इलाहाबाद हाईकोट

नाबालिग के साथ गैंग-रेप के 47 साल बाद दोषी ठहराए जाने का फ़ैसला बरकरार: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 71 साल के व्यक्ति की जेल की सज़ा कम की

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मंगलवार को 1979 के नाबालिग के साथ गैंग-रेप के मामले में एक व्यक्ति को दोषी ठहराए जाने का फ़ैसला बरकरार रखा, लेकिन उसकी मुख्य सज़ा को 7.5 साल से घटाकर 4 साल की कठोर कारावास (RI) कर दिया।जस्टिस संतोष राय की बेंच ने आपराधिक अपील के 43 साल से लंबित रहने और जीवित दोषी की उम्र (71 साल) को ध्यान में रखते हुए सज़ा में बदलाव किया।इसके साथ ही कोर्ट ने आरोपी-अपीलकर्ता द्वारा दायर आपराधिक अपील को आंशिक रूप से मंज़ूरी दे दी। उसे सरेंडर करने और बाकी बची सज़ा काटने का निर्देश दिया...

ऑनलाइन बिक रहा है चाइनीज मांझा? इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी सरकार से मांगी जांच रिपोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को यह जांच करने का निर्देश दिया कि प्रतिबंध के बावजूद क्या चाइनीज मांझा अब भी ऑनलाइन मंचों के माध्यम से बेचा जा रहा है।जस्टिस राजन राय और जस्टिस मंजीव शुक्ला की खंडपीठ वर्ष 2018 से लंबित जनहित याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है।इन याचिकाओं में उत्तर प्रदेश में चाइनीज मांझे के आयात, बिक्री और उपयोग पर सख्ती से रोक लगाने की मांग की गई।सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि चाइनीज मांझा ऑनलाइन उपलब्ध है और इस संबंध में एक समाचार पत्र में भी रिपोर्ट प्रकाशित हुई।इस...

सगा बेटा भरण-पोषण दे रहा है तो सौतेले बेटे से दोबारा गुजारा भत्ता नहीं मांग सकती मां: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि यदि किसी मां को दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत उसके सगे बेटे से भरण-पोषण मिल रहा है, तो वह उसी उद्देश्य के लिए बाद में अपने सौतेले बेटे से अलग से भरण-पोषण की मांग नहीं कर सकती।जस्टिस लक्ष्मी कांत शुक्ला ने एक महिला की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की।बता दें महिला ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश में संशोधन की मांग की थी जिसमें उसके सगे बेटे को 8,000 रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया जबकि सौतेले बेटे पर कोई जिम्मेदारी नहीं...

RWA के रोजमर्रा के विवादों पर सीधे याचिका नहीं चलेगी: हाईकोर्ट ने यूपी सरकार से शिकायत निवारण व्यवस्था बनाने को कहा

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन (RWA) के रोजमर्रा के प्रबंधन से जुड़े विवादों को लेकर सीधे संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत याचिका दायर नहीं की जा सकती।कोर्ट ने साथ ही उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया कि उत्तर प्रदेश अपार्टमेंट (निर्माण संवर्धन, स्वामित्व एवं अनुरक्षण) अधिनियम, 2010 के तहत ऐसे विवादों के निपटारे के लिए सक्षम प्राधिकारी के माध्यम से औपचारिक शिकायत निवारण व्यवस्था विकसित करने पर विचार करे।जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस...

जमानत याचिका में 10 दिन की देरी पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त, यूपी सरकार पर लगाया ₹50,000 जुर्माना

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक जमानत याचिका के निस्तारण में पुलिस अधिकारियों की लापरवाही के कारण हुई 10 दिन से अधिक की देरी पर उत्तर प्रदेश सरकार पर ₹50,000 का जुर्माना लगाया है। अदालत ने निर्देश दिया कि यह राशि याचिकाकर्ताओं को अदा की जाए। साथ ही राज्य सरकार को जांच के बाद संबंधित पुलिस अधिकारियों से यह राशि वसूलने की स्वतंत्रता भी दी।जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की पीठ दहेज मृत्यु के एक मामले में आरोपी सास-ससुर की जमानत याचिका पर सुनवाई कर रही थी। अदालत ने पाया कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई पर्याप्त साक्ष्य...

विज्ञापन जारी होने के साथ ही भर्ती प्रक्रिया शुरू हो जाती है, बाद में लागू कानून उस पर लागू नहीं होगा: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि भर्ती प्रक्रिया की शुरुआत नियुक्ति की मंजूरी से नहीं, बल्कि विज्ञापन जारी होने की तारीख से मानी जाएगी। अदालत ने कहा कि यदि भर्ती का विज्ञापन किसी नए कानून के लागू होने से पहले जारी हो चुका है, तो बाद में लागू हुआ कानून उस भर्ती प्रक्रिया को प्रभावित नहीं करेगा।जस्टिस सौरभ श्याम शमशेरी ने सुप्रीम कोर्ट के तेज प्रकाश पाठक बनाम राजस्थान हाईकोर्ट फैसले का हवाला देते हुए कहा कि भर्ती प्रक्रिया विज्ञापन जारी होने से शुरू होकर अधिसूचित रिक्तियों को भरने तक चलती...

