आरोपी का खुद को बेकसूर बताने वाला और सह-आरोपी को फंसाने वाला बयान भरोसे लायक नहीं: सुप्रीम कोर्ट

  • आरोपी का खुद को बेकसूर बताने वाला और सह-आरोपी को फंसाने वाला बयान भरोसे लायक नहीं: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (22 मई) को हत्या के मामले में दोषी ठहराए जाने का फैसला रद्द किया। कोर्ट ने पाया कि किसी आरोपी का अदालत के बाहर दिए गए बयान (Extra-Judicial Confession) के ज़रिए दूसरे सह-आरोपियों को फंसाना और उन्हें बयान देने वाले से जिरह करने का मौका न देना, अभियोजन पक्ष के मामले के लिए घातक होगा। साथ ही किसी को दोषी ठहराने के लिए ऐसे बयान भरोसे लायक नहीं माने जा सकते।

    जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने कलकत्ता हाईकोर्ट का वह फैसला पलट दिया, जिसमें ट्रायल कोर्ट के उस फैसले को सही ठहराया गया, जिसमें अपीलकर्ताओं को हत्या के अपराध के लिए दोषी ठहराया गया था। अभियोजन पक्ष के मामले में दूसरी कमियों के अलावा, कोर्ट ने पाया कि अपीलकर्ता को दोषी ठहराने का आधार ऐसे आरोपी का अदालत के बाहर दिया गया बयान था, जिसने खुद को बेकसूर बताते हुए (Exculpatory Statement) खुद को तो बरी कर लिया था, लेकिन अपराध करने का आरोप दूसरे सह-आरोपियों पर लगाया था।

    ऐसे खुद को बेकसूर बताने वाले बयानों को नज़रअंदाज़ करते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की:

    “खुद को बेकसूर बताते हुए और सह-आरोपी पर आरोप लगाते हुए दिया गया बयान, अपने आप में ही भरोसे लायक नहीं होता। इसे दूसरे आरोपियों के खिलाफ इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, क्योंकि उन्हें बयान देने वाले व्यक्ति से जिरह करने का कोई मौका नहीं दिया गया। यह बयान देने वाले व्यक्ति को भी दोषी नहीं ठहरा सकता, क्योंकि तीन गवाहों द्वारा बताए गए इस बयान में 'अपराध स्वीकार करने' (Confession) का कोई तत्व मौजूद नहीं है, जबकि इसके विपरीत एक गवाह का बयान अलग है।”

    इसके अलावा, कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष का मामला इसलिए भी कमज़ोर पड़ गया, क्योंकि आरोपी ने यह बयान भीड़ के दबाव में आकर दिया था। भीड़ ने कथित घटना के बाद आरोपियों को रोककर रखा था। इसलिए किसी दबाव वाले माहौल में या भीड़ के प्रभाव में दिया गया बयान न तो भरोसे लायक माना जा सकता है और न ही विश्वसनीय।

    अदालत ने टिप्पणी की,

    “अदालत के बाहर किया गया इक़बालिया बयान, अपने स्वभाव से ही एक कमज़ोर सबूत होता है। इस मामले में यह बिल्कुल भी साबित नहीं हुआ। वैसे भी, यह बयान तब दिया गया, जब दो आरोपियों को हत्या के आरोप में एक भीड़ ने रोक रखा था। ज़ाहिर है, रोके गए लोगों पर काफ़ी दबाव रहा होगा, और हो सकता है कि उन्होंने किसी अनुचित दबाव या हिंसा की धमकी के तहत ऐसा कहा हो। असल में, रिकॉर्ड से पता चलता है कि गिरफ़्तारी के बाद जब A1 और A2 को मेडिकल जाँच के लिए ले जाया गया तो उनके शरीर पर चोटें थीं; जो फिर से दिए गए बयान की विश्वसनीयता की जड़ पर ही सवाल खड़ा करता है; वैसे भी, एक इक़बालिया बयान के तौर पर इसकी स्थिति पहले से ही संदिग्ध है।”

