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RTI अपीलों के निस्तारण के लिए 45 दिन की समयसीमा तय करने से हाईकोर्ट का इनकार, CIC को लंबित मामलों के समाधान की व्यवस्था सुधारने का निर्देश

जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) को सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI Act) के तहत दूसरी अपीलों का निस्तारण 45 दिनों के भीतर करने का निर्देश देने से इनकार कर दिया।अदालत ने कहा कि RTI Act, 2005 में दूसरी अपीलों और शिकायतों के निस्तारण के लिए कोई वैधानिक समयसीमा निर्धारित नहीं है, इसलिए अदालत ऐसी समयसीमा तय नहीं कर सकती। हालांकि, हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि आयोग अपीलों को वर्षों तक लंबित नहीं रख सकता। उसे लंबित मामलों का बोझ कम करने और नए मामलों के शीघ्र निस्तारण के...

स्टेन स्वामी की कस्टडी में मौत को 5 साल: कोई सबक नहीं सीखा गया, UAPA के गलत प्रयोग पर चिंता बरकरार

भीमा कोरेगांव मामले में कस्टडी के दौरान फादर स्टेन स्वामी की मौत को पांच साल हो चुके हैं। हमें अब भी नहीं पता कि उन्होंने क्या अपराध किया था, सिवाय नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (NIA) के बढ़ा-चढ़ाकर लगाए गए उन आरोपों के, जिन पर बाद में खुद अदालतों ने कई सह-आरोपियों को ज़मानत देते समय शक और सवाल उठाए।अगर कथित अपराध इतना गंभीर था कि उससे राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा हो सकता था, तो उम्मीद की जाती कि मुक़दमे की सुनवाई तेज़ी से होगी। हालांकि, सुनवाई में कोई तेज़ी नहीं दिख रही है; यह बहुत धीमी गति से चल रही...

WhatsApp से नोटिस भेजना कानूनी रूप से मान्य नहीं: BNSS की धारा 35 और अनौपचारिक इलेक्ट्रॉनिक नोटिस की सीमाएं

क्या होता है जब किसी व्यक्ति को इसलिए गिरफ्तार कर लिया जाता है, क्योंकि उसने कोर्ट द्वारा भेजे गए नोटिस का पालन नहीं किया, जबकि उसे वह नोटिस मिला ही नहीं था (इसके विपरीत, कोर्ट द्वारा वारंट तामील करने की प्रक्रिया अलग होती है)? यही मुद्दा सतेंद्र कुमार अंतिल बनाम CBI मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का मुख्य आधार है।जब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) लागू हुई तो कई पुलिस अधिकारियों ने धारा 35 के तहत नोटिस भेजने के लिए WhatsApp और ईमेल का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। इस तरीके के पीछे की...

प्रिवेंटिव डिटेंशन और संविधान: UAPA, NSA और MCOCA के साथ कानूनी समझ-बूझ के पचास साल

मामले के केंद्र में मौजूद संवैधानिक विरोधाभाससंविधान सभा की बहसों के शब्दों में कहें तो भारत एक ऐसा गणतंत्र है जिसने अपनी सुरक्षा संबंधी चिंताओं को संवैधानिक रूप दिया। युद्ध के बाद की दुनिया में किसी भी अन्य उदार लोकतंत्र ने अपने मूल दस्तावेज़ में एहतियाती हिरासत को इतने स्पष्ट रूप से शामिल नहीं किया। भारत के संविधान के अनुच्छेद 22(3) से 22(7) तक एक सावधानीपूर्वक सीमित दायरा बनाया गया, जिसमें राज्य किसी व्यक्ति को बिना किसी आरोप, बिना मुकदमे और आपराधिक प्रक्रिया के सामान्य सुरक्षा उपायों के बिना...

लोकायुक्त की एसपीई को RTI से बाहर नहीं रखा जा सकता: सुप्रीम कोर्ट ने रद्द की एमपी सरकार की अधिसूचना

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि मध्य प्रदेश लोकायुक्त संगठन की स्पेशल पुलिस एस्टैब्लिशमेंट (SPE) को सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम से छूट नहीं दी जा सकती। अदालत ने राज्य सरकार की वर्ष 2011 की उस अधिसूचना को रद्द कर दिया, जिसके तहत एसपीई को RTI कानून के दायरे से बाहर रखा गया था।जस्टिस जे.के. महेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की खंडपीठ ने कहा कि एसपीई भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों की जांच करती है और इसे RTI अधिनियम की धारा 24(4) के तहत "खुफिया एवं सुरक्षा संगठन" नहीं माना...

