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संविदा विधि (Contract Law) भाग 4 : संविदा अधिनियम के अंतर्गत प्रतिसंहरण ( Revocation) क्या होता है और कैसे किया जाता है (धारा 5-6)

Shadab Salim
17 Oct 2020 4:45 AM GMT
संविदा विधि (Contract Law) भाग 4 : संविदा अधिनियम के अंतर्गत प्रतिसंहरण ( Revocation) क्या होता है और कैसे किया जाता है (धारा 5-6)
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प्रतिसंहरण का सामान्य सा अर्थ होता है रद्द करना अर्थात अपने प्रस्ताव और स्वीकृति को रद्द करना। प्रश्न उठता है कि कोई भी प्रस्ताव या स्वीकृति को रद्द किया जा सकता है रद्द करने की समय अवधि क्या है।

इस प्रश्न का उत्तर हमें संविदा अधिनियम 1872 धारा 5 के अंतर्गत प्राप्त होता है। इस धारा के अनुसार कोई भी प्रस्थापना उसके प्रतिग्रहण की सूचना प्रस्थापक के विरुद्ध संपूर्ण हो जाने के पूर्व किसी भी समय प्रतिसंहरण की जा सकेगी किंतु उसके पश्चात नहीं।

कोई भी प्रतिग्रहण या प्रतिग्रहण की सूचना प्रतिग्रहिता के विरुद्ध संपूर्ण हो जाने से पूर्व किसी भी समय प्रतिसंहरण किया जा सकेगा किंतु उसके पश्चात नहीं।

अधिनियम के अंतर्गत प्रस्ताव और स्वीकृति दोनों के प्रतिसंहरण की व्यवस्था रखी गई है। प्रस्ताव करने वाले को अपने प्रस्ताव को रद्द करने का भी अधिकार दिया गया है तथा स्वीकृति करने वाले को अपनी स्वीकृति रद्द करने का भी अधिकार दिया गया है परंतु यह अधिकार सीमाओं के अंतर्गत बांधा गया है। ऐसा नहीं है कि किसी भी प्रस्ताव को कभी भी रद्द किया जा सकता है और किसी व्यक्ति को कभी भी रद्द किया जा सकता है। इसके लिए समय अवधि दी गई है और वैज्ञानिक तर्क बताए गए हैं जिसके आधार पर ही प्रस्ताव और स्वीकृति को रद्द किया जा सकता है।

प्रस्ताव रद्द करना- ( Revocation of proposal)

प्रस्थापना का प्रतिसंहरण कोई भी प्रस्थापना प्रतिग्रहण के पूर्व किसी भी समय किया जा सकती है। स्पष्ट है कि प्रतिग्रहण होने के पूर्व कोई भी प्रस्थापना प्रतिसंहरण की जा सकती है। अंग्रेजी विधि के सामान्य नियमों का अध्ययन करने से यह मालूम होता है कि प्रतिग्रहण पत्र डाक में डाल दिया जाता है तो संविदा का निर्माण हो जाता है। ऐसी स्थिति में प्रस्ताव का प्रतिसंहरण अभिप्रभावी होगा। अधिनियम की धारा 5 के अंतर्गत कोई भी प्रस्थापना किसी भी समय प्रतिसंहरण की जा सकती हैं जबकि प्रतिग्रहण की संसूचना प्रस्थापक के विरुद्ध पूर्ण हुई हो अर्थात किसी भी प्रस्थापना का प्रतिसंहरण प्रस्थापना की सूचना के संबंध में पूर्ण हो जाने के पूर्व किया जा सकता है।

