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'शिकायतकर्ता इस तथ्य से अवगत थी कि शायद विवाह न हो पाए': मद्रास हाईकोर्ट ने शादी के झूठे वादे पर बलात्कार के आरोपों को खारिज किया

LiveLaw News Network
22 Sep 2021 2:45 PM GMT
शिकायतकर्ता इस तथ्य से अवगत थी कि शायद विवाह न हो पाए: मद्रास हाईकोर्ट ने शादी के झूठे वादे पर बलात्कार के आरोपों को खारिज किया
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मद्रास हाईकोर्ट ने सोमवार को फैसला सुनाया कि शादी करने के झूठे वादे के बहाने भारतीय दंड संहिता (आईपीसी)की धारा 376 के तहत बलात्कार का अपराध तब नहीं बनता है जब शिकायतकर्ता स्वेच्छा से यौन कृत्य में शामिल होती है(वो भी यह जानते हुए कि उसकी अपनी वैवाहिक स्थिति के कारण इच्छित विवाह बिल्कुल भी नहीं हो सकता है)। अदालत ने सीआरपीसी की धारा 482 के तहत दायर एक याचिका पर यह फैसला सुनाया है, जिसमें आरोपी के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने की मांग की गई थी।

न्यायमूर्ति एम. निर्मल कुमार ने कहा कि,

''प्रतिवादी नंबर दो ने याचिकाकर्ता नंबर एक की पहल का विरोध नहीं किया और वास्तव में उनके आगे झुक गई। इस प्रकार उसने प्रतिरोध और सहमति के बीच एक विकल्प का स्वतंत्र रूप से प्रयोग किया। वह अपने कृत्य के परिणामों को जानती थी, खासकर जब उसे पता था कि उसकी वैवाहिक स्थिति के कारण उनका विवाह बिल्कुल नहीं हो सकता है। उसके बावजूद उसने कई अवसरों पर यौन संबंध बनाए। इस मामले में दोनों के बीच पांच साल तक यौन संबंध रहे हैं,जिसे रेप नहीं कहा जा सकता है। मामले के तथ्य और उनके बीच बने शारीरिक संबंध के लिए प्रतिवादी नंबर दो की स्वीकृति को देखते हुए आईपीसी की धारा 376 के तहत अपराध का गठन नहीं होता है।''

पृष्ठभूमि

इस मामले में, शिकायतकर्ता और आरोपी दोनों ही मद्रास हाईकोर्ट और चेन्नई के आसपास की अन्य अदालतों में वकालत कर रहे हैं। शिकायतकर्ता ने वर्ष 2009 में एक टीएन विश्वनाथ से शादी की थी। इसके बाद, शिकायतकर्ता और आरोपी पहली बार 5 अप्रैल, 2015 को मिले थे, जिसके बाद उनके बीच एक रिश्ता बन गया ,जो जुलाई 2020 तक लगभग 5 साल की अवधि तक चला।

अवलोकन

सभी दलीलों पर विचार करने के बाद कोर्ट ने माना कि पक्षकारों के बीच सहमति से शारीरिक संबंध बने हैं और आईपीसी की धारा 376 के तहत बलात्कार का अपराध नहीं बनता है। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों पर भरोसा किया और तदनुसार फैसला सुनाया कि कोई सहमति थी या नहीं, यह सभी प्रासंगिक परिस्थितियों के सावधानीपूर्वक अध्ययन पर ही पता लगाया जा सकता है।

कोर्ट ने कहा कि,''बलात्कार और सहमति से यौन संबंध बनाने के बीच के अंतर को प्रत्येक मामले के तथ्यों के आधार पर देखा जाना चाहिए। जब शिकायत को रद्द करने की मांग की जाती है, तो यह आकलन करने के लिए सामग्री को देखने की अनुमति है कि शिकायतकर्ता ने क्या आरोप लगाया है और अगर आरोपों को पूरी तरह से स्वीकार किया जाता है तो क्या कोई अपराध बनता है?''

