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संविदा विधि (Contract Law) भाग 7 : स्वतंत्र सहमति के अंतर्गत कपट, दुर्व्यपदेशन और भूल

Shadab Salim
20 Oct 2020 7:00 AM GMT
संविदा विधि (Contract Law) भाग 7 :  स्वतंत्र सहमति के अंतर्गत कपट, दुर्व्यपदेशन और भूल
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भारतीय संविदा अधिनियम 1872 के अंतर्गत धारा 10 सभी करारों को संविदा घोषित करती है। इस धारा के अंतर्गत यह उल्लेख किया गया है कि किसी भी करार के संविदा होने के लिए स्वतंत्र सहमति उसमें एक प्रमुख गुण होता है।

अधिनियम की धारा 14 के अंतर्गत स्वतंत्र सहमति की परिभाषा प्रस्तुत की गई है जिसमें स्वतंत्र सहमति में पांच तत्वों का समावेश दिया गया है। इन पांच तत्वों में अंत के तीन तत्व कपाट, दुर्व्यपदेशन और भूल है जिन्हें इस आलेख में प्रस्तुत किया जा रहा है।

यदि किसी सहमति में कपट नहीं है दुर्व्यपदेशन नहीं है और भूल नहीं है तो ऐसी परिस्थिति में ही सहमति स्वतंत्र सहमति होती है। यदि इन चीजों का समावेश किसी सहमति में होता है तो वह सहमति स्वतंत्र सहमति नहीं होती है। इस आलेख में इन तीनों पर चर्चा की जा रही है पूर्व के आलेख भाग 6 में प्रपीड़न और असम्यक असर को समझा जा चुका है।

कपट (Fraud)

किसी भी व्यक्ति द्वारा जब जानबूझकर दुर्व्यपदेशन किया जाता है यह कपट हो जाता है। भारतीय संविदा अधिनियम के अंतर्गत धारा 17 में कपट की परिभाषा प्रस्तुत की गई है। इस परिभाषा के अंतर्गत मिथ्या कथन जिसका सत्य होने के रूप में सुझाव किया गया है कपट होता है। कपट इस ज्ञान से किया गया हो कि यह असत्य है और धोखा देने का कोई कार्य किया गया हो। कोई ऐसा कार्य या लोप हुआ हो जिसका कपटपूर्ण होना विधिताः घोषित किया गया हो।

जहां कपट को कार्यवाही में साबित कर दिया जाता है वहां संपूर्ण कार्यवाही असफल हो जाएगी और वाद एवं निष्पादन कार्यवाही न केवल असफल होंगी अपितु ऐसे कपट द्वारा प्रभावित पक्षकारगण उसकी उपेक्षा करने के भी हकदार होंगे।

वादी ने वादपत्र में कपट का अभिकथन किया लेकिन वादी की ओर से प्रक्रिया में थोड़ी भी अनियमितता पाई जाती है तो वह संविदा अकृत घोषित करने की मांग नहीं कर सकता।

धारा 17 के अनुसार जो बात सत्य नहीं है उसका सत्य के रूप में उस व्यक्ति द्वारा सुझाया जाना कपट है जो व्यक्ति यह विश्वास नहीं करता कि वह सत्य है इसे दूसरे शब्दों में इस प्रकार कहा जा सकता है कि किसी तत्व के विषय में सुझाव देना एक कथन देना बिना उसकी सत्यता में विश्वास रखे हुए कपट।

कपट के लिए तत्व का कथन होना चाहिए और वह कथन असत्य तो होना चाहिए।

जैसे किसी व्यक्ति ने अपनी कोई कार किसी व्यक्ति को बेचने के लिए प्रस्ताव भेजा तथा कार का इंजन खुला हुआ था और कार चलने लायक नहीं थी। यहां पर बेचने वाले व्यक्ति ने कार के भीतर होने वाले ऐब का उल्लेख नहीं किया और कार को कपटपूर्ण आशय से बेच दिया यह कपट है। इस प्रकार के कपट से ली गई सहमति स्वतंत्र सहमति नहीं होती है।

कपट से अभिप्रेरित है और उसके अंतर्गत आता है निम्नलिखित में कोई भी कार्य संविदा के एक पक्षकार द्वारा उसकी मौनुकुलता से या उसके अभिकर्ता द्वारा किसी अन्य प्रकार की या उसके अभिकर्ता की प्रवंचना करने के आशय से संविदा करने के लिए उत्प्रेरित करने के आशय से किया गया हो।

जो बात सत्य नहीं है उसका सत्य के रूप में उस व्यक्ति द्वारा सुझाया जाना जो यह विश्वास नहीं करता है कि वह सत्य है।

