इलाहाबाद हाईकोट

वकालत के पेशे में गैंगस्टर और माफियाओं की घुसपैठ: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गंभीर अपराधों के आरोपी वकीलों की प्रैक्टिस पर लगाई रोक

एक अहम फैसले में यह देखते हुए कि गैंगस्टर और माफिया तत्वों ने कानूनी पेशे को "सुरक्षित पनाहगाह" बना लिया है, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में गंभीर अपराधों के आरोपी वकीलों को राज्य की किसी भी अदालत या ट्रिब्यूनल में प्रैक्टिस करने से रोक दिया। यह रोक उनके खिलाफ चल रही अनुशासनात्मक कार्यवाही या मुकदमों के खत्म होने तक लागू रहेगी।हाईकोर्ट ने सवाल किया,"ऐसे में आपराधिक आरोपों का सामना कर रहा कोई व्यक्ति 'कोर्ट के अधिकारी' के तौर पर और 'एडवोकेट्स एक्ट, 1961' के तहत मिले अधिकारों और सुविधाओं का लाभ...

S.47 CPC | डिक्री में मुकदमे की प्रॉपर्टी के बारे में क्लर्क की गलती से हुई गलत जानकारी को एग्जीक्यूटिंग कोर्ट ठीक कर सकता है: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि एग्जीक्यूटिंग कोर्ट, सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 47 के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए, डिक्री में मुकदमे की प्रॉपर्टी के बारे में क्लर्क की गलती या टाइपिंग की गलती से हुई गलत जानकारी को ठीक कर सकता है। कोर्ट ने कहा कि ऐसा सुधार सिर्फ़ उसी कोर्ट तक सीमित नहीं है जिसने डिक्री पास की थी।जस्टिस मनीष कुमार निगम ने कहा,“जहां डिक्री की शर्तें साफ़ और स्पष्ट हैं, वहां उन शर्तों को लागू किया जाना चाहिए। हालांकि, जहां डिक्री अस्पष्ट या उलझन भरी है, वहां...

सेशन जज के ट्रांसफर ऑर्डर को CrPC की धारा 482 के तहत चुनौती दी जा सकती है, धारा 407 के तहत नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि जब कोई सेशन जज CrPC की धारा 408 के तहत किसी क्रिमिनल केस को ट्रांसफर करने की अर्ज़ी मंज़ूर करता है, तो उस आदेश से प्रभावित व्यक्ति CrPC की धारा 407 के तहत नई ट्रांसफर अर्ज़ी दाखिल करके उसे चुनौती नहीं दे सकता।कोर्ट ने कहा कि ट्रांसफर की मंज़ूरी देने वाले आदेश को केवल CrPC की धारा 482 के तहत हाईकोर्ट में ही चुनौती दी जा सकती है।बता दें, CrPC की धारा 408 सेशन जज को अपने अधिकार क्षेत्र के भीतर क्रिमिनल ट्रायल/अपील को ट्रांसफर करने का अधिकार देती है।धारा 407 हाईकोर्ट को...

POCSO | क्या कथित रक्तस्राव से पेनेट्रेशन का अनुमान लगाया जा सकता है, जब मेडिकल रिपोर्ट में कोई चोट नहीं दिखाई गई हो? इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दिया जवाब

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि चोटों की अनुपस्थिति, अपने आप में बलात्कार या प्रवेशन यौन उत्पीड़न के आरोपों को खारिज नहीं करती। हालांकि, कथित रक्तस्राव से प्रवेश का अनुमान अत्यधिक संदिग्ध हो जाता है जब एक समसामयिक मेडिकल रिपोर्ट संतोषजनक स्पष्टीकरण के बिना किसी भी शारीरिक चोट को पूरी तरह से खारिज कर देती है।जस्टिस सलिल कुमार राय और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की पीठ ने कहा कि हालांकि भरोसेमंद नेत्र संबंधी गवाही आम तौर पर चिकित्सा राय पर हावी होती है, लेकिन समसामयिक चिकित्सा निष्कर्षों को नजरअंदाज...

