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धारा 197 CrPC: सार्वजनिक क्षेत्र के निगमों के कर्मचारी 'लोक सेवक' के रूप में संरक्षण की पूर्व स्वीकृति के हक़दार नहीं, पढ़िए सुप्रीम कोर्ट का फैसला

LiveLaw News Network
20 Aug 2019 6:29 AM GMT
धारा 197 CrPC: सार्वजनिक क्षेत्र के निगमों के कर्मचारी लोक सेवक के रूप में संरक्षण की पूर्व स्वीकृति के हक़दार नहीं, पढ़िए सुप्रीम कोर्ट का फैसला
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"यह तथ्य कि, निगम द्वारा हटाए या पदच्युत किये जाने के मामले में उनकी पूर्व सेवा को, पेंशन के प्रयोजनों हेतु ध्यान में लिया जा सकता है या उनके खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई करने से पहले, संबंधित मंत्रालय की/ प्रशासनिक स्वीकृति औपचारिक रूप से आवश्यक हो सकती है, उन्हें Cr.PC के तहत 'लोक सेवक' का दर्जा हासिल नहीं होगा।"

सर्वोच्च न्यायालय ने यह दोहराया है कि सार्वजनिक क्षेत्र के निगमों के वे कर्मचारी दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 197 के तहत 'लोक सेवक' के रूप में संरक्षण के हकदार नहीं हैं।

दरअसल न्यायमूर्ति नवीन सिन्हा और न्यायमूर्ति ए. एस. बोपन्ना की खंडपीठ, आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 197 के तहत पूर्व स्वीकृति (previous sanction) के अभाव में उनके अभियोजन को चुनौती को खारिज करने के एक निर्णय के खिलाफ दाखिल एक अपील पर विचार कर रही थी।

इस मामले [बीएसएनएल बनाम प्रमोद वी. सावंत] में शीर्ष अदालत के समक्ष दी गयी दलील यह थी कि चूंकि उन्हें भारत के राष्ट्रपति द्वारा भारतीय दूरसंचार सेवा में नियुक्त किया गया था, इसलिए केवल राष्ट्रपति के आदेशों द्वारा ही वे हटाए जा सकते थे। अदालत के समक्ष यह आग्रह किया गया था कि यह तथ्य कि उन्हें निगम में प्रतिनियुक्ति (deputation) पर भेजा गया है, धारा 197, सीआरपी के तहत उनके अभियोजन से पहले अनिवार्य मंजूरी की आवश्यकता हेतु अप्रासंगिक या महत्वहीन है। दूसरे शब्दों में उनका यह कहना था कि वो भले ही अपीलकर्ता निगम में प्रतिनियुक्ति पर भेजे गए हों परन्तु धारा 197 सीआरपीसी के तहत उनके खिलाफ अभियोजन लाने हेतु पूर्व मंजूरी की आवश्यकता, उनके मामले में भी लागू होगी। इन दलीलों का सामना करते हुए, प्रतिवादी ने यह तर्क दिया कि उनमें से 2 ने अवशोषण (absorption) का विकल्प चुना था और इस तरह वे 01.10.2000 से अपीलकर्ता निगम के कर्मचारी हो गए और तत्काल प्रभाव से वे केंद्रीय सिविल सेवा क्लास 1 के अंतर्गत सरकारी कर्मचारी नहीं रह गए और एक अन्य अपीलार्थी, इस दौरान प्रतिनियुक्ति निगम से सेवानिवृत्त हो गया है, लेकिन उसकी स्थिति स्पष्ट नहीं है।

पीठ ने यह देखा कि, 2 अपीलकर्ताओं के लिए धारा 197, Cr.P.C के तहत अभियोजन के लिए मंजूरी देने का सवाल (इस आधार पर कि वे 'लोक सेवक' हैं) उपलब्ध नहीं है, क्योंकि शिकायत के पूर्व, अपीलकर्ता निगम में वे 01.10.2000 को अपने अवशोषण (absorbtion) के बाद, भारतीय दूरसंचार सेवा के कर्मचारी नहीं रह गए थे। बेंच ने कहा:

"यह तथ्य कि, निगम द्वारा हटाए (remove) या पदच्युत (dismiss) किये जाने के मामले में उनकी पूर्व सेवा को, पेंशन के प्रयोजनों हेतु ध्यान में लिया जा सकता है या उनके खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई करने से पहले, संबंधित मंत्रालय की/ प्रशासनिक स्वीकृति औपचारिक रूप से आवश्यक हो सकती है, उन्हें Cr.PC के तहत 'लोक सेवक' का दर्जा हासिल नहीं होगा।"

"इसलिए हमें यह विचार करने की आवश्यकता है कि क्या सीआरपीसी की धारा 197 के तहत पूर्व मंजूरी, एक 'लोक सेवक' के रूप में उनकी स्थिति के संबंध में एक शर्त थी। यह सवाल कोई नया नहीं है (no more res integra) और यह उचित रूप से तय है कि सार्वजनिक क्षेत्र के निगमों के कर्मचारी, 'लोक सेवक' के रूप में धारा 197 Cr.P.C के तहत संरक्षण के हकदार नहीं हैं।"

पीठ ने आगे कहा कि अपीलकर्ता नंबर 2 की स्थिति के संबंध में इस स्तर पर रिकॉर्ड पर पर्याप्त सबूत उपलब्ध नहीं हैं जिससे यह कहा जा सके कि धारा 197 सीआरपीसी के तहत उसे संरक्षण उपलब्ध होगा। खंडपीठ ने आगे कहा कि इन मामलों को मजिस्ट्रेट द्वारा उन साक्ष्यों के आधार पर देखा जा सकता है, जिन्हें मुकदमे की सुनवाई के दौरान उनके समक्ष रखा जाता है। उनकी अपील को खारिज करते हुए, पीठ ने देखा:

"इसलिए, यह अभिनिर्णित किया जाता है कि अपीलकर्ताओं नंबर 3 और 4 के संबंध में उन्हें 'लोक सेवक' मानते हुए धारा 197, Cr.PC के तहत पूर्व मंजूरी का प्रश्न, अपीलकर्ता निगम में उनके अवशोषण के कारण उत्पन्न नहीं होता है। अपीलार्थी नंबर 2 के मामले में, प्रासंगिक स्थिति के समय अपीलकर्ता निगम में प्रतिनियुक्ति पर उसकी स्थिति के बारे में विचार करते हुए और आवश्यक साक्ष्य के अभाव में, मुकदमे के दौरान अपीलकर्ता निगम में उसकी स्थिति के विषय में अस्पष्टता को देखते हुए, हम इस प्रश्न को ट्रायल के दौरान विचार के लिए खुला छोड़ते हैं जब उचित साक्ष्य उपलब्ध हो जाएं।"



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