैधानिक नैतिकता पर भरोसा करना चाहिए, न कि सामाजिक नैतिकता की अस्पष्ट धारणाओं पर': राजस्थान हाईकोर्ट ने लिव-इन संबंध में शामिल विवाहिता और उसके प्रेमी को संरक्षण दिया

राजस्थान हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा है कि न तो राज्य और न ही समाज लिव-इन रिलेशनश‌िप में रह रहे दो वयस्कों के निजी जीवन में घुस सकता है। अगर लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे जोड़े में से एक ने कानूनी तौर पर किसी और से शादी की है तो भी राज्य और समाज ऐसा नहीं कर सकते हैं।

अदालत लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले एक दंपति की ओर से पुलिस सुरक्षा के लिए दायर एक याचिका पर फैसला सुना रही थी। ज‌स्टिस पुष्पेंद्र स‌िंह भाटी ने कहा, "यह अच्छी तरह से तय है कि किसी व्यक्ति की निजता में दखल देना अदालत के अधिकार क्षेत्र में नहीं है। किसी व्यक्ति के रिश्ते की तथाकथित नैतिकता की जांच करना या उस पर टिप्‍पणी करना, और निंदा का व्यापका बयान देना...किसी व्यक्ति के पसंद के अधिकार में घुसपैठ को बढ़ावा देगा और बड़े पैमाने पर समाज की ओर से से की जा रही अनुचित नैतिक पुलिसिंग के कृत्यों की अनदेखी करेगा।"

केस शीर्षक: लीला बनाम राजस्थान राज्य

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वकीलों की पहली जिम्मेदारी अपने क्लाइंट्स के प्रति, उसके बाद अदालतों के प्रति: केरल हाईकोर्ट

केरल हाईकोर्ट ने एक फर्जी वकील मामले में दायर अग्रिम जमानत याचिका को खारिज करते हुए टिप्पणी की कि एक वकील पहले अपने क्लाइंट के प्रति सबसे अधिक जिम्मेदारी लेता है, फिर अदालत के प्रति।

न्यायमूर्ति शिरसी वी ने अपने आदेश में यह भी कहा कि कानूनी पेशा सबसे महान पेशों में से एक है: "वकीलों के पेशे को सबसे महान व्यवसायों में से एक माना जाता है। वकीलों को न्याय के प्रशासन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होती है, क्योंकि केवल उनके ईमानदार और उद्देश्यपूर्ण प्रयास और सहायता से न्यायालय न्याय को ठीक से संचालित कर सकते हैं।"

केस शीर्षक: सेसी जेवियर बनाम केरल राज्य और अन्य।

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वकील ने कहा-न्यायाधीश को तंजावुर जमींदार की तरह मामले की सुनवाई नहीं करनी चाहिए; मद्रास हाईकोर्ट के न्यायाधीश ने मामले की सुनवाई से खुद को अलग किया

मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति आर. सुब्रमण्यम ने पिछले हफ्ते एक मामले की सुनवाई से खुद को अलग किया, जब वकील ने उनके समक्ष कहा कि उन्हें (जस्टिस सुब्रमण्यम) को 'तंजावुर जमींदार' की तरह मामले की सुनवाई नहीं करनी चाहिए।

तंजावुर दक्षिण भारतीय राज्य तमिलनाडु का एक जिला है और 11वीं शताब्दी के बृहदेश्वर मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। वकील ने इस प्रकार टिप्पणी की क्योंकि याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश अधिवक्ता एन जी आर प्रसाद द्वारा दायर जवाबी हलफनामे के पैरा 8 में दिए गए बयान के बारे में स्पष्टीकरण मांगा गया था।

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शादी के झूठे वादे पर बलात्कार के आरोपों से बचने के लिए 'ज्योतिषीय दोषों' का बहाना नहीं कर सकतेः बॉम्बे हाईकोर्ट

