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जरूरी नहीं है कि एनआई एक्ट की धारा 138 के तहत भेजे जाने वाला डिमांड नोटिस कोई वकील ही भेजे-त्रिपुरा हाईकोर्ट [निर्णय पढ़ें]
जरूरी नहीं है कि एनआई एक्ट की धारा 138 के तहत भेजे जाने वाला डिमांड नोटिस कोई वकील ही भेजे-त्रिपुरा हाईकोर्ट [निर्णय पढ़ें]

त्रिपुरा हाईकोर्ट ने माना है कि एनआई एक्ट के तहत ऐसा जरूरी नहीं बताया गया है कि धारा 138 के तहत भेजे जाने वाला डिमांड नोटिस किसी वकील के जरिए ही भेजा जाए।इस मामले में हाईकोर्ट के समक्ष उठाए गए मुद्दों में एक मुद्दा यह था कि शिकायतकर्ता द्वारा भेजा गया डिमांड नोटिस वकील के जरिए नहीं भेजा गया था। कोर्ट के समक्ष दलील दी गई कि डिमांड नोटिस पर उस वकील के हस्ताक्षर नहीं थे,जिसके जरिए इसे तामील करवाया गया था। इसलिए यह नोटिस एनआई एक्ट की धारा 138 की आवश्यकता के अनुसार नहीं भेजा गया था। जस्टिस ने...

अप्रसिद्ध या अलोकप्रिय विचार व्यक्त करना नहीं है कोई अपराध-पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने किया एक लेखिका के खिलाफ दर्ज केस को रद्द
''अप्रसिद्ध या अलोकप्रिय'' विचार व्यक्त करना नहीं है कोई अपराध-पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने किया एक लेखिका के खिलाफ दर्ज केस को रद्द

पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने महर्षि वाल्मीकी को अपनी किताब में डकैत बताने के मामले में एक लेखिका के खिलाफ दर्ज आपराधिक केस को रद्द कर दिया है।इस मामले में बाल्मीकी समुदाय के एक सदस्य ने मंजुला सहदेव के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। आरोप लगाया गया था कि मंजुला ने अपनी किताब '' महर्षि बाल्मिक-एक समस्तिक अध्याय'' में भगवान बाल्मीकी को एक डाकू व लुटेरा बताया है। जिससे बाल्मीकी समुदाय की धार्मिक भावनाएं आहत हुई है।लेखिका के खिलाफ दर्ज केस को रद्द करते हुए जस्टिस अरविंद सिहं सांगवान ने कई तथ्य नोट किए।...

किसी गवाह को हितपरायण या पक्षपातपूर्ण तभी कहा जा सकता है,जब आरोपी व्यक्ति को सजा होने से उसको कुछ लाभ होता हो: सुप्रीम कोर्ट  [निर्णय पढ़े]
किसी गवाह को हितपरायण या पक्षपातपूर्ण तभी कहा जा सकता है,जब आरोपी व्यक्ति को सजा होने से उसको कुछ लाभ होता हो: सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़े]

किसी गवाह को तभी ''हितपरायण या पक्षपातपूर्ण'' कहा जा सकता है,जब उसको सिविल केस में हुए फैसले के परिणाम से या आरोपी को सजा होने से कुछ लाभ होना हो। यह टिप्पणी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक आपराधिक अपील में बचाव पक्ष की तरफ से दिए गए तर्क को खारिज कर दिया है।सदयाप्पन उर्फ गणेशन बनाम राज्य मामले में बचाव पक्ष ने दलील दी थी कि मृतक के रिश्तेदारों के बयानों पर निचली अदालत को विश्वास नहीं करना चाहिए था क्योंकि उन सभी गवाहों का इस मामले से हित जुड़ा था। सदयाप्पन को उसके पड़ोसी सेलवम उर्फ थानगरज की हत्या...

