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आखिर क्यों एक पूर्व न्यायाधीश नहीं बल्कि किसी पत्रकार को प्रेस काउंसिल का नेतृत्व करना चाहिए

LiveLaw News Network
30 Aug 2019 7:34 AM GMT
आखिर क्यों एक पूर्व न्यायाधीश नहीं बल्कि किसी पत्रकार को प्रेस काउंसिल का नेतृत्व करना चाहिए
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प्रोफेसर एम श्रीधर आचार्युलु

जब मेडिकल काउंसिल की अध्यक्षता डॉक्टर करते हैं और बार काउंसिल ऑफ इंडिया की अध्यक्षता पेशेवर वकील करते हैं तो प्रेस काउंसिल का मार्गदर्शन करने के लिए एक पत्रकार को क्यों नहीं चुना जाता है? कानून और तर्क इस बात को समझने में पूरी तरह से विफल है कि आखिर क्यों सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व न्यायाधीश को कामकाजी पत्रकारों के पेशेवर निकाय का प्रमुख होना चाहिए?

सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश, मौलिक अधिकार के रूप में वक्तव्य की स्वतंत्रता की उनकी समझ और विवेकपूर्ण/स्वतंत्र कार्यात्मक अनुभव के साथ इस पद के साथ न्याय करेंगे। एक परिपक्व पत्रकार, इस स्पष्ट समझ के साथ कि प्रेस की स्वतंत्रता, पूर्ण अधिकार नहीं है और इसे सामाजिक जिम्मेदारियों के साथ जोड़ा जाना चाहिए, प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया को बेहतर दिशा दे सकता है। न्यायाधीशों और पत्रकारों, दोनों को लोगों के साथ स्वतंत्र रूप से खड़ा होना चाहिए।

यह एक बड़ा झटका था कि प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया (पीसीआई) के अध्यक्ष जो सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश हैं, उन्होंने भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक के समर्थन में सुप्रीम कोर्ट के सामने खड़े अपना पक्ष रखने का विकल्प चुना है। पीसीआई के चेयरमैन द्वारा 20 दिन पहले लगाए गए मीडिया-ब्लॉक-आउट को चुनौती देने वाले कश्मीर डेली न्यूजपेपर एडिटर की रिट याचिका में हस्तक्षेप करने का फैसला, खुद पीसीआई के अस्तित्व पर संदेह पैदा करेगा।

पत्रकारिता के पेशेवर निकाय के रूप में पीसीआई को होने वाली क्षति अपूरणीय है। यदि मीडिया रिपोर्ट की मानें तो, यह जानकर थोड़ी राहत मिली कि पीसीआई ने अपना विचार बदल दिया, और वक्तव्य की स्वतंत्रता के साथ खड़े होने की अपनी वैधानिक जिम्मेदारी का उसे एहसास हुआ।

जैसे कि संवैधानिक संस्थानों के किले एक के बाद एक गिर रहे हैं, हाल के दिनों में पीसीआई को लोगों की आजादी का एक और ऐसा गिरता हुआ किला माना गया।

सवाल यह है कि पीसीआई अध्यक्ष ने परिषद के भीतर इस तरह के कठोर निर्णय के बारे में चर्चा क्यों नहीं की या मीडिया पेशेवरों से सलाह क्यूं नहीं ली? प्रेस काउंसिल को श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा निरस्त कर दिया गया था लेकिन केंद्र में जनता पार्टी सरकार के आने के बाद इसे बहाल कर दिया गया था। क्या प्रेस और लोगों की स्वतंत्रता के संरक्षण के लिए काम करना पीसीआई का मुख्य कार्य नहीं है?

