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सार्वजनिक उपद्रव (Public nuisance) के बारे में ख़ास बातें
उपद्रवों (Nuisances) को मुख्य रूप से दो भाग में विभाजित किया जा सकता है:- निजी उपद्रवों (Private Nuisance) और (ii) सार्वजनिक उपद्रवों (Public nuisance). निजी उपद्रवों (Private Nuisance) और सार्वजनिक उपद्रवों (Public Nuisance) को निम्न उदहारण से समझा जा सकता है कि कोई एक गतिविधि या चीज जो किसी समुदाय के स्वास्थ्य, सुरक्षा या नैतिकता को प्रभावित करता है यह एक निजी उपद्रव से अलग है , जो केवल एक पड़ोसी या कुछ व्यक्तियों को नुकसान पहुंचाता है। उदाहरण के लिए, एक कारखाना जो हानिकारक धुएं के बादलों को...
संविदा विधि (Law of Contract ) भाग 15 : प्रत्याभूति की संविदा क्या होती है? (Contract of Guarantee)
संविदा विधि से संबंधित अब तक के आलेखों में संविदा विधि सीरीज के अंतर्गत 14 आलेख लिखे जा चुके हैं तथा इस आलेख- 15 में प्रत्याभूति की संविदा क्या होती है, इस संदर्भ में उल्लेख किया जा रहा है अब तक के आलेखों में संविदा विधि की आधारभूत धाराओं तथा क्षतिपूर्ति की संविदा तक उल्लेख किया जा चुका है, क्षतिपूर्ति की संविदा क्या होती है इस संदर्भ में जानने के लिए इसके पूर्व के आलेख का अध्ययन करें।प्रत्याभूति की संविदा (धारा-126) (Contract of Guarantee)प्रत्याभूति हमारे आसपास का आम बोलचाल का शब्द है। अधिकांश...
संविदा विधि (Law of Contract ) भाग 14 : क्षतिपूर्ति क्या होती है, संविदा विधि में क्षतिपूर्ति की संविदा क्या होती है (Indemnity)
अब तक के संविदा विधि से संबंधित आलेखों के 13 भागों के अंतर्गत संविदा विधि के प्रारंभिक रूप को और उसकी अवधारणा को समझा गया है। आलेख 14 संविदा विधि के एक प्रकार से दूसरे भाग का प्रारंभ है, इस आलेख में लेखक क्षतिपूर्ति के संदर्भ में विशेष बातों का उल्लेख कर रहा है। संविदा विधि की अब तक की 75 धाराओं के अंतर्गत संविदा विधि के प्रारंभिक रूप को समझा गया है। भारतीय संविदा अधिनियम 1872 की प्रारंभिक 75 धाराएं आधारभूत धाराएं हैं, इन धाराओं के बाद अगली धाराओं का अध्ययन संविदा विधि का भाग-2 माना जाता...
संविदा विधि (Law of Contract ) भाग 13 : संविदा- सदृश्य क्या होता है, संविदा सदृश्य के संबंध में विशेष बातें (Quasi Contract)
किसी भी संविदा के होने के लिए करार की आवश्यकता होती है। प्रस्थापना और प्रस्थापना के प्रतिग्रहण के बाद करार का जन्म होता है तथा इसमें भी स्वतंत्र सहमति और वैध प्रतिफल तथा विधिपूर्ण उद्देश्य होना आवश्यक होता है। पूर्व के आलेखों में अब तक किसी संविदा के प्रस्ताव से लेकर उस संविदा के पालन तक चर्चा की जा चुकी है। इस आलेख में सदृश्य संविदा के विषय में चर्चा की जा रही है।संविदा होने के लिए करार की आवश्यकता होती है तब संविदा का निर्माण होता है परंतु सदैव ऐसा नहीं होता है। कुछ संविदाएं तो ऐसी होती हैं...
