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RTI अपीलों के निस्तारण के लिए 45 दिन की समयसीमा तय करने से हाईकोर्ट का इनकार, CIC को लंबित मामलों के समाधान की व्यवस्था सुधारने का निर्देश
जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) को सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI Act) के तहत दूसरी अपीलों का निस्तारण 45 दिनों के भीतर करने का निर्देश देने से इनकार कर दिया।अदालत ने कहा कि RTI Act, 2005 में दूसरी अपीलों और शिकायतों के निस्तारण के लिए कोई वैधानिक समयसीमा निर्धारित नहीं है, इसलिए अदालत ऐसी समयसीमा तय नहीं कर सकती। हालांकि, हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि आयोग अपीलों को वर्षों तक लंबित नहीं रख सकता। उसे लंबित मामलों का बोझ कम करने और नए मामलों के शीघ्र निस्तारण के...

स्टेन स्वामी की कस्टडी में मौत को 5 साल: कोई सबक नहीं सीखा गया, UAPA के गलत प्रयोग पर चिंता बरकरार
भीमा कोरेगांव मामले में कस्टडी के दौरान फादर स्टेन स्वामी की मौत को पांच साल हो चुके हैं। हमें अब भी नहीं पता कि उन्होंने क्या अपराध किया था, सिवाय नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (NIA) के बढ़ा-चढ़ाकर लगाए गए उन आरोपों के, जिन पर बाद में खुद अदालतों ने कई सह-आरोपियों को ज़मानत देते समय शक और सवाल उठाए।अगर कथित अपराध इतना गंभीर था कि उससे राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा हो सकता था, तो उम्मीद की जाती कि मुक़दमे की सुनवाई तेज़ी से होगी। हालांकि, सुनवाई में कोई तेज़ी नहीं दिख रही है; यह बहुत धीमी गति से चल रही...

तबस्सुम खान: वह जज, जिन्होंने अपना फ़र्ज़ निभाया
2 अगस्त 2022 की रात को मध्य प्रदेश से एक ट्रक निकला। इसमें महाराष्ट्र के अमरावती से लाए गए मवेशी और तीन आदमी सवार थे। सिवनी मालवा पुलिस इलाके के बाराखड गांव के पास, भीड़ ने ट्रक को रोक लिया। भीड़ ने तीनों आदमियों को लाठी-डंडों से पीटा। लगभग पचास साल के नज़ीर अहमद की मौत हो गई। बाकी दो लोग बच गए और उन्होंने कोर्ट को बताया कि क्या हुआ था।चार साल बाद एक जज ने सबूतों पर गौर किया। 12 जून 2026 को सिवनी मालवा की फर्स्ट एडिशनल सेशंस जज ने सात लोगों को दोषी ठहराया। उन्होंने माना कि उन लोगों ने गैर-कानूनी...

नेशनल स्टॉक एक्सचेंज RTI Act के तहत 'पब्लिक अथॉरिटी': दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार को कहा कि नेशनल स्टॉक एक्सचेंज ऑफ़ इंडिया (NSE) राइट टू इन्फॉर्मेशन एक्ट, 2005 (RTI Act) की धारा 2(h) के तहत "पब्लिक अथॉरिटी" (सार्वजनिक प्राधिकरण) के दायरे में आता है। [2026 LiveLaw (Del) 603]जस्टिस सी. हरि शंकर और जस्टिस ओम प्रकाश शुक्ला की डिवीजन बेंच ने नेशनल स्टॉक एक्सचेंज की अपील खारिज की, जो उसने सिंगल जज के उस फैसले के खिलाफ दायर की थी, जिसमें कहा गया था कि एक्सचेंज RTI व्यवस्था के दायरे में आता है।कोर्ट के सामने मुख्य मुद्दा यह था कि क्या NSE, एक प्राइवेट कंपनी...

भारत में आपराधिक न्याय प्रणाली: जांच प्रक्रियाओं पर विशेष ध्यान
हमारी कानूनी प्रणाली का विकास और बदलाव सदियों, सभ्यताओं और ऐतिहासिक दौरों में लगातार होता रहा है। आज हम जिस देश को गर्व से देखते हैं, उसने समय के साथ कई कानूनी सिद्धांतों और संस्थागत ढांचों को अपनी मौजूदा कानूनी संरचना में शामिल किया है, जबकि समाज की बदलती ज़रूरतों के हिसाब से अनुपयुक्त माने जाने वाले कई अन्य को छोड़ भी दिया है। इस तरह का अनुकूलन और बदलाव असल में कानून की प्रकृति में निहित गतिशीलता को दर्शाता है।भारत की मौजूदा आपराधिक न्याय प्रणाली में, खासकर जांच प्रक्रियाओं के संबंध में,...