    “आखिरी बार साथ देखे जाने” (last seen together) के सिद्धांत पर अदालत ने फ़ैसला दिया कि मृतक को आरोपी के साथ आखिरी बार देखे जाने और मौत के अनुमानित समय के बीच का अंतर इतना ज़्यादा था कि उससे कोई पक्का और आरोपी के ख़िलाफ़ नतीजा नहीं निकाला जा सकता।

    अदालत ने टिप्पणी की,

    “'आखिरी बार साथ देखे जाने' के सिद्धांत पर भरोसा करने में सबसे अहम बात यह है कि उन्हें साथ देखे जाने के समय और मौत होने के समय के बीच कितना अंतर है।”

    साथ ही यह भी जोड़ा कि जहाँ समय का अंतर ज़्यादा होता है, वहाँ बीच में हुई दूसरी घटनाओं या परिस्थितियों से इनकार नहीं किया जा सकता।

    बेंच ने अभियोजन पक्ष के एक गवाह की गवाही पर भी गंभीर संदेह ज़ाहिर किया। इस गवाह ने दावा किया कि उसने मृतक और आरोपी को एक सार्वजनिक मैदान में साथ शराब पीते देखा था, लेकिन अदालत ने उसके बयान में कई विसंगतियां (Inconsistencies) पाईं।

    अदालत भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 के तहत कथित तौर पर बरामद की गई चीज़ों से भी पूरी तरह से संतुष्ट नहीं हुई। अदालत ने फ़ैसला दिया कि अभियोजन पक्ष ऐसी बरामदगियों को सबूत के तौर पर स्वीकार्य बनाने के लिए ज़रूरी दो मुख्य शर्तों—यानी चीज़ों को छिपाने और उनके बारे में जानकारी होने—को साबित करने में नाकाम रहा।

    बेंच ने प्रक्रिया से जुड़ी कुछ कमियों पर भी ध्यान दिलाया। इनमें बरामद की गई मोटरसाइकिल की मालिकाना हक को साफ़ तौर पर साबित न कर पाना और कथित हथियारों को मेडिकल राय के लिए डॉक्टर के सामने पेश न कर पाना शामिल है।

    अदालत ने आगे टिप्पणी की कि हालांकि परिस्थितिजन्य सबूतों पर आधारित मामलों में हत्या का मकसद (Motive) हमेशा ज़रूरी नहीं होता, लेकिन इस मामले में इसकी गैर-मौजूदगी काफ़ी अहम हो जाती है। ऐसा इसलिए, क्योंकि अभियोजन पक्ष आरोपी को हत्या से जोड़ने वाली परिस्थितियों की एक मज़बूत और तार्किक कड़ी (Coherent Chain) स्थापित करने में नाकाम रहा।

    अदालत ने फ़ैसला दिया,

    “सभी परिस्थितियों को समग्र रूप से देखने पर... और यह पाए जाने पर कि अभियोजन पक्ष द्वारा पेश की गई कोई भी परिस्थिति आरोपी को हत्या से जोड़ने वाला पक्का सबूत साबित नहीं होती, हमारे पास दोषसिद्धि के आदेश को रद्द करने के अलावा कोई और चारा नहीं है।”

    आखिरकार, अदालत ने अपीलें मंज़ूर कीं और निर्देश दिया कि अपीलकर्ताओं को तुरंत रिहा कर दिया जाए, बशर्ते कि वे किसी अन्य मामले में वांछित न हों। खास बात यह है कि यह देखते हुए कि तीसरा आरोपी भी अपीलकर्ताओं के साथ ही जेल में था, लेकिन उसने अपील दायर नहीं की थी, अदालत ने राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण और पश्चिम बंगाल राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण को निर्देश दिया कि वे यह सुनिश्चित करें कि उसे कानूनी सहायता उपलब्ध कराई जाए ताकि दो महीने के भीतर उच्चतम न्यायालय में अपील दायर की जा सके।

    Cause Title: Papan Sarkar @ Pranab Versus State of West Bengal (with connected case)

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