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न्यूनतम मजदूरी अधिनियम मंदिरों और मठों पर लागू नहीं होता: आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट

LiveLaw News Network
24 Sep 2021 8:57 AM GMT
न्यूनतम मजदूरी अधिनियम मंदिरों और मठों पर लागू नहीं होता: आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट
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आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि न्यूनतम मजदूरी अधिनियम मंदिरों या मठों पर लागू नहीं होता है। एपी धर्मार्थ और हिंदू धार्मिक संस्थान और बंदोबस्ती अधिनियम, 1987 के संदर्भ में, अदालत ने कहा कि मंदिर और मठ के बीच अंतर है।

जस्टिस डीवीएसएस सोमयाजुलु ने श्री राघवेंद्र स्वामी मठ की ओर से दायर रिट याचिका की अनुमति देते हुए कहा, "मठ एक ऐसी संस्‍था है, जिसका अध्यक्ष एक व्यक्ति होता है, जिसका प्रमुख कार्य शिक्षण, धार्मिक दर्शन के प्रचार आदि में संलग्न रहना और धार्मिक प्रशिक्षण आदि प्रदान करना है। दूसरी ओर, मंदिर एक ऐसा स्थान है, जो धार्मिक पूजा के स्थान के रूप में उपयोग किया जाता है और समर्पित होता है।",

याचिका में न्यूनतम मजदूरी के भुगतान का निर्देश देने वाले ज्ञापन को चुनौती दी गई है।

अदालत के समक्ष, यह दलील दी गई कि एक मठ और एक मंदिर के बीच मौलिक अंतर होता है, हालांकि दोनों को धार्मिक संस्थान कहा जा सकता है, और 1987 के अधिनियम के तहत अधिकारियों के पास एक मठ के मामलों में हस्तक्षेप करने के लिए किसी प्रकार की शक्ति या नियंत्रण नहीं है। मामले में राज्य ने समान काम के लिए समान वेतन के सिद्धांत पर आधारित ज्ञापन का बचाव किया।

कोर्ट ने कहा, "इस न्यायालय की राय में आयुक्त को दी गई अधीक्षण की सामान्य शक्ति धर्मनिरपेक्ष गतिविधि में हस्तक्षेप करने के लिए विस्तारित नहीं है और इसके दायरे में सीमित है। धारा 8 के पढ़ने से यह स्पष्ट हो जाता है कि अधीक्षण और नियंत्रण की शक्ति यह आदेश पारित करने के लिए शामिल है कि यह सुनिश्चित हो सके कि संस्था ठीक से प्रशासित हो और आय उस उद्देश्य के लिए खर्च की जाए, जिसके लिए उसका निर्माण किया गया है। संयोजन "और‟ का उपयोग यह स्पष्ट करता है कि धारा 8 (1) के तहत यह शक्ति यह सुनिश्चित करने के लिए है कि धन केवल उन्हीं उद्देश्यों के लिए खर्च किए जाते हैं जिन उद्देश्‍यों के लिए उन्हें तय किया गया है।

इसी प्रकार धारा 8(2) जो एक नॉन-ऑब्सटेंटे (non-obstante) क्लॉज से शुरू होती है, वह अधिनियम के तहत "उन्हें प्रदान की गई" शक्तियों के बारे में बात करती है या उन्हें दिए गए कार्यों की बात करती है। कोई भी वैधानिक प्रावधान इंगित नहीं किया गया है, जिसके तहत न्यूनतम मजदूरी आदि का भुगतान करने के निर्देश देने की यह विशेष शक्ति न्यायालय को दिखाई जाए। अंत में, इस मुद्दे पर इस न्यायालय की राय है कि यदि अधिनियम की धारा 8(1) और धारा 49 को एक साथ पढ़ा जाए, तो आयुक्त की सीमित शक्तियां स्पष्ट हो जाती हैं। वे "केवल दित्तम‟ के फिक्सिंग/खर्च/उपयोग तक सीमित हैं। असहमति की स्थिति में मामले को निर्णय के लिए न्यायालय को भेजा जाना है (धारा 49-प्रोविज़ो)। इसी तरह, धारा 51-53 आदि में संशोधन आदि, जहां आयुक्त को "धर्मिका परिषद" द्वारा प्रतिस्थापित किया गया है, यह भी स्पष्ट करता है कि आयुक्त की भूमिका बहुत सीमित है।"

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले [श्री सत्य नारायण तुलसी मानस मंदिर बनाम वर्कमैन कम्पैनसेशन कमिश्नर] का उल्लेख किया, जिसमें उसने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया , जिसमें कहा गया था कि मंदिर या अन्य धार्मिक और धर्मार्थ प्रतिष्ठानों में रोजगार में शामिल सेवकों/श्रमिकों के लिए न्यूनतम मजदूरी या अन्य कल्याणकारी योजना के भुगतान को राज्य द्वारा विनियमित किया जा सकता है।

कोर्ट ने कहा था, न्यूनतम मजदूरी अधिनियम उन सभी उद्योगों पर लागू नहीं होता है जो औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के अंतर्गत आते हैं। यह केवल अधिनियम की अनुसूची में उल्लिखित कुछ 'पसीने वाले' उद्योगों पर लागू होता है। मंदिर उनमें से नहीं है।

इस पर ध्यान देते हुए कोर्ट ने कहा, "मठ एक विशेष संप्रदाय से संबंधित धार्मिक और अन्य कार्यों के लिए बनी एक संस्था है, यह मंदिर से अलग है, जो पूजा के लिए सभी के लिए खुला है। मठ का संचालन का अपना क्षेत्र है और उत्तरदाता इसकी धर्मनिरपेक्ष गतिविधि में हस्तक्षेप नहीं कर सकते हैं। न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948 मठ पर लागू नहीं है। इलाहाबाद हाईकोर्ट और माननीय सुप्रीम कोर्ट के निर्णय और न्यूनतम मजदूरी अधिनियम की परिभाषाएं भी इस निष्कर्ष का समर्थन करती हैं। मठ को अपनी गतिविधियों को बनाए रखने और संचालित करने के लिए दी गई स्वायत्तता भी इस दृष्टिकोण का समर्थन करती है कि प्रतिवादी हर गतिविधि में हस्तक्षेप नहीं कर सकते हैं।यदि प्रतिवादियों के पास हर गतिविधि में हस्तक्षेप करने की ऐसी शक्ति है तो यह संवैधानिक और धार्मिक संप्रदायों को अपनी गतिविधियों को चलाने के लिए दी गई अन्य गारंटी के विपरीत होगा।"

कोर्ट ने यह भी कहा कि राज्य मठ के धार्मिक कार्यों और धर्मनिरपेक्ष मुद्दों को अलग करके मठ के प्रबंधन को संभालने के लिए किसी भी शक्ति या अधिकार का दावा नहीं कर सकता है।

मामला: श्री राघवेंद्र स्वामी मठ बनाम आंध्र प्रदेश राज्य

Case no.| Date: WP 0641 of 2021 | 22 September 2021

कोरम: जस्टिस डीवीएसएस सोमयाजुलु

प्र‌तिनिधित्व: सीन‌ियर एडवोकेट सीआर श्रीधरन, याचिकाकर्ता के लिए जीवीएस गणेश

निर्णय पढ़ने/डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें

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