SC के ताज़ा फैसले
S. 25 Hindu Succession Act | हत्या का आरोपी, मारे गए व्यक्ति की संपत्ति पर उत्तराधिकार का दावा नहीं कर सकता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक वादी को किसी मृतक द्वारा बनाई गई वसीयत के आधार पर संपत्ति का उत्तराधिकार पाने से अयोग्य घोषित किया। कोर्ट ने यह पाया कि वह वादी, उस मृतक की हत्या के मामले में आरोपी के तौर पर नामजद है।कोर्ट ने हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 (Hindu Succession Act) की धारा 25 के तहत मिली शक्ति का इस्तेमाल करते हुए वादी को अयोग्य घोषित किया। यह धारा यह प्रावधान करती है कि जो व्यक्ति किसी की हत्या करता है, या हत्या करने में किसी की मदद करता है, वह मारे गए व्यक्ति की संपत्ति का...
बेनामी लेन-देन में खरीदी गई संपत्ति पर असली मालिक, बेनामीदार द्वारा बनाई गई वसीयत के आधार पर दावा नहीं कर सकता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि कोई भी व्यक्ति बेनामी लेन-देन में खरीदी गई संपत्ति पर, केवल उसके नाममात्र के मालिक (Ostensible Owner) द्वारा बनाई गई वसीयत के आधार पर मालिकाना हक का दावा नहीं कर सकता। कोर्ट ने यह टिप्पणी करते हुए कहा कि इस तरह की वसीयत संबंधी व्यवस्थाओं का इस्तेमाल 'बेनामी संपत्ति लेन-देन निषेध अधिनियम, 1988' केतहत मौजूद कानूनी रोक को खत्म करने के लिए नहीं किया जा सकता।कोर्ट ने शुक्रवार (8 मई) को यह भी फैसला दिया कि किसी व्यावसायिक अनुबंध के तहत किसी अन्य व्यक्ति द्वारा दिए गए...
रेलवे, बिजली अधिनियम के तहत 'उपभोक्ता', 'डीम्ड डिस्ट्रीब्यूशन लाइसेंसी' नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (8 मई) को फैसला सुनाया कि रेलवे, बिजली अधिनियम, 2003 के अर्थ के तहत एक 'उपभोक्ता' है। इस फैसले के साथ ही रेलवे का वह दावा खारिज हो गया, जिसमें वह 'डीम्ड डिस्ट्रीब्यूशन लाइसेंसी' (माना गया वितरण लाइसेंसी) का दर्जा मांग रहा था, ताकि वह वितरण कंपनियों को क्रॉस-सब्सिडी सरचार्ज और अतिरिक्त सरचार्ज का भुगतान करने से बच सके।कोर्ट ने कहा कि भारतीय रेलवे एक बंद और आत्मनिर्भर बिजली नेटवर्क चलाता है, जिसका एकमात्र उद्देश्य उसकी अपनी आंतरिक परिचालन ज़रूरतों को पूरा करना है—जिसमें...
उपभोक्ताओं से उस अवधि के लिए मूल्यह्रास नहीं वसूला जा सकता, जिस दौरान उन्हें बिजली की सप्लाई न की गई: सुप्रीम कोर्ट
बिजली उपभोक्ताओं को बड़ी राहत देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (7 मई) को यह टिप्पणी की कि बिजली उपभोक्ताओं पर उस पावर प्लांट के डेप्रिसिएशन की लागत चुकाने का बोझ नहीं डाला जा सकता, जिससे उन्हें अब बिजली की सप्लाई नहीं मिल रही है; भले ही उस एसेट (संपत्ति) की तकनीकी उपयोगिता अवधि अभी बाकी हो।जस्टिस पामिदिघंतम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने टिप्पणी की,"...यह स्वीकार्य है कि मार्च 2018 के बाद उपभोक्ताओं को बिजली की सप्लाई नहीं की गई। उपभोक्ताओं से ऐसी सेवा के लिए भुगतान करने की...
पैरा-टीचर्स का रेगुलराइज़ेशन का दावा राज्य द्वारा तय किए गए शैक्षिक मानकों के अधीन: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कॉन्ट्रैक्ट पर रखे गए टीचर सिर्फ़ अपनी लंबी सेवा के आधार पर किसी न्यायिक आदेश के ज़रिए रेगुलराइज़ेशन का दावा अपने अधिकार के तौर पर नहीं कर सकते; क्योंकि इससे वैधानिक नियमों के बाहर सार्वजनिक भर्ती का एक समानांतर तरीका बन जाता है।जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस SVN भट्टी की बेंच ने कहा कि जहां एक तरफ़ एड-हॉक टीचर का सरकारी टीचर बनने की "इच्छा" रखना उचित है, वहीं दूसरी तरफ़ गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए उम्मीदवारों की "उपयुक्तता" का आकलन करना भी राज्य का कर्तव्य...
