SC के ताज़ा फैसले

सिर्फ़ कस्टडी में दिए गए कबूलनामे के आधार पर प्रिवेंटिव डिटेंशन नहीं हो सकता: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अधिकारी सिर्फ़ आरोपी के कबूलनामे के आधार पर प्रिवेंटिव डिटेंशन (एहतियाती हिरासत) का आदेश जारी नहीं कर सकते। कोर्ट ने नेशनल सिक्योरिटी एक्ट, 1980 के तहत मुल्ला अफ़रोज़ की हिरासत रद्द की, जिस पर 2024 की संभल हिंसा का मास्टरमाइंड होने का आरोप है।"इसलिए हमारी राय है कि पुलिस अधिकारी के सामने दिया गया कबूलनामा, अकेले और किसी स्वतंत्र सबूत के समर्थन के बिना प्रिवेंटिव डिटेंशन के आदेश को बनाए रखने के लिए ज़रूरी 'व्यक्तिगत संतुष्टि' (Subjective Satisfaction) का आधार नहीं बन सकता।...

एक ही पद पर काम करने वाले सीनियर अधिकारी को जूनियर से कम वेतन नहीं दिया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक ही पद पर काम करने वाले सीनियर कर्मचारी को जूनियर से कम वेतन नहीं दिया जा सकता, जब तक कि इस अंतर के पीछे कोई ठोस और साबित करने लायक कारण न हों।कोर्ट ने कहा,"यह एक बुनियादी बात है कि एक ही पद पर काम करने वाले सीनियर अधिकारी को जूनियर अधिकारी से कम वेतन नहीं दिया जा सकता... अगर किसी जूनियर को सीनियर से ज़्यादा वेतन मिल रहा है तो इसके लिए ठोस कारण होने चाहिए।" जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की बेंच ने अलीगढ़ के धर्म समाज कॉलेज के रीडर (एसोसिएट प्रोफेसर) की अपील...

कर्मचारी को हटाने वाला अधिकारी नियुक्ति करने वाले अधिकारी के बराबर पद का है तो आर्टिकल 311 के तहत रोक लागू नहीं होती: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान के आर्टिकल 311(1) के तहत संवैधानिक सुरक्षा तभी लागू होती है, जब हटाने वाला अधिकारी, नियुक्ति करने वाले अधिकारी से निचले पद का हो। कोर्ट ने यह भी कहा कि कानूनी नियमों के तहत किसी निचले अधिकारी को अनुशासनात्मक शक्तियां सौंपने (डेलिगेशन) से संवैधानिक रोक लागू नहीं होती।बता दें, आर्टिकल 311(1) किसी सिविल सेवक को उस अधिकारी द्वारा बर्खास्त या हटाने से रोकता है, जो उसकी नियुक्ति करने वाले अधिकारी से निचले पद का हो। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच...

BREAKING | स्टूडेंट की NSA हिरासत रद्द करने और नोएडा DM की आलोचना वाले हाईकोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश पर रोक लगाई, जिसमें गौतम बुद्ध नगर जिले (नोएडा) की मजिस्ट्रेट मेधा रूपम को नोएडा में मज़दूरों के विरोध-प्रदर्शन के सिलसिले में छात्रा आकृति चौधरी को नेशनल सिक्योरिटी एक्ट (NSA) के तहत हिरासत में रखने के लिए अपनी सैलरी से 5 लाख रुपये का मुआवज़ा देने का निर्देश दिया गया था।कोर्ट ने उस फ़ैसले के अमल पर भी रोक लगाई, जिसमें छात्रा की हिरासत रद्द की गई थी।जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस एनके सिंह की बेंच ने DM और उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा दायर दो अलग-अलग...

