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संविदा विधि (Law of Contract ) भाग 3 : संविदा अधिनियम के अंतर्गत प्रस्ताव ( Proposal) और स्वीकृति (acceptance) कैसे किया जाता है (धारा 3-4)

Shadab Salim
16 Oct 2020 5:08 AM GMT
संविदा विधि (Law of Contract ) भाग 3 : संविदा अधिनियम के अंतर्गत प्रस्ताव ( Proposal) और स्वीकृति (acceptance) कैसे किया जाता है (धारा 3-4)
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भारतीय संविदा अधिनियम 1872 के अंतर्गत अब तक के दो आलेखों में हमने इस अधिनियम का मूल अर्थ और उससे संबंधित परिभाषाओं को समझने का प्रयास किया है, इस आलेख के अंतर्गत प्रस्थापना (प्रस्ताव) और प्रतिग्रहण ( स्वीकृति) कैसे किया जाता है प्रस्थापना और प्रतिग्रहण की सूचना कैसे संपूर्ण होती है, इस संदर्भ में उल्लेख किया जा रहा है।

प्रस्ताव ( Proposal) की संसूचना

संविदा अधिनियम 1872 की धारा 3 प्रस्थापनाओं की संसूचना, प्रतिग्रहण कि संसूचना और प्रतिसंहरण के संबंध में उल्लेख कर रही है। इस धारा का सर्वाधिक महत्व प्रस्ताव की संसूचना को लेकर है। जैसा कि पूर्व के आलेख में हमने यह समझा है कि किसी भी करार के होने के लिए पहले एक पक्ष द्वारा प्रस्ताव किया जाता है दूसरे पक्षकार द्वारा उसकी स्वीकृति की जाती है फिर करार अस्तित्व में आता है। प्रस्ताव होना ही मात्र महत्वपूर्ण नहीं है और स्वीकृति होना ही मात्र महत्वपूर्ण नहीं है अपितु प्रस्तावक को स्वीकृति की सूचना होना भी महत्वपूर्ण है।

यदि धारा 3 के अर्थों को समझा जाए इसके अनुसार मन की दशा जिसकी सूचना नहीं दी गई है मनुष्य एवं मनुष्य के मध्य संविदात्मक संव्यवहारों हेतु पर्याप्त नहीं माना जाता है। किसी भी कार्य या लोप के द्वारा प्रस्ताव और प्रतिग्रहण की संसूचना होना चाहिए।

संविदा के संबंध में स्वीकृति शब्दों द्वारा बोलकर अथवा लिखित रूप में होती है। प्रस्ताव की स्वीकृति की सूचना दिया जाना अत्यंत आवश्यक होता है। यदि प्रतिग्रहिता द्वारा प्रस्ताव के स्वीकृति की सूचना नहीं की जाती है ऐसी स्थिति में विधिमान्य संविदा का सृजन नहीं होता है और संविदा पूर्ण नहीं समझी जाती है। विधिमान्य संविदा के लिए आवश्यक है कि प्रस्थापना के प्रतिग्रहण की सूचना प्रस्तावक को दी जानी चाहिए।

अधिनियम की धारा 3 के अंतर्गत जब कभी किसी पक्षकार द्वारा प्रस्ताव किया जाता है तो इस प्रस्ताव की सूचना जिस व्यक्ति से प्रस्ताव किया गया है उस व्यक्ति को प्राप्त होना चाहिए तब ही विद्यमान संविदा का सृजन होता है। आज आधुनिक समय में टेलीफोन के माध्यम से भी संविदा होती है। टेलीफोन पर संविदा के दोनों पक्षकार आमने सामने होकर संविदा के संबंध में वार्ता करते हैं। ऐसी स्थिति में जब पर प्रस्थापक अपनी प्रस्थापना या प्रस्ताव से दूसरे पक्षकार को अवगत कराता है तो उक्त दूसरा पक्षकार यदि उस प्रस्थापना को प्रतिग्रहीत करता है तो वह प्रतिग्रहण की सूचना उस प्रस्थापक को दे देता है और दोनों के मध्य विधि मान संविदा सृजित हो जाती है।

