SC के ताज़ा फैसले

नियमित पद के विज्ञापन के बदले संविदा पर नियुक्ति स्पष्ट रूप से अवैध: सुप्रीम कोर्ट
नियमित पद के विज्ञापन के बदले संविदा पर नियुक्ति 'स्पष्ट रूप से अवैध': सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (13 मई) को फैसला सुनाया कि नियमित रिक्तियों के लिए जारी विज्ञापन के बदले किसी उम्मीदवार को संविदा के आधार पर नियुक्त करना "स्पष्ट रूप से अवैध और असंवैधानिक" है, खासकर तब जब इस तरह के भेदभावपूर्ण व्यवहार के लिए कोई कारण दर्ज न किया गया हो।जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी की पीठ ने असिस्टेंट प्रोफेसर द्वारा दायर अपील स्वीकार की। इस प्रोफेसर को इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी, इलाहाबाद में शिक्षण पदों के लिए नियमित नौकरी के विज्ञापन के बदले संविदा पर...

Land Acquisition | आवासीय प्लॉट की सेल डीड का उपयोग औद्योगिक भूमि के मुआवजे को निर्धारित करने के लिए नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
Land Acquisition | आवासीय प्लॉट की सेल डीड का उपयोग औद्योगिक भूमि के मुआवजे को निर्धारित करने के लिए नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि राजमार्ग विस्तार के लिए अधिग्रहित औद्योगिक भूमि के मुआवजे को निर्धारित करने के लिए पास के किसी गांव के आवासीय बिक्री विलेख का उपयोग नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि 'भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित मुआवजा और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013' की धारा 26(1)(b) के तहत 'समान प्रकार की भूमि' की शर्त अनिवार्य है और भूमि अधिग्रहण मुआवजे को निर्धारित करने के लिए इसे सख्ती से लागू किया जाना चाहिए।जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की...

S.167 B(2) IT Act | एसोसिएशन ऑफ़ पर्सन्स के सदस्य को मुनाफ़े की परवाह किए बिना दिया गया तय हिस्सा, टैक्स के दायरे में आएगा: सुप्रीम कोर्ट
S.167 B(2) IT Act | 'एसोसिएशन ऑफ़ पर्सन्स' के सदस्य को मुनाफ़े की परवाह किए बिना दिया गया तय हिस्सा, टैक्स के दायरे में आएगा: सुप्रीम कोर्ट

टैक्स क़ानून पर एक अहम फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (12 मई) को कहा कि 'एसोसिएशन ऑफ़ पर्सन्स' (AOP) से कुल कमाई का एक तय हिस्सा पाने वाला सदस्य, अगर बिज़नेस के ख़र्च या नुक़सान नहीं उठाता है तो वह इस कमाई को "मुनाफ़े का हिस्सा" बताकर इनकम टैक्स से छूट का दावा नहीं कर सकता।यह बताना ज़रूरी है कि 'एसोसिएशन ऑफ़ पर्सन्स' (AOP) या 'बॉडी ऑफ़ इंडिविजुअल्स' (BOI) के सदस्यों पर टैक्स, इनकम टैक्स एक्ट, 1961 की धारा 167B (2) के साथ पढ़ी जाने वाली धारा 86 के तहत तय होता है। इन प्रावधानों को एक साथ...

कथित जातिगत गाली-गलौज किसी निजी घर के अंदर किए जाने पर SC/ST Act के तहत कोई अपराध नहीं: सुप्रीम कोर्ट
कथित जातिगत गाली-गलौज किसी निजी घर के अंदर किए जाने पर SC/ST Act के तहत कोई अपराध नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (11 मई) को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम (SC/ST Act) के तहत व्यक्ति के खिलाफ दर्ज मामला रद्द किया। इस व्यक्ति पर आरोप था कि उसने एक घर की चारदीवारी के अंदर, अनुसूचित जाति श्रेणी से ताल्लुक रखने वाले शिकायतकर्ता के साथ जाति-आधारित गाली-गलौज की थी।चूंकि FIR में यह ज़िक्र नहीं था कि अपीलकर्ता नंबर 1 और अन्य अपीलकर्ताओं द्वारा गाली-गलौज और धमकाने की कथित घटना किसी ऐसी जगह पर हुई, जहां आम लोगों की नज़र पड़ सकती हो, इसलिए कोर्ट ने यह माना कि SC/ST...