बॉम्बे हाईकोर्ट ने 'शादी के झूठे वादे पर बलात्कार' और धोखाधड़ी के आरोपी 32 वर्षीय व्यक्ति के शादी से इनकार करने के वैध कारण के रूप में 'ज्योतिषीय असंगति' के दावों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया।

न्यायमूर्ति संदीप शिंदे ने कहा कि आदमी के आचरण से यह स्पष्ट है कि उसका शुरू से ही लड़की से शादी करने का कोई इरादा नहीं था। अगर उसके इरादे नेक थे तो वह उससे शादी करने से इनकार नहीं करता, क्योंकि उसने अपनी पहली पुलिस शिकायत वापस लेने के बाद बेमेल कुंडली का हवाला दिया था।

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'शिकायतकर्ता इस तथ्य से अवगत थी कि शायद विवाह न हो पाए': मद्रास हाईकोर्ट ने शादी के झूठे वादे पर बलात्कार के आरोपों को खारिज किया

मद्रास हाईकोर्ट ने सोमवार को फैसला सुनाया कि शादी करने के झूठे वादे के बहाने भारतीय दंड संहिता (आईपीसी)की धारा 376 के तहत बलात्कार का अपराध तब नहीं बनता है जब शिकायतकर्ता स्वेच्छा से यौन कृत्य में शामिल होती है(वो भी यह जानते हुए कि उसकी अपनी वैवाहिक स्थिति के कारण इच्छित विवाह बिल्कुल भी नहीं हो सकता है)।

अदालत ने सीआरपीसी की धारा 482 के तहत दायर एक याचिका पर यह फैसला सुनाया है, जिसमें आरोपी के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने की मांग की गई थी।

केस का शीर्षकः डी. संथानम और प्रिया बनाम राज्य

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पुलिस उन धाराओं का इस्तेमाल कर रही, जिन्हें अदालतें रद्द कर चुकी हैं, दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र को कानून की किताबों को अपडेट करने पर विचार करने का निर्देश दिया

दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार को केंद्र सरकार से कहा है कि वह एक जनहित याचिका को प्रतिनिधित्व के रूप में विचार करे। याचिका कानून से ऐसे प्रावधानों को हटाने की मांग करती है, जिन्हें न्यायालयों द्वारा असंवैधानिक घोषित किया गया है।

एडवोकेट अंशुल बजाज द्वारा दायर याचिका में पुलिस थानों को प्रासंगिक संशोधित आपराधिक कानून की किताबों/ बेयर एक्ट्स और सुप्रीम कोर्ट और संबंधित हाईकोर्टों के निर्णयों को उपलब्ध कराने की मांग की गई है, जिससे उनके दायित्वों और जिम्मेदारियों को प्रचारित करेंगे।

केस शीर्षक: अंशुल बजाज बनाम यूनियन ऑफ इंडिया और अन्य।

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"अस्पतालों में मरीजों के परिजनों द्वारा डॉक्टरों और अन्य पैरामेडिकल स्टाफ की पिटाई, दुर्व्यवहार और गाली गलौज नियमित विशेषता बन गई है " : मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने ऐसी हिंसा को रोकने के लिए राज्य सरकार को कानून में संशोधन करने के निर्देश दिए

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की जबलपुर पीठ ने अस्पतालों में मरीजों के परिजनों द्वारा डॉक्टरों और अन्य पैरामेडिकल स्टाफ को पीटने, मारपीट करने और हमला करने की बढ़ती प्रथा के खिलाफ कड़ी आपत्ति व्यक्त की।

अदालत सोमवार को एक जनहित याचिका (पीआईएल) याचिका पर फैसला सुना रही थी, जिसे 18 नवंबर, 2013 को बिड़ला अस्पताल और प्रियंवदा बिड़ला कैंसर अनुसंधान संस्थान, सतना (म.प्र.), एमपी के प्रमुख डॉ संजय माहेश्वरी द्वारा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को संबोधित कर लिखे गए एक पत्र के आधार पर दर्ज किया गया था।

