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गुजारे भत्ते के मामलों की सुनवाई पर अदालतों को दिशा-निर्देश जारी करने का अधिकार न तो संघ के पास है ओर न ही राज्य के पास-बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला

LiveLaw News Network
22 Aug 2019 8:58 AM GMT
गुजारे भत्ते के मामलों की सुनवाई पर अदालतों  को दिशा-निर्देश जारी करने का अधिकार न तो संघ के पास है ओर न ही राज्य के पास-बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला
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बॉम्बे हाईकोर्ट ने उस याचिका को खारिज कर दिया है जो एक व्यक्ति ने सीआरपीसी की धारा 125 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुए दायर की थी। अदालत ने माना है कि न तो केंद्र और न ही राज्य के पास यह अधिकार है कि अदालतों के न्यायिक विवेक को निर्देशित करने के लिए दिशा-निर्देश जारी कर सके।

अदालत उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें मांग की गई थी कि धारा 125 के तहत दिए जाने वाले गुजारे भत्ते के लिए केंद्र या राज्य को दिशा-निर्देश जारी करने चाहिए।

जस्टिस अकिल कुरैशी और जस्टिस एस.जे कथावाला की दो सदस्यीय पीठ इस मामले में मोहम्मद हुसैन पाटिल नामक व्यक्ति की तरफ से दायर रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी। उसने सीआरपीसी की धारा 125 के प्रावधनों को चुनौती दी थी। याचिकाकर्ता का कहना था कि इस धारा के प्रावधान आदमी व औरत में भेदभाव करते हैं, जो संविधान के अनुच्छेद 14 के खिलाफ है।

क्या था मामला

याचिकाकर्ता और उसकी पत्नी का विवाह 25 दिसम्बर 2011 को इस्लामिक रीति-रिवाज के अनुसार हुआ था। शादी के कुछ महीने बाद ही उनके बीच विवाद शुरू हो गए। कुछ समय बाद उसकी पत्नी निलोफर ने 22 जुलाई 2014 को सोलापुर की फैमिली कोर्ट के समक्ष सीआरपीसी की धारा 125 के तहत अर्जी दायर कर दी। उसने मांग की थी कि उसके पति से 25 हजार रुपए गुजारा भत्ता उसे दिया जाए और 25 हजार रुपए उसके बेटे के लिए।

इसके अलावा उसने घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम के तहत सोलापुर के न्यायिक दंडाधिकारी,प्रथम श्रेणी की अदालत में दो अलग केस भी दायर कर दिए। एक मई 2013 को सोलापुर के विजापुर नईका पुलिस स्टेशन में भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए के तहत प्राथमिकी भी दर्ज करवा दी गई।

फैमिली कोर्ट ने 24 फरवरी 2017 को अपने आदेश में पति को निर्देश दिया कि वह तीस हजार रुपए अपनी पत्नी व दस हजार रुपए अपने बेटे को गुजारे भत्ते के तौर पर दे। इस आदेश के खिलाफ उसने हाईकोर्ट में पुनविचार याचिका दायर की,जिसे 26 जुलाई 2017 को हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया। कोर्ट ने पाया कि फैमिली कोर्ट ने याचिकाकर्ता की आय का एक तिहाई हिस्सा उसकी पत्नी व बेटे को गुजारे भत्ते के तौरपर देने के लिए कहा है। साथ ही यह भी पाया कि उसकी पत्नी बेरोजगार है, जिसके बाद निम्निलिखित प्रार्थनाओं के साथ यह याचिका दायर की गई-

ए-याचिकाकर्ता ने सीआरपीसी की धारा 125 के संवैधानिक प्रावधान या नियमों को चुनौती दी।

बी- याचिकाकर्ता ने मांग की है कि केंद्र सरकार या महाराष्ट्र सरकार को निर्देश दिए जाए कि वह दिशा-निर्देश बनाए,जिनका पालन कोर्ट विभिन्न

वैधानिक प्रावधानों के तहत गुजारा भत्ता देते हुए करे, जिनमें सीआरपीसी की धारा125, हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 24 और डीवी एक्ट की धारा 12 भी शामिल है।

सी-कोर्ट से आग्रह किया कि वह गुजारा भत्ता देने के मामलों के लिए दिशा-निर्देश तय करे।