धारा 3 में स्पष्ट है कि प्रस्थापनाओं की संसूचनाओं, प्रस्थापनाओं का प्रतिग्रहण, प्रस्थापनाओं तथा प्रतिग्रहणओं का प्रतिसंहरण क्रमश प्रस्थापना करने वाले, प्रतिग्रहण करने वाले अथवा प्रतिसंहरण करने वाले पक्षकार के ऐसे कार्य या लोप से समझा जाता है जिसके द्वारा वह प्रस्थापना प्रतिगृहीत या प्रतिसंहरण को सूचित करने का आशय रखता है अथवा जो उसे संसूचित करने का प्रभाव रखता है।

इस लेख में हम केवल प्रस्ताव की संसूचना और प्रतिग्रहण की संसूचना के संबंध में समझने का प्रयास कर रहे हैं इसके अगले लेख में प्रस्ताव और प्रतिग्रहण की संसूचना के प्रतिसंहरण अर्थात उन्हें रद्द किए जाने के संबंध में समझेंगे।

प्रस्ताव और स्वीकृति की संसूचना कब संपूर्ण हो जाती है (धारा- 4)

अब तक यह समझा जा चुका है कि किसी भी विधिमान्य संविदा के लिए प्रस्ताव और स्वीकृति की संसूचना का होना महत्वपूर्ण है। प्रश्न यह है कि कोई भी प्रस्ताव स्वीकृति की संसूचना कब संपूर्ण होती है! इस प्रश्न से संबंधित अधिनियम की धारा 4 महत्वपूर्ण धारा है।

धारा के अंतर्गत यह समझाने का प्रयास किया गया है कि कोई भी प्रस्तावना की संसूचना और स्वीकृति की संसूचना कब संपूर्ण होती है। प्रस्ताव या प्रस्थापना की संसूचना उस व्यक्ति को दी जानी चाहिए जिस व्यक्ति के साथ संविदा किया जाना है। भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 4 में यह व्यवस्था की गई है कि प्रस्थापना की संसूचना उस समय पूर्ण होती है जिस व्यक्ति को यह प्रस्थापना की जाती है यह उसके ज्ञान में आ जाती है।

उदाहरण के लिए विजय अपना मोबाइल ₹2000 में अजय को बेचने की प्रस्थापना करता है। प्रस्थापना की सूचना उस समय संपूर्ण मानी जाती है जब अजय विजय के उक्त प्रकार के प्रस्ताव से अवगत हो जाता है अर्थात अजय को प्रस्ताव की जानकारी प्राप्त हो जाती है।

जब तक प्रस्थापक द्वारा प्रस्ताव की सूचना से वह व्यक्ति जिसे प्रस्तावना की गई है अवगत नहीं होता है यह कहा जा सकता है कि प्रस्थापक ने उक्त व्यक्ति को सूचना नहीं दी है। इस उदाहरण से यह समझने को मिलता है कि कोई भी प्रस्तावना तब पूर्ण होती है जब उसकी सूचना उस व्यक्ति को प्राप्त हो गई है जिससे प्रस्थापना की गई है। लालमन बनाम गौरी दत्त 1913 के एक महत्वपूर्ण प्रकरण में यह माना गया है कि बिना ज्ञान के प्रेषित सूचना पर्याप्त नहीं है। प्रतिग्रहिता को प्रस्थापक द्वारा प्रस्तावना से संबंधित सभी बातों को युक्तियुक्त रूप में अवगत कराना चाहिए। सरल शब्दों में यह कहा जा सकता है कि कोई भी प्रस्थापना तब संपूर्ण मानी जाती है जब वह प्रतिग्रहण करने वाले व्यक्ति के संज्ञान में आ जाती है।

