SC के ताज़ा फैसले
पति के खिलाफ दहेज लेने की शिकायत के आधार पर पत्नी और उसके परिवार पर 'दहेज देने' के लिए मुकदमा नहीं चलाया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (16 अप्रैल) को फैसला सुनाया कि किसी महिला या उसके परिवार के सदस्यों पर 'दहेज लेने वालों' के खिलाफ अपनी शिकायत में किए गए दावों के आधार पर 'दहेज देने' के लिए दहेज निषेध अधिनियम के तहत कार्रवाई नहीं की जा सकती।जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की खंडपीठ ने एक पति द्वारा दायर अपील को खारिज कर दिया, जिसमें उसने अपनी पत्नी और उसके परिवार के खिलाफ FIR दर्ज कराने की मांग की थी।पति ने तर्क दिया कि चूंकि उसकी पत्नी ने उसके खिलाफ अपनी ही कानूनी शिकायत में दहेज देने की...
Air Force Act | एक ही आरोप पर आपराधिक मुकदमे में बरी हुए अधिकारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू नहीं की जा सकती: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (15 अप्रैल) को कहा कि एक बार जब रक्षा बलों ने अनुशासनात्मक कार्रवाई के बजाय आपराधिक कार्रवाई को जारी रखने का फैसला कर लिया हो तो आपराधिक कार्रवाई में बरी होने के बाद उस रक्षा कर्मी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू नहीं की जा सकती।दिल्ली हाईकोर्ट की डिवीज़न बेंच का फैसला रद्द करते हुए जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की बेंच ने पूर्व-वायु सेना कर्मी का सम्मान बहाल किया। उन्हें लगभग तीन दशक बाद सेवा से जुड़े सभी लाभ दिए गए; उनके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई में...
घोषणात्मक डिक्री सिर्फ इसलिए रद्द नहीं की जा सकती कि वादी ने उसके निष्पादन की मांग नहीं की: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि घोषणात्मक मुकदमे में पारित डिक्री का केवल निष्पादन न होना - विशेष रूप से तब, जब वादी पहले से ही संपत्ति के कब्जे में हो - उस डिक्री को देर से चुनौती देने का कोई वैध आधार नहीं हो सकता।जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की खंडपीठ ने राजस्थान हाईकोर्ट का फैसला रद्द किया, जिसमें प्रतिवादी की अपील को नए सिरे से विचार के लिए वापस भेजने के आदेश को सही ठहराया गया। यह अपील, अपीलकर्ता के पक्ष में डिक्री पारित होने के 31 साल की अत्यधिक देरी के बाद दायर की गई।यह...
जिन दोषियों को सिर्फ़ जुर्माने की सज़ा मिली, वे भी 'अपराधी परिवीक्षा अधिनियम' के फ़ायदे के हकदार: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि जिन अपराधियों को सिर्फ़ जुर्माना भरने की सज़ा दी गई, उन्हें भी 'अपराधी परिवीक्षा अधिनियम, 1958' की धारा 4 के तहत परिवीक्षा (प्रोबेशन) का फ़ायदा दिया जा सकता है।जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की बेंच ने उन दोषियों को रिहा करने का आदेश दिया, जिन्हें मारपीट के आरोप में IPC की धारा 34 के साथ पढ़ी जाने वाली धाराओं 323 और 324 के तहत दोषी ठहराया गया। साथ ही उन्हें बिना किसी ठोस सज़ा के, सिर्फ़ 500 से 2,000 रुपये का जुर्माना भरने की सज़ा दी गई।कोर्ट...
आपसी सहमति से तलाक के लिए समझौते के बाद सहमति वापस नहीं ले सकता जीवनसाथी : सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि भले ही आपसी सहमति से तलाक के मामलों में कोई भी पक्ष अंतिम डिक्री से पहले अपनी सहमति वापस ले सकता है, लेकिन यदि पति-पत्नी के बीच सभी विवादों का पूर्ण और अंतिम समझौता (Full & Final Settlement) हो चुका हो, तो उस समझौते की शर्तों से पीछे हटना स्वीकार्य नहीं है।जस्टिस राजेश बिंडल और जस्टिस विजय बिश्नोई की खंडपीठ ने यह टिप्पणी उस मामले में की, जिसमें पत्नी द्वारा अदालत-मान्य मध्यस्थता समझौते से पीछे हटने पर कड़ी नाराज़गी जताई गई।पूरा मामला:विवादित...
