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भ्रष्टाचार के मामलों में क्या बिना सबूत दिए शिकायतकर्ता की मौत अभियोजन पक्ष के लिए घातक हो सकती है? पढ़िए सुप्रीम कोर्ट का ऑर्डर
भ्रष्टाचार के मामलों में क्या बिना सबूत दिए शिकायतकर्ता की मौत अभियोजन पक्ष के लिए घातक हो सकती है? पढ़िए सुप्रीम कोर्ट का ऑर्डर

सुप्रीम कोर्ट की 3 न्यायाधीशों की खंडपीठ ने एक बड़ी पीठ को इस सवाल का हवाला दिया है कि क्या शिकायतकर्ता के सबूतों के अभाव में/अवैध परितोषण की मांग के प्रत्यक्ष या प्राथमिक साक्ष्य के अभाव में अभियोजन पक्ष की ओर से दिए गए अन्य सबूतों के आधार पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 7 एवं धारा 13(1)(d),जिसे धारा 13 (2) के साथ पढ़ा जाए, के तहत लोक सेवक के दोषी होने के सम्बन्ध में निष्कर्ष निकालने की अनुमति नहीं है? दरअसल इस मामले में न्यायमूर्ति एन. वी. रमना, न्यायमूर्ति मोहन एम. शांतनगौदर और...

आखिर क्यों एक पूर्व न्यायाधीश नहीं बल्कि किसी पत्रकार को प्रेस काउंसिल का नेतृत्व करना चाहिए
आखिर क्यों एक पूर्व न्यायाधीश नहीं बल्कि किसी पत्रकार को प्रेस काउंसिल का नेतृत्व करना चाहिए

प्रोफेसर एम श्रीधर आचार्युलुजब मेडिकल काउंसिल की अध्यक्षता डॉक्टर करते हैं और बार काउंसिल ऑफ इंडिया की अध्यक्षता पेशेवर वकील करते हैं तो प्रेस काउंसिल का मार्गदर्शन करने के लिए एक पत्रकार को क्यों नहीं चुना जाता है? कानून और तर्क इस बात को समझने में पूरी तरह से विफल है कि आखिर क्यों सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व न्यायाधीश को कामकाजी पत्रकारों के पेशेवर निकाय का प्रमुख होना चाहिए? सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश, मौलिक अधिकार के रूप में वक्तव्य की स्वतंत्रता की उनकी समझ और विवेकपूर्ण/स्वतंत्र...

विशेषज्ञ साक्ष्य को मौलिक साक्ष्य पर प्राथमिकता नहीं दी जानी चाहिए, पढ़िए सुप्रीम कोर्ट का फैसला
विशेषज्ञ साक्ष्य को मौलिक साक्ष्य पर प्राथमिकता नहीं दी जानी चाहिए, पढ़िए सुप्रीम कोर्ट का फैसला

"आमतौर पर एक तथ्य के रूप में केवल विशेषज्ञ सबूत को इसका निर्णायक प्रमाण नहीं माना जाता है।" सर्वोच्च न्यायालय ने दोहराया है कि विशेषज्ञ साक्ष्य को मौलिक साक्ष्य पर प्राथमिकता नहीं दी जानी चाहिए। इस मामले (चेनादी जलपति रेड्डी बनाम बद्दाम प्रताप रेड्डी (मृत)) में पहले प्रतिवादी के विवादित हस्ताक्षर को उसके भाई ने पहले प्रतिवादी के रूप में पहचाना था। हालांकि बचाव गवाह पक्ष के एक अन्य गवाह हैंड राइटिंग विशेषज्ञ ने यह बताया कि पहले प्रतिवादी और विवादित हस्ताक्षर के प्रवेश हस्ताक्षर टैली नहीं हैं...

