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हिंदू विधि भाग 18 : उत्तराधिकार से संबंधित संपत्ति में हिस्सेदारों को अग्रक्रयाधिकार (Peferential Right) प्राप्त होता है

Shadab Salim
26 Sep 2020 5:31 AM GMT
हिंदू विधि भाग 18 : उत्तराधिकार से संबंधित संपत्ति में हिस्सेदारों को अग्रक्रयाधिकार (Peferential Right) प्राप्त होता है
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हिंदू विधि के अधीन किसी निर्वसीयती मरने वाले हिंदू व्यक्ति की संपत्ति के सभी वारिसों को संपत्ति में अग्रक्रयाधिकार प्राप्त होता है अर्थात उत्तराधिकार के किसी हिस्से को खरीदने का पहला अधिकार उस संपत्ति के हिस्सेदारों को ही प्राप्त होता है।

जहां निर्वसीयती मृत व्यक्ति की अचल संपत्ति अनुसूची के वर्ग -1 ही के दो या दो से अधिक वारिसों पर न्यागत होती है और उनमें से कोई वारिस उत्तराधिकार में प्राप्त संपत्ति या व्यवसाय में अपने हित को अंतरित करना चाहता है, तो अन्य वारिस या वारिसगण को यह अधिमानी विधिक अधिकार प्राप्त होगा कि वह विक्रेता वारिस के हित को क्रय कर ले अर्थात कोई सहस्वामी अचल संपत्ति में अपना हित वर्ग 1 के अन्य वारिसों के अधिमानी अधिकारों को काटते हुए किसी बाहरी व्यक्ति को संपत्ति में नहीं बेच सकता है।

संपत्ति क्रय करने का अधिमानी अधिकार संपत्ति के विक्रय हो जाने के पूर्व ही इंफोर्स कराया जा सकता है। अधिमानी अधिकार व्यक्तिगत अधिकार है, विक्रय के लिए प्रस्तावित संपत्ति को क्रय करने का स्वामी का अधिकार अंतरण योग्य नहीं है तथा उत्तराधिकार में प्राप्त नहीं किया जा सकता है। अधिमानी अधिकार को प्रभावशील करने के लिए उपचार सिविल न्यायालय के सम्मुख वाद प्रस्तुत कर प्राप्त किया जा सकता है।

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 (धारा- 22)

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 की धारा- 22 संपत्ति के वारिसों को एक दूसरे के विरुद्ध अग्रक्रयाधिकार का विकल्प उपलब्ध करती है। इस धारा की महत्वपूर्ण बात यह है कि यह धारा संपत्ति में किसी बाहरी व्यक्ति की घुसपैठ को रोकती है अर्थात कोई अंशधारी अपनी संपत्ति को किसी बाहरी व्यक्ति को बेचकर ना जाए। सबसे पहला अधिकार संपत्ति के अन्य वारिसों को प्राप्त होता है कि वह संपत्ति में हित रखने वाले अन्य अंशधारी का अंश क्रय कर सकता है।

जहां एक से अधिक अधिमानी वारिस हो और उनके मध्य आपस में संपत्ति को क्रय करने के संबंध में सहमति न हो तो उस दशा में सक्षम न्यायालय को इस विवाद का निर्णय करना होगा। यदि प्रस्तावित निर्णय के पश्चात संपत्ति क्रय करता है अथवा नहीं यह उसके स्वविवेक पर छोड़ा गया है। धारा- 22 की उपधारा दो सहस्वामी को अपने विधिक अधिमानी अधिकार को जो उपधारा 1 में वर्णित है को प्रवृत कराने का अधिकार देती है। यदि दो या दो से अधिक वर्ग 1 के वारिस अधिमानी अधिकार को प्राप्त करने हेतु संपत्ति को क्रय करना चाहते हैं तो उस दशा में सहस्वामी जो अधिकतम प्रतिफल की धनराशि देगा उसी को वरीयता दी जाएगी।

