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इलाहाबाद हाईकार्ट ने वैवाहिक मामलों को सौहार्दपूर्ण निपटाने पर दिया ज़ोर, पढ़िए फैसला

LiveLaw News Network
19 Aug 2019 6:28 AM GMT
इलाहाबाद हाईकार्ट ने वैवाहिक मामलों को सौहार्दपूर्ण निपटाने पर दिया ज़ोर, पढ़िए फैसला
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इस बात पर गौर करते हुए कि जब एक वैवाहिक विवाद सुलझने/समझौते के मोड़ पर आता है तो तो दोषी ठहराए जाने की संभावना बेहद कम होती है, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यह कहा है कि ऐसे मामलों में पीड़ित व आरोपी को निपटान की शर्तो के तहत समझौता/अपराध का शमन (compounding the offence) करने की अनुमति दी जानी चाहिए।

"आपराधिक कानून का मुख्य उद्देश्य यह है कि अपराधी को इसके कुछ परिणाम जरूर मिलें, जिसके लिए उसे या तो सजा भुगतनी पड़ सकती है या पीड़ित को मुआवजा देना पड़ सकता है। लेकिन साथ ही साथ कानून यह भी प्रावधान करता है कि जरूरी नहीं है कि हर आपराधिक मामले में आवश्यक रूप से सजा ही दी जाए, खासतौर पर जिन मामलों में पीड़ित सबकुछ भूलकर समझौता करना चाहता/चाहती है।"

" अगर एक वैवाहिक विवाद के मामले में आरोपी व पीड़ित आगे बढ़ना चाह रहे हैं तो उनके बीच में हुए समझौते की शर्तो (वैवाहिक विवाद में पक्षकारों के बीच हुए निपटारे के तहत) के तहत उनको अपराध का शमन करने की अनुमति दी जा सकती है। पक्षकारों के वैवाहिक विवाद में यदि समझौता होता है तो दोषी ठहराए जाने की संभावना बेहद कम होती है और इसलिए याचिकाकर्ता के खिलाफ आपराधिक अभियोग या केस चलाने की अनुमति देने में कोई लाभदायक उद्देश्य पूरा होता हुआ नजर नहीं आता है," जस्टिस संजय कुमार सिंह ने कहा।

जस्टिस सिंह ने यह सभी टिप्पणी एक मामले में याचिकाकर्ता पति व उसके भाई की तरफ से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए की हैं। दोनों याचिकाकर्ताओं ने उनके खिलाफ वर्ष 2017 में दर्ज एक मामले में दायर आरोप पत्र को रद्द करने की मांग की थी। इनके खिलाफ आईपीसी की धारा 498ए, 323, 504, 506, 406 और दहेज निषेध अधिनियम की धारा 3/4 के तहत केस दर्ज किया गया था और इसी मामले में इलाहाबाद के 18वें अतिरिक्त मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी की कोर्ट में आरोप पत्र दायर किया गया था।

यह था मामला :

दरअसल याचिकाकर्ता नंबर-1 की शादी वर्ष 2013 में दूसरे पक्षकार यानि प्रतिवादी से हुई थी। इनकी शादी सफल नहीं रही और उसकी पत्नी ने 22 जनवरी 2017 को उसके व उसके भाई (दोनों याचिकाकर्ता), उनके पिता व उनकी बहन के खिलाफ FIR दर्ज करा दी, जिसमें उनपर मारपीट करने, प्रताड़ित करने, दहेज मांगने सहित कई आरोप लगाए गए। इस मामले में आरोप पत्र दायर किया गया और दंडाधिकारी कोर्ट ने उस पर संज्ञान लेने के बाद वादियों को समन जारी कर दिया।

जुलाई 2019 में जब मामले में सुनवाई हुई तो दोनों पक्षों की तरफ से कोर्ट को यह बताया गया कि वे मामले का निपटारा करने के लिए तैयार हैं। जिसके बाद कोर्ट ने वादियों को मामले का सौहार्दपूर्ण निपटारा करने के लिए रुपयों का प्रबंध करने का समय दे दिया।