कश्मीर टाइम्स की कार्यकारी संपादक अनुराधा भसीन ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत एक रिट याचिका दायर की है, जिसमे यह मांग की गयी है कि केंद्र को यह आदेश दिया जाए कि वह कश्मीर और जम्मू के कुछ जिलों में पत्रकारों और मीडिया कर्मियों की आवाजाही की स्वतंत्रता, मोबाइल, इंटरनेट और लैंडलाइन सेवाओं के पूर्ण ब्लॉक-आउट को बहाल करे।

इस पत्रकार ने शीर्ष अदालत से, कामकाजी पत्रकारों को रिपोर्ट करने का अपना कर्तव्य निभाने अपने पेशे का अभ्यास करने में सक्षम बनाने के लिए मदद मांगी, जो कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 19 (1) (ए) और 19 (1) (जी) और 21 के तहत उनका अधिकार है, इसके अलावा इस याचिका में कश्मीर घाटी के निवासियों के 'जानने के अधिकार' को भी बहाल करने की मांग की गयी।

बीते 4 अगस्त से, मोबाइल फोन नेटवर्क, इंटरनेट सेवाएं और लैंडलाइन फोन बंद कर दिए गए, जिससे कश्मीर और जम्मू के कुछ जिले, संचार और सूचना के सभी संभावित साधनों से पूरी तरह से अलग हो गए। कोई औपचारिक आदेश, जिसके तहत इस तरह की कार्रवाई की गई थी, को सूचित नहीं किया गया था और ऐसी अत्यधिक मनमानी कार्रवाई के पीछे की शक्ति और प्राधिकरण अभी भी अज्ञात था।

पत्रकारों की आवाजाही पर प्रतिबन्ध और सख्त संचार नाकाबंदी के परिणामस्वरूप वर्चुअल ब्लैकआउट हुआ, और रिपोर्टिंग और प्रकाशन करने वाला मीडिया इससे प्रभावित हुआ। जम्मू-कश्मीर गृह विभाग के सिविल सचिवालय ने कहा, 'अमरनाथ यात्रा के विशिष्ट लक्ष्यीकरण के साथ, आतंकवादी खतरों के नवीनतम खुफिया जानकारी को और 'कश्मीर घाटी में मौजूदा सुरक्षा स्थिति को देखते हुए,' पर्यटकों और अमरनाथ यात्रियों की सुरक्षा के लिए, यह सलाह दी जाती है कि वे घाटी में अपने प्रवास को तुरंत खत्म कर दें और जल्द से जल्द लौटने के लिए आवश्यक उपाय करें।"

पीसीआई को प्रेस के व्यक्तियों द्वारा राज्य-अत्याचारों के खिलाफ भावी शिकायतों को प्राप्त करना और उनका जवाब देना होता है और इसके अलावा मीडिया पेशेवरों को भी विनियमित करना इसका मकसद होता है, यदि वे स्वतंत्रता का दुरुपयोग करते हुए अनैतिक आचरण करते हैं। यह पीसीआई के लिए गरिमापूर्ण होता यदि वे स्वतंत्रता की रक्षा करते एवं पत्रकारों को, शेष राष्ट्र के साथ जम्मू कश्मीर राज्य के लोगों को एकीकृत करने के हित में, जम्मू और कश्मीर में संवेदनशील स्थिति से निपटने के लिए सावधान करते।

PCI से तथ्यात्मक रिपोर्टिंग और निष्पक्ष आलोचना और घाटी में उनके उचित प्रकाशन को सुविधा पहुंचाने की उम्मीद थी। इसका मकसद, स्वतंत्र रूप से राज्य में लगे प्रतिबंधों की निष्पक्षता का अध्ययन करना और उसकी समीक्षा की आवश्यकता को उठाना होना चाहिए था।

प्रेस काउंसिल एक्ट, 1978 की धारा 13 के तहत पीसीआई का कार्य, (i) सार्वजनिक रूचि के उच्च मानकों को बनाए रखना है, (ii) समाचार पत्रों, समाचार एजेंसियों की ओर से "नागरिकता के अधिकार और उत्तरदायित्व, दोनों की एक उचित भावना" को बढ़ावा देना है और (iii) "सार्वजनिक हित और महत्व के समाचारों की आपूर्ति और प्रसार को प्रतिबंधित करने वाले किसी भी विकास की संभावना की समीक्षा करना" है। यदि जम्मू और कश्मीर में पत्रकारों को धारा 370 के बदलाव के बाद मौजूदा माहौल के मद्देनजर कुछ अतिरिक्त सावधानी बरतने की जरूरत है, तो प्रेस परिषद आवश्यक दिशा-निर्देशों या आचार संहिता के साथ पेशेवरों को सलाह दे सकती है। लेकिन ब्लॉक-आउट के समर्थन में, गृह मंत्रालय के पक्ष में खड़ा होना न तो नैतिक है और न ही कानूनी।