Krishna Janmabhoomi Dispute | साइट पर एंट्री और कार सेवा पर रोक की मांग वाली याचिका: हाईकोर्ट ने DM और SSP से मांगी रिपोर्ट

श्री कृष्ण जन्मभूमि मालिकाना हक विवाद के चल रहे मामलों में इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक अर्ज़ी दी गई। इसमें अधिकारियों से मांग की गई कि वे किसी भी व्यक्ति या समूह को विवादित जगह पर मीटिंग करने, "कार सेवा" करने या कोई कार्यक्रम आयोजित करने से रोकें।यह अर्ज़ी आशुतोष महाराज ने वकील रीना एन. सिंह के ज़रिए दायर की। वह खुद को मथुरा के श्री कृष्ण जन्मभूमि मुक्ति निर्माण ट्रस्ट (रजिस्टर्ड) का अध्यक्ष बताते हैं।अर्ज़ी में खास तौर पर राज्य सरकार और प्रशासन से मांग की गई कि वे किसी भी व्यक्ति या समूह को...

तारीख पर तारीख आपराधिक न्याय व्यवस्था की पहचान नहीं बन सकती: 24 साल से लंबित अपहरण मुकदमे पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 24 वर्षों से लंबित एक अपहरण के मुकदमे पर गंभीर चिंता जताते हुए कहा कि तारीख पर तारीख आपराधिक न्याय व्यवस्था की पहचान नहीं बन सकती। अदालत ने कहा कि वर्षों तक बिना किसी सार्थक प्रगति के मुकदमा लंबित रहना न्याय व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है और यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निष्पक्ष एवं शीघ्र सुनवाई के अधिकार के विपरीत है।जस्टिस राजीव भारती की पीठ ने वर्ष 2001 के अपहरण के एक मामले में दो आरोपियों को अग्रिम जमानत देते हुए यह टिप्पणी की।अदालत ने कहा,"वर्षों तक कार्यवाही...

इलाहाबाद हाईकोर्ट का अहम फैसला: पुराने भूमि अधिग्रहण कानून के निरस्त होने के बाद जारी हुई अधिसूचना पर कार्रवाई अवैध

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि यदि भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 के तहत जारी अधिसूचना पर भले ही 1 जनवरी 2014 से पहले की तारीख अंकित हो, लेकिन उसका प्रकाशन 1 जनवरी 2014 के बाद हुआ है, तो ऐसी पूरी अधिग्रहण प्रक्रिया शुरू से ही अवैध मानी जाएगी। अदालत ने स्पष्ट किया कि पुराने कानून के निरस्त होने के बाद उसके तहत नई अधिग्रहण कार्रवाई शुरू नहीं की जा सकती।जस्टिस राजन राय और जस्टिस मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने कहा कि अधिसूचना पर लिखी तारीख का कोई कानूनी महत्व नहीं है। महत्वपूर्ण यह...

लिखित बयान दाखिल करने का अधिकार खत्म होने पर प्रतिवादी अपना साक्ष्य पेश नहीं कर सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि यदि किसी प्रतिवादी का लिखित बयान दाखिल करने का अधिकार समाप्त हो गया है, तो उसे अपने पक्ष में साक्ष्य पेश करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। अदालत ने स्पष्ट किया कि साक्ष्य केवल उन्हीं तथ्यों को सिद्ध करने के लिए दिया जा सकता है, जिनका उल्लेख पक्षकार ने अपनी दलीलों में किया हो। जब लिखित बयान ही नहीं है, तो उसके समर्थन में साक्ष्य देने का भी कोई आधार नहीं बनता।जस्टिस मनीष कुमार निगम ने कहा,"यदि कोई पक्षकार किसी महत्वपूर्ण तथ्य का उल्लेख अपनी दलीलों में नहीं करता तो वह उस...

निर्माता पर कार्रवाई से पहले निरीक्षण और जांच की प्रक्रिया अपनाना अनिवार्य: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि किसी निर्माता के खिलाफ विधिक माप विज्ञान (पैकेज्ड वस्तु) नियम, 2011 के तहत कार्रवाई करने से पहले नियम 19 और 21 में निर्धारित निरीक्षण एवं परीक्षण की प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य है। इन नियमों की अनदेखी कर की गई कार्रवाई कानूनन टिकाऊ नहीं होगी।जस्टिस आलोक माथुर ने कहा,"नियम 19 और 21 में निर्धारित पूर्व शर्तें अनिवार्य हैं। इनका उद्देश्य निर्माता और विक्रेता दोनों के हितों की रक्षा करना तथा यह सुनिश्चित करना है कि केवल वास्तविक दोषी के खिलाफ ही कार्रवाई हो।" मामला...