WhatsApp से नोटिस भेजना कानूनी रूप से मान्य नहीं: BNSS की धारा 35 और अनौपचारिक इलेक्ट्रॉनिक नोटिस की सीमाएं
क्या होता है जब किसी व्यक्ति को इसलिए गिरफ्तार कर लिया जाता है, क्योंकि उसने कोर्ट द्वारा भेजे गए नोटिस का पालन नहीं किया, जबकि उसे वह नोटिस मिला ही नहीं था (इसके विपरीत, कोर्ट द्वारा वारंट तामील करने की प्रक्रिया अलग होती है)? यही मुद्दा सतेंद्र कुमार अंतिल बनाम CBI मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का मुख्य आधार है।जब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) लागू हुई तो कई पुलिस अधिकारियों ने धारा 35 के तहत नोटिस भेजने के लिए WhatsApp और ईमेल का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। इस तरीके के पीछे की...

प्रिवेंटिव डिटेंशन और संविधान: UAPA, NSA और MCOCA के साथ कानूनी समझ-बूझ के पचास साल
मामले के केंद्र में मौजूद संवैधानिक विरोधाभाससंविधान सभा की बहसों के शब्दों में कहें तो भारत एक ऐसा गणतंत्र है जिसने अपनी सुरक्षा संबंधी चिंताओं को संवैधानिक रूप दिया। युद्ध के बाद की दुनिया में किसी भी अन्य उदार लोकतंत्र ने अपने मूल दस्तावेज़ में एहतियाती हिरासत को इतने स्पष्ट रूप से शामिल नहीं किया। भारत के संविधान के अनुच्छेद 22(3) से 22(7) तक एक सावधानीपूर्वक सीमित दायरा बनाया गया, जिसमें राज्य किसी व्यक्ति को बिना किसी आरोप, बिना मुकदमे और आपराधिक प्रक्रिया के सामान्य सुरक्षा उपायों के बिना...

न्याय के दरवाज़े पर खड़ा सिपाही
भारतीय कानूनी ढांचे में अर्धसैनिक बलों के सर्विस से जुड़े विवादों को सुलझाने के तरीके में एक खास संरचनात्मक कमी है। बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स (BSF) के कॉन्स्टेबल बख्शीश अहमद का मामला इसका एक मुख्य उदाहरण है; उन्हें 2022 में नारायणपुर, मालदा में तैनाती के दौरान नौकरी से निकाल दिया गया। जब अहमद ने अपनी बर्खास्तगी को चुनौती देने के लिए 2025 में दिल्ली हाई कोर्ट का रुख किया तो डिवीज़न बेंच ने उनकी रिट याचिका खारिज की।यह खारिज करना न तो मामले की असल खूबियों पर आधारित था और न ही अधिकार क्षेत्र...

जज द्वारा बनाई गई 'इंट्रा-कोर्ट अपील' का खतरा
एक संवैधानिक लोकतंत्र में सुप्रीम कोर्ट का सम्मान इसलिए किया जाता है, क्योंकि वह संस्थागत रूप से अनुशासित है, न कि इसलिए कि वह कभी गलती नहीं करता। उसकी शक्ति केवल प्रतिक्रिया देने की नहीं है; बल्कि कानून के अनुसार निर्णय लेने की है। इसीलिए सोशल मीडिया पर मचे हंगामे के कारण कोर्ट का अपने ही आदेशों पर दोबारा विचार करने, उन्हें बेअसर करने या प्रभावी ढंग से फिर से खोलने का कोई भी बढ़ता हुआ चलन गंभीर चिंता का विषय होना चाहिए। मुद्दा यह नहीं है कि कोर्ट खुद को सुधार सकता है या नहीं। वह निश्चित रूप से...

DNA टेस्ट, प्राइवेसी और पिता होने का पता लगाना: कानून पर सुप्रीम कोर्ट का स्पष्टिकरण
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक फैसले में पिता होने का पता लगाने के लिए DNA टेस्ट के इस्तेमाल को सही ठहराया और एक लंबे समय से चले आ रहे कानूनी सवाल का जवाब दिया: क्या किसी व्यक्ति का प्राइवेसी का अधिकार बायोलॉजिकल माता-पिता का पता लगाने की ज़रूरत से ज़्यादा अहम है? इस फैसले से पहले, कोर्ट का हमेशा से यह मानना रहा है कि DNA टेस्ट का आदेश बहुत कम और सिर्फ़ खास हालात में ही दिया जाना चाहिए। हालाँकि, किन हालात में ऐसे टेस्ट की इजाज़त दी जा सकती है, इस बारे में कोई पक्का जवाब नहीं था।पिता होने का...