किसी भी प्रतिग्रहण का प्रतिसंहरण उस प्रतिग्रहण की सूचना प्रतिग्रहिता के संबंध में पूर्ण होने के पूर्व किया जा सकता है। उसके बाद में प्रतिग्रहीता की सूचना पूर्ण होने के संबंध में धारा 4 में उल्लेखित हैं जिसके अनुसार प्रतिसंहरण की सूचना जहां तक प्रतिसंहरण करने वाले का संबंध है उस समय पूर्ण हो जाती है जबकि उस व्यक्ति के पास भेजने के लिए जिस प्रस्थापना की गई है पारेषण के अनुक्रम में इस प्रकार रख दी गई है कि वह प्रतिग्रहीत करने वाले व्यक्ति की शक्ति से परे हो गई है। जहां तक उस व्यक्ति का संबंध है जिससे वहां की गई है प्रतिग्रहण की सूचना तब पूर्ण होती है जबकि वह उसके ज्ञान से अच्छी प्रकार में आ जाती है।

स्वीकृति रद्द करना- ( Revocation of acceptance)

प्रतिग्रहण को रद्द करना भी संभव होता है परंतु यह तभी संभव होता है जब प्रतिग्रहण की सूचना प्रस्तावक के ज्ञान में नहीं आती है। यदि प्रतिग्रहण की संसूचना प्रस्तावक के ज्ञान में आ जाती है तो फिर प्रतिग्रहण को रद्द नहीं किया जा सकता। किसी भी प्रतिग्रहण के रिवोकेशन के लिए यह आवश्यक है कि प्रस्तावक के ज्ञान में नहीं पहुंचना चाहिए।

प्रस्ताव और स्वीकृति के रद्दकरण को एक उदाहरण द्वारा समझा जा सकता है-

राहुल अपना घर 5000000 रुपए में कपिल को बेचने के लिए डाक द्वारा प्रस्ताव भेजता है। कपिल इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लेता है और डाक द्वारा अपने प्रस्ताव की सूचना राहुल को भेजने के लिए डाक लगा देता है। अब ऐसी स्थिति में यदि राहुल अपने प्रस्ताव को रद्द करना चाहता है तो राहुल उस समय तक ही अपने प्रस्ताव को रद्द कर सकता है जब तक कपिल अपनी स्वीकृति को डाक में नहीं लगाता है।

कपिल अपनी स्वीकृति को रद्द करना चाहता है तो वह ऐसा रद्दकरण तब तक ही कर सकता है जब तक इस प्रतिग्रहण की सूचना राहुल को प्राप्त नहीं होती है अर्थात यदि डाक राहुल को प्राप्त हो गई तो फिर कपिल द्वारा अपने अपनी स्वीकृति को रद्द नहीं किया जा सकता। कपिल अपनी स्वीकृति को राहुल के डाक प्राप्त होने तक रद्द कर सकता है यदि कपिल राहुल के डाक प्राप्त होने के पूर्व ही टेलीफोन करके राहुल को यह कह देता है कि मैं इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं कर रहा हूं तो फिर यह कपिल की स्वीकृति का रद्दकरण वैध माना जाएगा क्योंकि राहुल को इसकी स्वीकृति के संबंध में कोई जानकारी प्राप्त नहीं होती।

प्रतिसंहरण कैसे किया जाता है-

यह समझा जा चुका है कि किसी भी प्रस्ताव या स्वीकृति का प्रतिसंहरण किया जा सकता है। अब अगला प्रश्न यह है कि ऐसा प्रतिसंहरण कैसे किया जा सकता है किस रीती से और किस ढंग से किया जा सकता है! इसके संबंध में भारतीय संविदा अधिनियम 1872 की धारा 6 में उल्लेख किया गया है। इस धारा के अंतर्गत विभिन्न प्रकार के तरीकों का उल्लेख किया गया है जो निम्न है-