₹6.33 करोड़ रियल एस्टेट धोखाधड़ी मामला: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाजी इकबाल के खिलाफ जांच STF से SFIO को सौंपी, FIR रद्द करने से इनकार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ₹6.33 करोड़ के कथित रियल एस्टेट धोखाधड़ी मामले में पूर्व एमएलसी हाजी इकबाल उर्फ बाला के खिलाफ दर्ज एफआईआर रद्द करने से इनकार करते हुए जांच उत्तर प्रदेश एसटीएफ (STF) से लेकर सीरियस फ्रॉड इन्वेस्टिगेशन ऑफिस (SFIO) को सौंपने का आदेश दिया है।जस्टिस चंद्रधारी सिंह और जस्टिस लक्ष्मीकांत शुक्ला की खंडपीठ ने कहा कि जब आरोप स्पष्ट हों और प्रथम दृष्टया अपराध बनता हो, तब शुरुआती चरण में आपराधिक कार्यवाही को रोका नहीं जा सकता। अदालत ने कहा कि एफआईआर रद्द करने से शिकायतकर्ता के पास कोई...

फर्जी हस्ताक्षर और दस्तावेजों के इस्तेमाल पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त, याचिकाकर्ता और उसके वकील के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई का आदेश

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक जनहित याचिका (PIL) में फर्जी हस्ताक्षर और दस्तावेजों के इस्तेमाल का प्रथम दृष्टया मामला पाए जाने पर याचिकाकर्ता और उसके अधिवक्ता के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई शुरू करने का आदेश दिया है। अदालत ने कहा कि फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (FSL) की रिपोर्ट से रिकॉर्ड पर मौजूद हस्ताक्षरों में गंभीर विसंगतियां सामने आई हैं, जिससे जालसाजी और दस्तावेजों में हेरफेर की आशंका बनती है।चीफ जस्टिस अरुण भंसाली और जस्टिस क्षितिज शैलेन्द्र की खंडपीठ एक जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें कुशीनगर...

वकालतनामे पर हस्ताक्षर विवाद: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फॉरेंसिक जांच के दिए आदेश

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गाजीपुर स्थित नेहरू विद्यापीठ इंटर कॉलेज के प्रबंधन से जुड़े मामले में विवादित वकालतनामे पर किए गए हस्ताक्षरों की फॉरेंसिक जांच कराने का आदेश दिया है। अदालत के समक्ष एक पक्षकार ने दावा किया कि उसने न तो वकालतनामे पर हस्ताक्षर किए और न ही संबंधित अधिवक्ता को अपनी ओर से पेश होने के लिए अधिकृत किया था।जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की एकलपीठ के समक्ष यह विवाद पुनर्विचार याचिका की सुनवाई के दौरान सामने आया। याचिकाकर्ता शिव शंकर सिंह ने कहा कि उन्होंने संबंधित अधिवक्ता को कभी नियुक्त नहीं...

चुनाव याचिका में जाति प्रमाणपत्र की वैधता की जांच नहीं कर सकता चुनाव न्यायाधिकरण: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा कि चुनाव याचिका की सुनवाई के दौरान चुनाव न्यायाधिकरण किसी जाति प्रमाणपत्र की वैधता की जांच नहीं कर सकता और न ही उसे फर्जी घोषित करने का अधिकार रखता है।जस्टिस नीरज तिवारी ने स्पष्ट किया कि सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी जाति प्रमाणपत्र की वैधता तय करने या उसे निरस्त करने का अधिकार केवल राज्य सरकार द्वारा गठित जिला, मंडलीय और राज्य स्तरीय जांच समितियों को है। चुनाव न्यायाधिकरण इस विषय पर निर्णय देने का अधिकार नहीं रखता।कोर्ट ने कहा,"अब यह पूरी तरह...

IPC की धारा 307 के तहत जुर्माना न लगाना सज़ा सुनाने में गलती, दोषी की अपील पर इसे सुधारा नहीं जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 307 (हत्या की कोशिश) के तहत दोषी ठहराए जाने पर ट्रायल कोर्ट के लिए जेल की सज़ा के साथ जुर्माना लगाना ज़रूरी है और ऐसा न करना सज़ा सुनाने में एक गलती है।हालांकि, जस्टिस संतोष राय की बेंच ने साफ़ किया कि अगर राज्य या शिकायतकर्ता ने जुर्माना लगाकर सज़ा बढ़ाने की अपील नहीं की है, तो हाई कोर्ट सिर्फ़ दोषी की अपील पर इस कमी को ठीक नहीं कर सकता।बेंच ने कहा,"CrPC की धारा 374 के तहत सिर्फ़ दोषी की अपील पर CrPC की धारा 386 के तहत अपने अधिकार का इस्तेमाल करते हुए, यह कोर्ट...