अगर ट्रायल के दौरान पीड़ित पक्ष बदल ले तो सिर्फ़ CrPC की धारा 164 के तहत दिए गए बयान के आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ बेंच) ने कहा कि अगर ट्रायल के दौरान पीड़ित और अभियोजन पक्ष के अन्य गवाह अपनी बात से मुकर जाते हैं (होस्टाइल हो जाते हैं) तो आरोपी को सिर्फ़ CrPC की धारा 164 के तहत दर्ज बयान के आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता।अपहरण के मामले में 2011 में ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई सज़ा रद्द करते हुए जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की बेंच ने कहा कि चूंकि CrPC की धारा 164 के तहत बयान आरोपी की मौजूदगी में दर्ज नहीं किया जाता है, इसलिए उसे गवाह से जिरह (क्रॉस-एग्जामिनेशन) करने का मौका नहीं मिलता...

हाईकोर्ट का यूपी कोर्ट्स को निर्देश: अगर दहेज हत्या का मामला हत्या जैसा लगे तो मुख्य आरोप हत्या का और वैकल्पिक आरोप दहेज हत्या का तय करें

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश की सभी निचली अदालतों (ट्रायल कोर्ट) को एक ज़रूरी निर्देश जारी किया। निर्देश के मुताबिक, अगर जांच के दौरान मिले सबूतों से पता चलता है कि ससुराल में हुई मौत 'हत्या' (homicidal) थी, तो मुख्य आरोप IPC की धारा 302 (हत्या) के तहत और वैकल्पिक आरोप IPC की धारा 304-B ​​(दहेज हत्या) के तहत तय किया जाना चाहिए।जस्टिस सलिल कुमार राय और जस्टिस डॉ. अजय कुमार-II की बेंच ने यह निर्देश ऐसे मामले पर नाराज़गी जताते हुए जारी किया, जिसमें जांच अधिकारी और ट्रायल कोर्ट के जज दोनों ने...

पति की नेट इनकम का 25% गुज़ारा-भत्ता तय करना ज़रूरी नहीं; कोर्ट कम या ज़्यादा भी दे सकता है: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि पत्नी को पति की नेट सैलरी का 25% गुज़ारा-भत्ता देने का जो पैमाना (बेंचमार्क) अक्सर इस्तेमाल किया जाता है, वह सिर्फ़ एक "सामान्य गाइडलाइन" है, न कि कोई अनिवार्य नियम।जस्टिस अचल सचदेव की बेंच ने साफ़ किया कि हर मामले के तथ्यों के आधार पर कोर्ट के पास कम या ज़्यादा भत्ता तय करने का अधिकार है।कोर्ट ने यह भी साफ़ किया कि गुज़ारा-भत्ता तय करने के लिए "नेट इनकम" का मतलब आम तौर पर ज़रूरी कटौतियों और टैक्स के बाद बची हुई इनकम से होता है, न कि ग्रॉस सैलरी से।कोर्ट असल में दो...

इलेक्ट्रोहोम्योपैथी का सर्टिफिकेट लेकर एलोपैथी नहीं कर सकते, बिना मान्यता इलाज करना झोलाछाप डॉक्टरी: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल इलेक्ट्रोहोम्योपैथी का सर्टिफिकेट रखने वाला व्यक्ति एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति से मरीजों का इलाज नहीं कर सकता।अदालत ने कहा कि मान्यता प्राप्त मेडिकल योग्यता के बिना एलोपैथी करना झोलाछाप डॉक्टरी है और ऐसे लोगों को मरीजों का इलाज करने की अनुमति देना जनस्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा है।जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने एटा के चीफ मेडिकल ऑफिसर द्वारा एक प्राइवेट अस्पताल को सील किए जाने के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका खारिज करते हुए यह...

सेशन जज सुनवाई के बीच लंबित मुकदमा उसी न्यायिक अधिकारी की नई अदालत में स्थानांतरित कर सकते हैं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि किसी आपराधिक मुकदमे की आंशिक सुनवाई कर रहे न्यायिक अधिकारी का तबादला उसी सत्र प्रभाग के भीतर किसी अन्य सक्षम अदालत में हो जाता है, तो सेशन जज दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC)। की धारा 408 के तहत अपने विवेकाधिकार का प्रयोग करते हुए उस लंबित मुकदमे को अधिकारी की नई अदालत में स्थानांतरित कर सकते हैं।जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की पीठ ने इस संबंध में दायर याचिका खारिज करते हुए कहा कि यदि स्थानांतरण का उद्देश्य उस न्यायिक अधिकारी को गवाहों के हावभाव और आचरण का लाभ बनाए...

