UAPA में भी जमानत नियम, जेल अपवाद: सुप्रीम कोर्ट ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता को बताया सर्वोपरि

Amir Ahmad

18 May 2026 3:15 PM IST

  • सुप्रीम कोर्ट में यूएपीए मामले की सुनवाई

    सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (UAPA) जैसे कठोर कानूनों में भी जमानत नियम है और जेल अपवाद। अदालत ने स्पष्ट किया कि UAPA की धारा 43डी(5) के तहत जमानत पर लगी कानूनी पाबंदियां संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 के तहत मिले व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को खत्म नहीं कर सकतीं।

    जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस बीवी नागरत्ना की खंडपीठ ने जम्मू-कश्मीर के व्यक्ति को नार्को-टेरर मामले में जमानत देते हुए यह टिप्पणी की। मामले की जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी कर रही थी।

    फैसला सुनाते हुए जस्टिस भुइयां ने कहा,

    “जमानत नियम है और जेल अपवाद। यह केवल दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) से निकला कोई खोखला कानूनी नारा नहीं है।”

    खंडपीठ ने कहा कि यह सिद्धांत संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 से उत्पन्न होता है और निर्दोषता की धारणा पर आधारित है, जो कानून के शासन वाले किसी भी सभ्य समाज की बुनियाद है।

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में UAPA जैसे कानून जमानत पर कुछ प्रतिबंध लगा सकते हैं लेकिन ये प्रतिबंध व्यक्तिगत स्वतंत्रता और हिरासत के बीच संवैधानिक संतुलन को उलट नहीं सकते।

    अदालत ने कहा,

    “धारा 43डी(5) के तहत लगाया गया वैधानिक प्रतिबंध सीमित दायरे में ही लागू होगा और यह संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 की गारंटी के अधीन रहेगा।”

    खंडपीठ ने साफ शब्दों में कहा,

    “हमें यह कहने में कोई संदेह नहीं कि UAPA के तहत भी जमानत नियम है और जेल अपवाद।”

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह फैसला इसलिए जरूरी हो गया ताकि यूनियन ऑफ इंडिया बनाम केए नजीब मामले में दिए गए तीन जजों के फैसले की कानूनी स्थिति स्पष्ट की जा सके और बाद में आए कुछ दो-जजों के फैसलों से पैदा हुई भ्रम की स्थिति दूर हो सके।

    अदालत ने कहा कि केए नजीब फैसले में पहले ही चेतावनी दी गई थी कि धारा 43डी(5) को जमानत खारिज करने का एकमात्र आधार नहीं बनाया जा सकता और न ही इसके जरिए शीघ्र सुनवाई के संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन किया जा सकता है।

    सुप्रीम कोर्ट ने उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से इनकार करने वाले फैसले के कुछ हिस्सों पर भी गंभीर चिंता जताई। विशेष रूप से उस निर्देश पर जिसमें आरोपियों को एक वर्ष तक जमानत याचिका दाखिल करने से प्रभावी रूप से रोक दिया गया था।

    खंडपीठ ने केंद्र सरकार द्वारा संसद में पेश राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों का भी उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि 2019 से 2023 के बीच देशभर में UAPA मामलों में दोषसिद्धि दर केवल 1.5 से 4 प्रतिशत के बीच रही, जबकि जम्मू-कश्मीर में यह एक प्रतिशत से भी कम थी।

    अदालत ने कहा कि यह आंकड़े भी केए नजीब फैसले के सिद्धांतों को लागू करने का एक मजबूत आधार प्रदान करते हैं।

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