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राजनीतिक दलों द्वारा गैंगस्टरों को दल में शामिल करने, चुनाव टिकट देने का चलन बंद होना चाहिए: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राजनीतिक दलों द्वारा गैंगस्टरों/अपराधियों का स्वागत, चुनाव टिकट देने के चलन पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि अगर इसे नहीं रोका गया तो ऐसे अपराधी और गैंगस्टर भस्मासुर बन जाएंगे और देश और लोकतांत्रिक व्यवस्था को नुकसान पहुंचाएंगे।

न्यायमूर्ति प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने ये टिप्पणियां कीं और यूपी पुलिस के दो अधिकारियों, एसओ विनय कुमार तिवारी और बीट अधिकारी कृष्ण कुमार शर्मा को जमानत देने से इनकार कर दिया, जो 3 जुलाई, 2020 को बिकरू गांव में हुए संघर्ष के संबंध में साजिश के आरोपों का सामना कर रहे हैं, जिसमें आठ पुलिसकर्मियों को गैंगस्टर विकास दुबे ने मार गिराया था।

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"केवल पुरुष को दोषी ठहराने का कोई कारण नहीं": कलकत्ता हाईकोर्ट ने माना कि 'स्वैच्छिक यौन संबंध' पोक्सो कानून को आकर्षित नहीं करेगा

कलकत्ता हाईकोर्ट ने कहा है कि यौन संबंधों का स्वैच्छिक कृत्य पोक्सो कानून, 2012 को आकर्षित नहीं करेगा। जस्टिस सब्यसाची भट्टाचार्य ने कहा, यदि संबंध की प्रकृति सहभा‌गिता की है तो केवल पुरुष को भिन्न यौनांग रचना के कारण आरोपित करने का कोई औचित्य नहीं है।

कोर्ट के मुताबिक, किसी व्यक्ति को पेनेट्रेटिव सेक्सुअल एसॉल्ट का दोषी ठहराने के लिए आरोपी की तुलना में पीड़िता की मानसिकता, परिपक्वता और पिछला आचरण भी प्रासंगिक है। फैसले में कहा गया है कि पोक्सो एक्ट के प्रावधानों का उपयोग बच्चों की सुरक्षा के लिए उपयुक्त संरचना के लिए किया जाना चाहिए, न कि किसी व्यक्ति को दूसरे से शादी करने के लिए मजबूर करने के लिए दुर्व्यवहार के साधन के रूप में।

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फर्जी वकील मामला : केरल हाईकोर्ट ने बार एसोसिएशनों को नए सदस्यों का नामांकन करने से पहले बार काउंसिल से सत्यापन करने की सलाह दी

केरल हाईकोर्ट ने बिना नामांकन के दो साल से अधिक समय तक राज्य में अधिवक्ता के रूप में वकालत करने वाले सेसी जेवियर को गिरफ्तारी से पहले जमानत देने से इनकार करते हुए कहा कि उसने न केवल बार एसोसिएशन और आम जनता को बल्कि पूरी न्यायिक प्रणाली को धोखा दिया है।

कोर्ट ने यह भी देखा कि यह सलाह दी जाती है कि बार एसोसिएशन नए सदस्यों का नामांकन करने से पहले बार काउंसिल से सत्यापित करें। न्यायमूर्ति शिरसी वी ने यह कहते हुए अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी:

COVID -19 महामारी में ऑक्सीजन की कमी के कारण मौत का मामला : मुआवजे के लिए दिल्ली सरकार द्वारा गठित एचपीसी को दिल्ली हाईकोर्ट ने मंजूरी दी

दिल्ली हाईकोर्ट ने मंगलवार को COVID -19 महामारी के बीच ऑक्सीजन की कमी के कारण हुई मौतों की जांच के लिए दिल्ली सरकार द्वारा गठित उच्चाधिकार समिति (एचपीसी) को काम करने की मंजूरी दे दी।