S.156(3) CrPC/S.175(3) BNSS | आरोपी के बचाव पर भरोसा करके मजिस्ट्रेट के जांच का आदेश रद्द नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट अपनी अंतर्निहित विवेकाधीन शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए मजिस्ट्रेट द्वारा निर्देशित पुलिस जांच को तब तक नहीं रोक सकते, जब तक कि शिकायत में पहली नज़र में कोई संज्ञेय अपराध सामने न आता हो।कोर्ट ने कहा कि इस चरण पर कोर्ट को शिकायत में लगाए गए आरोपों और शिकायतकर्ता द्वारा पेश की गई सामग्री तक ही सीमित रहना चाहिए। साथ ही आरोपी द्वारा पेश किए गए बचावों की जांच करने के लिए उनसे आगे नहीं जाना चाहिए।जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने कहा,"...हाईकोर्ट को...
West Bengal SIR | जिन लोगों की अपीलें पेंडिंग, उन्हें 2026 के चुनावों में वोट देने की इजाज़त नहीं दी जा सकती: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को इस बात पर हिचकिचाहट ज़ाहिर की कि जिन लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए , उन्हें आने वाले पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में वोट देने की इजाज़त दी जाए, जबकि उनकी अपीलें अभी अपीलीय ट्रिब्यूनलों के सामने पेंडिंग हैं। पिछले हफ़्ते भी कोर्ट ने कुछ ऐसी ही राय ज़ाहिर की थी।हालांकि, कोर्ट ने संकेत दिया कि वह उस अर्ज़ी पर विचार कर सकता है, जिसमें सप्लीमेंट्री लिस्ट जारी करने की इजाज़त मांगी गई ताकि उन लोगों को शामिल किया जा सके, जिनकी अपीलें विधानसभा चुनावों से पहले मंज़ूर...
अदालतें अवमानना क्षेत्राधिकार में पहले से तय मुद्दों पर दोबारा फैसला नहीं दे सकतीं, सिर्फ़ पालन की जांच कर सकती हैं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अवमानना क्षेत्राधिकार का इस्तेमाल करते समय संबंधित अदालतों के लिए यह गलत है कि वे अपनी सीमाओं को लांघकर उन मुद्दों पर दोबारा फैसला दें, जो मूल कार्यवाही में पहले ही तय हो चुके हैं। उन्हें खुद को सिर्फ़ बाध्यकारी निर्देशों का पालन सुनिश्चित करने तक ही सीमित रखना चाहिए।जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा,"अवमानना कार्यवाही में क्षेत्राधिकार सिर्फ़ जारी किए गए निर्देशों के पालन की जांच करने तक ही सीमित है। यह उन मुद्दों पर दोबारा फैसला देने तक नहीं...
वोट देने और चुनाव लड़ने का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में फिर दोहराया कि न तो वोट देने का अधिकार और न ही चुनाव लड़ने का अधिकार मौलिक अधिकार है। ये दोनों अधिकार एक-दूसरे से अलग हैं और चुनाव लड़ने का अधिकार ज़्यादा सख़्त नियमों के अधीन है, जैसे कि योग्यता, अयोग्यता और संस्थागत ज़रूरतों के मामले में।जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने राजस्थान में ज़िला दुग्ध संघों से जुड़े एक चुनावी विवाद पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की।जस्टिस महादेवन द्वारा लिखे गए फ़ैसले में यह कहा गया:"यह बात पूरी तरह से तय है कि न तो...
मालिकाना हक की घोषणा के लिए बाद में दायर किया गया कोई भी मुकदमा CPC की धारा 11 के स्पष्टीकरण IV के तहत वर्जित होगा: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (9 अप्रैल) को यह स्पष्ट किया कि मालिकाना हक की घोषणा के लिए बाद में दायर किया गया कोई भी मुकदमा CPC की धारा 11 के स्पष्टीकरण IV (रचनात्मक रेस ज्यूडिकाटा) के तहत वर्जित होगा, यदि वादी ने स्थायी निषेधाज्ञा के लिए दायर पहले के मुकदमे में, जहां मालिकाना हक विवादित था, मालिकाना हक की घोषणा की मांग करना छोड़ दिया था।कोर्ट ने यह माना कि चूंकि मालिकाना हक का दावा प्राथमिक मुकदमे में उठाया जा सकता था और उठाया जाना भी चाहिए था, इसलिए संबंधित पक्ष को नए मुकदमे में उस मुद्दे...