संविदा विधि (Law of Contract ) भाग 12 : संविदा का पालन कैसे किया जाता है? जानिए विशेष बातें (Performance of Contracts)
अब तक के आलेखों में हमने संविदा क्या होती है और संविदा का सृजन कैसे किया जाता है इसके संबंध में संपूर्ण जानकारियों को साझा किया है तथा समझाने का प्रयास किया है कि एक वैध संविदा का सृजन कैसे होता है। एक वैध संविदा जब अस्तित्व में आ जाती है तब इस संविदा के लिए सबसे सर्वोत्तम तो होगा की संविदा का पालन किया जाए इसलिए संविदा अधिनियम की धारा 37 अध्याय 4 के अंतर्गत यह स्पष्ट संविदा के पक्षकारों को कहा गया है कि वह अपने वचनों का पालन करें। धारा 37 के अंतर्गत एक प्रकार से नैतिक रूप से भी यह इशारा किया...
संविदा विधि (Law of Contract ) भाग 11: समाश्रित संविदा (Contingent Contracts) क्या होती है
संविदा विधि से संबंधित अब तक के आलेखों में संविदा विधि के आधारभूत सिद्धांतों का अध्ययन किया गया है। भाग 11 से संविदा विधि के अगले विषयों का अध्ययन किया जा रहा है।भारतीय संविदा अधिनियम 1872 के अध्याय 3 के अंतर्गत धारा 31 से लेकर 36 तक समाश्रित संविदा (Contingent Contracts) के विषय में उल्लेख किया गया है।इस अधिनियम की धारा 30 के अंतर्गत पंधम के तौर पर अर्थात सट्टे वाले करार संविदा नहीं होते हैं क्योंकि उन में में एक पक्षकार जीतता है तथा दूसरा पक्षकार हारता है। इस ही से मिलता-जुलता रूप एक और है...
संविदा विधि (Law of Contract ) भाग 10 : संविदा अधिनियम के अंतर्गत शून्य करार (Void Agreements) क्या होते हैं और कौन से करारों का कोई अस्तित्व ही नहींं होता
यह आलेख संविदा विधि के भाग- 9 का शेष भाग है तथा इसके अंतर्गत उन करारों का उल्लेख किया जा रहा है जिन करारों को विधि द्वारा सीधे शून्य घोषित किया गया है। अब तक हमने धारा 26 के अंतर्गत विवाह अवरोधक करार धारा 27 के अंतर्गत व्यापार अवरोधक करारों के संबंध में चर्चा की है। अभी इस आलेख में उन करारों के संबंध में चर्चा की जा रही है जिन्हें विधि द्वारा सीधे शून्य घोषित किया गया है। पाठकगण यदि इस आलेख को समझना चाहते हैं तो उन्हें इस आलेख के पूर्व भाग- 9 का भी अध्ययन करना चाहिए यदि भाग-9 का अध्ययन किया...
संविदा विधि (Law of Contract ) भाग 9 : संविदा अधिनियम के अंतर्गत शून्य करार (Void Agreements) क्या होते हैं और कौन से करारों को विधि द्वारा सीधे शून्य घोषित किया गया है
भारतीय संविदा अधिनियम 1872 की धारा 10 के अंतर्गत विधिपूर्ण प्रतिफल और विधिपूर्ण उद्देश्य के साथ कोई भी करार के संविदा होने के लिए आवश्यक योग्यता यह भी है कि उन करारों को विधि द्वारा सीधे शून्य घोषित न किया गया हो। समाज और देश को बनाए रखने के लिए जनता के हित के लिए कुछ करार ऐसे हैं जिन्हें विधि द्वारा सीधे ही शून्य घोषित कर दिया गया है।पिछले आलेख भाग-8 में प्रतिफल के कारण शून्य होने वाले करारों के संबंध में चर्चा की गई है। इस आलेख में उन करारों के संबंध में चर्चा की जा रही है जिन्हें विधि द्वारा...
संविदा विधि (Law of Contract ) भाग 8 : संविदा अधिनियम के अंतर्गत शून्य करार (Void Agreements) क्या होते हैं और प्रतिफल के संबंध में करार कब शून्य होता है?