मोटर वाहन अधिनियम के तहत डेमो कार पंजीकरण करवाना ज़रूरी, पढ़िए हाईकोर्ट का फैसला
मोटर वाहन अधिनियम के तहत डेमो कार पंजीकरण करवाना ज़रूरी, पढ़िए हाईकोर्ट का फैसला

केरल उच्च न्यायालय ने यह माना है कि 'डेमो कार', जो डीलरों द्वारा एक भावी खरीदार को वाहन मॉडल प्रदर्शित करने के लिए रखी जाती हैं, उनको मोटर वाहन अधिनियम के तहत पंजीकरण की आवश्यकता होगी। 'ट्रेड सर्टिफिकेट' का लाभ केवल उन्हीं वाहनों के लिए उपलब्ध है जो ग्राहकों को बिक्री के उद्देश्य से डीलर के कब्जे में हैं, टेस्ट ड्राइव के लिए रखे गए वाहनों को नहीं। यह निर्णय न्यायमूर्ति अनिल नरेंद्रन ने केरल ऑटोमोबाइल डीलर्स एसोसिएशन और राजश्री मोटर्स (मर्सिडीज बेंज के डीलर) द्वारा दायर उस याचिका को खारिज करते...

बलात्कार के अपराध को साबित करने के लिए सेमिनल डिस्चार्ज महत्वपूर्ण नहीं, दिल्ली हाईकोर्ट ने अभियुक्तों की सजा रखी बरक़रार, पढ़ें निर्णय
बलात्कार के अपराध को साबित करने के लिए सेमिनल डिस्चार्ज महत्वपूर्ण नहीं, दिल्ली हाईकोर्ट ने अभियुक्तों की सजा रखी बरक़रार, पढ़ें निर्णय

वर्तमान मामले में एक निचली अदालत ने दो आरोपी को मानसिक रूप से बीमार महिला के साथ बलात्कार करने के लिए, भारतीय दंड संहिता की धारा 324, 366 और 376 (1) और 376 डी के तहत दोषी ठहराया गया था। उन्हें 20 वर्ष सश्रम कारावास की सजा सुनाई गई थी, इसके साथ ही उनपर कुल 26000 रुपये का जुर्माना भी लगाया गया था, यह रकम उन्हें अभियोजन पक्ष (पीड़िता) को मुआवजे के रूप में चुकानी थी। आरोपियों ने अपनी दोषसिद्धि के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में अपील दायर की, अपीलकर्ता अभियुक्त ने यह तर्क दिया कि उन्हें कुछ भ्रम के तहत...

पत्नी द्वारा अपने अधिकारों की रक्षा के लिए अपनाया गया कानूनी तरीका पति पर क्रूरता नहीं कहा जा सकता, पढ़ें सुप्रीम कोर्ट का फैसला
पत्नी द्वारा अपने अधिकारों की रक्षा के लिए अपनाया गया कानूनी तरीका पति पर क्रूरता नहीं कहा जा सकता, पढ़ें सुप्रीम कोर्ट का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि अपने अधिकारों की रक्षा के लिए पत्नी द्वारा अपनाए गए कानूनी तरीकों को पति पर क्रूरता नहीं माना जा सकता है। न्यायमूर्ति आर भानुमति और न्यायमूर्ति ए एस बोपन्ना की पीठ ने यह भी दोहराया कि विवाह का खुद टूटना विवाह विच्छेद की कानूनी मांग करने का आधार नहीं है। अपनी तलाक की याचिका में पति ने आरोप लगाया कि पत्नी ने सीआरपीसी की धारा 107/151 के तहत एक झूठा मामला दर्ज किया था, जिसके परिणामस्वरूप उसे और उसके पिता को गिरफ्तार कर लिया गया। यह भी आरोप लगाया गया था कि पत्नी ने उनके...

पक्षद्रोही गवाह के साक्ष्य का ऐसा हिस्सा, जो विश्वसनीय पाया जाता है, उस पर अदालत विचार कर सकती है, पढ़िए सुप्रीम कोर्ट का फैसला
पक्षद्रोही गवाह के साक्ष्य का ऐसा हिस्सा, जो विश्वसनीय पाया जाता है, उस पर अदालत विचार कर सकती है, पढ़िए सुप्रीम कोर्ट का फैसला

सुप्रीम कोर्ट के एक ताज़ा फैसले में यह स्पष्ट हुआ है कि पक्षद्रोही गवाह (hostile witness) के साक्ष्य का ऐसा हिस्सा, जो विश्वसनीय पाया जाता है, उसपर अदालत द्वारा विचार किया जा सकता है और यह जरुरी नहीं कि उसके पूरे साक्ष्य को त्याग दिया जाए। उच्चतम न्यायालय ने यह देखा कि यदि आरोपी द्वारा धारा 313 CrPC के तहत अपने बयान में अस्पष्ट या गलत स्पष्टीकरण/झूठी व्याख्या दी गयी है तो उसे आरोपी के अपराध को स्थापित करने हेतु, परिस्थितियों की श्रृंखला पूरी करने के लिए एक परिस्थिति के रूप में विचार में नहीं...