एक भूमि, एक हृदय: विश्वास और स्वतंत्रता ने भारत को किस तरह एकजुट किया?
स्कूल की पाठ्यपुस्तक में भारत की "अनेकता में एकता" के बारे में पढ़ने और वास्तव में इसे अपने पैरों के नीचे महसूस करने के बीच बहुत बड़ा अंतर है। हाल ही में मैं और मेरी पत्नी पूरे तमिलनाडु की दो दिवसीय छोटी यात्रा पर गये। मीलों के हिसाब से यह कोई लंबी यात्रा नहीं थी, लेकिन इसने हमारे देश को देखने के हमारे नजरिए को पूरी तरह से बदल दिया। केवल अड़तालीस घंटों में, हम भारत की आध्यात्मिक विविधता के केंद्र में चले, और पता लगाया कि इतने सारे विभिन्न धर्मों की भूमि एक साझा संस्कृति के तहत एक साथ कैसे रह...

मुझे भूल जाएं या न भूलें? 'भूला दिए जाने का अधिकार' को लागू करना
पिछले कुछ सालों में निजता के अधिकार (Right to Privacy) को भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के सबसे अहम पहलुओं में से एक माना गया। देश भर की अदालतों ने बार-बार कहा कि निजता का अधिकार, मानवीय गरिमा का एक अहम और बुनियादी हिस्सा होने के नाते भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार के दायरे में आता है। हालांकि, इस पर उचित प्रतिबंध भी लगाए जा सकते हैं।इस डिजिटल युग में 'भूल दिए जाने का अधिकार' (Right to be Forgotten) चर्चा में आया है। आसान शब्दों में 'भूल दिए जाने के अधिकार' का मतलब है कि...

अदालतों में AI के इस्तेमाल के लिए 2026 के ड्राफ्ट नियमों में जवाबदेही का विश्लेषण और सुझाव
नए ड्राफ्ट नियम: एक अहम कदमभारतीय अदालतों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को शामिल करना अब कोई दूर की बात नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने "अदालतों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के इस्तेमाल के लिए नियम (2026)" पेश करके एक अहम कदम उठाया। भारतीय न्याय व्यवस्था पर अभी मामलों का जो भारी बोझ है, उसे देखते हुए AI को अपनाना बहुत ज़रूरी है।यहां नियम 4 "इंसानी प्राथमिकता" की बात करता है, जिसका मतलब है कि AI का इस्तेमाल सिर्फ़ उन कामों के लिए किया जाना चाहिए, जो मदद करने वाले हों और इसे इंसानी फ़ैसले के अधीन...

लोकायुक्त की एसपीई को RTI से बाहर नहीं रखा जा सकता: सुप्रीम कोर्ट ने रद्द की एमपी सरकार की अधिसूचना
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि मध्य प्रदेश लोकायुक्त संगठन की स्पेशल पुलिस एस्टैब्लिशमेंट (SPE) को सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम से छूट नहीं दी जा सकती। अदालत ने राज्य सरकार की वर्ष 2011 की उस अधिसूचना को रद्द कर दिया, जिसके तहत एसपीई को RTI कानून के दायरे से बाहर रखा गया था।जस्टिस जे.के. महेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की खंडपीठ ने कहा कि एसपीई भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों की जांच करती है और इसे RTI अधिनियम की धारा 24(4) के तहत "खुफिया एवं सुरक्षा संगठन" नहीं माना...

देर से मिला न्याय, कमज़ोर हुआ लोकतंत्र: सुप्रीम कोर्ट की नाकामियों पर एक दशक का फ़ैसला
लोकतंत्र के लिए एक ऐसा ज़ख्म जो उसे बर्दाश्त नहींभारतीय संवैधानिक न्याय-व्यवस्था में एक दुखद घटना बार-बार दोहराई जाती है। यह घटना 'उचित प्रक्रिया' (due process) का सम्मानजनक चोला पहनती है, कानूनी प्रक्रियाओं की पेचीदगियों में छिप जाती है और सालों बाद एक ऐसे फ़ैसले के रूप में सामने आती है, जो कानूनी तौर पर तो सही होता है, लेकिन लोकतांत्रिक नज़रिए से बेमतलब। इस दुखद घटना का एक नाम है: चुनावी और संवैधानिक विवादों में न्याय मिलने में देरी। इसका सबसे परेशान करने वाला पहलू यह नहीं है कि ऐसा होता है,...

