SC के ताज़ा फैसले

केंद्र सरकार किसी भी अधिकारी को कंपनीज़ एक्ट के तहत धोखाधड़ी की शिकायत दर्ज करने के लिए अधिकृत कर सकती है: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केंद्र सरकार की वह समीक्षा याचिका खारिज की, जिसमें आर्थिक अपराधों के लिए बनी स्पेशल कोर्ट द्वारा कंपनीज़ एक्ट, 2013 के तहत धोखाधड़ी से जुड़े अपराधों का संज्ञान निजी शिकायत के आधार पर न लेने के फैसले को चुनौती दी गई थी।हालांकि, चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस के. विनोद चंद्रन और जॉयमाल्य बागची की बेंच ने स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार, सीरियस फ्रॉड इन्वेस्टिगेशन ऑफिस (SFIO) के डायरेक्टर के अलावा, कंपनीज़ एक्ट की धारा 212(6) के दूसरे प्रावधान के तहत किसी...

गिरफ्तारी के लिखित आधार नहीं बताए तो पुलिस अधिकारी पर होगी विभागीय जांच: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करने वाले पुलिस अधिकारी ने यदि गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में उपलब्ध नहीं कराए हैं तो उसके खिलाफ विभागीय जांच शुरू की जानी चाहिए।कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 22(1) के तहत गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में और आरोपी की समझ वाली भाषा में देना अनिवार्य है। इसका पालन नहीं होने पर गिरफ्तारी गैरकानूनी मानी जाएगी। जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चंद्रकुर की खंडपीठ ने कहा कि गिरफ्तारी के आधार...

BREAKING | गिरफ्तारी का कारण न बताने पर पहली गिरफ्तारी रद्द होने के बाद दोबारा गिरफ्तारी के लिए मजिस्ट्रेट की मंज़ूरी ज़रूरी: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक अहम फ़ैसला सुनाया। इसमें आरोपी की दोबारा गिरफ्तारी की प्रक्रिया साफ़ की गई—खासकर तब, जब संविधान के आर्टिकल 22(1) के तहत गिरफ्तारी का कारण न बताने की वजह से पिछली गिरफ्तारी को गैर-कानूनी घोषित कर दिया गया हो।जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस अतुल चंदुरकर की बेंच ने तय किया कि जिस व्यक्ति को आर्टिकल 22(1) के उल्लंघन के कारण रिहा किया गया था, उसे दोबारा गिरफ्तार करने के लिए पुलिस को संबंधित ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के सामने अर्ज़ी देनी होगी और मजिस्ट्रेट की मंज़ूरी लेनी...

कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वाले कर्मचारियों को ग्रेच्युटी देने के लिए मुख्य नियोक्ता ज़िम्मेदार नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब मुख्य नियोक्ता और कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वाले कर्मचारियों के बीच नियोक्ता-कर्मचारी का संबंध न हो तो कॉन्ट्रैक्टर के ज़रिए रखे गए कर्मचारियों को ग्रेच्युटी देने के लिए मुख्य नियोक्ता को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द किया, जिसमें ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉर्पोरेशन लिमिटेड (ONGC) को कॉन्ट्रैक्टर के ज़रिए रखे गए कर्मचारियों को ग्रेच्युटी देने के लिए ज़िम्मेदार ठहराया गया था। कोर्ट ने कहा कि कंट्रोलिंग अथॉरिटी यह तय नहीं कर सकती कि...

Income Tax | CBDT का सर्कुलर कोर्ट पर बाध्यकारी नहीं : सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने फिर से कहा कि CBDT के सर्कुलर कोर्ट पर बाध्यकारी नहीं होते। कोर्ट ने हाल ही में उन टैक्सपेयर्स की अपीलों को खारिज किया, जिन्होंने अपने एक्सपोर्ट कोटा की बिक्री से मिले प्रीमियम पर सेक्शन 80HHC के तहत डिडक्शन (कटौती) का दावा किया था।धारा 80HHC भारतीय कंपनियों और रेजिडेंट टैक्सपेयर्स को एक्सपोर्ट से होने वाले मुनाफे पर टैक्स डिडक्शन की सुविधा देता था, लेकिन 1 अप्रैल 2005 से यह सुविधा उपलब्ध नहीं है।जस्टिस एसवीएन भट्टी और जस्टिस एनवी अंजारिया की बेंच ने कहा कि एक्सपोर्ट कोटा बेचने...

