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सिर्फ सात राज्यों में ही बासमती चावल की खेती करने के केंद्र के फैसले को दिल्ली हाईकोर्ट ने किया रद्द [निर्णय पढ़े]

Live Law Hindi
3 May 2019 4:47 AM GMT
सिर्फ सात राज्यों में ही बासमती चावल की खेती करने के केंद्र के फैसले को दिल्ली हाईकोर्ट ने किया रद्द [निर्णय पढ़े]
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दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र के उस निर्णय को रद्द कर दिया है,जिसके तहत सिर्फ सात राज्य पंजाब,हरियाणा,दिल्ली,हिमाचल प्रदेश,उत्तराखंड व कुछ हिस्सा उत्तर पद्रेश का और जम्मू एंड कश्मीर में ही बासमती चावल की खेती करने की बात कही गई थी ताकि बीज की गुणवत्ता व विशुद्धता को बनाए रखा जा सके।

जस्टिस विभू बाखरू ने 29 मई 2008 व सात फरवरी 2014,के दो विभागीय ज्ञापनों (ओएम यानि आफेशियल मैमोरेंडम) को रद्द कर दिया है। इसके साथ कृषि मंत्रालय की तरफ से जारी एक पत्र को भी रद्द किया है,जिसमें बताया गया था कि बासमती चावल की खेती के लिए इन सात राज्यों के भौगोलिक इलाकों की जानकारी दी गई थी। साथ ही कहा गया था कि इन सात राज्यों में उन्हीं इलाकों में उगाए गए चावल को बासमती माना जाएगा जो इलाका इसके लिए चिन्हित किए गए है। बासमती चावल का बीज इन विशेष इलाकों के अलावा अन्य किसी जगह नहीं उगाया जाएगा।
''ओएम के अभिप्राय से यह स्पष्ट नहीं हो रहा है कि बीज की गुणवत्ता को बनाए रखा जाएगा बल्कि उन इलाकों को चिन्हित कर दिया गया है,जिनमें फसल को उगाने के लिए बीज का प्रयोग किया जा सकेगा। इन अधिसूचनाओं को प्रभाव यह होगा कि प्रजनक बीज निश्चित इलाकों से अन्य किसी जगह पर उपलब्ध नहीं होगा।साफ उद्देश्य यह है कि बासमती चावल की खेती विशेष इलाकोें में ही की जा सकती है। यह बीज एक्ट के क्षेत्र से बाहर की बात है। इतना ही नहीं यह मामला कृषि के क्षेत्र से जुड़ा है जो राज्य का विषय है।''
इस मामले में मध्य प्रदेश सरकार ने इन ज्ञापनों को चुनौती दी थी। उसी पर सुनवाई करते हुए इनको रद्द किया गया है। मध्य प्रदेश सरकार का कहना था कि उनके 13 राज्यों को भी बासमती चावल की खेती के लिए चिन्हित भौगोलिग इलाकों में शामिल किया जाना चाहिए था। इतना ही नहीं खरीफ 2016 के दौरान उनको अलाॅट हुए बासमती चावल के बीज को भी वापिस ले लिया गया था। दलील दी गई थी कि ज्ञापन के अनुसार भौगोलिक इलाकों के अलावा किसी अन्य इलाके के लिए बासमती चावल के बीज नहीं दिए जा सकते है।
मध्य प्रदेश सरकार ने दलील दी कि यह ज्ञापन बीज एक्ट के अनुसार जारी नहीं किए गए।
जिसके बाद कोर्ट ने बीज एक्ट के विभिन्न प्रावधानों को देखा और पाया कि
'' बीज एक्ट को इस बात से कोई संबंध नहीं है कि कहां और कैसे बीज का प्रयोग किया जाए। जब एक व्यक्ति बीज एक्ट की धारा 7 के तहत दी गई शर्तो को पूरा कर देता है तो उसके बाद ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं रहता है कि कहां और कैसे फसल उगाई जाए। बीज एक्ट सिर्फ यह सुनिश्चित करने के लिए है कि किसानों के लिए जो बीज उपलब्ध है,वो अंकुरण व गुणवत्ता की न्यूनतम सीमा को पूरा करते हो। वहीं उन पर लगे लेबल इस बात की पूरी जानकारी देते हो।''
''जस्टिस बाखरू ने ज्ञापनों को बीज एक्ट के अनुसार देखने के बाद कहा कि यह नोट किया जाना महत्वपूर्ण है कि ओएम-एक के अनुसार बासमती चावल का उत्पादन सिर्फ निश्चित इलाकों में ही किया जा सकता है,जिन्हें इंडो-गेनगेटिक प्लेन यानि गंगा-सिंधूचे मैदान का नाम दिया गया है। इतना ही नहीं इसमें बासमती चावल की विशेषताएं बताने के अलावा उन इलाकों को विशेष तौर पर चिंहित किया जाए है,जहां यह उगाए जा सकते है। जो साफ तौर पर बीज एक्ट के क्षेत्र से बाहर का मामला है।''
''ओएम-दो में निर्धारित इलाकों के अलावा उगाए गए बासमती चावल पर रोक के बारे में कहा गया है। साथ ही कहा गया है कि प्रमाणित बीज का उत्पादन उसी अनुसार किया जाए जैसा की बीज एक्ट के तहत बताया गया है। जैसा की पहले भी देखा गया है कि बीज एक्ट के रूल 14 के अनुसार मूल बीज के उत्पादन का निरीक्षण किया जाएगा और उसको सीड सर्टिफिकेशन एजेंसी द्वारा प्रमाणित किया जाएगा। ताकि उसकी जैविक शुद्धता व पहचान को बनाए रखा जा सके। यह मुद्दा किसी का नहीं है िकमूल बीज का उत्पादन निर्धारित भौगोलिक इलाके से बाहर किया गया तो इससे बासमती चावल की जैविक पहचान या शुद्धता खत्म हो जाएगी। ओएम-दो एकदम बीज एक्ट के अभिप्राय व उद्देश्य से बिल्कुल भिन्न है। जबकि बीज एक्ट का मुख्य उद्देश्य है कि किसानों को अच्छी गुणवत्ता के बीज मिले। ओएम-दो का अभिप्राय सिर्फ बीज के उत्पादन के लिए इलाकों को प्रतिबंधित करना है। जो पूरी तरह बीज एक्ट की योजना से पूरी तरह से बाहर है।''
कोर्ट ने इस मामले में केंद्र द्वारा 2017 में जारी उस अधिसूचना पर कोई विचार नहीं दिया,जिसके तहत बासमती चावल के बीज के उत्पादन को सिर्फ चावल उगाने वाले राज्य पंजाब,हरियाणा,हिमाचल प्रदेश,दिल्ली,उत्तराखंड,पश्चिमी उत्तर प्रदेश का कुछ हिस्सा व जम्मू एंड कश्मीर राज्य तक ही सीमित कर दिया गया है।

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