सरकारी नौकर पारिवारिक पेंशन के बारे में वसीयत नहीं बना सकता : छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट [निर्णय पढ़े]
सरकारी नौकर पारिवारिक पेंशन के बारे में वसीयत नहीं बना सकता : छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट [निर्णय पढ़े]

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कहा है कि सरकारी नौकर फ़ैमिली पेंशन के बारे में वसीयत नहीं बना सकता। विजय कौशिक नामक एक सिपाही ने अपना सारा पेंशन से जुड़े लाभ और पेंशन अपनी दूसरी पत्नी और उससे हुए बेटे के नाम कर दिया। उसकी मौत के बाद उसकी पत्नी और उसके बेटे ने उत्तराधिकार प्रमाणपत्र के लिए आवेदन दिया। कोर्ट ने उसका आवेदन ख़ारिज कर दिया और वसीयत के आधार पर उसकी दूसरी पत्नी और उसके बेटे के दावे को सही माना। पुनरीक्षण याचिका पर हाईकोर्ट के समक्ष मुद्दा यह निर्णय करने का था कि क्या कोई सरकारी नौकर रिटायर...

आईपीसी की धारा 498A और 306: ऐसी घटना जो पत्नी की मौत से काफ़ी पहले हुआ उसे आत्महत्या का कारण नहीं बताया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़े]
आईपीसी की धारा 498A और 306: ऐसी घटना जो पत्नी की मौत से काफ़ी पहले हुआ उसे आत्महत्या का कारण नहीं बताया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़े]

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि ऐसी घटना जो मृतक की मौत से काफ़ी पहले हुआ, उसे ऐसा व्यवहार नहीं माना जा सकता जिसकी वजह से मृतक ने आत्महत्या की। जगदीशराज खट्टा को हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने आईपीसी की धारा 498A और 306 के दोषी मानते हुए निचली अदालत के फ़ैसले को बदल दिया जिसने उसे इस मामले में बरी कर दिया था। हाईकोर्ट ने खट्टा को (1) मृतक के रिश्तेदारों के बयानों के आधार पर दोषी क़रार दिया जिन्होंने कहा कि रिश्तेदारों की मौजूदगी में आरोपी पति मृतक पत्नी के साथ निर्दयता से पेश आता था, और (2) अपनी मौत के...

बल्ब लगाने को लेकर हुए झगड़े में बेटी की हत्या करने वाले को सुप्रीम कोर्ट से राहत [निर्णय पढ़े]
बल्ब लगाने को लेकर हुए झगड़े में बेटी की हत्या करने वाले को सुप्रीम कोर्ट से राहत [निर्णय पढ़े]

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को उस व्यक्ति की सज़ा को संशोधित किया जिसको अपनी बेटी को मारने का अपराधी ठहराया गया था। गोविंद सिंह को निचली अदालत ने आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई थी और उसे अपनी बेटी ललिता की हत्या का दोषी पाया गया था। बल्ब की जगह तय करते समय बेटी और बाप में तू-तू मैं-मैं हुई और ऐसा आरोप है कि बाप ने चिम्नी लैम्प अपनी बेटी की तरफ़ फेंका जिससे उसकी बेटी जल गई। उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया जहाँ सात दिन बाद उसकी मौत हो गई। निचली अदालत के फ़ैसले के ख़िलाफ़ उसने छत्तीसगढ़ उच्च नयालय...

बिल्डर को ऑक्यूपैंसी प्रमाणपत्र देने में हो रही देरी का ख़ामियाज़ा उपभोक्ताओं को भुगतने नहीं दिया जा सकता : एनसीडीआरसी
बिल्डर को ऑक्यूपैंसी प्रमाणपत्र देने में हो रही देरी का ख़ामियाज़ा उपभोक्ताओं को भुगतने नहीं दिया जा सकता : एनसीडीआरसी

राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (एनसीडीआरसी) ने कहा है कि भवन निर्माण में किसी तरह की गड़बड़ी या नियम से हटने के कारण अगर बिल्डिंग में रहने के लिए प्रमाणपत्र देने में देरी होती है तो इसकी वजह से उपभोक्ता को परेशानी में नहीं डाला जा सकता। न्यायमूर्ति वीके जैन ने कहा कि अगर बिल्डर को अगर मकान बनाने के लिए ज़मीन के अंदर से पानी निकालने की मनाही है तो यह बिल्डर का दायित्व है कि वह मकान बनाने के लिए पानी का इंतज़ाम करे और इसके लिए भवन के ख़रीदार को परेशानी में डाला नहीं जा सकता। ...