जिस प्रकार हमने पूर्व के आलेखों में यह समझा है कि भारतीय संविदा अधिनियम 1872 के अंतर्गत धारा 10 सर्वाधिक महत्वपूर्ण धारा है। इस धारा के अंतर्गत जिन बातों का उल्लेख किया गया है उन बातों को अगली 20 धाराओं में विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। धारा 10 के अनुसार किसी भी करार के संविदा होने के लिए उस में सक्षम पक्षकार, स्वतंत्र सहमति, विधिपूर्ण प्रतिफल और विधिपूर्ण उद्देश तथा करार विधि द्वारा सीधे शून्य घोषित नहीं किया गया हो यह सभी बातों का समावेश होना चाहिए तब ही कोई करार संविदा का रूप लेता है।पूर्व...
संविदा विधि (Contract Law) भाग 7 : स्वतंत्र सहमति के अंतर्गत कपट, दुर्व्यपदेशन और भूल
भारतीय संविदा अधिनियम 1872 के अंतर्गत धारा 10 सभी करारों को संविदा घोषित करती है। इस धारा के अंतर्गत यह उल्लेख किया गया है कि किसी भी करार के संविदा होने के लिए स्वतंत्र सहमति उसमें एक प्रमुख गुण होता है। अधिनियम की धारा 14 के अंतर्गत स्वतंत्र सहमति की परिभाषा प्रस्तुत की गई है जिसमें स्वतंत्र सहमति में पांच तत्वों का समावेश दिया गया है। इन पांच तत्वों में अंत के तीन तत्व कपाट, दुर्व्यपदेशन और भूल है जिन्हें इस आलेख में प्रस्तुत किया जा रहा है। यदि किसी सहमति में कपट नहीं है दुर्व्यपदेशन नहीं है...
संविदा विधि (Contract Law) भाग 6 : स्वतंत्र सहमति (Free Consent) क्या होती है?
संविदा विधि के पिछले आलेखों में अब तक हमने जाना है कि किसी भी करार के लिए प्रस्थापना और प्रस्थापना का प्रतिग्रहीत होना आवश्यक होता है तथा जब प्रस्थापना प्रतिग्रहीत हो जाती है तो वह करार बन जाती है। भाग पांच के अंतर्गत हमने जाना है कि कोई करार वैध संविदा कब बनता है तथा किसी भी करार को वैध संविदा होने हेतु सक्षम पक्षकार तथा स्वतंत्र सहमति का होना नितांत आवश्यक होता है। पिछले आलेख में यह भी अध्ययन किया जा चुका है कि कोई करार के सक्षम पक्षकार क्या होते है, सक्षम पक्षकार होने के लिए वयस्कता, स्वस्थ...
संविदा विधि (Contract Law) भाग 5 : कोई करार कब संविदा बनता है और संविदा करने के लिए सक्षम कौन होता है (धारा 10-12)
भारतीय संविदा अधिनियम 1872 के अंतर्गत सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि जब करार हो जाता है तो कौन से करार संविदा बनते हैं और संविदा करने के लिए सक्षम पक्षकार कौन होते हैं? इस प्रश्न का जवाब हमें इस अधिनियम की धारा 10 और 12 में प्राप्त होता है। इस अधिनियम की धारा 10 भारतीय संविदा अधिनियम 1872 के सर्वाधिक महत्वपूर्ण धाराओं में से एक धारा है। यदि इस धारा को गहनता से अध्ययन किया जाए तो यह प्राप्त होता है कि संविदा अधिनियम का संपूर्ण निचोड़ तथा निष्कर्ष इस धारा के अंतर्गत समाहित कर दिया गया है। इस...
जानिए विशिष्ट राहत अधिनियम (Specific Relief Act, 1963) के बारे में ये खास बातें
विशिष्ट राहत अधिनियम, 1963 (Specific Relief Act, 1963) संसद द्वारा अधिनियमित किया गया और यह 1 मार्च, 1964 को लागू हुआ था। वर्तमान विशिष्ट राहत अधिनियम, 1963 पूर्व विशिष्ट राहत अधिनियम 1877 का एक संशोधित रूप है जिसे वर्तमान अधिनियम की धारा 44 द्वारा निरस्त कर दिया गया था। यह अधिनियम ठेकों, टोरंट और अन्य मामलों से संबंधित मामलों में राहत प्रदान करने के उद्देश्य से बनाया गया था। यह अधिनियम भारतीय अनुबंध अधिनियम(Indian Contract Act), 1872 की शाखाओं में से एक में माना जाता है।हाल ही में, विशिष्ट...
