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एडहॉक जिला जज के तौर पर अपनी सेवाएं दे चुके जज अपनी वरिष्ठता का दावा प्रारंभिक नियुक्ति की तारीख से नहीं कर सकते, पढ़िए फैसला

LiveLaw News Network
20 Aug 2019 11:37 AM GMT
एडहॉक जिला जज के तौर पर अपनी सेवाएं दे चुके जज अपनी वरिष्ठता का दावा प्रारंभिक नियुक्ति की तारीख से नहीं कर सकते, पढ़िए फैसला
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सुप्रीम कोर्ट ने यह साफ किया है कि जिला जज, जो पहले एडहॉक जिला जज के तौर पर अपनी सेवाएं दे चुके हैं, वह अपनी वरिष्ठता का दावा उस प्रारंभिक नियुक्ति की तारीख से नहीं कर सकते है, जब उनको बतौर एडहॉक जिला जज नियुक्त किया गया था।

पहले फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट और उसके बाद नियमित जिला जज के पदों पर हुई थी नियुक्ति कुम सी. यामिनी व अन्य को फास्ट ट्रैक कोर्ट में वर्ष 2003 में एडहॉक जिला जज के तौर पर नियुक्त किया गया था। बाद में उनका चयन हो गया और सरकार ने उनको नियमित जिला जज के पदों पर नियुक्त कर दिया।

हाईकोर्ट ने इन सभी की उस मांग को खारिज कर दिया था, जिसमें इन्होंने यह दावा किया था कि इनकी वरिष्ठता का आकंलन उनकी शुरूआती/प्रथम नियुक्ति से किया जाए, जिसमें इनको बतौर एडहॉक जिला जज नियुक्त किया गया था। हाईकोर्ट के इसी आदेश को इन्होंने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।

वरिष्ठता का दावा प्रारंभिक नियुक्ति से करने का कोई कारण मौजूद नहीं

जस्टिस एस. ए. बोबड़े, जस्टिस आर. सुभाष रेड्डी और जस्टिस बी. आर गवई की पीठ ने यह कहा कि इन्होंने यह दावा किया है कि इनकी बतौर एडहॉक जिला जज की नियुक्ति भी उसी प्रक्रिया का पालन करते हुए की गई थी, जिसका पालन नियमित कैडर में स्वीकृत पदों पर नियुक्ति के लिए किया जाता है। परंतु इस तर्क के आधार पर उनके इस अनुरोध को स्वीकार नहीं किया जा सकता है कि जिला जज के स्थायी कैडर में वरिष्ठता की गणना उनके बतौर एडहॉक जिला जज की प्रारंभिक नियुक्ति की तारीख से की जाए।

सिर्फ इस आधार पर कि उनकी नियुक्ति उसी प्रक्रिया का पालन करते हुए की गई थी, जो प्रक्रिया नियमित पदों की नियुक्ति में अपनाई जाती है, उनके उस दावे को स्वीकार नहीं किया जा सकता है, जिसमें उन्होंने कहा है कि उनको वरिष्ठता, उनकी प्रारंभिक नियुक्ति से दी जाए। पहले भी हाईकोर्ट द्वारा उनकी इस मांग को खारिज किया जा चुका है, जिसमें उन्होंने नियमितीकरण का दावा किया था और वर्ष 2004 में जिला जज के खाली नियमित पदों को भरने के लिए जारी अधिसूचना को चुनौती दी थी। जिस पर सुप्रीम कोर्ट भी अपनी मोहर लगा चुका है और उसे ठीक मान चुका है। ऐसे में हमारा मानना है कि वादियों के पास ऐसा कोई आधार नहीं है, जिसके चलते वह अपनी वरिष्ठता का दावा प्रारंभिक नियुक्ति से कर रहे हैं।

जब वर्ष 2013 में हाईकोर्ट द्वारा जारी अधिसूचना के जवाब में उन्होंने आवेदन कर दिया था, अब उस नियुक्ति का लाभ उठाने के बाद अपीलकर्ताओं के पास किसी भी हाल में यह मौका नहीं है कि वे उस आदेश की उन शर्तो पर सवाल उठाए जो नियमों के अनुरूप लगाई गई हैं। इस बात पर कोई विवाद नहीं है कि अपीलकर्ताओं को सिर्फ फास्ट ट्रैक कोर्ट में बतौर एडहॉक जिला जज 'नियुक्त किया गया था। शुरुआत में जब अपीलकर्ता को किसी ऐसे पद या पद की श्रेणी में नियुक्त नहीं किया गया था जो ऐसी श्रेणी में कैडर की संख्या के अंतर्गत आता हो, ऐसे में अपीलकर्ता उन व्यक्तियों के सापेक्ष अपनी वरिष्ठता का दावा नहीं कर सकती है, जिसकी नियुक्ति उस श्रेणी के नियमित पद पर हुई हो, जो कैडर की संख्या का हिस्सा था।

कोर्ट ने यह भी कहा कि वरिष्ठता का दावा कई तत्वों पर निर्भर करता है, जिनमें नियुक्ति की प्रकृति, वह नियम जिनके तहत नियुक्ति की गई हो और कब नियुक्ति की गई थी, क्या यह नियुक्ति कैडर पद पर थी या नही, शामिल है। जब अपीलकर्ताओं को ए. पी. न्यायिक सेवा में किसी नियमित पद पर नियुक्त नहीं किया गया था तो ऐसे में अपीलकर्ता फास्ट ट्रैक कोर्ट में बतौर एडहॉक जिला जज के तौर पर की गई अपनी नियुक्ति के आधार पर वरिष्ठता का दावा नहीं कर सकते हैं।

हालांकि पीठ ने यह आदेश दिया है कि इन न्यायधीशों और उन सभी को जो इनके समान सेवा दे चुके हैं, को पेंशन व अन्य सेवानिवृत्त के लाभ देने के उद्देश्य से फास्ट ट्रैक कोर्ट में बतौर जजों के रूप में दी गई इनकी सेवाओं को ध्यान में लिया जाए।



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