S. 92 CPC | पब्लिक ट्रस्ट के खिलाफ़ केस करने की इजाज़त वाली अर्ज़ी पेंडिंग होने पर सिविल कोर्ट अंतरिम आदेश नहीं दे सकता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (18 सितंबर) को कहा कि जब तक 'कोड ऑफ़ सिविल प्रोसीजर, 1908' (CPC) की धारा 92 के तहत केस करने की इजाज़त मांगने वाली अर्ज़ी पेंडिंग है, तब तक सिविल कोर्ट सुरक्षा या बचाव से जुड़े अंतरिम आदेश नहीं दे सकता।चूंकि CPC की धारा 92 के तहत लोगों के समूह की ओर से केस (रिप्रेजेंटेटिव सूट) करने के लिए कोर्ट से पहले इजाज़त लेना ज़रूरी है, इसलिए जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस मनमोहन की बेंच ने कहा कि धारा 92 CPC के तहत इजाज़त मिलना केस शुरू करने के लिए एक ज़रूरी शर्त है। जब तक ऐसी इजाज़त...

रद्द किए गए नियमों के तहत प्रमोशन का दावा करने का कोई पक्का अधिकार नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (17 सितंबर) को फिर से कहा कि लागू नियमों के तहत बनने वाली प्रमोशन वाली पोस्ट को ज़रूरी नहीं कि उन्हीं नियमों के तहत भरा जाए, खासकर तब जब वे नियम अब रद्द कर दिए गए हों। कोर्ट ने माना कि ऐसी प्रमोशन वाली पोस्ट को नए नियमों के तहत भरा जा सकता है, जिनमें भर्ती के नए तरीके बताए गए।जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने कहा,"सरकार के पॉलिसी फ़ैसले को देखते हुए कर्मचारी को रद्द किए गए नियमों के अनुसार प्रमोशन पर विचार किए जाने का कोई पक्का अधिकार नहीं...

आर्टिकल 220 के तहत पूर्व हाईकोर्ट जजों को बार काउंसिल में महिला सदस्य के तौर पर शामिल करने पर कोई रोक नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ किया कि संविधान का आर्टिकल 220, जो भारत में अदालतों और अधिकारियों के सामने प्रैक्टिस करने से पूर्व हाईकोर्ट चीफ जस्टिसों और जजों को रोकता है, उन्हें संबंधित राज्य बार काउंसिल में महिला सदस्य के तौर पर शामिल करने से नहीं रोकता।चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने यह स्पष्टीकरण तब दिया, जब वह राज्य बार काउंसिल में महिला सदस्यों को शामिल करने के बारे में कोर्ट के पहले के निर्देशों में बदलाव की मांग करने वाली अलग-अलग...

ट्रस्ट कोई 'कानूनी व्यक्ति' नहीं, इसलिए उसे आरोपी नहीं बनाया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि 'ट्रस्ट' कोई कानूनी व्यक्ति (Juristic Person) नहीं है और न तो वह किसी पर मुकदमा कर सकता है और न ही उस पर मुकदमा किया जा सकता है। कोर्ट ने कर्नाटक में वित्तीय अनियमितता के एक मामले में आरोपी बनाए गए एक ट्रस्ट के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही रद्द की।जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने 'प्रतिभा प्रतिष्ठान बनाम मैनेजर, केनरा बैंक (2017)' मामले में दिए गए फैसले का समर्थन करते हुए कहा,"...ट्रस्ट का अपना कोई अलग कानूनी अस्तित्व नहीं होता है, जिससे वह...

अगर POCSO Act के तहत उम्र साबित न हो पाए तो भी IPC की धारा 376 के तहत रेप का दोषी ठहराया जा सकता है: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (10 सितंबर) को कहा कि अगर अभियोजन पक्ष (Prosecution) पीड़ित की उम्र साबित नहीं कर पाता है - जो POCSO Act के तहत दोषी ठहराने के लिए ज़रूरी है - तो भी आरोपी IPC की धारा 376 के तहत रेप के आरोप से अपने-आप बरी नहीं हो जाता।कोर्ट ने कहा कि धारा 376 के तहत औपचारिक आरोप न होने पर भी आरोपी को उस प्रावधान के तहत दोषी ठहराया जा सकता है, क्योंकि यह POCSO Act की धारा 3 जैसा ही अपराध है और दोनों में 'एक्टस रियस' (आपराधिक कृत्य) एक ही है। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एनवी...