पति की गलती से विवाह शून्य हुआ है तो पति भरण पोषण देने को बाध्य, सुप्रीम कोर्ट ने की केरल हाईकोर्ट के फैसले की पुष्टि
पति की गलती से विवाह शून्य हुआ है तो पति भरण पोषण देने को बाध्य, सुप्रीम कोर्ट ने की केरल हाईकोर्ट के फैसले की पुष्टि

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में केरल उच्च न्यायालय के उस फैसले को बरकरार रखा है, जिसमें यह कहा गया था कि जहां शादी को रद्द कर दिया गया हो या पति द्वारा की गई कुछ शरारत या गलती के कारण शादी को शून्य घोषित किया गया हो तो भी पति को CrPC की धारा 125 के तहत पत्नी को भरण-पोषण का भुगतान करना होगा। अदालत ने केरल HC के फैसले को रखा बरकरार न्यायमूर्ति आर. बानुमति और न्यायमूर्ति ए. एस. बोपन्ना की पीठ ने उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ याचिका को खारिज करते हुए पत्नी को भरण-पोषण की पुष्टि करते हुए कहा कि...

यौन उत्पीड़न के आरोपों पर न्यायिक अधिकारी के खिलाफ हाईकोर्ट अनुशासनात्मक कार्रवाई की शुरुआत कर सकती है, पढ़िए सुप्रीम कोर्ट का फैसला
यौन उत्पीड़न के आरोपों पर न्यायिक अधिकारी के खिलाफ हाईकोर्ट अनुशासनात्मक कार्रवाई की शुरुआत कर सकती है, पढ़िए सुप्रीम कोर्ट का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को दिल्ली उच्चतर न्यायिक सेवा के एक न्यायिक अधिकारी की तरफ से दायर याचिका को खारिज कर दिया। न्यायिक अधिकारी के खिलाफ यौन उत्पीड़न के मामले में अनुशासनात्मक कार्रवाई चल रही है। एक कनिष्ठ न्यायिक सहायक ने न्यायिक अधिकारी के खिलाफ शिकायत दायर करते हुए उन पर कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न करने का आरोप लगाया था। जब मामला फुल कोर्ट के पास पहुंचा तो उसके खिलाफ लंबित अनुशासनात्मक कार्यवाही पर विचार करते हुए न्यायिक अधिकारी को तुरंत प्रभाव से सस्पेंड कर दिया गया। न्यायिक अधिकारी ने...

बलात्कार केस : शादी करने के वादे से सहमतितथ्यों की ग़लतफ़हमी की वजह से कब निरस्त हो जाएगी, जानिए सुप्रीम कोर्ट का नज़रिया
बलात्कार केस : शादी करने के वादे से 'सहमति'तथ्यों की ग़लतफ़हमी की वजह से कब निरस्त हो जाएगी, जानिए सुप्रीम कोर्ट का नज़रिया

बुधवार को दिए गए एक फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने IPC की धारा 375 (बलात्कार) के तहत किसी महिला की 'सहमति' की व्याख्या को लेकर क़ानूनी रुख को स्पष्ट किया। यह ऐसे मामलों से जुड़ा है जिसमें आरोप यह है कि सहमति 'तथ्यों के बारे में ग़लतफ़हमी'(शादी करने के वादे) पर आधारित है। न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ और इंदिरा बनर्जी की पीठ ने प्रमोद सूर्यभान पवार बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में अपने फ़ैसले में कहा, "…यह साबित करने के लिए कि 'सहमति' कहीं शादी के वादे से उपजे तथ्यों के बारे में ग़लतफ़हमी पर...

