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इकॉनमिक इंफ्रास्ट्रक्चर के तौर पर कानून का शासन: बार (वकीलों का समूह) क्यों इसका सबसे अहम रक्षक है?

किसी देश के कानूनी और रेगुलेटरी ढांचे की क्वालिटी, बिजनेस में भरोसे, निवेश के फैसलों और लंबे समय की आर्थिक तरक्की को तय करने में अहम भूमिका निभाती है। आर्थिक सुधारों पर होने वाली बहस में अक्सर रेगुलेशन को बिजनेस की राह में रुकावट के तौर पर दिखाया जाता है। असल बात यह है कि टिकाऊ विकास कम रेगुलेशन पर नहीं, बल्कि समझदारी भरे रेगुलेशन पर निर्भर करता है—ऐसे नियम जो साफ, अनुमान लगाने लायक, सही अनुपात में हों और जिनकी सार्थक कानूनी जांच हो सके।ऐसे ढांचे की नींव में 'कानून का शासन' (Rule of Law) होता...

RTI आवेदक को भर्ती परीक्षा की मेरिट लिस्ट और मार्क्स पाने का अधिकार, लेकिन सोशल मीडिया पर पब्लिश नहीं कर सकते: सिक्किम हाईकोर्ट

सिक्किम हाईकोर्ट ने सिक्किम पब्लिक सर्विस कमीशन (SPSC) को निर्देश दिया कि वह सिक्किम सर्विसेज़ (कंबाइंड रिक्रूटमेंट) परीक्षा, 2022 में शामिल हुए उम्मीदवारों की एक संयुक्त मेरिट लिस्ट और इंटरव्यू के मार्क्स उपलब्ध कराएं। कोर्ट ने RTI आवेदक से यह वचन भी लिया कि इस जानकारी को किसी भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर पब्लिश नहीं किया जाएगा।सूचना आयोग के जानकारी देने के आदेश का पालन करने की SPSC की सहमति को दर्ज करते हुए, जस्टिस मीनाक्षी मदन राय ने "राज्य जन सूचना अधिकारी को RTI आवेदक द्वारा मांगी गई...

शुरुआती जांच या समस्यापूर्ण अनुमान: किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 की धारा 15

साल 2023 में कानून का उल्लंघन करने के आरोप में पकड़े गए 79% किशोर 16 से 18 साल की उम्र के थे। कानून का उल्लंघन करने वाले किशोरों में यह उम्र का दायरा इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि बच्चों का आपराधिक न्याय प्रणाली से संपर्क बढ़ने का समाज पर व्यापक असर पड़ता है। साथ ही किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 में कानूनी तौर पर एक अलग श्रेणी बनाई गई, जिसमें 16-18 साल की उम्र के किशोरों को एक अलग वर्ग माना गया।भारतीय किशोर न्याय कानून व्यवस्था में एक अहम बदलाव किशोर न्याय...

ज़्यादातर लोग बहुत देर होने से पहले वसीयत क्यों नहीं लिखते: विरासत की प्लानिंग क्यों ज़रूरी है?

ज़िम्मेदारियां, परिवार में गलतफहमियां, बचत और प्रॉपर्टी होने के बावजूद, बहुत से लोग बिना कोई कानूनी रूप से मान्य वसीयत छोड़े ही दुनिया से चले जाते हैं। तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। यह देरी इसलिए होती है, क्योंकि लोग अपनी मौत के बारे में बात करने में असहज महसूस करते हैं और डरते हैं। लोगों को हमेशा लगता है कि उनके पास अभी बहुत समय है और वे अपनी मौत और वसीयत के बारे में बात करने को नज़रअंदाज़ कर देते हैं। हालांकि, असल में वे बिना वसीयत के मरने के नतीजों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं। दुर्भाग्य से...

सुप्रीम कोर्ट ने क्यों माना कि ऑनलाइन गेमिंग पर रोक लगाने वाले राज्यों के कानून पब्लिक ऑर्डर के दायरे में आते हैं?

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में संविधान की सातवीं अनुसूची की सूची II की प्रविष्टि 1 के तहत 'सार्वजनिक व्यवस्था' (Public Order) के तत्वों की व्याख्या की और यह फैसला सुनाया कि राज्य ऑनलाइन सट्टेबाजी और जुए की गतिविधियों को विनियमित करने और उन पर रोक लगाने के लिए सार्वजनिक व्यवस्था पर अपनी विधायी शक्ति का उपयोग कर सकते हैं।जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की खंडपीठ ने विभिन्न निर्णयों का हवाला देते हुए यह माना कि संवैधानिक अभिव्यक्ति "सार्वजनिक व्यवस्था" केवल दंगों, हिंसा या राज्य की...

प्रजनन स्वायत्तता और सरकारी लापरवाही: भारत में महिलाओं के शारीरिक अधिकारों का कानूनी विश्लेषण

इंडिया टुडे की हालिया खबरों में यह बताया गया कि मध्य प्रदेश के धार जिले के बाग स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) में लगभग 173-180 आदिवासी महिलाओं का नसबंदी ऑपरेशन किया गया। इसके अलावा, मासिक धर्म से जुड़ी समस्याओं के इलाज के नाम पर महिलाओं के गर्भाशय को जबरन निकालने की घटनाएँ भी सामने आई हैं; ऐसा अक्सर इसलिए किया जाता है ताकि उन्हें काम से छुट्टी न देनी पड़े और वे लगातार काम करती रहें। ये घटनाएँ महिलाओं की सुरक्षा और स्वायत्तता के संबंध में सरकार और नियामक प्राधिकरणों पर गंभीर सवाल खड़े...

मीम से मूवमेंट तक: भारत की कॉकरोच जनता पार्टी के पीछे की संवैधानिक चिंता

लोकतंत्र अक्सर अपनी सबसे गहरी संस्थागत चिंताओं को चुनावों के दौरान नहीं, बल्कि मज़ाक-मस्ती के पलों में ज़ाहिर करते हैं। तथाकथित "कॉकरोच जनता पार्टी" (CJP) का हालिया उभार शुरू में मीम और व्यंग्य से प्रेरित एक और क्षणिक इंटरनेट घटना लग सकता है। हालांकि, इस आंदोलन को लेकर जनता में जो ज़बरदस्त गूंज सुनाई दे रही है, वह इस बात का संकेत है कि यह डिजिटल हास्य से कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण चीज़ को दर्शाता है। इस व्यंग्य के पीछे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, संस्थागत जवाबदेही, युवाओं में बेरोज़गारी, परीक्षाओं...

क्या प्यार को नियंत्रित किया जा सकता है? असम का UCC और लिव-इन संबंधों पर राज्य के नियंत्रण की संवैधानिक सीमाएं

असम सरकार के यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) लागू करने के फ़ैसले ने एक बार फिर समकालीन भारत की सबसे जटिल संवैधानिक बहसों में से एक को ज़िंदा कर दिया: वह सीमा जहां तक राज्य कानूनी एकरूपता और सामाजिक सुधार के नाम पर निजी संबंधों को नियंत्रित कर सकता है। जहां UCC से जुड़ी चर्चाएं पारंपरिक रूप से शादी, तलाक़, उत्तराधिकार और विरासत पर केंद्रित रही हैं, वहीं यह संकेत कि असम का प्रस्तावित ढाँचा लिव-इन संबंधों को भी नियंत्रित कर सकता है, एक महत्वपूर्ण संवैधानिक घटनाक्रम है। यह पारंपरिक नागरिक संस्थाओं से हटकर...