S.28 Specific Relief Act | खरीदार की चूक के कारण बिक्री समझौता रद्द करने के लिए अलग से आवेदन की ज़रूरत नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (6 मई) को यह टिप्पणी की कि यदि कोई डिक्री-धारक (जिसके पक्ष में फैसला आया हो) तय समय सीमा के भीतर बिक्री की शेष राशि जमा करने में विफल रहता है तो बिक्री समझौते के 'विशिष्ट पालन' (specific performance) के लिए जारी डिक्री को लागू नहीं किया जा सकता, जिसके परिणामस्वरूप वह अनुबंध (contract) रद्द हो जाता है।कोर्ट ने यह फैसला दिया कि खरीदार की चूक के कारण अनुबंध रद्द करने के लिए 'निर्णय-ऋणी' (जिसके खिलाफ फैसला आया हो) द्वारा अलग से आवेदन देना अनिवार्य नहीं है।जस्टिस पंकज मित्तल...
मंदिर पर सिर्फ़ निगरानी की भूमिका निभाने और पुजारियों की नियुक्ति करने से ही मालिकाना हक़ नहीं मिल जाता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि सिर्फ़ इस बात से कि किसी समूह ने मंदिर पर प्रबंधकीय या निगरानी का नियंत्रण रखा है, उसे अपने-आप मंदिर का मालिकाना हक़ नहीं मिल जाता।कोर्ट ने कहा,"सिर्फ़ इस बात से कि किसी संस्था ने मंदिर पर कुछ निगरानी या प्रबंधकीय काम किए, या 'पुजारियों' की नियुक्ति में हिस्सा लिया है, उसे अपने-आप मालिकाना हक़ नहीं मिल जाता।" जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने राजस्थान हाईकोर्ट का फ़ैसला रद्द किया। हाईकोर्ट ने राजस्थान के कोटा में स्थित मंदिर 'मूर्ति स्वरूप श्री...
'तटस्थ रहने वालों' को तीसरे पक्ष के अधिकार पक्के हो जाने के बाद वरिष्ठता विवाद उठाने की अनुमति नहीं दी जा सकती: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (4 मई) को कहा कि 'तटस्थ रहने वालों' (fence-sitters)—यानी ऐसे लोग जो किसी मुकदमे को बिना दखल दिए किनारे से देखते रहते हैं—को मामला खत्म हो जाने के बाद वरिष्ठता और उसके आधार पर मिलने वाले प्रमोशन से जुड़े विवाद उठाने की अनुमति नहीं दी जा सकती।जस्टिस अहसानुद्दीन अमनुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने कहा,"यह एक स्थापित कानून है कि तटस्थ रहने वालों को मामला खत्म हो जाने के बाद वरिष्ठता और उसके आधार पर मिलने वाले प्रमोशन से जुड़ा कोई विवाद उठाने या किसी आदेश की वैधता को...
जाली वसीयत पर आधारित संपत्ति खरीदने वाला खरीदार आपराधिक रूप से जिम्मेदार नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी जाली वसीयत (Will) के आधार पर खरीदी गई संपत्ति के मामले में, यदि खरीदार को उस जालसाजी की जानकारी नहीं थी, तो उसे आपराधिक रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने एक खरीदार के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि जब खरीद के समय खरीदार को कथित फर्जी वसीयत की जानकारी नहीं थी और वह संबंधित अवधि में विदेश में था, तो उसे धोखाधड़ीपूर्ण लेन-देन के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता।अदालत ने स्पष्ट किया...
अगर नियुक्ति 'अगले आदेश तक' की शर्त पर है तो पूरा कार्यकाल करने का कोई अधिकार नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (28 अप्रैल) को यह टिप्पणी की कि अगर किसी नियुक्ति आदेश में कार्यकाल को "अगले आदेश तक" की शर्त के अधीन रखा गया है तो इससे कर्मचारी को पूरे कार्यकाल तक पद पर बने रहने का कोई ऐसा अधिकार नहीं मिल जाता, जिसे वह कानूनी तौर पर लागू करवा सके।जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की खंडपीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला सही ठहराया, जिसमें प्रतिवादी अधिकारियों द्वारा अपीलकर्ता का कार्यकाल कम किए जाने का फैसला बरकरार रखा गया था। खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि हालांकि...