प्रतिग्रहण की संसूचना

जब प्रस्तावना की संसूचना संपूर्ण हो जाती है तो प्रतिग्रहण की संसूचना को लेकर प्रश्न उठते हैं। प्रतिग्रहण की संसूचना के संदर्भ में धारा 4 कहती है कि प्रति ग्रहण की संसूचना संस्थापक के विरुद्ध तब संपूर्ण हो जाती है जब वह उसके प्रति इस प्रकार पारेषण के अनुक्रम में कर दी जाती है कि वह प्रतिग्रहिता की शक्ति के बाहर हो जाए और प्रतिग्रहिता के विरुद्ध तब संपूर्ण हो जाती है जब वह प्रस्थापक के ज्ञान में आ जाती है।

इस धारा के भाव को अत्यंत गहनता से समझने का प्रयास करना चाहिए। यहां पर प्रतिग्रहण की संसूचना प्रस्तावक और प्रतिग्रहण करने वाले व्यक्ति दोनों के विरुद्ध संपूर्ण होने का प्रकार बताया गया है। जिस प्रकार प्रस्थापना की संसूचना दी जाती है उसी प्रकार प्रस्थापना के प्रतिग्रहण की सूचना प्रतिग्रहिता द्वारा प्रस्तावक को दी जानी चाहिए।

पावेल बनाम ली के वाद 1908 में यह कहा गया है कि प्रस्थापना जब प्रतिग्रहीत कर ली जाती है तो यहां पर प्रतिग्रहिता का कर्तव्य है कि वह प्रतिग्रहण की सूचना प्रस्तावक को प्रेषित करें। प्रस्थापना के प्रतिग्रहण की सूचना प्रतिग्रहीत पत्र या टेलीफोन के द्वारा कर सकता है अर्थात जैसे ही प्रतिग्रहिता प्रस्ताव को स्वीकार करता है उसे पत्र या टेलीफोन के माध्यम से अपने प्रतिग्रहण की संसूचना प्रेषित कर देनी चाहिए। भगवान दास बनाम गिरधारी लाल एंड कंपनी एआईआर 1966 एस सी 543 के प्रकरण में भी इस सिद्धांत को स्वीकार किया गया है।

सरल से शब्दों में यह कहा जा सकता है कि प्रतिग्रहण की सूचना युक्तियुक्त रूप से प्रस्ताव पक्ष को प्रेषित की जानी चाहिए।

प्रतिग्रहण की संसूचना से संबंधित जहां तक प्रस्थापक का संबंध है तब पूर्ण हो जाती है जबकि यहां पर प्रस्थापक को भेजने के लिए प्रेषण के अनुक्रम में इस प्रकार रखी जाती है कि वह प्रतिग्रहिता की शक्ति से परे हो जाए परंतु प्रतिग्रहिता के संबंध में प्रतिग्रहण की संसूचना तक पूर्ण समझी जाती है जबकि प्रस्थापक के ज्ञान में आ जाती है।

इस संपूर्ण प्रश्न को इस आलेख अंत में प्रस्तुत किए गए इस उदाहरण के द्वारा सरलता से समझा जा सकता है-

सौरभ सचिन को अपनी कार ₹100000 में बेचने का प्रस्ताव ईमेल के माध्यम से भेजता है। सचिन को मेल प्राप्त हो जाता है। सचिन ₹100000 में सौरभ की कार को खरीदने का प्रस्ताव स्वीकृत कर लेता है। सचिन अपनी स्वीकृति की संसूचना ईमेल के माध्यम से ही सौरभ को सेंड कर देता है। सचिन जैसे ही ईमेल के माध्यम से अपनी सूचना सचिन को सेंड करता है तो यह सूचना सचिन की शक्ति से बाहर हो जाती है अर्थात अब सचिन ई-मेल को सौरभ तक पहुंचने से नहीं रोक सकता है। ई-मेल सौरभ तक पहुंच जाता है जिस समय सचिन ने सौरभ को ईमेल सेंड किया था उसी समय सचिन की स्वीकृति की संसूचना संपूर्ण हो गई क्योंकि ई-मेल सचिन की शक्ति से बाहर हो गया था।

अगले आलेख में प्रस्थापना और प्रतिग्रहण के प्रतिसंहरण के संबंध में उल्लेख किया जाएगा।

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