यह उपधारा सहस्वामियों के दावे को निर्मित करने का आधार प्रदान करती है। जैसे एक सहस्वामी जो वर्ग एक का वारिस है उत्तराधिकार में प्राप्त अचल संपत्ति के अपने अंश को विक्रय करने का पूर्ण अधिकार है किंतु यह अधिकार इस धारा के प्रावधान के अधीन है। प्रस्तावित विक्रय करने से पूर्व विक्रेता को अन्य सहस्वामियों को जिन्हें अधिमानी अधिकार प्राप्त है संपत्ति क्रय करने का अवसर देना होगा।

सहस्वामी क्रय करने हेतु अग्रसर नहीं होते हैं तो संपत्ति किसी भी बाहरी व्यक्ति को विक्रय की जा सकती है। यदि वर्तमान प्रावधान के प्रतिकूल कोई विक्रय किया जाता है तो ऐसा ट्रांजैक्शन नहीं होगा और अधिमानी अधिकार धारण करने वाले सहवारिसों चयन पर शून्यकरणीय होगा।

कृषि भूमि के संबंध में धारा 22 लागू नहीं होती

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 की धारा 22 कृषि भूमि के उत्तराधिकार के संबंध में लागू नहीं होती है।

प्यारा सिंह बनाम धन सिंह 1980 एम् पी एल जे 14 के प्रकरण में कहा गया है कि जब धारक की मृत्यु हुई हो और उसके पुत्रों में उत्तराधिकार में राजस्व भूमि प्राप्त की है तब भूमि को विक्रय करने के संबंध में किसी हिस्सेदार को किसी प्रकार का अग्रक्रयाधिकार उपलब्ध नहीं होगा। इस प्रकरण में एक भाई अपने हिस्से को विक्रय करना चाहता था तथा दूसरा भाई उसके विरुद्ध हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 की धारा 22 के अंतर्गत आवेदन लेकर आया था।

जीवन राम बनाम लक्ष्मी देवी एआईआर 1981 राजस्थान 16 के वाद में भी स्पष्ट कहा गया है कि कृषि भूमि के संबंध में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 की धारा 22 लागू नहीं होती है।

मूल रूप से अग्रक्रयाधिकार की अवधारणा मुस्लिम विधि के हक शुफ़ा की अवधारणा से प्रेरित है।

यह न्याय की बात है कि परिवार की संपत्ति में किसी विदेशी आदमी को प्रवेश नहीं करने दिया जाए तथा कोई भी पारिवारिक संपत्ति उसके उत्तराधिकारी प्रथम रूप से खरीदने के हकदार हैं।

एक युक्तियुक्त मूल्य पर संपत्ति को खरीदने का पहला अधिकार उसके सह स्वामियों को प्राप्त होता है। इसी अवधारणा को हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 की धारा 22 के अंतर्गत प्रवेश दिया गया है।

धारा-22 की उपधारा 1 के अनुसार यदि किसी निर्वसीयती की संपत्ति को या व्यापार को उसके हितों को उस निर्वसीयती के एक से अधिक अनुसूची के वर्ग 1 के वारिस उत्तराधिकार में प्राप्त कर लेते हैं और उन वारिसों में से कोई एक वारिस उत्तराधिकार में प्राप्त संपत्ति में या व्यापार में अपने हितों को विक्रय करना चाहता है तो अन्य वारिसों को हक होगा कि विक्रय करने वाले वारिस के हक को खरीद ले।

इस धारा के द्वारा वर्ग 1 के उत्तराधिकारियों को उत्तराधिकार में निर्वसीयती से प्राप्त संपत्ति को अपनी स्वेच्छा से बाहरी व्यक्ति को विक्रय करने में प्रतिबंध लगा दिया गया है। पहले अग्रक्रयाधिकार वर्ग 1 के उत्तराधिकारियों तक ही सीमित रखा गया है।

निर्वसीयती की संपत्ति को वर्ग 1 के वारिस विरासत में प्राप्त करते हैं और उन में से कोई एक अपने हिस्से को बेचना चाहे तो वह अपने हिस्से को बाहरी व्यक्ति को नहीं बेच सकता है। यदि दूसरा वारिस उसी मूल्य पर विक्रेता के हिस्से को खरीदने के लिए तैयार हो तभी इस परिस्थिति में यह नियम लागू होता है।

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