बच्चे की कस्टडी आर्थिक रूप से सक्षम होने का दावा कर दी, तो पूरा भरण-पोषण पिता पर नहीं डाला जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि यदि कोई कामकाजी मां अपनी आर्थिक क्षमता का दावा करते हुए नाबालिग बच्चे की कस्टडी प्राप्त करती है तो बाद में वह बच्चे के भरण-पोषण का पूरा वित्तीय बोझ केवल पिता पर नहीं डाल सकती। यदि मां भी पर्याप्त आय अर्जित कर रही है, तो बच्चे के खर्च दोनों माता-पिता अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार वहन करेंगे।जस्टिस लक्ष्मी कांत शुक्ला ने यह टिप्पणी करते हुए एक महिला और उसकी नाबालिग बेटी की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज की। याचिका में फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी गई, जिसमें महिला...

1981 हत्या मामला: 12 लोगों पर एक साथ गोली चलाने का आरोप, लेकिन शव पर मिलीं सिर्फ 3 गोली की चोटें, हाईकोर्ट ने 3 दोषियों को किया बरी

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वर्ष 1981 के चर्चित हत्या मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए तीन जीवित अपीलकर्ताओं को सभी आरोपों से बरी किया। कोर्ट ने पाया कि अभियोजन का दावा था कि 12 आरोपियों ने एक साथ मृतक पर गोलियां चलाई थीं जबकि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मृतक के शरीर पर केवल तीन प्रवेश घाव और एक निकास घाव मिला। कोर्ट ने इसे अभियोजन के प्रत्यक्षदर्शी बयान और चिकित्सकीय साक्ष्य के बीच गंभीर विरोधाभास मानते हुए दोषसिद्धि को टिकाऊ नहीं माना।जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने वर्ष 1984...

1981 में पिता पर एसिड अटैक |ट्रायल जज के हत्या के आरोप को नज़रअंदाज़ करने और बेटे को सिर्फ़ 3 साल की सज़ा सुनाने पर हाईकोर्ट ने जताई नाराज़गी

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बुधवार को गोरखपुर की ट्रायल कोर्ट के फ़ैसले पर "गहरा दुख" जताया। इस फ़ैसले में एक व्यक्ति को IPC की धारा 326 के तहत दोषी ठहराया गया और अपने ही पिता पर एसिड डालकर उनकी जान लेने के लिए सिर्फ़ 3 साल की सज़ा सुनाई गई।जस्टिस संतोष राय की बेंच ने कहा,"...ट्रायल जज ने सबूतों को गलत तरीके से समझा और हत्या/गैर-इरादतन हत्या के अपराध से जुड़े तय सिद्धांतों को लागू करने में पूरी तरह नाकाम रहे। उन्होंने सिर्फ़ IPC की धारा 326 के तहत दोषी ठहराया और सिर्फ़ तीन साल की कठोर सज़ा सुनाई।" ...

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ₹2,161 करोड़ के कथित शराब घोटाले से जुड़ी FIR में छत्तीसगढ़ के पूर्व आबकारी आयुक्त को ज़मानत दी

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ₹2,161 करोड़ के कथित छत्तीसगढ़ शराब घोटाले से जुड़ी उत्तर प्रदेश की FIR में छत्तीसगढ़ के पूर्व आबकारी आयुक्त निरंजन दास को ज़मानत दी।जस्टिस विक्रम डी. चौहान ने कहा:"अगर आरोपी ज़मानत का हकदार है तो उसे सिर्फ़ आपराधिक इतिहास के आधार पर ज़मानत देने से मना नहीं किया जा सकता। आरोपी को ज़मानत देने से मना करने के लिए आपराधिक इतिहास के आधार पर कोई खास वजह नहीं बताई गई। इसलिए कोर्ट को यह सही नहीं लगता कि सिर्फ़ इस आधार पर कि उनका आपराधिक इतिहास रहा है, आवेदक को ज़मानत देने से मना...