Order XII Rule 6 CPC | आपराधिक मामले में की गई स्वीकारोक्ति का इस्तेमाल सिविल कार्यवाही में किया जा सकता है: सुप्रीम कोर्ट
Order XII Rule 6 CPC | आपराधिक मामले में की गई स्वीकारोक्ति का इस्तेमाल सिविल कार्यवाही में किया जा सकता है: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश XII नियम 6 के तहत स्वीकारोक्ति पर आधारित फैसला, उन स्वीकारोक्तियों पर भी आधारित हो सकता है, जो लिखित दलीलों (Pleadings) के बाहर की गई हों।ट्रायल कोर्ट, पहली अपीलीय अदालत और हाईकोर्ट के एक जैसे फैसलों में दखल देने से इनकार करते हुए जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने प्रतिवादी (Defendant) की याचिका खारिज की। इस प्रतिवादी को आपराधिक कार्यवाही के दौरान की गई स्वीकारोक्तियों के आधार पर विवादित जगह खाली करने का...

S. 25 Hindu Succession Act | हत्या का आरोपी, मारे गए व्यक्ति की संपत्ति पर उत्तराधिकार का दावा नहीं कर सकता: सुप्रीम कोर्ट
S. 25 Hindu Succession Act | हत्या का आरोपी, मारे गए व्यक्ति की संपत्ति पर उत्तराधिकार का दावा नहीं कर सकता: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक वादी को किसी मृतक द्वारा बनाई गई वसीयत के आधार पर संपत्ति का उत्तराधिकार पाने से अयोग्य घोषित किया। कोर्ट ने यह पाया कि वह वादी, उस मृतक की हत्या के मामले में आरोपी के तौर पर नामजद है।कोर्ट ने हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 (Hindu Succession Act) की धारा 25 के तहत मिली शक्ति का इस्तेमाल करते हुए वादी को अयोग्य घोषित किया। यह धारा यह प्रावधान करती है कि जो व्यक्ति किसी की हत्या करता है, या हत्या करने में किसी की मदद करता है, वह मारे गए व्यक्ति की संपत्ति का...

बेनामी लेन-देन में खरीदी गई संपत्ति पर असली मालिक, बेनामीदार द्वारा बनाई गई वसीयत के आधार पर दावा नहीं कर सकता: सुप्रीम कोर्ट
बेनामी लेन-देन में खरीदी गई संपत्ति पर असली मालिक, बेनामीदार द्वारा बनाई गई वसीयत के आधार पर दावा नहीं कर सकता: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि कोई भी व्यक्ति बेनामी लेन-देन में खरीदी गई संपत्ति पर, केवल उसके नाममात्र के मालिक (Ostensible Owner) द्वारा बनाई गई वसीयत के आधार पर मालिकाना हक का दावा नहीं कर सकता। कोर्ट ने यह टिप्पणी करते हुए कहा कि इस तरह की वसीयत संबंधी व्यवस्थाओं का इस्तेमाल 'बेनामी संपत्ति लेन-देन निषेध अधिनियम, 1988' केतहत मौजूद कानूनी रोक को खत्म करने के लिए नहीं किया जा सकता।कोर्ट ने शुक्रवार (8 मई) को यह भी फैसला दिया कि किसी व्यावसायिक अनुबंध के तहत किसी अन्य व्यक्ति द्वारा दिए गए...