सिर्फ सात राज्यों में ही बासमती चावल की खेती करने के केंद्र के फैसले को दिल्ली हाईकोर्ट ने किया रद्द [निर्णय पढ़े]
सिर्फ सात राज्यों में ही बासमती चावल की खेती करने के केंद्र के फैसले को दिल्ली हाईकोर्ट ने किया रद्द [निर्णय पढ़े]

दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र के उस निर्णय को रद्द कर दिया है,जिसके तहत सिर्फ सात राज्य पंजाब,हरियाणा,दिल्ली,हिमाचल प्रदेश,उत्तराखंड व कुछ हिस्सा उत्तर पद्रेश का और जम्मू एंड कश्मीर में ही बासमती चावल की खेती करने की बात कही गई थी ताकि बीज की गुणवत्ता व विशुद्धता को बनाए रखा जा सके।जस्टिस विभू बाखरू ने 29 मई 2008 व सात फरवरी 2014,के दो विभागीय ज्ञापनों (ओएम यानि आफेशियल मैमोरेंडम) को रद्द कर दिया है। इसके साथ कृषि मंत्रालय की तरफ से जारी एक पत्र को भी रद्द किया है,जिसमें बताया गया था कि बासमती चावल...

मृत्यु पूर्व दिए बयान सिर्फ इसलिए अमान्य नहीं क्योंकि उन्हें किसी डॉक्टर ने प्रमाणित नहीं किया : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़े]
मृत्यु पूर्व दिए बयान सिर्फ इसलिए अमान्य नहीं क्योंकि उन्हें किसी डॉक्टर ने प्रमाणित नहीं किया : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़े]

"यदि मरने से पहले बयान दर्ज करने वाला व्यक्ति इस बात को लेकर संतुष्ट है कि बयान देने के लिए घोषणाकर्ता एक उपयुक्त चिकित्सा स्थिति में है और यदि कोई संदिग्ध परिस्थितियां नहीं हैं तो मृत्यु के पूर्व दिए बयान केवल इस आधार पर अमान्य नहीं हो सकते कि इसे डॉक्टर द्वारा प्रमाणित नहीं किया गया। चिकित्सक द्वारा प्रमाणीकरण के लिए आग्रह केवल विवेक का एक नियम है जिसे मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर लागू किया जाता है। असली परीक्षण यह है कि क्या मरने से पूर्व दिया गया बयान सत्य और स्वैच्छिक हैं।“

Patna HC Takes Judicial Notice Of A Huge Structure Located Adjacent To The Newly Inaugurated Centenary Building
प्रामाणिक अंग्रेजी अनुवाद के साथ हिंदी में दायर की जा सकती हैं रिट याचिकाएं : पटना हाई कोर्ट (पूर्ण बेंच) [निर्णय पढ़ें]

पटना उच्च न्यायालय की एक पूर्ण पीठ ने यह माना है कि रिट याचिकाएँ या कर संदर्भ (Tax Reference) हिंदी भाषा में दायर की जा सकती हैं, लेकिन इसके लिए याचिका के साथ एक प्रामाणिक अंग्रेजी संस्करण भी आवश्यक होगा।1972 की अधिसूचनावर्ष 1972 में सरकार द्वारा जारी एक अधिसूचना ने पटना उच्च न्यायालय के समक्ष (1) दीवानी और आपराधिक मामलों में बहस के लिए उच्च न्यायालय (2) में हिंदी भाषा के वैकल्पिक उपयोग और शपथ पत्र के साथ आवेदन प्रस्तुत करने के लिए अधिकृत किया था। अधिसूचना में एक बंधन यह रखा गया था कि भारत के...

नेकचलनी पर रिहा होने से एक कर्मचारी को यह अधिकार नहीं मिल जाता है  कि वह अपनी सेवा में बने रहने का हक मांग सके-सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़े]
नेकचलनी पर रिहा होने से एक कर्मचारी को यह अधिकार नहीं मिल जाता है कि वह अपनी सेवा में बने रहने का हक मांग सके-सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़े]

सुप्रीम कोर्ट ने दाॅ स्टेट बैंक आॅफ इंडिया एंड अदर्स बनाम पी.सुप्रामनीएने मामले में कहा है कि नेकचलनी पर रिहा होने से एक कर्मचारी को यह अधिकार नहीं मिलता है िक वह उसे नौकरी पर वापिस रखने की मांग करे। कोर्ट ने कहा कि नियोक्ता का यह कत्र्तव्य बनता है कि अगर कोई कर्मचारी ऐसे मामले में दोषी करार दिया जाता है,जिसमें नैतिक या न्यायसंगत भ्रष्टता(मोरल टर्पिटूड) शामिल है तो वह उसे नौकरी से हटा दे।जस्टिस एल-नागेश्वर राॅव व एम.आर शाह की पीठ ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुशील कुमार सिंघल बनाम...

सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार से जेल में 30 साल से बंद श्रीलंकाई की पूर्व रिहाई की अर्ज़ी पर विचार करने को कहा [निर्णय पढ़े]
सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार से जेल में 30 साल से बंद श्रीलंकाई की पूर्व रिहाई की अर्ज़ी पर विचार करने को कहा [निर्णय पढ़े]

सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को आदेश दिया है कि वह राज्य के जेल में 30 साल से बंद श्रीलंकाई शरणार्थी की समय-पूर्व रिहाई के बारे में उसकी अपील पर ग़ौर करे। राजन और अन्य लोगों पर पितचैकारा ग्राउंडर के घर में डकैती करने का आरोप है। अभियोजन पक्ष का कहना है कि वह जब कार से भागने की कोशिश करते हुए उसने फ़ायर किया जिसमें तीन लोगों की मौत हो गई और चार लोग घायल हो गए। उसके ख़िलाफ़ मामला चला जिसके बाद 30 साल की जेल की सज़ा हुई जिसमें सात साल का सश्रम कारावास भी था। उसे धारा 302 के तहत मौत की सज़ा भी...

सगे-संबंधी के मामले में नान -एडवोकेट पाॅवर आॅफ अटार्नी को दी जा सकती है कोर्ट के समक्ष दलीलें देने की अनुमति-कोलकता हाईकोर्ट
सगे-संबंधी के मामले में नान -एडवोकेट पाॅवर आॅफ अटार्नी को दी जा सकती है कोर्ट के समक्ष दलीलें देने की अनुमति-कोलकता हाईकोर्ट

किसी विशेष मामले में कोर्ट द्वारा एडवोकेट एक्ट 1961 की धारा 32 के तहत किसी व्यक्ति को कोर्ट के समक्ष पेश होने की अनुमति देना वकीलों को प्रैक्टिस के लिए मिले अधिकारों का अपवाद है। कोलकता हाईकोर्ट ने कहा है कि कोर्ट के पास यह अधिकार है कि किसी सगे-संबंधी के मामले में पाॅवर आॅफ अटार्नी यानि जिस व्यक्ति ने वकालत की पढ़ाई न की हो,को कोर्ट के समक्ष पेश होकर दलीलें देने की अनुमति दे दे। जस्टिस सुमेन सेन व जस्टिस रवि कृष्ण कपूर की दो सदस्यीय खंडपीठ ने कहा कि यह अधिकार कोर्ट उस समय प्रयोग कर सकती है,जब...

जजमेंट आॅन ऐडमीशन यानि स्वीकृति पर फैैसला तभी दिया जा सकता है,जब स्वीकृति स्पष्ट व बेशर्त हो-सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़े]
'जजमेंट आॅन ऐडमीशन यानि स्वीकृति पर फैैसला' तभी दिया जा सकता है,जब स्वीकृति स्पष्ट व बेशर्त हो-सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़े]

सुप्रीम कोर्ट ने यह माना है कि 'जजमेंट आॅन ऐडमीशन (स्वीकृति पर फैैसला)' पर फैसला तभी दिया जा सकता है,जब किसी प्रतिवादन या बहस में स्वीकृति स्पष्ट व बेशर्त रूप से दी गई हो।एक विशेष अदायगी केस यानि स्पेसिफिक परफॉरमेंस सूट में दिल्ली हाईकोर्ट की 2 सदस्यीय खंडपीठ ने याचिकाकर्ता की उस अर्जी को स्वीकार कर लिया है, जो उसके द्वारा कोड आॅफ सिविल प्रोसिजर के आर्डर XII के रूल 6 के तहत दायर की गई थी। हाईकोर्ट ने अपना यह आदेश प्रतिवादी के वकील की तरफ से जमानत अर्जी पर सुनवाई के दौरान दी गई दलीलों के आधार पर...

