इलाहाबाद हाईकोट

प्रधान से पंचायत फंड के नुकसान की वसूली के लिए समय-सीमा में मौजूद विरोधाभास को ठीक करे राज्य सरकार: इलाहाबाद हाईकोर्ट
प्रधान से पंचायत फंड के नुकसान की वसूली के लिए समय-सीमा में मौजूद विरोधाभास को ठीक करे राज्य सरकार: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि ग्राम पंचायत के पैसे या संपत्ति के नुकसान, बर्बादी या गलत इस्तेमाल के लिए ग्राम प्रधान पर सरचार्ज (अतिरिक्त शुल्क) लगाने की समय-सीमा यूपी पंचायत राज एक्ट, 1947 की धारा 27 के प्रावधान से तय होती है, न कि यूपी पंचायत राज नियम 1947 के नियम 257(2) के तीसरे प्रावधान में बताई गई कम समय-सीमा से। कोर्ट ने माना कि यह नियम एक्ट के प्रावधानों के खिलाफ है।यूपी पंचायत राज एक्ट, 1947 की धारा 27 के प्रावधान के तहत सरचार्ज की जिम्मेदारी नुकसान, बर्बादी या गलत इस्तेमाल होने के दस साल...

गिरफ्तारी में मौलिक अधिकारों की अनदेखी कर रही पुलिस, न्यायिक फैसलों को भी तवज्जो नहीं देती: इलाहाबाद हाईकोर्ट
गिरफ्तारी में मौलिक अधिकारों की अनदेखी कर रही पुलिस, न्यायिक फैसलों को भी तवज्जो नहीं देती: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गिरफ्तारी के दौरान संवैधानिक सुरक्षा उपायों के पालन को लेकर पुलिस के रवैये पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि पुलिस ने परंपरागत रूप से संविधान के अनुच्छेद 22(1) के प्रावधानों की "घोर उपेक्षा" की। अदालत ने कहा कि पुलिस अक्सर गिरफ्तारी की शक्ति का प्रयोग करते समय मौलिक अधिकारों के महत्व को समझने में विफल रहती है और इन अधिकारों को लागू करने वाले न्यायिक फैसलों को भी तिरस्कार की दृष्टि से देखती है।जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने यह टिप्पणी एक व्यक्ति की...

यूपी क्रिकेट एसोसिएशन पर प्रतिबंध और CBI जांच से इलाहाबाद हाईकोर्ट का इनकार, कहा- यह निजी संपत्ति विवाद
यूपी क्रिकेट एसोसिएशन पर प्रतिबंध और CBI जांच से इलाहाबाद हाईकोर्ट का इनकार, कहा- यह निजी संपत्ति विवाद

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन (UPCA) पर प्रतिबंध लगाने और उसकी संपत्तियों के हस्तांतरण की CBI जांच कराने की मांग वाली याचिका खारिज की।अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि भारतीय क्रिकेट नियंत्रण बोर्ड (BCCI) को UPCA की संपत्तियां अपने नियंत्रण में लेने का निर्देश नहीं दिया जा सकता, क्योंकि UPCA कंपनी अधिनियम 1956 की धारा 25 के तहत पंजीकृत एक कंपनी है और उसका स्वतंत्र कानूनी अस्तित्व है।जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने कहा कि किसी पंजीकृत सोसायटी की...

PFI Terror Plot Case | इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2021 में गिरफ्तार आरोपियों के खिलाफ़ ट्रायल में कोई प्रगति न होने पर NIA कोर्ट से किया सवाल
PFI 'Terror Plot' Case | इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2021 में गिरफ्तार आरोपियों के खिलाफ़ ट्रायल में कोई प्रगति न होने पर NIA कोर्ट से किया सवाल

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सोमवार को PFI टेरर प्लॉट के कथित मामले में 2021 में गिरफ्तार 2 आरोपियों के ट्रायल में प्रगति न होने पर हैरानी जताई और सवाल उठाए।हाईकोर्ट ने लखनऊ के NIA/ATS स्पेशल सेशंस जज से विस्तृत रिपोर्ट मांगी और पूछा कि ट्रायल को जल्द पूरा करने और गवाहों से पूछताछ (विटनेस एग्जामिनेशन) ठीक से कराने के उसके पहले के निर्देशों का पालन क्यों नहीं किया गया।जस्टिस राजेश सिंह चौहान और जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा की बेंच ने यह निर्देश तब दिया, जब वे अंसड बदरुद्दीन और फ़िरोज़ खान की तीसरी...