रेलवे, बिजली अधिनियम के तहत उपभोक्ता, डीम्ड डिस्ट्रीब्यूशन लाइसेंसी नहीं: सुप्रीम कोर्ट
रेलवे, बिजली अधिनियम के तहत 'उपभोक्ता', 'डीम्ड डिस्ट्रीब्यूशन लाइसेंसी' नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (8 मई) को फैसला सुनाया कि रेलवे, बिजली अधिनियम, 2003 के अर्थ के तहत एक 'उपभोक्ता' है। इस फैसले के साथ ही रेलवे का वह दावा खारिज हो गया, जिसमें वह 'डीम्ड डिस्ट्रीब्यूशन लाइसेंसी' (माना गया वितरण लाइसेंसी) का दर्जा मांग रहा था, ताकि वह वितरण कंपनियों को क्रॉस-सब्सिडी सरचार्ज और अतिरिक्त सरचार्ज का भुगतान करने से बच सके।कोर्ट ने कहा कि भारतीय रेलवे एक बंद और आत्मनिर्भर बिजली नेटवर्क चलाता है, जिसका एकमात्र उद्देश्य उसकी अपनी आंतरिक परिचालन ज़रूरतों को पूरा करना है—जिसमें...

उपभोक्ताओं से उस अवधि के लिए मूल्यह्रास नहीं वसूला जा सकता, जिस दौरान उन्हें बिजली की सप्लाई न की गई: सुप्रीम कोर्ट
उपभोक्ताओं से उस अवधि के लिए मूल्यह्रास नहीं वसूला जा सकता, जिस दौरान उन्हें बिजली की सप्लाई न की गई: सुप्रीम कोर्ट

बिजली उपभोक्ताओं को बड़ी राहत देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (7 मई) को यह टिप्पणी की कि बिजली उपभोक्ताओं पर उस पावर प्लांट के डेप्रिसिएशन की लागत चुकाने का बोझ नहीं डाला जा सकता, जिससे उन्हें अब बिजली की सप्लाई नहीं मिल रही है; भले ही उस एसेट (संपत्ति) की तकनीकी उपयोगिता अवधि अभी बाकी हो।जस्टिस पामिदिघंतम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने टिप्पणी की,"...यह स्वीकार्य है कि मार्च 2018 के बाद उपभोक्ताओं को बिजली की सप्लाई नहीं की गई। उपभोक्ताओं से ऐसी सेवा के लिए भुगतान करने की...

पैरा-टीचर्स का रेगुलराइज़ेशन का दावा राज्य द्वारा तय किए गए शैक्षिक मानकों के अधीन: सुप्रीम कोर्ट
पैरा-टीचर्स का रेगुलराइज़ेशन का दावा राज्य द्वारा तय किए गए शैक्षिक मानकों के अधीन: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कॉन्ट्रैक्ट पर रखे गए टीचर सिर्फ़ अपनी लंबी सेवा के आधार पर किसी न्यायिक आदेश के ज़रिए रेगुलराइज़ेशन का दावा अपने अधिकार के तौर पर नहीं कर सकते; क्योंकि इससे वैधानिक नियमों के बाहर सार्वजनिक भर्ती का एक समानांतर तरीका बन जाता है।जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस SVN भट्टी की बेंच ने कहा कि जहां एक तरफ़ एड-हॉक टीचर का सरकारी टीचर बनने की "इच्छा" रखना उचित है, वहीं दूसरी तरफ़ गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए उम्मीदवारों की "उपयुक्तता" का आकलन करना भी राज्य का कर्तव्य...

S.28 Specific Relief Act | खरीदार की चूक के कारण बिक्री समझौता रद्द करने के लिए अलग से आवेदन की ज़रूरत नहीं: सुप्रीम कोर्ट
S.28 Specific Relief Act | खरीदार की चूक के कारण बिक्री समझौता रद्द करने के लिए अलग से आवेदन की ज़रूरत नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (6 मई) को यह टिप्पणी की कि यदि कोई डिक्री-धारक (जिसके पक्ष में फैसला आया हो) तय समय सीमा के भीतर बिक्री की शेष राशि जमा करने में विफल रहता है तो बिक्री समझौते के 'विशिष्ट पालन' (specific performance) के लिए जारी डिक्री को लागू नहीं किया जा सकता, जिसके परिणामस्वरूप वह अनुबंध (contract) रद्द हो जाता है।कोर्ट ने यह फैसला दिया कि खरीदार की चूक के कारण अनुबंध रद्द करने के लिए 'निर्णय-ऋणी' (जिसके खिलाफ फैसला आया हो) द्वारा अलग से आवेदन देना अनिवार्य नहीं है।जस्टिस पंकज मित्तल...