तमाम न्यायिक निर्णयों में, शीर्ष अदालत ने प्रेस की कार्यात्मक गतिविधियों पर अप्रत्यक्ष रूप से अंकुश लगाने के लिए राज्य में निहित कार्यकारी शक्तियों के दुरुपयोग की चेतावनी दी है। ऐसा ही एक उदाहरण मिलता है, साकाल पेपर्स (प्राइवेट) लिमिटेड बनाम भारत संघ (1962) 3 एससीआर 842 के मामले में, जिसमें अखबारों की स्वतंत्रता पर रोक लगाने हेतु अप्रत्यक्ष साधनों का उपयोग करने का यह तरीका असंवैधानिक घोषित किया गया था। यदि प्रसार प्रतिबंधित है, तो समाचार पत्र जीवित नहीं रह सकता है, और इसकी आवाज को रोक दिया जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा '' इसका उद्देश्य कुछ ऐसी चीज़ विनियमित करना है, जैसा कि पहले ही कहा गया है, जो सीधे तौर पर एक अखबार के प्रसार से संबंधित है। चूंकि समाचार-पत्र का प्रसार, वक्तव्य की स्वतंत्रता के अधिकार का एक हिस्सा है, इसलिए अधिनियम को वक्तव्य की स्वतंत्रता के खिलाफ निर्देशित माना जाना चाहिए ...। इस तरह की कार्यप्रणाली की अनुमति नहीं है, और न्यायालयों को भी हमारे संविधान द्वारा गारंटीकृत स्वतंत्रता के शायद सबसे अनमोल अधिकार की रक्षा करने में सतर्क रहना चाहिए।"

यदि शीर्ष अदालत याचिका की जांच करना चाहती है और प्रेस को राहत देने के लिए इच्छुक है, तो प्रेस परिषद को इसका स्वागत करना चाहिए। शीर्ष अदालत के पूर्व न्यायाधीश के रूप में, पीसीआई के अध्यक्ष को इसके बारे में खुश होना चाहिए। यह मानते हुए कि प्रेस स्वतंत्रता पर प्रतिबंध 'राष्ट्रीय हित 'या' राष्ट्रीय अखंडता' के लिए उचित ठहराया जा सकता है, जैसा कि पीसीआई ने दावा किया है, सर्वोच्च न्यायालय के पास फिर भी इस मामले में जांच करने की बहुत बड़ी गुंजाइश है (a) कि क्या पूर्ण ब्लैक आउट जरुरी था, (b) क्या ऐसे व्यापक प्रतिबंधों को सीमित किया जा सकता है, घटनाओं के कुछ हिस्सों को रिपोर्ट करने की अनुमति दी जा सकती है, आदि।

यहां तक कि जिस अवधि के लिए इस तरह का पूर्ण ब्लॉक आउट किया गया और अनिश्चित काल के लिए नाकाबंदी की जरुरत एवं तार्किकता जैसे तथ्यों और परिस्थितियों की जांच की जा सकती है। प्रचलित स्थिति के संदर्भ में प्रतिबंध का तर्क संविधान द्वारा परिकल्पित किया गया है। कश्मीर संपादक की याचिका की जांच के जरिये, कार्यकारी कार्रवाई की न्यायिक समीक्षा हमारे संविधान की मूल संरचना का हिस्सा है। मीडिया पर सभी प्रतिबंधों को अमान्य किए बिना, न्यायपालिका अभी भी पूर्ण नाकाबंदी की आवश्यकता, वैधता, इसकी अवधि, सामान्य लोगों को जानने के अधिकार पर घातक प्रभाव आदि की जांच कर सकती है।