प्रतिसंहरण की सूचना देकर-

प्रतिग्रहण के लिए समय की समाप्ति पर अथवा उस समय की समाप्ति पर जो युक्तियुक्त हो-

प्रतिग्रहण के पूर्व की शर्त को पूर्ण न करने पर-

प्रस्थापनाकर्ता की मृत्यु या उन्मत्तता पर-

यह प्रतिसंहरण के चार प्रकार धारा 6 के भीतर उल्लेखित किए गए हैं।

1)- प्रस्तावना उस समय प्रतिसंहरण की जा सकती है जब प्रस्थापक दूसरे पक्षकार को सूचना देता है इस प्रकार प्रस्थापना प्रस्थापक द्वारा दूसरे पक्षकार को प्रतिसंहरण की सूचना देकर रद्द की जा सकती है।

ऐसी सूचना किसी भी प्रकार से दी जा सकती है। भारतीय विधि के अनुसार प्रस्थापना के प्रतिसंहरण की सूचना प्रस्थापक या उसके अभिकर्ता द्वारा ही दी जानी चाहिए यदि प्रस्थापना के प्रतिसंहरण की सूचना प्रतिग्रहिता को किसी अन्य माध्यम से प्राप्त होती है तो यह भी पर्याप्त होगा परंतु सूचना प्रस्तावक या उसके एजेंट द्वारा ही दी जानी चाहिए।

दूसरे कारण में विहित समय के बीत जाने पर भी किसी प्रस्थापना का प्रतिसंहरण हो जाता है। यदि प्रस्थापना में उसका प्रतिग्रहण किए जाने के संबंध में कोई समय सीमा विहित कर दी गयी है तो ऐसी स्थिति में प्रतिग्रहण उस समय अवधि के अंदर ही किया जाना चाहिए यदि उक्त सुनिश्चित समय अवधि के भीतर प्रस्थापना का प्रतिग्रहण कर दिया जाता ऐसी स्थिति में उक्त समय अवधि की समाप्ति हो जाने पर प्रस्थापना का प्रतिसंहरण स्वाभाविक रूप से हो जाएगा।

तीसरे कारण में किसी शर्त के पूरा न होने पर भी प्रस्थापना का प्रतिग्रहण हो जाता है पर जहां प्रस्तावक ने प्रस्थापना के बारे में कोई पूर्वर्ती शर्त रखी है जिसे प्रस्थापना के प्रतिग्रहण के पहले स्वीकार किया जाना आवश्यक है तो ऐसी स्थिति में उक्त शर्त स्वीकार न करने पर प्रस्थापना का प्रतिसंहरण हो जाता है। इस प्रकार यदि प्रस्थापना में कोई शर्त लगाई गई है जिसे प्रतिग्रहण के पहले स्वीकृत किया जाना आवश्यक है यदि प्रतिग्रहिता उक्त शर्त को पूरा करने में असफल रहता है तो प्रस्थापना समाप्त हो जाएगी। शर्त पूरा करने से पूर्व उसका प्रतिग्रहण करने से संविदा का निर्माण नहीं हो सकता।

जैसे कि यदि किसी व्यक्ति ने अपनी मोटरसाइकिल बेचने के लिए किसी दूसरे व्यक्ति को प्रस्ताव भेजा है। उसमें शर्त रखी है यदि तुम इस प्रस्ताव को स्वीकार कर रहे हो तो ₹5000 की राशि मेरे खाते में आज दिनांक को डिपॉज़िट कर देना परंतु प्रस्ताव को स्वीकार करने वाला राशि खाते में डिपाजिट नहीं करता है तो यह शर्त का उल्लंघन होगा प्रस्ताव का प्रतिसंहरण हो जाएगा।

प्रस्थापक की मृत्यु या उसका पागलपन

प्रस्थापक की मृत्यु हो जाती है या पागल हो जाता है ऐसी स्थिति में भी प्रस्ताव का प्रतिसंहरण हो जाता है। यदि प्रस्तावक की मृत्यु हो जाती है या पागल हो जाता है मृत या पागलपन का तथ्य प्रतिग्रहण के पहले ही प्रतिग्रहीता के ज्ञान में आ चुका है तो ऐसी स्थिति में प्रस्थापना का प्रतिसंहरण हो जाता है।

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