किसी तत्व का ज्ञान या विश्वास करने वाले व्यक्ति द्वारा उस तत्व का सक्रिय रूप में छुपाया जाना।

कोई वचन जो उसका पालन करने के आशय के बिना दिया गया हो।

कोई ऐसा कार्य या लोप जिसका कपटपूर्ण होना विधिताः घोषित है।

कपट का या मूल गुण है कि उसमें किसी भी तत्व को छिपाया जाता है तथा तत्व को छुपाकर कोई करार किया जाता है। सत्य का ज्ञान या विश्वास रखने वाला व्यक्ति यह प्रयास करता है कि दूसरा पक्षकार उक्त तथ्य की बातों को ना जान सके।

इसे संविदा अधिनियम की धारा 19 के दृष्टांत से जाना जा सकता है जिसके अनुसार ख क की संपदा में कच्ची धातु की एक पट्टी खोजता है और उसके अस्तित्व को छिपाने का प्रयास करता है और छुपा लेता है। क को उस कच्ची धातु की पट्टी के अस्तित्व का ज्ञान न होने के कारण उस संपदा को न्यून मूल्य पर क्रय करने में समर्थ हो जाता है। यहां ख ने कपट किया है जिसके परिणामस्वरूप संविदा क के विकल्प पर शून्यकरणीय है।

दुर्व्यपदेशन (Misrepresentation)

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 18 के अंतर्गत दुर्व्यपदेशन को परिभाषित किया गया है।

किसी भी सहमति के स्वतंत्र सहमति होने के लिए उसमे दुर्व्यपदेशन नहीं होना चाहिए इसे सुझाव मात्र के रूप में नहीं होना चाहिए। इसे उन परिस्थितियों के अधीन होना चाहिए जहां बोलने का कर्तव्य हो।

दुर्व्यपदेशन के अंतर्गत वह पक्ष शामिल है जो उस व्यक्ति की जिसे वह करता है उसकी जानकारी से समर्थित न हो। यदि वह व्यक्ति उसकी सत्यता में विश्वास करता है यद्यपि कपट एवं दुर्व्यपदेशन इन दोनों में मिथ्या कथन के परिणाम स्वरुप संविदा के लिए सहमति दी जाती है परंतु दोनों में प्रमुख अंतर यह है कि कपट में मिथ्या कथन करने वाला व्यक्ति इस बात की जानकारी से अवगत होता है कि उसका कथन जो वह कर रहा है मिथ्या है अर्थात कथन प्रस्तुत करने वाले व्यक्ति को उसकी असत्यता के विषय में जानकारी होती है या कथन प्रस्तुत करने वाला व्यक्ति लापरवाही से कथन की सत्यता या असत्यता को जानने का प्रयास किए बिना देता है जबकि मिथ्या दुर्व्यपदेशन में मिथ्या कथन करने वाला व्यक्ति या विश्वास करता है कि कथन सत्य है यद्यपि वह कथन सत्य नहीं होता है दुर्व्यपदेशन में धोखा देने का आशय नहीं होता है।

इसके अंतर्गत निश्चयात्मक कथन शामिल है जिसे देने वाला व्यक्ति उसकी सत्यता में विश्वास करता है किंतु वह सत्य नहीं है और उक्त बयान देने वाले व्यक्ति की जानकारी द्वारा वह समर्थित नहीं है। इस प्रकार असत्य बात को निश्चित ढंग से कहना जब की बात कहने वाले व्यक्ति को प्राप्त सूचना द्वारा समर्थित नहीं है तो यह दुर्व्यपदेशन है।

एक प्रकरण में जहां प्रतिवादी ने वादी के साथ कोई जहाज किराए पर लेने की संविदा की थी। उक्त संविदा के समय वादी ने कहा कि उसका वजन 28 टन से ज्यादा नहीं है जबकि वास्तविकता यह थी कि उसका वजन 3000 टन से ज्यादा था। वादी को यह विश्वास था कि उक्त जहाज का वजन 28 टन से ज्यादा नहीं है।

वास्तविक बात तो यह थी कि उसको उक्त जहाज के बारे में कोई जानकारी नहीं थी उसने केवल धूल में लठ लगा दिया था। इस मामले में न्यायालय ने निर्णय दिया कि प्रतिवादी की सम्मति दुर्व्यपदेशन से प्राप्त हुई थी इस कारण उक्त संविदा शून्यकरणीय है। जहाज के भार के बारे में जो निश्यात्मक ज्ञान दिया वह उसे प्राप्त सूचना से समर्थित होने के कारण असत्य था।