गुजारे भत्ते के मामलों की सुनवाई पर अदालतों  को दिशा-निर्देश जारी करने का अधिकार न तो संघ के पास है ओर न ही राज्य के पास-बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला
गुजारे भत्ते के मामलों की सुनवाई पर अदालतों को दिशा-निर्देश जारी करने का अधिकार न तो संघ के पास है ओर न ही राज्य के पास-बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला

बॉम्बे हाईकोर्ट ने उस याचिका को खारिज कर दिया है जो एक व्यक्ति ने सीआरपीसी की धारा 125 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुए दायर की थी। अदालत ने माना है कि न तो केंद्र और न ही राज्य के पास यह अधिकार है कि अदालतों के न्यायिक विवेक को निर्देशित करने के लिए दिशा-निर्देश जारी कर सके। अदालत उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें मांग की गई थी कि धारा 125 के तहत दिए जाने वाले गुजारे भत्ते के लिए केंद्र या राज्य को दिशा-निर्देश जारी करने चाहिए। जस्टिस अकिल कुरैशी और जस्टिस एस.जे कथावाला की दो...

मद्रास हाईकोर्ट ने कहा, इस मामले ने अदालत की अंतरात्मा को झकझोर दिया, पति के खिलाफ बेटी पर यौन हमले के पत्नी के झूठे आरोप ख़ारिज, पढ़िए फैसला
मद्रास हाईकोर्ट ने कहा, इस मामले ने अदालत की अंतरात्मा को झकझोर दिया, पति के खिलाफ बेटी पर यौन हमले के पत्नी के झूठे आरोप ख़ारिज, पढ़िए फैसला

मद्रास हाईकोर्ट ने पोक्सो अधिनियम, 2012 की धारा 6 के अधीन अपने पति के ख़िलाफ़ पत्नी की शिकायत पर कड़ा रुख़ अपनाया है। मद्रास हाईकोर्ट ने कहा "ऐसे कई मौक़े आए जब अदालत का ध्यान इसी तरह की घटनाओं की ओर आकृष्ट किया गया, जिसमें पति पर अपनी बेटी के ख़िलाफ़ पोक्सो अधिनियम के तहत इस तरह की शिकायतें दर्ज कराई गई थीं और इस अदालत को बताया गया कि इस तरह की ओछी हड़कतें फ़ैमिली कोर्ट में भी अपनाई गई हैं ताकि पति से इच्छित बातें मनवाई जा सकें। यह अदालत इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं है कि इस तरह की...

मुकदमेबाज़ अवैधता को बहुप्रचारित करने के औज़ार के रूप में अदालत का प्रयोग नहीं कर सकते, पढ़िए सुप्रीम कोर्ट का ऑर्डर
मुकदमेबाज़ अवैधता को बहुप्रचारित करने के औज़ार के रूप में अदालत का प्रयोग नहीं कर सकते, पढ़िए सुप्रीम कोर्ट का ऑर्डर

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि कोई मुकदमेबाज़ अदालत का प्रयोग ग़ैर क़ानूनी बातों को बहुप्रचारित करने के औज़ार के रूप में नहीं कर सकता। शीर्ष अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति को जिस पर दायित्व है, उसे अदालत के अंतरिम आदेश का लाभ लेने की इजाज़त नहीं दी जा सकती। सुप्रीम कोर्ट गोवा स्टेट कोआपरेटिव बैंक लिमिटेड बनाम कृष्ण नाथ ए (दिवंगत) मामले पर ग़ौर कर रहा था। शीर्ष अदालत के समक्ष मुद्दा यह था कि महाराष्ट्र कोआपरेटिव सोसाइटिज अधिनियम, 1960 की धारा 109 के प्रावधानों के तहत विघटन की निर्धारित अवधि के बीत...

महाराष्ट्र की बाढ़ को मानव-कृत आपदा घोषित किया जाए, पूर्व सांसद ने बॉम्बे हाईकोर्ट को लिखा पत्र, पढ़िए यह पत्र
महाराष्ट्र की बाढ़ को मानव-कृत आपदा घोषित किया जाए, पूर्व सांसद ने बॉम्बे हाईकोर्ट को लिखा पत्र, पढ़िए यह पत्र

बॉम्बे हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश प्रदीप नंदराजोग को संबोधित एक पत्र में पूर्व सांसद नाना पटोले और सामाजिक कार्यकर्ता डॉ.संजय लखे पाटिल ने महाराष्ट्र के कोल्हापुर, सतारा और सांगली जिलों में भारी बाढ़ और जलभराव की घटना को आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 की धारा 2 डी के तहत, मानव-कृत आपदा (man-made disaster) घोषित करने की मांग की है। इसके अलावा उक्त पत्र में यह मांग की गयी है कि राज्य सरकार को यह निर्देश दिए जाएं कि वो बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में लोगों के लिए उठाए गए वास्तविक राहत और बचाव उपायों पर...