क्या ज़मानत खारिज होने के बाद गिरफ्तारी की वैधता को चुनौती दी जा सकती है? इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दिया जवाब
क्या ज़मानत खारिज होने के बाद गिरफ्तारी की वैधता को चुनौती दी जा सकती है? इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दिया जवाब

मध्य प्रदेश राज्य बनाम कुसुम साहू [2025 LiveLaw (SC) 1110] मामले में सुप्रीम कोर्ट के 2025 के फैसले से अलग राय रखते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पिछले हफ्ते कहा कि रेगुलर ज़मानत अर्ज़ी खारिज होने का मतलब यह नहीं है कि बाद में भारत के संविधान के अनुच्छेद 22(1) के तहत गिरफ्तारी और न्यायिक रिमांड की वैधता को चुनौती नहीं दी जा सकती।जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की बेंच ने स्पष्ट किया कि कुसुम साहू मामले में तय किया गया सिद्धांत वहां लागू नहीं होगा, जहां कोर्ट का सरोकार केवल गिरफ्तारी और...

सरकारी कल्याण योजना के तहत लाभार्थी को दिए गए मुआवज़े को चुनौती देने के लिए इंश्योरेंस कंपनी रिट याचिका दायर नहीं कर सकती: इलाहाबाद हाईकोर्ट
सरकारी कल्याण योजना के तहत लाभार्थी को दिए गए मुआवज़े को चुनौती देने के लिए इंश्योरेंस कंपनी रिट याचिका दायर नहीं कर सकती: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि इंश्योरेंस कंपनी, राज्य सरकार और इंश्योरेंस कंपनी के बीच हुए समझौते (MoU) के कथित उल्लंघन का हवाला देकर, सरकारी कल्याण योजना के तहत लाभार्थी को दिए गए मुआवज़े को चुनौती देने के लिए संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल नहीं कर सकती।कोर्ट ने कहा कि ऐसा विवाद मूल रूप से अनुबंध (Contract) से जुड़ा है और इसे उचित सिविल, कमर्शियल या आर्बिट्रेशन फोरम के सामने उठाया जाना चाहिए।कोर्ट ने देखा कि योजना के लाभार्थी MoU का हिस्सा नहीं हैं और उन्हें...

आपराधिक मामला लंबित होने मात्र से चरित्र प्रमाण पत्र देने से इनकार नहीं किया जा सकता : इलाहाबाद हाईकोर्ट
आपराधिक मामला लंबित होने मात्र से चरित्र प्रमाण पत्र देने से इनकार नहीं किया जा सकता : इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक मामला लंबित होने मात्र के आधार पर चरित्र प्रमाण पत्र जारी करने से इनकार नहीं किया जा सकता।जस्टिस प्रकाश पड़िया और जस्टिस विवेक सरन की खंडपीठ ने कहा कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धाराओं 323, 504 और 506 के तहत दर्ज मामले का लंबित होना अपने आप में चरित्र प्रमाण पत्र की मांग खारिज करने का आधार नहीं बन सकता।कोर्ट ने कहा,"हमारी राय में केवल IPC की धारा 323, 504 और 506 के तहत मामला लंबित होने के कारण चरित्र प्रमाण पत्र जारी करने का आवेदन खारिज...

पत्नी की सुविधा या बच्चे का हित ही केस के ट्रांसफर का आधार नहीं, न्याय प्रभावित होने का खतरा दिखाना होगा: इलाहाबाद हाईकोर्ट
पत्नी की सुविधा या बच्चे का हित ही केस के ट्रांसफर का आधार नहीं, न्याय प्रभावित होने का खतरा दिखाना होगा: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि वैवाहिक मामलों में पत्नी की सुविधा और नाबालिग बच्चे का हित महत्वपूर्ण कारक हैं, लेकिन केवल इन्हीं आधारों पर किसी मामले को एक अदालत से दूसरी अदालत स्थानांतरित (Transfer) नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि असली कसौटी यह है कि यदि मामला स्थानांतरित नहीं किया गया तो क्या न्याय मिलने में बाधा या विफलता होगी।जस्टिस योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव ने यह टिप्पणी उस याचिका पर की, जिसमें पत्नी ने पति द्वारा हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 9 के तहत दायर दांपत्य अधिकारों...