जहां कोई व्यक्ति किसी व्यक्ति को धोखा देने के इरादे के अभाव में कोई कार्य करता है और स्वयं को लाभान्वित करता है और दूसरों को हानि पहुंचाता है तो यह दुर्व्यपदेशन होता है न कि कपट। कपट में धोखा देने का आशय होता है कपट धोखा देने के उद्देश्य से ही किया जाता है परंतु दुर्व्यपदेशन में धोखा देने का आशय नहीं होता है।

भारत संविदा अधिनियम की धारा 19 के अंतर्गत प्रपीड़न, कपट, दुर्व्यपदेशन जब कोई संविदा में सहमति प्राप्त की जाती है तो ऐसी संविदा उस पक्षकार की सहमति पर शून्यकरणीय है जिससे ऐसी सम्मति प्राप्त की गई है।

भूल (Mistake)

भूल अनेक प्रकार की होती है तथ्य संबंधी भूल को शून्य करार माना गया है। जब भी किसी करार में कोई भी तथ्य संबंधी भूल होती है तो ऐसा करार शून्य हो जाता है।

भूल निम्नलिखित दो प्रकार की हो सकती है

तथ्य संबंधित भूल

विधि संबंधित भूल

विधि की भूल कभी भी क्षम्य नहीं है जबकि तथ्य की भूल क्षम्य है। संविदा की विषय वस्तु से संबंधित भूल निम्नलिखित के संबंध में हो सकती हैं-

अस्तित्व

हक

मूल्य

क्वालिटी

मात्रा

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 20 के अंतर्गत तथ्य संबंधी भूल को क्षम्य नहीं माना है। इस प्रकार की भूल के कारण संविदा को शून्य करार दिया गया है। जब संविदा के दोनों पक्षकार किसी करार के तत्वों की बाबत या विषय वस्तु की बाबत या वस्तु की पहचान या उसकी गुणवंता या उसकी मात्रा अथवा उसके मूल्य के विषय में पारस्परिक भूल करते हैं तो उसे पारस्परिक भूल कहते हैं। धारा 20 के अंतर्गत कोई करार तभी शून्य घोषित किया जाएगा जबकि संविदा के दोनों पक्षकारों की भूल हो अर्थात भूल पारस्परिक हो क्योंकि एक पक्षीय भूल पर्याप्त नहीं। यदि संविदा का एक पक्षकार भूल के अधीन है तो धारा 20 के अंतर्गत संविदा शून्य नहीं होगी।

उदाहरण के लिए क, ख से उसका एक निश्चित घोड़ा क्रय करने का करार करता है। करार के समय घोड़ा मर चुका था परंतु करार के समय उक्त तथ्य की जानकारी दोनों पक्षकारों को नहीं थी। यह कहा जा सकता है कि भूल उभय पक्षीय होनी चाहिए।

संविदा तभी शून्य होगी जब पक्षकारों की भूल उभय पक्षीय अर्थात पारस्परिक हो किंतु यदि भूल एक पक्षीय है तो ऐसी संविदा शून्य करने के लिए पर्याप्त नहीं होगी। न्याय प्रदान करने हेतु मामले का भली प्रकार अवलोकन किया जाना आवश्यक है और इस बात का परीक्षण किया जाना समीचीन प्रतीत होता है कि क्या संविदात्मक संव्यवहार में पारस्परिक भूल हुई है अर्थात भूल एक ही पक्षकार द्वारा हुई है या दोनों पक्षकारों द्वारा। यदि भूल एक पक्षीय है तो संविदा विखंडित किए जाने योग्य नहीं होगी अतः आवश्यक है कि भूल उभय पक्षीय हो।

विधि संबंधी भूल

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 21 के अंतर्गत विधि संबंधी भूल को क्षम्य नहीं माना गया है। यदि कोई भूल विधि संबंधी धूल है तो यह माफी योग्य नहीं है तथा इसमें कोई अनुतोष प्रदान नहीं किया जा सकता।

देश की सामान्य विधि के अनुसार यदि कोई त्रुटि तथ्य से संबंधित है तो ऐसी स्थिति में उपचार प्राप्त होगा वह क्षम्य होगी किंतु यदि भूल तथ्यात्मक न होकर विधि से संबंधित है तो ऐसी स्थिति में जा कहा जा सकता है कि वह क्षम्य नहीं है और उस के संदर्भ में कोई अनुतोष नहीं प्रदान किया जाएगा। इसका सीधा और स्पष्ट कारण यह है कि विधि की भूल क्षम्य नहीं है अतः विधि की भूल को वह भूल माना जाएगा जिसकी बाबत कोई अनुतोष नहीं प्रदान किया जा सकता।

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