मीनाक्षी नटराजन केस: क्या नॉमिनेशन रद्द करना सही था? क्या कहता है आपराधिक रिकॉर्ड बताने से जुड़ा कानून?
मध्य प्रदेश से राज्यसभा चुनाव के लिए मीनाक्षी नटराजन का नॉमिनेशन इसलिए रद्द कर दिया गया, क्योंकि उन्होंने अपने खिलाफ लंबित एक आपराधिक शिकायत की जानकारी नहीं दी थी। इस घटना ने कुछ अहम कानूनी सवाल खड़े कर दिए।रिटर्निंग ऑफिसर का मानना था कि हैदराबाद की अदालत में उनके खिलाफ दर्ज आपराधिक शिकायत का ज़िक्र न करने की वजह से उनका नॉमिनेशन अमान्य हो गया। इसलिए उन्होंने इसे रद्द कर दिया। उनका तर्क था कि इस मामले की जानकारी देने की कोई कानूनी ज़रूरत नहीं थी, क्योंकि उन्हें 'भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता'...

क्या टीएमसी के बागी सांसद दल-बदल विरोधी कानून के तहत अयोग्य ठहराए जा सकते हैं?
अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर विद्रोह की खबरें सामने आई हैं, जिसमें विधायकों के एक वर्ग ने पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी के अधिकार को चुनौती दी।दरार का पहला संकेत तब सामने आया जब पश्चिम बंगाल विधान सभा में टीएमसी के 80 विधायकों में से 58 ने विपक्ष के नेता के पद के लिए पार्टी से निष्कासित विधायक रीताब्रत बनर्जी का समर्थन किया। इस पद के लिए पार्टी नेतृत्व के चयन पर सवाल उठाए। विभाजन राष्ट्रीय स्तर तक बढ़ गया, जब लोकसभा में इसके 28 सांसदों में से कई ने काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व में...

तीसरे बच्चे के लिए माँ को मैटरनिटी लीव देने से इनकार करने पर मद्रास हाईकोर्ट ने क्या कहा?
शाय निशा तमिलनाडु के विल्लुपुरम में ज़िला न्यायपालिका में काम करती हैं। जनवरी 2026 में उन्होंने अपनी तीसरी प्रेग्नेंसी के लिए मैटरनिटी लीव के लिए आवेदन किया। प्रिंसिपल डिस्ट्रिक्ट जज ने उनका आवेदन खारिज कर दिया। इसका कारण 13 मार्च 2026 को तमिलनाडु मानव संसाधन प्रबंधन विभाग द्वारा जारी एक सरकारी आदेश था, जिसमें तीसरी प्रेग्नेंसी के लिए मैटरनिटी लीव को 12 हफ़्ते तक सीमित कर दिया गया। अपने पहले और दूसरे बच्चे के लिए उन्हें पूरी मैटरनिटी लीव मिलती। तीसरे बच्चे के लिए राज्य ने तय किया कि वह आधी...

RTI के तहत सरकारी कर्मचारी के वित्तीय मामलों का खुलासा करने की ज़रूरत नहीं, जब तक कि कोई बड़ा जनहित न हो: कर्नाटक हाईकोर्ट
कर्नाटक हाईकोर्ट ने RTI आवेदक की याचिका खारिज की। आवेदक ने राज्य सड़क परिवहन निगम (KSRTC) के पूर्व डिप्टी कंट्रोलर (सरकारी कर्मचारी) की संपत्ति और देनदारियों का विवरण सार्वजनिक करने की मांग की। कोर्ट ने कहा कि मांगी गई जानकारी निजी थी और उसका किसी जनहित से कोई लेना-देना नहीं था, इसलिए यह RTI Act की धारा 8(1)(j) के तहत सुरक्षित है।कोर्ट ने कहा कि आधिकारिक कार्यों, फैसलों, सार्वजनिक संसाधनों के इस्तेमाल और लोक प्रशासन से सीधे जुड़े मामलों की स्थिति अलग होगी।जस्टिस सुरह गोविंदराज ने कहा,"हालांकि,...

भारतीय न्यायपालिका में AI को रेगुलेट करना: संस्थागत प्रयोगों से एक राष्ट्रीय ढांचे तक
भारतीय न्यायपालिका में डिजिटल टेक्नोलॉजी के साथ प्रयोग 'ई-कोर्ट्स मिशन मोड प्रोजेक्ट' के साथ गंभीरता से शुरू हुए, जिसके तीन चरण हैं। पहला चरण (2007-2015) बुनियादी ढांचे पर केंद्रित है, जबकि दूसरे चरण (2015-2023) में 'केस एंड इंफॉर्मेशन सिस्टम 3.0' और 'नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड' की स्थापना के माध्यम से पूरे सिस्टम में डिजिटल परिपक्वता आई। तीसरा चरण (2023-वर्तमान) स्पष्ट रूप से केस मैनेजमेंट, कानूनी रिसर्च और अनुवाद के लिए AI, मशीन लर्निंग, ऑप्टिकल कैरेक्टर रिकग्निशन और नेचुरल लैंग्वेज...