मंदिर पर सिर्फ़ निगरानी की भूमिका निभाने और पुजारियों की नियुक्ति करने से ही मालिकाना हक़ नहीं मिल जाता: सुप्रीम कोर्ट
मंदिर पर सिर्फ़ निगरानी की भूमिका निभाने और पुजारियों की नियुक्ति करने से ही मालिकाना हक़ नहीं मिल जाता: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि सिर्फ़ इस बात से कि किसी समूह ने मंदिर पर प्रबंधकीय या निगरानी का नियंत्रण रखा है, उसे अपने-आप मंदिर का मालिकाना हक़ नहीं मिल जाता।कोर्ट ने कहा,"सिर्फ़ इस बात से कि किसी संस्था ने मंदिर पर कुछ निगरानी या प्रबंधकीय काम किए, या 'पुजारियों' की नियुक्ति में हिस्सा लिया है, उसे अपने-आप मालिकाना हक़ नहीं मिल जाता।" जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने राजस्थान हाईकोर्ट का फ़ैसला रद्द किया। हाईकोर्ट ने राजस्थान के कोटा में स्थित मंदिर 'मूर्ति स्वरूप श्री...

तटस्थ रहने वालों को तीसरे पक्ष के अधिकार पक्के हो जाने के बाद वरिष्ठता विवाद उठाने की अनुमति नहीं दी जा सकती: सुप्रीम कोर्ट
'तटस्थ रहने वालों' को तीसरे पक्ष के अधिकार पक्के हो जाने के बाद वरिष्ठता विवाद उठाने की अनुमति नहीं दी जा सकती: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (4 मई) को कहा कि 'तटस्थ रहने वालों' (fence-sitters)—यानी ऐसे लोग जो किसी मुकदमे को बिना दखल दिए किनारे से देखते रहते हैं—को मामला खत्म हो जाने के बाद वरिष्ठता और उसके आधार पर मिलने वाले प्रमोशन से जुड़े विवाद उठाने की अनुमति नहीं दी जा सकती।जस्टिस अहसानुद्दीन अमनुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने कहा,"यह एक स्थापित कानून है कि तटस्थ रहने वालों को मामला खत्म हो जाने के बाद वरिष्ठता और उसके आधार पर मिलने वाले प्रमोशन से जुड़ा कोई विवाद उठाने या किसी आदेश की वैधता को...

जाली वसीयत पर आधारित संपत्ति खरीदने वाला खरीदार आपराधिक रूप से जिम्मेदार नहीं: सुप्रीम कोर्ट
जाली वसीयत पर आधारित संपत्ति खरीदने वाला खरीदार आपराधिक रूप से जिम्मेदार नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी जाली वसीयत (Will) के आधार पर खरीदी गई संपत्ति के मामले में, यदि खरीदार को उस जालसाजी की जानकारी नहीं थी, तो उसे आपराधिक रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने एक खरीदार के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि जब खरीद के समय खरीदार को कथित फर्जी वसीयत की जानकारी नहीं थी और वह संबंधित अवधि में विदेश में था, तो उसे धोखाधड़ीपूर्ण लेन-देन के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता।अदालत ने स्पष्ट किया...

अगर नियुक्ति अगले आदेश तक की शर्त पर है तो पूरा कार्यकाल करने का कोई अधिकार नहीं: सुप्रीम कोर्ट
अगर नियुक्ति 'अगले आदेश तक' की शर्त पर है तो पूरा कार्यकाल करने का कोई अधिकार नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (28 अप्रैल) को यह टिप्पणी की कि अगर किसी नियुक्ति आदेश में कार्यकाल को "अगले आदेश तक" की शर्त के अधीन रखा गया है तो इससे कर्मचारी को पूरे कार्यकाल तक पद पर बने रहने का कोई ऐसा अधिकार नहीं मिल जाता, जिसे वह कानूनी तौर पर लागू करवा सके।जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की खंडपीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला सही ठहराया, जिसमें प्रतिवादी अधिकारियों द्वारा अपीलकर्ता का कार्यकाल कम किए जाने का फैसला बरकरार रखा गया था। खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि हालांकि...