यह केवल कश्मीर में पत्रकारों के वक्तव्य की स्वतंत्रता का मामला नहीं है, बल्कि कश्मीर में नागरिकों के जीने का, जानने का, बोलने का और विभिन्न अन्य अधिकारों पर पूरी तरह से अंकुश लगा हुआ है। कोई नहीं जानता कि यह कब तक चलेगा। लोग और प्रेस, स्वाभाविक रूप से राहत के लिए न्यायपालिका के ओर देखते हैं। प्रेस परिषद इसका विरोध कैसे कर सकता है? प्रेस काउंसिल को अपने आप ही मीडिया पर पूर्ण प्रतिबंधों के आकार और अवधि के बारे में भारत सरकार से पूछना चाहिए।

अनुच्छेद 32 के तहत संवैधानिक उपचार के अपने अधिकार को लागू करना नागरिक का मौलिक अधिकार है, जो भारतीय संविधान का अनूठा प्रावधान है।

पेशेवर अनुभव और परिपक्वता के साथ एक स्वतंत्र सोच वाले अध्यक्ष ने इस कठिन समय में शायद उचित निर्णय लिया होता। प्रेस काउंसिल को कश्मीर में वक्तव्य की स्वतंत्रता को सुविधाजनक बनाने के लिए प्रेस, लोगों और सरकार के बीच निष्पक्ष लोकपाल की भूमिका का प्रदर्शन करना चाहिए था। उचित कार्रवाई करने के लिए सरकार के पास सभी बुनियादी ढांचे और कानूनी सलाह का लाभ है। प्रेस परिषद की अपनी जिम्मेदारियां हैं। केंद्रीय गृह मंत्रालय या जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल, पीसीआई के समर्थन की तलाश में नहीं हैं। और पीसीआई को यह पता होना चाहिए कि यह उनसे 'स्वतंत्र' है।

अगर लोकतंत्र को बचाने वाली कोई भी ढाल है, तो वह लोगों को सूचित करने की स्वतंत्रता है ताकि वे एक महत्वपूर्ण राय व्यक्त करें और कश्मीर में लोगों की समस्याओं की रिपोर्ट करें। प्रत्येक लोकतांत्रिक संविधान को लोगों को बताने, लिखने, प्रतिनिधित्व करने, याचिका करने और किसी नीति को चुनौती देने के अधिकार को मान्यता, घोषणा, सुविधा, गारंटी और सुरक्षा प्रदान करनी चाहिए, और ऐसा तब और ज्यादा करना चाहिए जब पूर्ण रूप से वक्तव्य की स्वतंत्रता के लिए अवरोध उत्पन्न किया जाता है।

प्रत्येक नागरिक और पत्रकार को किसी भी सरकार के कदम पर सवाल उठाने के लिए मीडिया या अन्य स्रोतों से इनपुट प्राप्त करने का अधिकार है। लोगों की राय का निर्माण करना और गलत नीति को संशोधित करने के लिए सरकार पर दबाव डालना, यह किसी भी लोकतांत्रिक संविधान की गतिशील आवश्यकता है। यह इस संदर्भ में है कि पीसीआई में एक पेशेवर अध्यक्ष होना चाहिए न कि एक पूर्व न्यायाधीश। शीर्ष अदालत के न्यायाधीश के रूप में लंबे समय के अनुभव में जरुरी नहीं की वक्तव्य की स्वतंत्रता के महत्व का एहसास हो जाए। बेंच के सदस्य के रूप में, अध्यक्ष के पास सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों को समझने के लिए कई अवसर हैं, जिसने 1950 में संविधान के आरंभ होने के बाद से प्रेस की स्वतंत्रता को लोकतांत्रिक समाज के दुर्जेय किले के रूप में बनाया है। पीसीआई अध्यक्ष का यह दुर्भाग्यपूर्ण निर्णय, जिसे हालांकि मौजूदा समय में बदल लिया गया है, एक पत्रकार चेयरमैन प्राप्त करने के लिए पीसीआई में सुधार की आवश्यकता पर जोर देगा।

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