सिर्फ़ लंबे समय तक कब्ज़ा 'एडवर्स पज़ेशन' साबित नहीं करता, इसके लिए 'विरोधी इरादा' ज़रूरी: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (10.09.2026) को कहा कि किसी प्रॉपर्टी पर सिर्फ़ लंबे समय तक और बिना रुकावट कब्ज़ा होना ही 'एडवर्स पज़ेशन' (प्रतिकूल कब्ज़ा) का दावा साबित करने के लिए काफ़ी नहीं है। इसके लिए यह साबित करना ज़रूरी है कि कब्ज़ा किस बिंदु पर असली मालिक के खिलाफ़ (विरोधी) हो गया।ऐसा फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने यह भी कहा कि रेवेन्यू रिकॉर्ड में कब्ज़े को 'गैर-मरूसी बिला लगान बवजह धर्म-अर्थ' (यानी धार्मिक उद्देश्यों के लिए बिना किराया दिए कब्ज़ा) के तौर पर दर्ज करना प्रॉपर्टी को पूरी तरह से...

NH Act के तहत भूमि अधिग्रहण के लिए 2015 से पहले के अवॉर्ड्स पर ब्याज की गणना 1894 के एक्ट के अनुसार होगी: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (08.09.2026) को कहा कि जब नेशनल हाईवे एक्ट, 1956 (NH Act) के तहत सक्षम अधिकारी 01.01.2015 से पहले मुआवज़ा तय करते हैं तो ज़मीन मालिक को दिए जाने वाले सोलेशियम, ब्याज और सोलेशियम पर ब्याज की गणना 'ज़मीन अधिग्रहण एक्ट, 1894' के तहत की जानी चाहिए, न कि 'ज़मीन अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित मुआवज़ा और पारदर्शिता का अधिकार एक्ट, 2013' के तहत। बता दें, 01.01.2015 वह तारीख है, जब NH Act के तहत किए गए अधिग्रहण के लिए 2013 का एक्ट लागू किया गया।जस्टिस जेबी पारदीवाला...

बिना किसी अधिकारी का नाम लिए भी कंपनियों पर मुकदमा चलाया जा सकता है: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (7 सितंबर) को कहा कि किसी कंपनी पर ऐसे अपराध के लिए आपराधिक मुकदमा चलाया जा सकता है, जिसके लिए 'मेन्स रिया' (अपराध करने का इरादा) ज़रूरी है, भले ही उस कर्मचारी या अधिकारी की पहचान न हुई हो या उसे आरोपी न बनाया गया हो जिसके ज़रिए कथित अपराध किया गया।जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच ने कहा कि किसी असली व्यक्ति (Natural Person) की पहचान न होने या उसे आरोपी न बनाने के आधार पर ही सीआरपीसी (Code of Criminal Procedure) की धारा 482 के तहत शुरुआती चरण में ही...

NCTE की एग्जीक्यूटिव कमिटी को टीचर एजुकेशन इंस्टिट्यूट से सालाना परफॉर्मेंस अप्रेजल रिपोर्ट मांगने का अधिकार: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (3 सितंबर) को टीचर एजुकेशन इंस्टिट्यूट से सालाना परफॉर्मेंस अप्रेजल रिपोर्ट (PAR) मांगने के लिए नेशनल काउंसिल फॉर टीचर एजुकेशन (NCTE) और उसकी एग्जीक्यूटिव कमिटी के अधिकार को सही ठहराया।जस्टिस पमिदिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने कहा,"...काउंसिल और एग्जीक्यूटिव कमिटी के पास टीचर एजुकेशन देने वाले इंस्टिट्यूट से सालाना परफॉर्मेंस अप्रेजल रिपोर्ट मांगने का पूरा अधिकार है।" बेंच ने दिल्ली हाईकोर्ट की डिविजन बेंच का वह फैसला रद्द किया, जिसमें NCTE की...

NDPS Act | ड्रग डिस्पोज़ल कमिटी ट्रायल कोर्ट के आदेश के बिना ज़ब्त गाड़ी को डिस्पोज़ नहीं कर सकती: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कहा कि NDPS एक्ट, 1985 के तहत किसी मामले में ज़ब्त गाड़ी को ज़ब्त करने का अधिकार सिर्फ़ उस कोर्ट के पास है, जो एक्ट की धारा 63 के तहत अपराध की सुनवाई कर रही है। कोर्ट ने यह भी कहा कि NDPS Act की धारा 52A के तहत बनी ड्रग डिस्पोज़ल कमिटी (DDC) कोर्ट के आदेश के बिना ज़ब्त गाड़ी को डिस्पोज़ करने की प्रक्रिया खुद शुरू नहीं कर सकती।कोर्ट ने कहा,"कानूनी तौर पर ज़ब्ती का अधिकार उस कोर्ट के पास है जो अपराध की सुनवाई कर रही है।" इसे लागू करते हुए जस्टिस जेबी पारदीवाला और...