न्यायमूर्ति विपिन सांघी और न्यायमूर्ति जसमीत सिंह ने समिति को अपनी मंजूरी देते हुए कहा कि उसे सौंपी गई भूमिकाओं के निर्वहन में एचपीसी के कामकाज में कोई कठिनाई नहीं है। कोर्ट ने हालांकि दिल्ली सरकार की इस दलील पर गौर किया कि हाई पावर्ड कमेटी पूरी कवायद में किसी अस्पताल को गलत नहीं ठहराएगी और पूरे मुआवजे का भुगतान अकेले सरकार करेगी।

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'पुलिस की पुलिसिंग कौन करेगा?' इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बिकरू एनकाउंटर षडयंत्र मामले में यूपी के 2 पुलिसकर्मियों को जमानत देने से किया इनकार

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश पुलिस दो कर्मचारियों एसओ विनय कुमार तिवारी और बीट ऑफिसर कृष्ण कुमार शर्मा को जमानत देने से इनकार कर दिया। उन पर तीन जुलाई, 2020 को बिकरु गांव में पुलिस पर हुए घात लगा कर हुए हमले, जिसमें आठ पुलिसकर्मी मारे गए थे, की साजिश रचने का आरोप है।

गैंगस्टर विकास दुबे पर पुलिस वालों को मारने का आरोप लगा था। कोर्ट ने 40 साल पहले एक फैसले में जस्टिस वीआर कृष्णा अय्यर द्वारा दिए गए प्रसिद्ध बयान "पुलिस को पुलिस कौन करेगा" से शुरुआत की। कोर्ट ने कहा, "लगभग 40 साल बीत चुके हैं, लेकिन, यह सवाल अब भी एक बड़े प्रश्न चिह्न के साथ खड़ा है।"

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आपसी सहमति से तलाक देने के लिए विवाद का होना कोई शर्त नहीं: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय

छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने माना है कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13बी के तहत आपसी सहमति से तलाक देने के लिए पति और पत्नी के बीच गंभीर विवाद का होना कोई शर्त नहीं है। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एनके चंद्रवंशी की खंडपीठ ने कहा कि अधिनियम, 1955 की धारा 13-बी में निहित प्रावधान आपसी सहमति से तलाक देने के लिए धारा 13 में शामिल आधार के अस्‍त‌ित्व का प्रावधान नहीं करता है।

कोर्ट ने कहा, "किसी मामले में हो सकता है कि जोड़े के बीच कोई झगड़ा या विवाद ना हो, फिर भी उनके कार्य और व्यवहार सुखी और शांतिपूर्ण विवाहित जीवन जीने के लिए सुसंगत ना हो, इसलिए वे आपसी सहमति से तलाक की मांग कर सकते हैं। यदि कोई आवेदन अन्यथा विधिवत रूप से गठित किया गया है और न्यायालय के समक्ष उचित रूप से प्रस्तुत किया गया है तो यह न्यायालय पर नहीं है कि वह उस आधार या कारण की खोज करे, जिसने पार्टियों को आपसी सहमति से तलाक लेने के लिए मजबूर किया है।"

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सीआरपीसी की धारा 125-'अंतरिम भरण-पोषण देना प्राथमिक चिकित्सा देने के समान,यह पत्नी और बच्चों को दर-दर भटकने से बचाता है': हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा है कि सीआरपीसी के अध्याय IX के तहत अंतरिम भरण-पोषण देना प्राथमिक उपचार देने जैसा है, जो पत्नी और बच्चों को दर-दर भटकने/खानाबदोशी और उसके परिणामों से बचाता है।

न्यायमूर्ति अनूप चितकारा ने कहा कि, ''अंतरिम भरण पोषण देना प्राथमिक उपचार देने के समान है। दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 का अध्याय IX, आवेदक को भुखमरी से बचाने के लिए संक्षिप्त प्रक्रिया के तहत एक त्वरित उपाय प्रदान करता है और एक परित्यक्त पत्नी या बच्चों को तत्काल कठिनाइयों का सामना करने के लिए भरण-पोषण के माध्यम से उचित राशि प्रदान करता है।''