RTE Act | स्कूल, राज्य द्वारा आवंटित स्टूडेंट का एडमिशन योग्यता पर विवाद का बहाना बनाकर नहीं रोक सकते: सुप्रीम कोर्ट
RTE Act | स्कूल, राज्य द्वारा आवंटित स्टूडेंट का एडमिशन योग्यता पर विवाद का बहाना बनाकर नहीं रोक सकते: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि प्राइवेट "पड़ोस के स्कूलों" को शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 (RTE Act) के तहत राज्य द्वारा आवंटित स्टूडेंट्स को तुरंत एडमिशन देना होगा। इस मामले में वे इस आधार पर एडमिशन से मना नहीं कर सकते कि छात्र की योग्यता को लेकर कोई विवाद अभी लंबित है।कोर्ट ने साफ किया कि भले ही स्कूल को किसी स्टूडेंट की योग्यता को लेकर कोई शक हो तो भी वह स्पष्टीकरण के लिए अधिकारियों से संपर्क कर सकता है, लेकिन इस बीच वह एडमिशन नहीं रोक सकता।जस्टिस पमिदिघंतम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक...

S.27 Evidence Act | अलग-अलग आरोपियों के संयुक्त बयान तभी स्वीकार्य, जब उनसे अलग-अलग नई बातें सामने आती हों: सुप्रीम कोर्ट
S.27 Evidence Act | अलग-अलग आरोपियों के संयुक्त बयान तभी स्वीकार्य, जब उनसे अलग-अलग नई बातें सामने आती हों: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि अलग-अलग आरोपियों द्वारा दिए गए संयुक्त या एक साथ दिए गए खुलासे के बयान साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 के तहत तभी स्वीकार्य हैं, जब ऐसे बयानों से अपराध से जुड़े अलग और प्रासंगिक तथ्यों का पता चलता हो।जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की खंडपीठ ने यह फैसला कर्नाटक से जुड़े हत्या के मामले में अपनी दोषसिद्धि को चुनौती देने वाले दो दोषियों द्वारा दायर आपराधिक अपीलों पर सुनवाई करते हुए दिया। कोर्ट ने अंततः अपीलकर्ताओं को बरी किया, लेकिन भारतीय साक्ष्य अधिनियम,...

Article 227 | हाईकोर्ट ट्रायल कोर्ट द्वारा विचार किए गए सबूतों का दोबारा मूल्यांकन नहीं कर सकते: सुप्रीम कोर्ट
Article 227 | हाईकोर्ट ट्रायल कोर्ट द्वारा विचार किए गए सबूतों का दोबारा मूल्यांकन नहीं कर सकते: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट के लिए संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत अपने सुपरवाइजरी अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते हुए निचली अदालतों के फैसलों में दखल देना गलत है।जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की बेंच ने बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला रद्द करते हुए यह बात कही, जिसमें हाईकोर्ट ने अपील कोर्ट का फैसले में दखल दिया था, जिसमें अपीलकर्ता को बेदखली के मुकदमे में संशोधन करने की इजाज़त दी गई थी।बेंच ने कहा, "यह बात अच्छी तरह से तय है कि इस तरह के अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते समय...

मकान मालिक के कानूनी वारिस बेदखली के मुकदमे में वास्तविक ज़रूरत जोड़ने के लिए संशोधन कर सकते हैं: सुप्रीम कोर्ट
मकान मालिक के कानूनी वारिस बेदखली के मुकदमे में 'वास्तविक ज़रूरत' जोड़ने के लिए संशोधन कर सकते हैं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी की है कि यदि कोई मकान मालिक, जिसने अपने और अपने परिवार के लिए 'वास्तविक ज़रूरत' (bona fide requirement) के आधार पर बेदखली का मुकदमा दायर किया था, उसका निधन हो जाता है तो उसके कानूनी वारिस मुकदमे की दलीलों में संशोधन करके 'वास्तविक ज़रूरत' के अतिरिक्त आधारों को शामिल कर सकते हैं; बशर्ते कि ऐसे संशोधन मुकदमे के मूल आधार से न तो टकराते हों और न ही उसे बदलते हों।जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की खंडपीठ ने मकान मालिक के कानूनी वारिसों (पत्नी और बच्चों)...