बीमा प्रस्ताव फ़ॉर्म में पहले से मौजूद बीमारी का ज़िक्र नहीं करना अस्वीकरण का उचित आधार : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़े]
बीमा प्रस्ताव फ़ॉर्म में पहले से मौजूद बीमारी का ज़िक्र नहीं करना अस्वीकरण का उचित आधार : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़े]

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में जीवन बीमा निगम की एक याचिका को स्वीकार कर लिया जिसमें उसने कहा था कि बीमित व्यक्ति ने हृदय की बीमारी का ज़िक्र नहीं किया था और इसलिए उसके पास अस्वीकरण का उचित अधिकार है। मनीष गुप्ता ने एलआईसी की मेडिक्लेम पॉलिसी ख़रीदी थी। इसके लिए प्रस्ताव फ़ॉर्म में स्वास्थ्य और चिकित्सा संबंधी विवरण भरने की ज़रूरत होती है। उसने हृदय रोग से संबंधित सूचनाओं के बारे में नकारात्मक जानकारी दी थी। पर माइट्रल वाल्व रेप्लेस्मेंट ऑपरेशन होने के बाद उसने दावा किया। एलआईसी ने इस दावे को...

कोर्ट के किसी आदेश के उल्लंघन से अगर किसी व्यक्ति को नुक़सान होता है तो वह अवमानना का मामला दायर कर सकता है : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़े]
कोर्ट के किसी आदेश के उल्लंघन से अगर किसी व्यक्ति को नुक़सान होता है तो वह अवमानना का मामला दायर कर सकता है : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़े]

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जब किसी मामल में कोई फ़ैसला दिया जाता है जो आम प्रकृति का है तो फ़ैसले के पक्षकार सहित इससे प्रभावित होने वाला कोई भी पक्ष कोर्ट के इस आदेश के उल्लंघन होने पर अवमानना की याचिका दायर कर सकता है।न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव और न्यायमूर्ति एमआर शाह की पीठ ने अवमानना की एक याचिका पर सुनवाई के दौरान रिज़र्व बैंक को ख़ुलासे की ऐसी नीति को वापस लेने को कहा गया जो Reserve Bank of India v. Jayantilal N. Mistry मामले में दिए गए फ़ैसले के ख़िलाफ़ है।इस फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने...

किसी व्यक्ति को भद्दी गालियाँ देना आपराधिक धमकियों की श्रेणी के तहत अपराध में नहीं आता:सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़े]
किसी व्यक्ति को भद्दी गालियाँ देना आपराधिक धमकियों की श्रेणी के तहत अपराध में नहीं आता:सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़े]

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सिर्फ़ किसी व्यक्ति को भद्दी गालियाँ देना आपराधिक रूप से डराने धमकाने की श्रेणी के तहत अपराध नहीं हो सकता। न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति केएम जोसफ़ की पीठ ने विक्रम जौहर नामक व्यक्ति की अपील पर ग़ौर करते हुए यह बात कही जिसने आपराधिक मामले में ख़ुद की रिहाई की याचिका निचली अदालत और हाईकोर्ट द्वारा ख़ारिज किए जाने के ख़िलाफ़ है।शिकायत यह थी कि जौहर ने दो-तीन अज्ञात लोगों के साथ मिलकर शिकायतकर्ता के घर आए और उसको भद्दी गालियाँ दी और उसपर हमला करने की कोशिश...

हमला करने या मामूली चोट पहुंचाने के सभी मामलों को नहीं लाया जा सकता है नैतिक या न्यायसंगत भ्रष्टता वाले अपराध की श्रेणी में-सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़े]
हमला करने या मामूली चोट पहुंचाने के सभी मामलों को नहीं लाया जा सकता है नैतिक या न्यायसंगत भ्रष्टता वाले अपराध की श्रेणी में-सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़े]

'नेकचलनी पर रिहा होने से एक कर्मचारी को यह अधिकार नहीं मिल जाता है कि वह अपनी सेवा में बने रहने का हक मांग सके।' हमला करने या मामूली चोट पहुंचाने के सभी मामलों को नैतिक या न्यायसंगत भ्रष्टता वाले अपराध की श्रेणी नहीं लाया जा सकता है। यह टिप्पणी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक एसबीआई कर्मचारी को राहत दे दी है।उसे आईपीसी की धारा 324 के तहत दोषी करार दिए जाने के बाद नौकरी से हटा दिया गया था। पी.सुप्रामनीएने एसबीआई बैंक में बतौर मैसेंजर काम करता था।उसे निचली अदालत ने आईपीसी की धारा 324 के तहत दोषी...