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मंदिर के देवता 'नाबालिग', अवैध अतिक्रमण के खिलाफ उनकी रक्षा की जानी चाहिए: मद्रास हाईकोर्ट

मद्रास हाईकोर्ट ने हाल ही में दोहराया कि मंदिर संपत्तियों पर छलपूर्ण या अवैध अतिक्रमण समाज के खिलाफ अपराध है। अदालत एक व्यक्ति के खिलाफ बेदखली की कार्यवाही पर फैसला सुना रही थी, जिसने चेन्नई ‌स्‍थ‌ित अरुल्मिगु अगाथीश्वर स्वामी थिरुक्कोइल से जुड़ी मंदिर संपत्ति का पट्टाधारक होने का दावा किया था।

ज‌स्टिस एसएम सुब्रमण्यम ने कहा, " मंदिर की संपत्तियों के छलपूर्ण और अवैध अतिक्रमण समाज के खिलाफ बड़े पैमाने पर अपराध है। मंदिर के धन का दुरुपयोग निस्संदेह एक अपराध है और ऐसे सभी अपराधों को दर्ज किया जाए और अपराधियों के खिलाफ राज्य मुकदमा चला सकता है क्योंकि राज्य इन मंदिरों का नियंत्रक है और अपराध राज्य के खिलाफ किए जाते हैं। मंदिर की संपत्तियों को कुछ लालची पुरुषों, कुछ पेशेवर अपराधियों और भूमि हथियाने वालों द्वारा लूटने की अनुमति है।

HR & CE ‌डिपार्टमेंट के अधिकारियों के सक्रिय या निष्क्रिय योगदान और मिलीभगत को खारिज नहीं किया जा सकता है। ऐसे सरकारी अधिकारियों की ओर से इन चूकों, लापरवाही, कर्तव्य की उपेक्षा को भी गंभीरता से लिया जाना चाहिए और इस संबंध में सभी उचित कार्रवाई अत्यधिक जरूरी है।"

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'शर्म की बात है कि हर दूसरा मामला नाबालिग के बलात्कार से संबंधित है': केरल उच्च हाईकोर्ट ने POCSO के बढ़ते मामलों पर चिंता जताई

केरल हाईकोर्ट ने राज्य में नाबालिगों के बलात्कार के बढ़ते मामलों से चिंतित ने एक आपराधिक अपील पर सुनवाई करते हुए कहा कि यह शर्म की बात है कि हर दूसरा मामला नाबालिग के बलात्कार से संबंधित है।

न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन और न्यायमूर्ति ज़ियाद रहमान ए की खंडपीठ ने अपने पड़ोस में रहने वाली एक नाबालिग लड़की से बलात्कार के आरोपी की दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए कहा कि अभियोजन द्वारा पेश किए गए सबूतों में कोई विसंगति नहीं है।

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यदि पुरुष अपनी पत्नी को अपने जीवन से अलग करता है और इस कारण वह आत्महत्या कर लेती है तो आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला नहीं बनता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पिछले सप्ताह अपनी पत्नी को आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में एक पति के खिलाफ पारित दोषसिद्धि के आदेश को रद्द करते हुए कहा कि पत्नी को अपने जीवन से अलग करना उकसाने की श्रेणी में आने वाला एक कारण नहीं हो सकता है।

न्यायमूर्ति अजय त्यागी की पीठ के समक्ष जगवीर सिंह उर्फ​ बंटू ने एक अपील दायर कर अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, पीलीभीत के उस आदेश को चुनौती दी थी,जिसमें उसे भारतीय दंड संहिता की धारा 498-ए और 306 के तहत दोषी ठहराया गया था।