RTE Act | स्कूल, राज्य द्वारा आवंटित स्टूडेंट का एडमिशन योग्यता पर विवाद का बहाना बनाकर नहीं रोक सकते: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि प्राइवेट "पड़ोस के स्कूलों" को शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 (RTE Act) के तहत राज्य द्वारा आवंटित स्टूडेंट्स को तुरंत एडमिशन देना होगा। इस मामले में वे इस आधार पर एडमिशन से मना नहीं कर सकते कि छात्र की योग्यता को लेकर कोई विवाद अभी लंबित है।कोर्ट ने साफ किया कि भले ही स्कूल को किसी स्टूडेंट की योग्यता को लेकर कोई शक हो तो भी वह स्पष्टीकरण के लिए अधिकारियों से संपर्क कर सकता है, लेकिन इस बीच वह एडमिशन नहीं रोक सकता।जस्टिस पमिदिघंतम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक...
S.27 Evidence Act | अलग-अलग आरोपियों के संयुक्त बयान तभी स्वीकार्य, जब उनसे अलग-अलग नई बातें सामने आती हों: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि अलग-अलग आरोपियों द्वारा दिए गए संयुक्त या एक साथ दिए गए खुलासे के बयान साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 के तहत तभी स्वीकार्य हैं, जब ऐसे बयानों से अपराध से जुड़े अलग और प्रासंगिक तथ्यों का पता चलता हो।जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की खंडपीठ ने यह फैसला कर्नाटक से जुड़े हत्या के मामले में अपनी दोषसिद्धि को चुनौती देने वाले दो दोषियों द्वारा दायर आपराधिक अपीलों पर सुनवाई करते हुए दिया। कोर्ट ने अंततः अपीलकर्ताओं को बरी किया, लेकिन भारतीय साक्ष्य अधिनियम,...
Article 227 | हाईकोर्ट ट्रायल कोर्ट द्वारा विचार किए गए सबूतों का दोबारा मूल्यांकन नहीं कर सकते: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट के लिए संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत अपने सुपरवाइजरी अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते हुए निचली अदालतों के फैसलों में दखल देना गलत है।जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की बेंच ने बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला रद्द करते हुए यह बात कही, जिसमें हाईकोर्ट ने अपील कोर्ट का फैसले में दखल दिया था, जिसमें अपीलकर्ता को बेदखली के मुकदमे में संशोधन करने की इजाज़त दी गई थी।बेंच ने कहा, "यह बात अच्छी तरह से तय है कि इस तरह के अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते समय...
मकान मालिक के कानूनी वारिस बेदखली के मुकदमे में 'वास्तविक ज़रूरत' जोड़ने के लिए संशोधन कर सकते हैं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी की है कि यदि कोई मकान मालिक, जिसने अपने और अपने परिवार के लिए 'वास्तविक ज़रूरत' (bona fide requirement) के आधार पर बेदखली का मुकदमा दायर किया था, उसका निधन हो जाता है तो उसके कानूनी वारिस मुकदमे की दलीलों में संशोधन करके 'वास्तविक ज़रूरत' के अतिरिक्त आधारों को शामिल कर सकते हैं; बशर्ते कि ऐसे संशोधन मुकदमे के मूल आधार से न तो टकराते हों और न ही उसे बदलते हों।जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की खंडपीठ ने मकान मालिक के कानूनी वारिसों (पत्नी और बच्चों)...
अग्रिम ज़मानत खारिज करते समय कोर्ट आरोपी को सरेंडर करने का निर्देश नहीं दे सकता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने ज़ोर देकर कहा कि अग्रिम ज़मानत खारिज करते समय किसी आरोपी को ट्रायल कोर्ट के सामने सरेंडर करने का निर्देश देने का अधिकार कोर्ट के पास नहीं है।कोर्ट ने टिप्पणी की,"अगर कोर्ट अग्रिम ज़मानत खारिज करना चाहता है, तो वह ऐसा कर सकता है, लेकिन कोर्ट के पास यह कहने का अधिकार नहीं है कि याचिकाकर्ता को अब सरेंडर कर देना चाहिए।" जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच ऐसे व्यक्ति द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिस पर धोखाधड़ी और जालसाज़ी का आरोप है। यह याचिका झारखंड...