संविदा विधि (Contract Law) भाग 4 : संविदा अधिनियम के अंतर्गत प्रतिसंहरण ( Revocation) क्या होता है और कैसे किया जाता है (धारा 5-6)
प्रतिसंहरण का सामान्य सा अर्थ होता है रद्द करना अर्थात अपने प्रस्ताव और स्वीकृति को रद्द करना। प्रश्न उठता है कि कोई भी प्रस्ताव या स्वीकृति को रद्द किया जा सकता है रद्द करने की समय अवधि क्या है।इस प्रश्न का उत्तर हमें संविदा अधिनियम 1872 धारा 5 के अंतर्गत प्राप्त होता है। इस धारा के अनुसार कोई भी प्रस्थापना उसके प्रतिग्रहण की सूचना प्रस्थापक के विरुद्ध संपूर्ण हो जाने के पूर्व किसी भी समय प्रतिसंहरण की जा सकेगी किंतु उसके पश्चात नहीं।कोई भी प्रतिग्रहण या प्रतिग्रहण की सूचना प्रतिग्रहिता के...
संविदा विधि (Law of Contract ) भाग 3 : संविदा अधिनियम के अंतर्गत प्रस्ताव ( Proposal) और स्वीकृति (acceptance) कैसे किया जाता है (धारा 3-4)
भारतीय संविदा अधिनियम 1872 के अंतर्गत अब तक के दो आलेखों में हमने इस अधिनियम का मूल अर्थ और उससे संबंधित परिभाषाओं को समझने का प्रयास किया है, इस आलेख के अंतर्गत प्रस्थापना (प्रस्ताव) और प्रतिग्रहण ( स्वीकृति) कैसे किया जाता है प्रस्थापना और प्रतिग्रहण की सूचना कैसे संपूर्ण होती है, इस संदर्भ में उल्लेख किया जा रहा है।प्रस्ताव ( Proposal) की संसूचनासंविदा अधिनियम 1872 की धारा 3 प्रस्थापनाओं की संसूचना, प्रतिग्रहण कि संसूचना और प्रतिसंहरण के संबंध में उल्लेख कर रही है। इस धारा का सर्वाधिक महत्व...
संविदा विधि ( Law of Contract) भाग 2 : संविदा अधिनियम के अंतर्गत परिभाषाएं (धारा- 2)
किसी भी अधिनियम की उद्देशिका उसकी परिभाषा वाली धारा होती है। भारतीय संविदा अधिनियम 1872 के अंतर्गत भी परिभाषाओं के संबंध में (धारा-2) दी गई है। इस धारा के अंतर्गत इस अधिनियम से संबंधित संपूर्ण महत्वपूर्ण परिभाषाओं का समावेश कर दिया गया है। यदि इन परिभाषाओं को जिज्ञासा पूर्वक समझ लिया जाए तो भारतीय संविदा अधिनियम 1872 सरलतापूर्वक समझा जा सकता है। इस आलेख में भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 की धारा-2 के अंतर्गत जो 10 परिभाषाएं प्रस्तुत की गई है उनमे महत्वपूर्ण परिभाषाओं पर टीका टिप्पणी सहित सारगर्भित...
संविदा विधि (Law of Contract ) भाग 1 : संविदा विधि का अर्थ और उससे संबंधित महत्वपूर्ण बातें
यह सीरीज संविदा विधि से संबंधित आलेखों को लेकर प्रारंभ की जा रही है। इस सीरीज के अंतर्गत संविदा विधि से संबंधित समस्त महत्वपूर्ण प्रावधानों को टीका टिप्पणी सहित सारगर्भित आलेखों में समावेश किया जा रहा है। इस सीरीज का उद्देश्य विधि के छात्रों और कानूनी जानकारी प्राप्त करने के इच्छुक व्यक्तियों को सरल से सरलतम भाषा में संविदा विधि की सभी महत्वपूर्ण जानकारियां उपलब्ध कराना है। यह इस सीरीज का प्रथम आलेख है जिसके माध्यम से संविदा विधि के अर्थ और उस पर संबंधित महत्वपूर्ण बातों पर चर्चा की जा रही है...