RTE-निजी स्कूलों में प्रवेश पर रोक लगाने के कर्नाटक हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने जारी किया नोटिस, पढ़िए याचिका
RTE-निजी स्कूलों में प्रवेश पर रोक लगाने के कर्नाटक हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने जारी किया नोटिस, पढ़िए याचिका

सुप्रीम कोर्ट ने उस याचिका पर नोटिस जारी कर दिया है, जो कर्नाटक हाईकोर्ट के 31 मई को दिए गए एक फैसले के खिलाफ दायर की गई है। कर्नाटक हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि अगर किसी छात्र/छात्रा के इलाके के आस-पास कोई सरकारी या सहायता प्राप्त स्कूल स्थित है तो छात्र/छात्रा को शिक्षा के अधिकार यानि राईट टू एजुकेशन के तहत किसी निजी स्कूल में दाखिला पाने का अधिकार नहीं है। हाईकोर्ट ने अपना यह फैसला उस याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया था, जिसमें कर्नाटक सरकार द्वारा किए गए संशोधनों को चुनौती दी गई...

एडहॉक जिला जज के तौर पर अपनी सेवाएं दे चुके जज अपनी वरिष्ठता का दावा प्रारंभिक नियुक्ति की तारीख से नहीं कर सकते, पढ़िए फैसला
एडहॉक जिला जज के तौर पर अपनी सेवाएं दे चुके जज अपनी वरिष्ठता का दावा प्रारंभिक नियुक्ति की तारीख से नहीं कर सकते, पढ़िए फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने यह साफ किया है कि जिला जज, जो पहले एडहॉक जिला जज के तौर पर अपनी सेवाएं दे चुके हैं, वह अपनी वरिष्ठता का दावा उस प्रारंभिक नियुक्ति की तारीख से नहीं कर सकते है, जब उनको बतौर एडहॉक जिला जज नियुक्त किया गया था। पहले फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट और उसके बाद नियमित जिला जज के पदों पर हुई थी नियुक्ति कुम सी. यामिनी व अन्य को फास्ट ट्रैक कोर्ट में वर्ष 2003 में एडहॉक जिला जज के तौर पर नियुक्त किया गया था। बाद में उनका चयन हो गया और सरकार ने उनको नियमित जिला जज के पदों पर नियुक्त कर दिया। ...

धारा 197 CrPC: सार्वजनिक क्षेत्र के निगमों के कर्मचारी लोक सेवक के रूप में संरक्षण की पूर्व स्वीकृति के हक़दार नहीं, पढ़िए सुप्रीम कोर्ट का फैसला
धारा 197 CrPC: सार्वजनिक क्षेत्र के निगमों के कर्मचारी 'लोक सेवक' के रूप में संरक्षण की पूर्व स्वीकृति के हक़दार नहीं, पढ़िए सुप्रीम कोर्ट का फैसला

"यह तथ्य कि, निगम द्वारा हटाए या पदच्युत किये जाने के मामले में उनकी पूर्व सेवा को, पेंशन के प्रयोजनों हेतु ध्यान में लिया जा सकता है या उनके खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई करने से पहले, संबंधित मंत्रालय की/ प्रशासनिक स्वीकृति औपचारिक रूप से आवश्यक हो सकती है, उन्हें Cr.PC के तहत 'लोक सेवक' का दर्जा हासिल नहीं होगा।" सर्वोच्च न्यायालय ने यह दोहराया है कि सार्वजनिक क्षेत्र के निगमों के वे कर्मचारी दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 197 के तहत 'लोक सेवक' के रूप में संरक्षण के हकदार नहीं हैं। दरअसल...