अंतरिम आदेश से प्रभावित कोई बाहरी व्यक्ति रिट कार्यवाही में पक्षकार बनने का हकदार: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि कार्यवाही में शामिल न होने वाले किसी बाहरी व्यक्ति को, जो मूल रिट कार्यवाही का पक्षकार नहीं है, पक्षकार बनने से मना नहीं किया जा सकता, यदि उस कार्यवाही में पारित आदेश का उस बाहरी व्यक्ति पर सीधा प्रभाव पड़ता हो।जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने टिप्पणी की,"रिट कार्यवाही में जहां कोर्ट से पहले से पारित किसी अंतरिम आदेश के दायरे और प्रभाव की व्याख्या करने के लिए कहा जाता है, वहां किसी ऐसे व्यक्ति को, जो उस आदेश से सीधे और स्पष्ट रूप से प्रभावित...
Motor Accident Claim | केस पार्टी बनाई गई बीमा कंपनी सभी आधार उठा सकती है और मुआवज़े की रकम को चुनौती दे सकती है: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक बीमा कंपनी की उस अपील को मंज़ूरी दी, जो बॉम्बे हाईकोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ थी। हाईकोर्ट ने बीमा कंपनी को मोटर दुर्घटना मुआवज़े की रकम के बारे में अपनी दलीलें रखने से रोक दिया था।कोर्ट ने कहा कि जब किसी मोटर दुर्घटना मुआवज़े के केस में बीमा कंपनी को एक पार्टी-प्रतिवादी (Respondent) के तौर पर शामिल किया जाता है तो उसे सभी उपलब्ध आधारों पर दावे को चुनौती देने का अधिकार होता है। यानी, उसे सिर्फ़ मोटर वाहन अधिनियम की धारा 149(2) में बताए गए आधारों (जैसे, पॉलिसी की...
कई अपराधों के लिए जब जेल की सज़ाएं एक साथ चलती हैं तो जुर्माना भी एक साथ ही चलता है: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (8 अप्रैल) को यह टिप्पणी की कि जहां अलग-अलग अपराधों के लिए दी गई सज़ाओं को एक साथ (Concurrently) चलाने का निर्देश दिया गया हो, वहां हर अपराध के लिए अलग से जुर्माना नहीं लगाया जा सकता।कोर्ट ने फ़ैसला सुनाया कि दो अपराधों की सज़ा के हिस्से के तौर पर अलग से लगाया गया जुर्माना भी, जेल की सज़ाओं के साथ-साथ ही माना जाएगा।जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन. वी. अंजारिया की बेंच ने कहा,"IPC की धारा 53 में जुर्माने को भी सज़ा का एक हिस्सा माना गया। इस नज़रिए से जब सज़ा को एक...
CCS Pension Rules | कर्मचारी के खिलाफ आपराधिक या अनुशासनात्मक कार्यवाही लंबित होने पर ग्रेच्युटी रोकी जा सकती है: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कोई भी नियोक्ता उस कर्मचारी की ग्रेच्युटी का भुगतान रोकने का हकदार है, जिसके खिलाफ कोई न्यायिक या अनुशासनात्मक कार्यवाही लंबित है।जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने हिमाचल प्रदेश सड़क परिवहन निगम के एक पूर्व क्लर्क द्वारा दायर अपील खारिज की। इस क्लर्क की ग्रेच्युटी परिवहन निगम ने उसके खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही के लंबित होने के कारण रोक दी थी।रिटायरमेंट के बाद अपीलकर्ता की ग्रेच्युटी प्रतिवादी विभाग द्वारा रोक दी गई थी। इसका कारण उसके...
अनारक्षित श्रेणी में PwD के लिए क्षैतिज रूप से आरक्षित पद SC/ST/OBC दिव्यांग उम्मीदवारों के लिए भी खुले हैं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (7 अप्रैल) को यह टिप्पणी की कि जब किसी अनारक्षित सीट पर क्षैतिज आरक्षण लागू होता है तो उस अनारक्षित सीट के लिए प्रतिस्पर्धा करने का अधिकार उन सभी उम्मीदवारों को होता है जिनके पास वह क्षैतिज विशेषता (Horizontal Attribute) मौजूद है, चाहे वे SC, ST, OBC या सामान्य श्रेणी के हों।जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई की। इस मामले में वेस्ट बंगाल स्टेट इलेक्ट्रिसिटी ट्रांसमिशन कंपनी लिमिटेड में जूनियर सिविल इंजीनियर के एक पद को यूआर...