अदालत का फैसला

वकील सुभाष झा इस मामले में याचिकाकर्ता की तरफ से पेश हुए थे। उन्होंने दलील दी कि सीआरपीसी की धारा 125 भेदभाव करने वाली है और भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14,15,20 व 21 का उल्लंघन करती है। उन्होंने यह भी दलील दी कि हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 24 के तहत यह अधिकार दिया गया है कि चाहे पति हो या पत्नी,दोनों ही गुजारा भत्ता मांग सकते है और इसमें उनके बीच लिंग के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाता है। सीआरपीसी की धारा 125 के तहत इस समानता को खत्म कर दिया गया है और इसके तहत सिर्फ पत्नी ही गुजारा भत्ता मांग सकती है। ऐसे में धारा 125 उस समानता का उल्लंघन है,जो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत दी गई है। इसलिए गुजारा भत्ता दिए जाने के लिए दिशा-निर्देश तय किए जाने चाहिए।

इस मामले में कोर्ट ने कहा कि-

" हमने पाया है कि याचिकाकर्ता ने किसी विशेष आदेश को चुनौती नहीं दी है, जो उसके खिलाफ जा रहा है। यह तीनों प्रार्थनाएं बिना किसी परिणामी राहत के अमूर्त प्रकृति की है, जो याचिकाकर्ता के खिलाफ है या उसे अपनी धारा में बहा कर ले जा सकती है। याचिकाकर्ता ने केंद्र के विधान के प्रावधानों को चुनौती दी है और दिशा-निर्देश जारी करने की मांग की है, जबकि उसने किसी ऐसे आदेश को चुनौती नहीं दी,जो उसके खिलाफ है। इसलिए इन मांगों पर विचार नहीं किया जा सकता है।''

कोर्ट ने सीआरपीसी धारा 125 के प्रावधानों को देखने के बाद कहा कि-

"पहली बात ये है कि इस प्रावधान को एक विशेष श्रेणी के व्यक्तियों को को गुजारा भत्ता देने के लिए बनाया गया है। दूसरा तथ्य यह है कि गुजारा भत्ता तभी दिया जा सकता है,जब वह व्यक्ति अपने आप की गुजर-बसर करने में सक्षम न हो। इसलिए विधान में पत्नी,नाबालिग बच्चे,बालिग बच्चे जो अपाहिज हो या मानसिक रूप से बीमार हो या किसी चोट के कारण अपनी गुजर बसर करने में सक्षम न हो और एक व्यक्ति के माता-पिता,सबको गुजारे भत्ते के लिए एक साथ एकत्रित कर दिया गया है।''

इसके अलावा कोर्ट ने सीआरपीसी की धारा 125 के संबंध में कानून तय करने वाले सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का भी निरीक्षण किया-

"चतुरभुज बनाम सिताबाई मामले में कहा गया है कि गुजारा भत्ता की कार्यवाही का उद्देश्य एक व्यक्ति को उसके द्वारा भूतकाल में बरती गई लापरवाही के लिए दंड देना नहीं है बल्कि उन व्यक्तियों पर दबाव ड़ालना है,जो उनको सहायता दे सकते है, जो व्यक्ति खुद का रख-रखाव करने में सक्षम नहीं है और नैतिक तौर पर भी वह सहायता का दावा कर सकते है।"

शबाना बानो बनाम इमरान खान, इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि धारा 125 के प्रावधान उन तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं पर भी लागू होते है,जब तक वह दोबारा विवाह नहीं करती है।''

अंत में पीठ ने माना कि-

"सीआरपीसी की धारा 125 की संवैधानिकता का परीक्षण किया जा चुका है और वह उचित है। दूसरे शब्दों में कहे तो इस मामले में याचिकाकर्ता की तरफ से दी गई दलीलों में कोई तथ्य या गुण नहीं है। भारत के संविधान का अनुच्छेद 14 जैसा कि सर्वविदित है,वर्गो के कानून को प्रतिबंधित करता है,लेकिन उचित वर्गीकरण को नहीं।

प्रार्थना खंड बी को संक्षेप में खारिज करने की आवश्यकता है। न तो केंद्र और न ही महाराष्ट्र सरकार के पास यह अधिकार है कि वह विभिन्न विधानों के तहत गुजारे भत्ते के मामलों की सुनवाई के लिए सक्षम न्यायालयों के न्यायिक विवेक को निर्देशित करने के लिए दिशा-निर्देश जारी कर सके।''


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