कोर्ट ने यह भी कहा कि आईपीसी की धारा 90 के तहत अगर शिकायतकर्ता द्वारा गलत तथ्यों के आधार पर सहमति दी जाती है, तो यह विकृत है।

कोर्ट ने आगे कहा कि,

''आईपीसी की धारा 375 के तहत सहमति के लिए न केवल कृत्य के महत्व और नैतिक गुणवत्ता के ज्ञान के आधार पर बुद्धि का प्रयोग करने के बाद स्वैच्छिक भागीदारी की आवश्यकता होती है, बल्कि प्रतिरोध और सहमति के बीच का चुनाव भी अच्छे से किया गया हो। सहमति थी या नहीं,इसका पता सभी प्रासंगिक परिस्थितियों का सावधानीपूर्वक अध्ययन करने के बाद ही लगाया जा सकता है।''

मामले के तथ्यों का हवाला देते हुए, अदालत ने पाया कि उनके रिश्ते की अवधि के दौरान, शिकायतकर्ता ने कोई विरोध नहीं दिखाया या आरोपी के खिलाफ कोई आपत्ति दर्ज नहीं की। यह माना गया कि शिकायत की सत्यता 'अत्यधिक संदिग्ध' है। अदालत ने कहा कि,

''शिकायत की सत्यता अत्यधिक संदिग्ध है। इसमें कोई संदेह नहीं है, इस न्यायालय को प्राथमिकी को रद्द करने में सतर्क रहना होगा खासकर जब मामला जांच के चरण में हो।''

अदालत ने तब यह फैसला सुनाया कि आईपीसी की धारा 376 के तहत बलात्कार का अपराध निम्नलिखित आधारों के कारण नहीं बनता है,

1) शिकायतकर्ता 36 वर्ष की एक सुशिक्षित महिला है और वह एक अधिवक्ता है।

2) शिकायतकर्ता ने अपने पति से तलाक लिए बिना ही आरोपी के साथ संबंध बनाने जारी रखे।

3) जब आरोपी ने अपने प्यार का इजहार किया और उसके साथ यौन संबंध शुरू करने की इच्छा जताई तो शिकायतकर्ता ने 'कोई विरोध, आपत्ति या इनकार नहीं किया'।

4) शिकायतकर्ता द्वारा यह स्वीकार किया गया है कि उसने यह मानते हुए आरोपी को 'खुद को' सौंप दिया कि वह अविवाहित है और इसलिए उससे शादी करेगा।

इस प्रकार, न्यायालय ने कहा,

''प्रतिवादी नंबर दो(शिकायतकर्ता) ने स्पष्ट रूप से और अपनी स्वेच्छा से याचिकाकर्ता नंबर एक(आरोपी) के साथ यौन कृत्य में भाग लिया, वो भी एक बार नहीं बल्कि पांच साल से अधिक की अवधि के दौरान कई अवसरों पर ऐसा किया गया है।''

कोर्ट ने आगे यह भी कहा कि सहमति के बारे में केवल सबूत या मामले की संभावनाओं के आधार पर ही निष्कर्ष निकाला जा सकता है।

कोर्ट ने कहा कि,''सहमति को विचार-विमर्श के साथ मिलकर किया गया कार्य भी कहा जाता है। यह शिकायत किए गए कार्य को करने की अनुमति देने के लिए एक व्यक्ति के दिमाग की सक्रिय इच्छा को दर्शाता है।''

अदालत ने कहा कि शिकायतकर्ता के पास उस कार्य के 'महत्व और नैतिक गुण' को समझने के लिए 'पर्याप्त बुद्धि' थी, जिसके लिए वह सहमति दे रही थी, यही वजह है कि उसने लंबे समय तक रिश्ते को गुप्त रखा था।

अदालत ने आगे कहा कि, ''प्रतिवादी नंबर दो ने याचिकाकर्ता नंबर एक की पहल का विरोध नहीं किया और वास्तव में उनके आगे झुक गई। इस प्रकार उसने प्रतिरोध और सहमति के बीच एक विकल्प का स्वतंत्र रूप से प्रयोग किया। वह अपने कृत्य के परिणामों को जानती थी, खासकर जब उसे पता था कि उसकी वैवाहिक स्थिति के कारण उनका विवाह बिल्कुल नहीं हो सकता है। उसके बावजूद उसने कई अवसरों पर यौन संबंध बनाए। इस मामले में दोनों के बीच पांच साल तक यौन संबंध रहे हैं,जिसे रेप नहीं कहा जा सकता है। मामले के तथ्य और उनके बीच बने शारीरिक संबंध के लिए प्रतिवादी नंबर दो की स्वीकृति को देखते हुए आईपीसी की धारा 376 के तहत अपराध का गठन नहीं होता है।''

तदनुसार, अदालत ने आरोपी के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी को रद्द कर दिया और उसे आईपीसी की धारा 376 के तहत बलात्कार के अपराध से बरी कर दिया।

केस का शीर्षकः डी. संथानम और प्रिया बनाम राज्य

आदेश/निर्णय डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें



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