स्थायी समायोजन के बाद कर्मचारी नए कैडर का सदस्य, शुरुआती नियुक्ति के आधार पर लाभ नहीं रोके जा सकते: इलाहाबाद हाईकोर्ट
स्थायी समायोजन के बाद कर्मचारी नए कैडर का सदस्य, शुरुआती नियुक्ति के आधार पर लाभ नहीं रोके जा सकते: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि किसी कर्मचारी का एक बार किसी नए कैडर में स्थायी समायोजन (Permanent Absorption) हो जाने के बाद वह सभी सेवा संबंधी उद्देश्यों के लिए उसी कैडर का सदस्य माना जाएगा। उसकी प्रारंभिक नियुक्ति किस कैडर में हुई थी, यह आधार बनाकर उसे नए कैडर के वित्तीय या सेवा लाभों से वंचित नहीं किया जा सकता।जस्टिस इरशाद अली ने कहा कि स्थायी समायोजन केवल प्रशासनिक व्यवस्था नहीं, बल्कि कर्मचारी का नए कैडर में पूर्ण एकीकरण (Complete Integration) है। इसके बाद पुराने पद पर उसका लियन (Lien) और...

ऑनर किलिंग मामले में बुआ-फूफा को अग्रिम जमानत से इनकार, सच सामने लाने के लिए हिरासत में पूछताछ जरूरी: इलाहाबाद हाईकोर्ट
ऑनर किलिंग मामले में बुआ-फूफा को अग्रिम जमानत से इनकार, सच सामने लाने के लिए हिरासत में पूछताछ जरूरी: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आगरा के चर्चित ऑनर किलिंग मामले में मृतका की बुआ और फूफा की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि मामला बेहद गंभीर है और सच्चाई तक पहुंचने के लिए आरोपियों से हिरासत में पूछताछ (Custodial Interrogation) आवश्यक है। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि गैर-जमानती वारंट जारी होने के बावजूद दोनों पिछले सात महीने से फरार चल रहे थे।जस्टिस विवेक कुमार सिंह ने कहा कि अग्रिम जमानत एक असाधारण और विवेकाधीन राहत है, जिसे केवल विशेष परिस्थितियों में ही दिया जाना चाहिए। प्रथम दृष्टया...

मूल दस्तावेज के बिना फोटो-कॉपी पर मौजूद विवादित हस्ताक्षर की हस्तलेखन जांच नहीं कराई जा सकती: इलाहाबाद हाईकोर्ट
मूल दस्तावेज के बिना फोटो-कॉपी पर मौजूद विवादित हस्ताक्षर की हस्तलेखन जांच नहीं कराई जा सकती: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि यदि किसी दस्तावेज की केवल फोटो-कॉपी उपलब्ध है और उसका मूल दस्तावेज पेश नहीं किया गया तो उस पर मौजूद विवादित हस्ताक्षरों की हस्तलेखन विशेषज्ञ से वैज्ञानिक जांच नहीं कराई जा सकती। अदालत ने कहा कि फोटोप्रति में वे महत्वपूर्ण वैज्ञानिक विशेषताएं सुरक्षित नहीं रहतीं, जिनके आधार पर हस्ताक्षरों की विश्वसनीय तुलना संभव होती है।जस्टिस डॉ. योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव ने कहा,"यदि किसी विशेषज्ञ को फोटो-कॉपी पर मौजूद विवादित हस्ताक्षरों की तुलना मूल दस्तावेजों पर उपलब्ध स्वीकृत...

मथुरा-वृंदावन में भगदड़ रोकने के लिए भीड़ व्यवहार विज्ञान अपनाने की जरूरत, राज्य सरकार को कदम उठाने चाहिए: हाईकोर्ट
मथुरा-वृंदावन में भगदड़ रोकने के लिए भीड़ व्यवहार विज्ञान अपनाने की जरूरत, राज्य सरकार को कदम उठाने चाहिए: हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मथुरा-वृंदावन में धार्मिक आयोजनों के दौरान होने वाली भीड़ और भगदड़ की घटनाओं पर गंभीर चिंता जताते हुए कहा कि लोगों के जीवन की रक्षा करना राज्य का संवैधानिक दायित्व है। कोर्ट ने कहा कि भीड़ व्यवहार विज्ञान को शिक्षा, प्रशासन और सरकारी नीतियों का हिस्सा बनाना समय की जरूरत ही नहीं, बल्कि संवैधानिक अनिवार्यता है।जस्टिस विनोद दिवाकर ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन का अधिकार केवल राज्य द्वारा हिंसा न करने तक सीमित नहीं है बल्कि यह राज्य पर यह सकारात्मक जिम्मेदारी भी...