निरसन कानून का लाभ नहीं मिलेगा यदि अतिरिक्त भूमि का कब्जा पहले ही लिया जा चुका हो, देरी से दायर याचिका भी खारिज: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि यदि शहरी भूमि (सीमा निर्धारण एवं विनियमन) अधिनियम, 1976 के तहत अतिरिक्त घोषित भूमि का कब्जा शहरी भूमि (सीमा निर्धारण एवं विनियमन) निरसन अधिनियम, 1999 लागू होने से पहले ही प्रशासन द्वारा ले लिया गया था, तो भू-स्वामी निरसन अधिनियम का लाभ लेकर उस भूमि पर अपना अधिकार बरकरार रखने का दावा नहीं कर सकता।हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कब्जा लिए जाने के कई वर्षों बाद ऐसे भूमि सीमा निर्धारण की कार्यवाही को चुनौती दी जाती है तो अत्यधिक देरी के आधार पर भी याचिका खारिज की जा...

परिवार के लोग घर में मौजूद थे, ऐसे में दुष्कर्म की घटना संभव नहीं लगती; पीड़िता के बयान में भी विरोधाभास, बरी करने का फैसला बरकरार: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वर्ष 2014 के दुष्कर्म मामले में राज्य सरकार की अपील खारिज करते हुए आरोपी को बरी करने का ट्रायल कोर्ट का फैसला बरकरार रखा।अदालत ने कहा कि जिस समय कथित घटना हुई, उस समय पीड़िता के बच्चे और परिवार के अन्य सदस्य घर में मौजूद थे। ऐसे हालात में आरोपी द्वारा पीड़िता को घसीटकर कमरे में ले जाकर दुष्कर्म करना अत्यंत असंभव प्रतीत होता है।जस्टिस अब्दुल मोइन और जस्टिस प्रमोद कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने जुलाई 2019 में गोंडा की ट्रायल कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले को सही ठहराया। ट्रायल कोर्ट...

सिर्फ संदेह के आधार पर पेट्रोल पंप की डीलरशिप रद्द नहीं की जा सकती, तकनीकी साक्ष्य जरूरी: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि केवल इस आशंका के आधार पर कि ईंधन वितरण मशीन से छेड़छाड़ की गई है किसी पेट्रोल पंप की डीलरशिप समाप्त नहीं की जा सकती।अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक ठोस तकनीकी और वैज्ञानिक साक्ष्यों से यह साबित न हो जाए कि कथित अनियमितता ईंधन की आपूर्ति में हेरफेर करने में सक्षम थी और उसका संबंध डीलर से था तब तक डीलरशिप समाप्त करने जैसी दंडात्मक कार्रवाई उचित नहीं मानी जा सकती।जस्टिस इरशाद अली की पीठ ने यह टिप्पणी मार्केटिंग अनुशासन दिशानिर्देश, 2012 के खंड...

RTI Act | सुनवाई का अवसर दिए बिना सूचना अधिकारी पर जुर्माना नहीं लगाया जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI Act), 2005 की धारा 20 के तहत सूचना देने में देरी पर लोक सूचना अधिकारी (PIO) पर जुर्माना लगाने से पहले उसे सुनवाई का उचित अवसर देना अनिवार्य है। अदालत ने कहा कि केवल बिना आधार के राय बनाकर दंड नहीं लगाया जा सकता, बल्कि उपलब्ध अभिलेखों और तथ्यों के आधार पर विधिसम्मत राय बनाना आवश्यक है।यह फैसला जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने सुनाया।मामले में याचिकाकर्ता एक खंड शिक्षा अधिकारी होने के...

संशोधन की अर्ज़ी खारिज होने पर भी पार्टी मौजूदा दलीलों के आधार पर कानूनी तर्क दे सकती है: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के ऑर्डर VI नियम 17 के तहत दलीलों (pleadings) में संशोधन की अर्ज़ी खारिज होने का मतलब यह नहीं है कि कोई पार्टी अंतिम सुनवाई के चरण में पहले से रिकॉर्ड पर मौजूद दलीलों से उत्पन्न कानूनी सवालों को नहीं उठा सकती।कोर्ट ने कहा कि अगर प्रस्तावित संशोधन केवल उन कानूनी दलीलों को दोहराता है, जो पहले से ही दलीलों और अपील के मेमोरेंडम से स्पष्ट हैं, तो उसे खारिज करने से कोई कानूनी नुकसान नहीं होता है।CPC का ऑर्डर VI नियम 17 कोर्ट को दलीलों में संशोधन...

जहां आर्बिट्रेशन क्लॉज़ मौजूद हो, वहां विवादित तथ्यों वाले कॉन्ट्रैक्ट से जुड़े मामलों में रिट अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि संविधान के आर्टिकल 226 के तहत रिट याचिका ऐसे कॉन्ट्रैक्ट विवाद में स्वीकार्य नहीं है, जहां विवाद में तथ्यों से जुड़े सवाल शामिल हों और एग्रीमेंट के तहत पीड़ित पक्ष के पास आर्बिट्रेशन (मध्यस्थता) का उपाय उपलब्ध हो।कोर्ट ने मछली पकड़ने के लीज़ को खत्म करने और सिक्योरिटी ज़ब्त करने के खिलाफ चुनौती पर सुनवाई करने से इनकार किया। कोर्ट ने कहा कि लीज़ वाली जगह और कॉन्ट्रैक्ट के तहत बकाया रकम पर विरोधी दावों का समाधान तभी हो सकता है, जब पार्टियाँ तय फोरम के सामने सबूत पेश...