कर्नाटक भूमि राजस्व अधिनियम के तहत रिविज़न पर लिमिटेशन एक्ट लागू नहीं होता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (2 सितंबर) को कहा कि कर्नाटक भूमि राजस्व अधिनियम में दी गई समय-सीमा (लिमिटेशन पीरियड) को खत्म करने के लिए लिमिटेशन एक्ट, 1963 के प्रावधानों का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा की बेंच ने एक मामले की सुनवाई की, जिसमें कर्नाटक सरकार के भूमि रिकॉर्ड प्राधिकरण ने अपनी रिविज़न शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए बेंगलुरु के येदियुर झील इलाके में भूमि सर्वेक्षण नंबरों की नई जांच का आदेश दिया। यह आदेश कर्नाटक भूमि राजस्व अधिनियम, 1964 ("अधिनियम") के...

गुजरात प्रोहिबिशन एक्ट के तहत ज़ब्त गाड़ियों को अंतरिम तौर पर छोड़ने पर कोई पूरी तरह रोक नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (02.09.2026) को ट्रायल कोर्ट, सेशंस कोर्ट और गुजरात हाईकोर्ट के उन आदेशों को रद्द किया, जिनमें भारतीय निर्मित विदेशी शराब (IMFL) की बड़ी खेप ले जाते समय ज़ब्त किए गए ट्रक की अंतरिम कस्टडी देने से इनकार कर दिया गया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि सिक्योरिटी जमा करने पर गाड़ी उसके मालिक को सौंप दी जाए। आदेशों को रद्द करते हुए कोर्ट ने कहा कि गुजरात प्रोहिबिशन एक्ट, 1949 की धारा 98(2) ट्रायल के दौरान ज़ब्त गाड़ी को उसके मालिक को सौंपने पर पूरी तरह रोक नहीं लगाती है, भले ही बरामद...

BREAKING | छात्र प्रदर्शनों से जुड़ी देशभर की FIRs सुप्रीम कोर्ट ने की रद्द, नई FIR पर भी रोक
सुप्रीम कोर्ट ने 20 से 25 जुलाई के बीच हुए छात्र प्रदर्शनों के संबंध में देशभर के किसी भी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश में दर्ज FIRs को आगे न बढ़ाने और उनकी जांच न करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने इन मामलों को सभी उद्देश्यों के लिए बंद माना है।CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की खंडपीठ ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए यह आदेश दिया।कोर्ट ने केंद्र (दिल्ली पुलिस), बिहार, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और असम द्वारा दायर आवेदनों में चिन्हित...

अगर प्रॉसिक्यूशन अहम गवाह से पूछताछ नहीं करता है तो ट्रायल कोर्ट को उससे सवाल पूछना चाहिए: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में ट्रायल कोर्ट्स को चेतावनी दी कि वे ट्रायल के दौरान तेज़ी से काम करें, खासकर तब जब प्रॉसिक्यूशन अहम गवाहों से पूछताछ करने में पूरी तरह नाकाम रहा हो।जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने कहा,"...जब प्रॉसिक्यूशन पूरी तरह नाकाम हो जाता है तो कोर्ट को अहम गवाहों से पूछताछ न करने के प्रॉसिक्यूशन के रवैये पर तुरंत सवाल उठाना चाहिए। ट्रायल कोर्ट सिर्फ़ मूक दर्शक नहीं होता और एक निष्पक्ष जज के तौर पर उसकी यह ज़िम्मेदारी है कि वह यह सुनिश्चित करे कि...

NCDRC के तीसरे सदस्य का रेफरेंस का जवाब देने के बजाय अपील पर फ़ैसला सुनाना ज़रूरी नहीं कि ग़ैर-क़ानूनी हो: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल कंज्यूमर डिस्प्यूट्स रिड्रेसल कमीशन (NCDRC) की बेंच के सदस्यों के बीच मतभेद होने पर तीसरे या "रेफरी" सदस्य की भूमिका की सीमाएं स्पष्ट की। कोर्ट ने कहा कि हालाँकि आम तौर पर रेफरी सदस्य को केवल रेफर किए गए सवालों का जवाब देना चाहिए और मामले को मूल बेंच को वापस भेजना चाहिए, लेकिन किसी असाधारण मामले में अपील पर ख़ुद फ़ैसला करना सही हो सकता है।जब रेफर करने वाली बेंच कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट, 2019 की धारा 58(3) के तहत मतभेद के सटीक बिंदुओं को बताने के बजाय, शिकायत की जड़ तक जाने...