ऑनर किलिंग मामले में पिता और भाई की उम्रकैद बरकरार, घटना से पहले और बाद का आचरण बना अहम सबूत: इलाहाबाद हाईकोर्ट
ऑनर किलिंग मामले में पिता और भाई की उम्रकैद बरकरार, घटना से पहले और बाद का आचरण बना अहम सबूत: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दो नाबालिग बहनों की कथित ऑनर किलिंग के मामले में पिता और भाई को सुनाई गई उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा।कोर्ट ने कहा कि अपराध से पहले और बाद में आरोपियों का आचरण भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 8 के तहत महत्वपूर्ण परिस्थिति है और इस मामले में वही उनके अपराध की ओर स्पष्ट संकेत करता है।जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने राम प्रसाद और उसके बेटे चंद्रभान की आपराधिक अपील खारिज करते हुए वर्ष 2019 में अमरोहा की फास्ट ट्रैक अदालत द्वारा सुनाए गए फैसले को सही...

सिर्फ़ आखिरी बार साथ देखे जाने के आधार पर हत्या की सज़ा नहीं दी जा सकती: इलाहाबादहाई कोर्ट ने 1996 के दोहरे हत्याकांड मामले में तीन लोगों को बरी किया
सिर्फ़ 'आखिरी बार साथ देखे जाने' के आधार पर हत्या की सज़ा नहीं दी जा सकती: इलाहाबादहाई कोर्ट ने 1996 के दोहरे हत्याकांड मामले में तीन लोगों को बरी किया

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पिछले हफ़्ते 1996 के दोहरे हत्याकांड मामले में तीन लोगों की सज़ा रद्द की। कोर्ट ने कहा कि परिस्थितिजन्य सबूतों (Circumstantial Evidence) पर आधारित मामले में, सिर्फ़ "आखिरी बार साथ देखे जाने" (Last Seen Together) के सिद्धांत या सबूत के आधार पर सज़ा को बरकरार नहीं रखा जा सकता, जब तक कि परिस्थितियों की कड़ी का हर हिस्सा बिना किसी शक के साबित न हो जाए।कोर्ट ने पाया कि इस मामले में अभियोजन पक्ष (Prosecution) दोषी ठहराने वाली परिस्थितियों की पूरी कड़ी बनाने में नाकाम रहा और ट्रायल...

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नाबालिग लड़कियों की ऑनर किलिंग मामले में पिता और भाई की उम्रकैद की सज़ा रखी बरकरार, बताया यह आधार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नाबालिग लड़कियों की 'ऑनर किलिंग' मामले में पिता और भाई की उम्रकैद की सज़ा रखी बरकरार, बताया यह आधार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पिछले हफ़्ते 2 नाबालिग लड़कियों की 'ऑनर किलिंग' के मामले में एक पिता और उसके बेटे की सज़ा और उम्रकैद बरकरार रखा। कोर्ट ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 8 के तहत अपराध करने से पहले और बाद में दोषियों के व्यवहार को "बहुत अहम" माना।जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की बेंच ने राम प्रसाद और उनके बेटे चंद्र भान की आपराधिक अपील खारिज किया और अमरोहा के एडिशनल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज (फास्ट ट्रैक कोर्ट-II) के 2019 का फैसला बरकरार रखा।ट्रायल कोर्ट ने दयावती (13)...

BJP नेता के ग़लत कामों के बारे में सोशल मीडिया पर पोस्ट करने पर सस्पेंड सरकारी टीचर को हाईकोर्ट से राहत
BJP नेता के ग़लत कामों के बारे में सोशल मीडिया पर पोस्ट करने पर सस्पेंड सरकारी टीचर को हाईकोर्ट से राहत

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सरकारी प्राइमरी स्कूल टीचर का सस्पेंशन रद्द किया, जिन्हें BJP नेता के कथित गलत कामों को उजागर करने वाले सोशल मीडिया पोस्ट के कारण सस्पेंड किया गया था।जस्टिस मंजू रानी चौहान की बेंच ने कहा कि किसी गलत काम, गबन या जनहित से जुड़े मामले को सामने लाना ही अपने आप में 'दुर्व्यवहार' नहीं माना जा सकता।इस तरह सिंगल जज ने फिरोजाबाद जिले के विकास खंड एका के प्राइमरी स्कूल, भडाना-II में तैनात एक असिस्टेंट टीचर की रिट याचिका को मंज़ूरी दी, जिसमें उन्होंने फिरोजाबाद के डिस्ट्रिक्ट बेसिक...