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया सदोष हत्या का प्रयास, जिसमें हत्या न हुई हो [Section 308 IPC] और स्वेच्छा से खतरनाक हथियारों से चोट पहुंचाना [ Section 324 IPC] के बीच अंतर
एक आपराधिक अपील में पिछले महीने पारित एक आदेश में, सुप्रीम कोर्ट ने सदोष हत्या के प्रयास, जिसमें हत्या न हुई हो [धारा 308 आईपीसी] और जानबूझ़-कर तेज धारदार हथियार से घायल करने [ धारा 324 आईपीसी] के बीच 'सूक्ष्म और बारीक' अंतर समझाया।तीन जजों की पीठ ने कहा, धारा 308 के तहत, चोटें ऐसी होनी चाहिए जिनसे मौत हो सकती हो, जबकि धारा 324 के तहत चोटें जीवन को खतरे में डाल सकती या नहीं डाल सकती है।अदालत एक अभियुक्त को भारतीय दंड संहिता की धारा 308 के तहत दी गई सजा के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई कर रही...
हिंदू विधि भाग 19 : कोई हिंदू व्यक्ति अपनी साहदायिकी संपत्ति सहित कोई भी संपत्ति कहीं भी वसीयत कर सकता है
हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 किसी निर्वसीयती मरने वाले हिंदुओं की संपत्ति के उत्तराधिकार के संबंध में वारिसान की व्यवस्था करता है। इस अधिनियम के अंतर्गत हिंदू पुरुष और हिंदू नारी दोनों की संपत्ति के उत्तराधिकार की व्यवस्था की गई है पर यह अधिनियम केवल तब ही लागू होता है जब कोई हिंदू व्यक्ति अपने उत्तराधिकार के संबंध में कोई वसीयत कर कर नहीं मृत हुआ है। इस अधिनियम की धारा 30 महत्वपूर्ण धाराओं में से एक धारा है। इस धारा के अंतर्गत किसी हिंदू व्यक्ति को यह अधिकार दिया गया है कि वह अपनी संपत्ति को...
हिंदू विधि भाग 18 : उत्तराधिकार से संबंधित संपत्ति में हिस्सेदारों को अग्रक्रयाधिकार (Peferential Right) प्राप्त होता है
हिंदू विधि के अधीन किसी निर्वसीयती मरने वाले हिंदू व्यक्ति की संपत्ति के सभी वारिसों को संपत्ति में अग्रक्रयाधिकार प्राप्त होता है अर्थात उत्तराधिकार के किसी हिस्से को खरीदने का पहला अधिकार उस संपत्ति के हिस्सेदारों को ही प्राप्त होता है। जहां निर्वसीयती मृत व्यक्ति की अचल संपत्ति अनुसूची के वर्ग -1 ही के दो या दो से अधिक वारिसों पर न्यागत होती है और उनमें से कोई वारिस उत्तराधिकार में प्राप्त संपत्ति या व्यवसाय में अपने हित को अंतरित करना चाहता है, तो अन्य वारिस या वारिसगण को यह अधिमानी विधिक...










![सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया सदोष हत्या का प्रयास, जिसमें हत्या न हुई हो [Section 308 IPC] और स्वेच्छा से खतरनाक हथियारों से चोट पहुंचाना [ Section 324 IPC] के बीच अंतर सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया सदोष हत्या का प्रयास, जिसमें हत्या न हुई हो [Section 308 IPC] और स्वेच्छा से खतरनाक हथियारों से चोट पहुंचाना [ Section 324 IPC] के बीच अंतर](https://hindi.livelaw.in/h-upload/2019/07/26/500x300_362576-360061-supreme-court.jpg)