देर से मिला न्याय, कमज़ोर हुआ लोकतंत्र: सुप्रीम कोर्ट की नाकामियों पर एक दशक का फ़ैसला

लोकतंत्र के लिए एक ऐसा ज़ख्म जो उसे बर्दाश्त नहींभारतीय संवैधानिक न्याय-व्यवस्था में एक दुखद घटना बार-बार दोहराई जाती है। यह घटना 'उचित प्रक्रिया' (due process) का सम्मानजनक चोला पहनती है, कानूनी प्रक्रियाओं की पेचीदगियों में छिप जाती है और सालों बाद एक ऐसे फ़ैसले के रूप में सामने आती है, जो कानूनी तौर पर तो सही होता है, लेकिन लोकतांत्रिक नज़रिए से बेमतलब। इस दुखद घटना का एक नाम है: चुनावी और संवैधानिक विवादों में न्याय मिलने में देरी। इसका सबसे परेशान करने वाला पहलू यह नहीं है कि ऐसा होता है,...

मीनाक्षी नटराजन केस: क्या नॉमिनेशन रद्द करना सही था? क्या कहता है आपराधिक रिकॉर्ड बताने से जुड़ा कानून?

मध्य प्रदेश से राज्यसभा चुनाव के लिए मीनाक्षी नटराजन का नॉमिनेशन इसलिए रद्द कर दिया गया, क्योंकि उन्होंने अपने खिलाफ लंबित एक आपराधिक शिकायत की जानकारी नहीं दी थी। इस घटना ने कुछ अहम कानूनी सवाल खड़े कर दिए।रिटर्निंग ऑफिसर का मानना ​​था कि हैदराबाद की अदालत में उनके खिलाफ दर्ज आपराधिक शिकायत का ज़िक्र न करने की वजह से उनका नॉमिनेशन अमान्य हो गया। इसलिए उन्होंने इसे रद्द कर दिया। उनका तर्क था कि इस मामले की जानकारी देने की कोई कानूनी ज़रूरत नहीं थी, क्योंकि उन्हें 'भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता'...

तीसरे बच्चे के लिए माँ को मैटरनिटी लीव देने से इनकार करने पर मद्रास हाईकोर्ट ने क्या कहा?

शाय निशा तमिलनाडु के विल्लुपुरम में ज़िला न्यायपालिका में काम करती हैं। जनवरी 2026 में उन्होंने अपनी तीसरी प्रेग्नेंसी के लिए मैटरनिटी लीव के लिए आवेदन किया। प्रिंसिपल डिस्ट्रिक्ट जज ने उनका आवेदन खारिज कर दिया। इसका कारण 13 मार्च 2026 को तमिलनाडु मानव संसाधन प्रबंधन विभाग द्वारा जारी एक सरकारी आदेश था, जिसमें तीसरी प्रेग्नेंसी के लिए मैटरनिटी लीव को 12 हफ़्ते तक सीमित कर दिया गया। अपने पहले और दूसरे बच्चे के लिए उन्हें पूरी मैटरनिटी लीव मिलती। तीसरे बच्चे के लिए राज्य ने तय किया कि वह आधी...

RTI के तहत सरकारी कर्मचारी के वित्तीय मामलों का खुलासा करने की ज़रूरत नहीं, जब तक कि कोई बड़ा जनहित न हो: कर्नाटक हाईकोर्ट

कर्नाटक हाईकोर्ट ने RTI आवेदक की याचिका खारिज की। आवेदक ने राज्य सड़क परिवहन निगम (KSRTC) के पूर्व डिप्टी कंट्रोलर (सरकारी कर्मचारी) की संपत्ति और देनदारियों का विवरण सार्वजनिक करने की मांग की। कोर्ट ने कहा कि मांगी गई जानकारी निजी थी और उसका किसी जनहित से कोई लेना-देना नहीं था, इसलिए यह RTI Act की धारा 8(1)(j) के तहत सुरक्षित है।कोर्ट ने कहा कि आधिकारिक कार्यों, फैसलों, सार्वजनिक संसाधनों के इस्तेमाल और लोक प्रशासन से सीधे जुड़े मामलों की स्थिति अलग होगी।जस्टिस सुरह गोविंदराज ने कहा,"हालांकि,...