मस्जिद से जुड़ी 'सर्विस इनाम' ज़मीन वक्फ़ संपत्ति, इसे बेचा नहीं जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (24 अप्रैल) को कहा कि मस्जिदों से जुड़ी जिन ज़मीनों को 'सर्विस इनाम' कहा जाता है, वे वक्फ़ संपत्ति का हिस्सा होती हैं, और इसलिए उन्हें बेचा नहीं जा सकता।जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने कहा,"यह बात बिना किसी विवाद के तय है कि धार्मिक या चैरिटी के कामों के लिए 'सर्विस इनाम' के तौर पर दी गई ज़मीनें दान की गई संपत्ति (Endowed Property) का रूप ले लेती हैं और उन पर सार्वजनिक या धार्मिक ट्रस्ट का अधिकार होता है, जिससे उन्हें बेचने या किसी और को...
जल्द सुनवाई का अधिकार NDPS Act की धारा 37 के तहत ज़मानत की शर्तों की जगह नहीं ले सकता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि अनुच्छेद 21 के तहत जल्द सुनवाई का अधिकार, नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्सटेंसेस एक्ट, 1987 (NDPS Act) के तहत ज़मानत देने के लिए तय सख्त कानूनी ज़रूरतों को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता।कोर्ट ने कहा,"संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जल्द सुनवाई का अधिकार निस्संदेह एक कीमती संवैधानिक गारंटी है। हालांकि, NDPS Act जैसे खास कानून के संदर्भ में, जो कमर्शियल मात्रा से जुड़े मामलों से निपटता है, इस अधिकार को धारा 37 के आदेश के साथ-साथ पढ़ा जाना चाहिए, न कि उसकी जगह पर।" ...
पुलिस शिकायत वाले मामलों में आरोपी को तब तक गिरफ्तार नहीं कर सकती, जब तक समन के साथ-साथ गैर-जमानती वारंट जारी न हो जाए: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (23 अप्रैल) को बिहार और झारखंड में गंभीर प्रक्रियात्मक अनियमितता की ओर ध्यान दिलाया। कोर्ट ने पाया कि शिकायत वाले मामलों में मुकदमेबाज़ इस आशंका से सेशंस कोर्ट / हाई कोर्ट में अग्रिम ज़मानत के लिए जाते हैं कि केवल प्रक्रिया (process) जारी होने से ही उनकी गिरफ्तारी हो जाएगी।कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एक बार प्रक्रिया जारी हो जाने के बाद मुकदमेबाज़ को केवल उस प्रक्रिया का पालन करना होता है, क्योंकि शिकायत वाले मामले में तब तक गिरफ्तारी नहीं हो सकती, जब तक प्रक्रिया को लागू...
अपील कोर्ट आरोपी की अपील के बिना भी सज़ा को पलट/बदल सकता है: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि अगर आरोपी सज़ा को चुनौती देने वाली अपील नहीं भी करता है तो भी अपील कोर्ट को सज़ा पलटने से रोका नहीं जा सकता।जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा,“अपील कोर्ट को यह अधिकार है कि वह ट्रायल कोर्ट द्वारा दर्ज किए गए नतीजों और सज़ा की सच्चाई की जांच करे और न्याय के हित में उसे पलटे, बदले या पक्का करे।” यह बात असम राज्य की तरफ से एक मर्डर-रेप केस में रेस्पोंडेंट को बरी किए जाने के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई करते हुए कही। हाईकोर्ट, जिसने आरोपी को मर्डर और रेप...
Order 7 Rule 11 CPC | मूल्यांकन या कोर्ट फीस में कमी के आधार पर वाद-पत्र को बिना सुधार का मौका दिए खारिज नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में यह फैसला दिया कि किसी वाद के मूल्यांकन में कमी या कोर्ट फीस के भुगतान में कमी के आधार पर किसी वादी को CPC के आदेश 7 नियम 11 के तहत अपने आप ही खारिज (Non-Suited) नहीं किया जा सकता। चूंकि ये दोनों कमियां सुधारी जा सकने वाली हैं, इसलिए वादी को सुधार का मौका दिया जाना चाहिए। साथ ही वाद को तभी खारिज किया जाना चाहिए, जब वह इस मौके का पालन न करे।कोर्ट ने कहा,"आदेश VII नियम 11(b) या (c) के तहत किसी वाद-पत्र खारिज करना, केवल कम मूल्यांकन या कोर्ट फीस में कमी पाए जाने पर अपने...




