NI Act की धारा 138 की शर्तें पूरी होने पर चेक बाउंस की शिकायत को ट्रायल से पहले के स्टेज पर रद्द नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जब Negotiable Instruments Act, 1881 (NI Act) की धारा 138 की बुनियादी शर्तें पूरी हो जाती हैं तो चेक बाउंस के मामले को ट्रायल से पहले के स्टेज पर इस आधार पर रद्द नहीं किया जा सकता कि चेक किसी कानूनी रूप से लागू होने वाले कर्ज़ के लिए जारी नहीं किया गया।कोर्ट ने कहा कि चेक किसी कानूनी रूप से लागू होने वाले कर्ज़ के लिए जारी किया गया या नहीं, यह ट्रायल का मामला है, और इसे ट्रायल से पहले के स्टेज पर तय नहीं किया जा सकता।कोर्ट ने कहा,“जब धारा 138 की बुनियादी शर्तें पूरी हो...
S.528 BNSS | विश्वसनीय सबूत आरोपों को गलत साबित कर दें तो आपराधिक कार्यवाही रद्द की जा सकती है: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (6 अप्रैल) को फैसला सुनाया कि जहां अभियोजन पक्ष ऐसे विश्वसनीय और अकाट्य सबूतों का खंडन करने में विफल रहता है, जो शिकायत के तथ्यात्मक आधार को प्रभावी ढंग से कमजोर करते हैं, वहां कोर्ट के लिए कार्यवाही रद्द करने की अपनी शक्ति का प्रयोग करना उचित होगा।जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने उन अपीलकर्ताओं के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही रद्द की, जिन पर एक बुजुर्ग व्यक्ति पर हमला करने का आरोप था। कोर्ट ने पाया कि CCTV फुटेज काफी महत्वपूर्ण साबित...
दरगाह के सज्जादानशीन और वक्फ के मुतवल्ली एक जैसे नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में दोहराया कि दरगाह के सज्जादानशीन का पद वक्फ के मुतवल्ली के पद से मूल रूप से अलग है। कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि सज्जादानशीन का पद मुख्य रूप से एक आध्यात्मिक पद है, जबकि मुतवल्ली का पद एक धर्मनिरपेक्ष प्रशासनिक भूमिका है।जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने कर्नाटक की दरगाह के सज्जादानशीन पद के उत्तराधिकार से जुड़े एक विवाद पर फैसला सुनाते हुए यह टिप्पणी की।बेंच ने कहा:"ऊपर की गई चर्चा को देखते हुए मुतवल्ली और सज्जादानशीन के पदों को एक जैसा...
गलत तरीके से सार्वजनिक काम देने का एक भी मामला अनुच्छेद 14 का उल्लंघन: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को एक शुरुआती जांच करने का आदेश दिया। यह जांच अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू पर लगे पक्षपात के आरोपों और उनके रिश्तेदारों व करीबी सहयोगियों को काम के ठेके देने में खुली और प्रतिस्पर्धी निविदा प्रक्रिया से बार-बार हटने के तरीकों से जुड़े आरोपों पर आधारित है।कोर्ट ने कहा कि सार्वजनिक ठेके देने के फैसले संविधान के अनुच्छेद 14 के दायरे में आते हैं। राज्य से यह उम्मीद की जाती है कि वह जनहित को सुरक्षित रखने के लिए निष्पक्ष, पारदर्शी और मनमानी से...
NEET | मेडिकल सीट राष्ट्रीय संसाधन, धोखाधड़ी के कारण खाली हुई सीट अगले उम्मीदवार को ही दी जानी चाहिए: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने NEET-UG के एक उम्मीदवार के एडमिशन को सही ठहराया। यह सीट तब खाली हुई थी, जब पता चला कि मूल रूप से चुने गए उम्मीदवार ने जाली मार्कशीट का इस्तेमाल करके एडमिशन लिया था। कोर्ट ने कहा कि जब ऐसी परिस्थितियों में कोई सीट खाली होती है तो अधिकारियों का यह फ़र्ज़ है कि वे उसे मेरिट लिस्ट में अगले योग्य उम्मीदवार को दें।जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की बेंच ने नेशनल मेडिकल काउंसिल की अपील खारिज की, जिसमें हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के उस फ़ैसले को चुनौती दी गई, जिसमें...




