Hindu Succession Act | बिना बंटवारे के भी S14(1) के तहत विधवा का सीमित अधिकार पूर्ण अधिकार बन जाता है: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक हिंदू विधवा, जिसे 'हिंदू महिला संपत्ति अधिकार अधिनियम, 1937' के तहत अपने मृत पति की संपत्ति में अधिकार मिला है, वह 'हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956' की धारा 14(1) के तहत उस अधिकार की पूर्ण मालिक बन सकती है, भले ही संपत्ति का कोई बंटवारा न हुआ हो।कोर्ट ने कहा कि भले ही संपत्ति का बंटवारा न हुआ हो, लेकिन 1956 से पहले पति की मृत्यु पर विरासत में मिली संपत्ति में विधवा का सीमित अधिकार सिर्फ़ इसलिए खत्म नहीं हो जाता कि उसने औपचारिक बंटवारे की मांग नहीं की या उसे हासिल नहीं...

केंद्र सरकार किसी भी अधिकारी को कंपनीज़ एक्ट के तहत धोखाधड़ी की शिकायत दर्ज करने के लिए अधिकृत कर सकती है: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केंद्र सरकार की वह समीक्षा याचिका खारिज की, जिसमें आर्थिक अपराधों के लिए बनी स्पेशल कोर्ट द्वारा कंपनीज़ एक्ट, 2013 के तहत धोखाधड़ी से जुड़े अपराधों का संज्ञान निजी शिकायत के आधार पर न लेने के फैसले को चुनौती दी गई थी।हालांकि, चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस के. विनोद चंद्रन और जॉयमाल्य बागची की बेंच ने स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार, सीरियस फ्रॉड इन्वेस्टिगेशन ऑफिस (SFIO) के डायरेक्टर के अलावा, कंपनीज़ एक्ट की धारा 212(6) के दूसरे प्रावधान के तहत किसी...

गिरफ्तारी के लिखित आधार नहीं बताए तो पुलिस अधिकारी पर होगी विभागीय जांच: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करने वाले पुलिस अधिकारी ने यदि गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में उपलब्ध नहीं कराए हैं तो उसके खिलाफ विभागीय जांच शुरू की जानी चाहिए।कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 22(1) के तहत गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में और आरोपी की समझ वाली भाषा में देना अनिवार्य है। इसका पालन नहीं होने पर गिरफ्तारी गैरकानूनी मानी जाएगी। जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चंद्रकुर की खंडपीठ ने कहा कि गिरफ्तारी के आधार...

BREAKING | गिरफ्तारी का कारण न बताने पर पहली गिरफ्तारी रद्द होने के बाद दोबारा गिरफ्तारी के लिए मजिस्ट्रेट की मंज़ूरी ज़रूरी: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक अहम फ़ैसला सुनाया। इसमें आरोपी की दोबारा गिरफ्तारी की प्रक्रिया साफ़ की गई—खासकर तब, जब संविधान के आर्टिकल 22(1) के तहत गिरफ्तारी का कारण न बताने की वजह से पिछली गिरफ्तारी को गैर-कानूनी घोषित कर दिया गया हो।जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस अतुल चंदुरकर की बेंच ने तय किया कि जिस व्यक्ति को आर्टिकल 22(1) के उल्लंघन के कारण रिहा किया गया था, उसे दोबारा गिरफ्तार करने के लिए पुलिस को संबंधित ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के सामने अर्ज़ी देनी होगी और मजिस्ट्रेट की मंज़ूरी लेनी...

कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वाले कर्मचारियों को ग्रेच्युटी देने के लिए मुख्य नियोक्ता ज़िम्मेदार नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब मुख्य नियोक्ता और कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वाले कर्मचारियों के बीच नियोक्ता-कर्मचारी का संबंध न हो तो कॉन्ट्रैक्टर के ज़रिए रखे गए कर्मचारियों को ग्रेच्युटी देने के लिए मुख्य नियोक्ता को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द किया, जिसमें ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉर्पोरेशन लिमिटेड (ONGC) को कॉन्ट्रैक्टर के ज़रिए रखे गए कर्मचारियों को ग्रेच्युटी देने के लिए ज़िम्मेदार ठहराया गया था। कोर्ट ने कहा कि कंट्रोलिंग अथॉरिटी यह तय नहीं कर सकती कि...