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"हां, मेरा ट्रांसफर हो रहा है, व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी की रिपोर्ट्स पर ध्यान न दें": गुजरात हाईकोर्ट के जस्टिस परेश उपाध्याय केवल जरूरी मामलों की सुनवाई करेंगे

गुजरात हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति परेश उपाध्याय ने खुली अदालत में कहा कि उनका तबादला किया जा रहा है और लोगों को अखबारों की खबरों पर ध्यान नहीं देना चाहिए इसलिए वह खुद इसकी जानकारी दे रहे हैं। इसके साथ ही जस्टिस उपाध्याय ने अब केवल जरूरी मामलों की ही सुनवाई करने का फैसला किया है।

जस्टिस परेश उपाध्याय ने कहा, "मेरी तरफ से एक उल्लेख है, आप व्हाट्सएप यूनीवर्सिटी या समाचार पत्र की रिपोर्ट पर ध्यान न दें। मैं आप सभी को सूचित करता हूं कि हां, मेरा ट्रांसफर हो रहा है और इसलिए, हम केवल जरूरी मामलों को ही उठाएंगे। अब मेरी प्राथमिकताएं बदल जाएंगी।"

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आरोपी को दोषी ठहराने वाले आदेश के खिलाफ तत्काल अपील करने का कोई मौलिक/ वैधानिक अधिकार नहीं : बॉम्बे हाईकोर्ट

बॉम्बे हाई कोर्ट ने माना कि किसी आरोपी को अपराध का दोषी ठहराने वाले आदेश के खिलाफ तत्काल अपील करने का कोई मौलिक या वैधानिक अधिकार नहीं है।

अदालत द्वारा दोषसिद्धि दर्ज करने के बाद, अभियुक्त को सजा के सवाल पर सुना जाना चाहिए और सजा दिए जाने के बाद ही निर्णय पूरा होता है और दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 374 के तहत आदेश के के खिलाफ अपील की जा सकती है।

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धारा 311 सीआरपीसी, केवल वकील में बदलाव गवाहों को जिरह के लिए वापस बुलाने का आधार नहीं हो सकताः दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा है कि नए वकील की इच्छा के अनुसार कुछ सुझाव देने के लिए गवाहों को वापस बुलाने के लिए केवल वकील का परिवर्तन पर्याप्त नहीं होगा।

सीआरपीसी की धारा 311 के तहत एक आवेदन को खारिज करते हुए, जस्टिस योगेश खन्ना ने कहा कि चूंकि काफी देरी हुई है, इसलिए निर्णय लेते समय पीड़ित की दुर्दशा को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। उन्होंने न्यायिक मिसालों की एक श्रृंखला का हवाला देते हुए पूर्व वकील के उक्त पीड़ित की जांच न करने के सचेत निर्णय पर भी जोर दिया।

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"अभियोजन पक्ष के गवाहों की इच्छा और मनमानी पर किसी को सलाखों के पीछे नहीं रख सकते" : एमपी हाईकोर्ट ने एनडीपीएस एक्ट के आरोपी को 50 हज़ार रुपए का मुआवज़ा देने का निर्देश दिया

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने हाल ही में राज्य सरकार को एनडीपीएस अधिनियम के एक आरोपी को उसके "मौलिक अधिकार के उल्लंघन" के लिए 15 दिनों के भीतर 50,000 / - का भुगतान करने का निर्देश दिया।

यह आरोपी जनवरी 2018 से सलाखों के पीछे है और अभियोजन पक्ष अपने गवाहों को ट्रायल के दौरान अदालत के सामने पेश करने में विफल रहा है। न्यायमूर्ति जीएस अहलूवालिया की पीठ सुनवाई में देरी के आधार पर जयपाल सिंह की 10वीं जमानत याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जब उसने कहा कि राज्य सरकार लगातार तेजी से सुनवाई के आवेदक के मौलिक अधिकार का उल्लंघन कर रही है।

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