पुलिस स्टेशनों में CCTV कैमरों और बिजली बैकअप सुविधाओं के काम न करने पर हाईकोर्ट ने जताई नाराजगी कहा- यह SPs की ड्यूटी में लापरवाही
पुलिस स्टेशनों में CCTV कैमरों और बिजली बैकअप सुविधाओं के काम न करने पर हाईकोर्ट ने जताई नाराजगी कहा- यह SPs की ड्यूटी में लापरवाही

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा कि पुलिस स्टेशनों में CCTV कैमरों और बैकअप बिजली सुविधाओं (जैसे जनरेटर सेट और सोलर पैनल) का काम न करना, पुलिस अधीक्षक (SP) द्वारा "ड्यूटी निभाने में लापरवाही" के बराबर है।बेंच ने आगे कहा कि यह SP या वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) की मुख्य जिम्मेदारी है कि वे यह सुनिश्चित करें कि पुलिस स्टेशन इन ज़रूरी सुविधाओं से पूरी तरह लैस रहें।पुलिस स्टेशन को "संवेदनशील जगह" मानते हुए जस्टिस अजीत कुमार और जस्टिस गरिमा प्रसाद की बेंच ने उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) को...

S. 180 BNSS | इलाहाबाद हाईकोर्ट का डीजीपी को निर्देश- गवाहों का बयान उनकी अपनी भाषा में ही दर्ज करे पुलिस
S. 180 BNSS | इलाहाबाद हाईकोर्ट का डीजीपी को निर्देश- गवाहों का बयान उनकी अपनी भाषा में ही दर्ज करे पुलिस

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) को निर्देश दिया कि वह सभी पुलिस अधिकारियों को ज़रूरी निर्देश जारी करें। यह सुनिश्चित किया जाए कि BNSS की धारा 180 के तहत बयान दर्ज करते समय वे गवाहों से दोषी ठहराने वाले या दिशा-निर्देश देने वाले सवाल न पूछें। इसके बजाय, कुछ खास बिंदुओं पर स्पष्टीकरण मांगने के अलावा, गवाह द्वारा बताई गई बात को उनकी अपनी भाषा में ही दर्ज करें।जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की बेंच ने एक ज़मानत अर्ज़ी पर सुनवाई करते हुए यह निर्देश दिया। इस मामले में बेंच ने...

पत्नी के अपनी मर्ज़ी से छोड़ा था ससुराल: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पति की हेबियस कॉर्पस याचिका खारिज करते हुए कहा-गैर-कानूनी तरीके से बंधक नहीं बनाया गया
पत्नी के अपनी मर्ज़ी से छोड़ा था ससुराल: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पति की 'हेबियस कॉर्पस' याचिका खारिज करते हुए कहा-गैर-कानूनी तरीके से बंधक नहीं बनाया गया

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि पति 'हेबियस कॉर्पस' की रिट (याचिका) तब दायर नहीं कर सकता, जब खुद उसकी दलीलों से यह पता चलता हो कि पत्नी ने अपनी मर्ज़ी से ससुराल छोड़ा था और गैर-कानूनी तरीके से बंधक बनाए जाने का कोई शुरुआती मामला नहीं बनता है।जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की बेंच ने कहा कि पति को इसके बजाय हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 9 के तहत वैवाहिक अधिकारों की बहाली के लिए कानूनी उपाय अपनाना चाहिए।बेंच ने यह टिप्पणी तब की, जब वह पत्नी को पेश करने की मांग वाली पति की 'हेबियस' याचिका खारिज कर रही थी।...

आय से अधिक संपत्ति का मामला | जांच के दौरान कथित अतिरिक्त संपत्ति में कमी आना आरोप से बरी होने का आधार नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
आय से अधिक संपत्ति का मामला | जांच के दौरान कथित अतिरिक्त संपत्ति में कमी आना आरोप से बरी होने का आधार नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act) के तहत मुकदमा झेल रहे आरोपी को सिर्फ़ इसलिए आरोप से बरी (Discharge) नहीं किया जा सकता कि जांच के दौरान कथित तौर पर आय से अधिक संपत्ति की मात्रा कम हो गई थी।कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल इस आधार पर कि जांच के बाद आय और खर्च के बीच का अंतर कम हो गया, या यह अंतर आरोपी की आय का एक छोटा सा हिस्सा था, आरोपी को आरोप से बरी नहीं किया जा सकता।जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा की बेंच ने यह टिप्पणी सरकारी कर्मचारी द्वारा दायर...