दोनों पक्षकार हुए समझौता करने को राजी

जिसके बाद दोनों पक्षकारों ने एक संयुक्त हलफनामा कोर्ट में दायर करते हुए बताया कि उनके बीच मामले का निपटारा हो चुका है, जिसमें याचिकाकर्ता नंबर 1 की पूर्व पत्नी 22 लाख रुपए लेने को राजी हो गई है, जिसके बदले वह अपने पूर्व पति व उसके अन्य परिजनों के खिलाफ दर्ज करवाए गए अपने सभी मुकदमे वापस ले लेगी। दोनों पक्षकारों ने यह भी बताया कि वह अब वे कोई नया केस एक-दूसरे के खिलाफ दायर नहीं करेंगे।

वहीं याचिकाकर्ता नंबर 1 की पूर्व पत्नी ने कोर्ट को यह बताया कि यदि वादियों के खिलाफ लंबित आपराधिक कार्यवाही को खत्म कर दिया जाए तो उसे इस बात से कोई आपत्ति नहीं है।

जस्टिस संजय कुमार सिंह का इस मामले में दृष्टिकोण

इस मामले में दायर याचिकाओं का निपटारा करते हुए जस्टिस सिंह ने जी.वी राॅव बनाम एल. एच. वी प्रसाद व अन्य के मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा की गई टिप्पणियों का भी हवाला दिया। इस मामले में कोर्ट ने वैवाहिक मामलों के निपटारे में अपनाए जाने वाले दृष्टिकोण को तय किया था और यह कहा था कि "शादी एक पवित्र बंधन है और इसका मुख्य उद्देश्य नवदंपत्ति को जीवन में बसने व शांति से रहने के लिए सक्षम बनाना है। परंतु छोटे-छोटे वैवाहिक झगड़े बढ़ जाते हैं, जो अक्सर गंभीर हो जाते हैं और परिणामस्वरूप जघन्य अपराध हो जाते हैं, जिनमें घर के बड़े भी शामिल हो जाते हैं।

इसके परिणामस्वरूप, जो लोग बढ़ते वैवाहिक झगड़े को खत्म करने के लिए मध्यस्थ का काम कर सकते थे, वे असहाय हो जाते हैं क्योंकि वह भी अपराधिक केस में आरोपी बन चुके होते हैं और भी बहुत सारे ऐसे कारण हैं, जिनका उल्लेख यहां किया जाना जरूरी नहीं है, परंतु जिनके चलते वैवाहिक मामलों में मुक़दमेबाजी को बढ़ावा नहीं देना चाहिए और पक्षकारों को अपना मामला आपसी सौहार्द से निपटा लेने चाहिए बजाय कि इसके कि वे कोर्ट में केस लड़ें, जिनमें निर्णय आने में सालों लग जाते हैं, जिसके चलते पक्षकार अपने 'युवा' दिन अलग-अलग कोर्ट में अपने केस के लिए चक्कर काटने में निकाल देते है।"

पीठ ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा मार्च 2019 में दिए गए एक फैसले का भी हवाला दिया, जिसमें अदालत ने आरोपी व शिकायकर्ता के बीच विवाद को निपटाने के लिए हाईकोर्ट को सीआरपीसी की धारा 482 के तहत अपने क्षेत्राधिकार का प्रयोग करने के लिए दिशा-निर्देश दिए थे।

इस मामले में कोर्ट द्वारा की गई टिप्पणियों में से एक टिप्पणी निम्नलिखित थी-

"गैर-शमनीय (non-compoundable) अपराध की कार्यवाही को समाप्त करने के लिए संहिता की धारा 482 के तहत प्रदान की गई शक्ति का उपयोग संहिता की धारा 320 के तहत, प्रमुखता से दीवानी प्रकार के मामलों में किया जा सकता है। विशेषतौर पर वाणिज्यिक लेन-देन से उत्पन्न होने वाले या वैवाहिक विवाद या पारिवारिक विवाद वाले मामलों में, जिनमें पक्षकार अपने पूरे मामले को खुद से ही सुलझा लेते हैं।''

इन सभी केस व इनकी परिस्थितियों को देखते हुए जस्टिस सिंह ने मामले में दायर याचिका को स्वीकार कर लिया और दंपत्ति के बीच के चल रहे सभी केस को खत्म करने का आदेश दे दिया।



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