S. 92 CPC | पब्लिक ट्रस्ट के खिलाफ़ केस करने की इजाज़त वाली अर्ज़ी पेंडिंग होने पर सिविल कोर्ट अंतरिम आदेश नहीं दे सकता: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (18 सितंबर) को कहा कि जब तक 'कोड ऑफ़ सिविल प्रोसीजर, 1908' (CPC) की धारा 92 के तहत केस करने की इजाज़त मांगने वाली अर्ज़ी पेंडिंग है, तब तक सिविल कोर्ट सुरक्षा या बचाव से जुड़े अंतरिम आदेश नहीं दे सकता।चूंकि CPC की धारा 92 के तहत लोगों के समूह की ओर से केस (रिप्रेजेंटेटिव सूट) करने के लिए कोर्ट से पहले इजाज़त लेना ज़रूरी है, इसलिए जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस मनमोहन की बेंच ने कहा कि धारा 92 CPC के तहत इजाज़त मिलना केस शुरू करने के लिए एक ज़रूरी शर्त है। जब तक ऐसी इजाज़त...

रद्द किए गए नियमों के तहत प्रमोशन का दावा करने का कोई पक्का अधिकार नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (17 सितंबर) को फिर से कहा कि लागू नियमों के तहत बनने वाली प्रमोशन वाली पोस्ट को ज़रूरी नहीं कि उन्हीं नियमों के तहत भरा जाए, खासकर तब जब वे नियम अब रद्द कर दिए गए हों। कोर्ट ने माना कि ऐसी प्रमोशन वाली पोस्ट को नए नियमों के तहत भरा जा सकता है, जिनमें भर्ती के नए तरीके बताए गए।जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने कहा,"सरकार के पॉलिसी फ़ैसले को देखते हुए कर्मचारी को रद्द किए गए नियमों के अनुसार प्रमोशन पर विचार किए जाने का कोई पक्का अधिकार नहीं...

आर्टिकल 220 के तहत पूर्व हाईकोर्ट जजों को बार काउंसिल में महिला सदस्य के तौर पर शामिल करने पर कोई रोक नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ किया कि संविधान का आर्टिकल 220, जो भारत में अदालतों और अधिकारियों के सामने प्रैक्टिस करने से पूर्व हाईकोर्ट चीफ जस्टिसों और जजों को रोकता है, उन्हें संबंधित राज्य बार काउंसिल में महिला सदस्य के तौर पर शामिल करने से नहीं रोकता।चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने यह स्पष्टीकरण तब दिया, जब वह राज्य बार काउंसिल में महिला सदस्यों को शामिल करने के बारे में कोर्ट के पहले के निर्देशों में बदलाव की मांग करने वाली अलग-अलग...

सिर्फ़ लंबे समय तक कब्ज़ा एडवर्स पज़ेशन साबित नहीं करता, इसके लिए विरोधी इरादा ज़रूरी: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (10.09.2026) को कहा कि किसी प्रॉपर्टी पर सिर्फ़ लंबे समय तक और बिना रुकावट कब्ज़ा होना ही 'एडवर्स पज़ेशन' (प्रतिकूल कब्ज़ा) का दावा साबित करने के लिए काफ़ी नहीं है। इसके लिए यह साबित करना ज़रूरी है कि कब्ज़ा किस बिंदु पर असली मालिक के खिलाफ़ (विरोधी) हो गया।ऐसा फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने यह भी कहा कि रेवेन्यू रिकॉर्ड में कब्ज़े को 'गैर-मरूसी बिला लगान बवजह धर्म-अर्थ' (यानी धार्मिक उद्देश्यों के लिए बिना किराया दिए कब्ज़ा) के तौर पर दर्ज करना प्रॉपर्टी को पूरी तरह से...