BNSS लागू होने के बाद संज्ञान लिया गया हो तो PMLA शिकायत में आरोपी की सुनवाई पहले होना ज़रूरी: सुप्रीम कोर्ट

Shahadat

20 May 2026 9:00 PM IST

  • BNSS लागू होने के बाद संज्ञान लिया गया हो तो PMLA शिकायत में आरोपी की सुनवाई पहले होना ज़रूरी: सुप्रीम कोर्ट

    एक अहम फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर कोई मजिस्ट्रेट, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के लागू होने के बाद मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम, 2002 (PMLA) के तहत किसी कथित अपराध का संज्ञान लेता है तो BNSS की धारा 223(1) के पहले प्रावधान का पालन न करने पर वह संज्ञान रद्द माना जाएगा। इस प्रावधान के तहत संज्ञान लेने से पहले आरोपी को सुनवाई का मौका देना ज़रूरी है, भले ही शिकायत BNSS के लागू होने से पहले ही दायर की गई हो।

    जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस नोंगमीकापम कोटिश्वर सिंह की बेंच ने उत्तराखंड हाईकोर्ट का फ़ैसला रद्द किया। हाईकोर्ट ने मजिस्ट्रेट के उस आदेश को सही ठहराया था, जिसमें उसने PMLA के तहत अपीलकर्ता के ख़िलाफ़ अपराध का संज्ञान लिया था, लेकिन BNSS की धारा 223(1) के पहले प्रावधान के तहत ज़रूरी सुनवाई का मौका अपीलकर्ता-आरोपी को नहीं दिया।

    कोर्ट ने कहा,

    "BNSS की धारा 223(1) के पहले प्रावधान का पालन न करने से संज्ञान लेने का आदेश ही रद्द हो जाता है, और क़ानून की नज़र में उसे सही नहीं माना जा सकता।"

    यह मामला प्रवर्तन निदेशालय (ED) की एक शिकायत से जुड़ा है, जो 24 जून, 2024 को PMLA की धारा 44 और 45 के तहत दायर की गई। हालांकि, शिकायत BNSS के 1 जुलाई, 2024 को लागू होने से पहले दायर की गई, लेकिन स्पेशल कोर्ट ने असल में 2 जुलाई, 2024 को ही संज्ञान लिया, जब CrPC रद्द हो चुकी थी और उसकी जगह BNSS लागू हो गई। अहम बात यह है कि संज्ञान लेने से पहले आरोपी को सुनवाई का कोई मौका नहीं दिया गया। हाईकोर्ट ने भी इस फ़ैसले को सही ठहराया था।

    हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट के फ़ैसलों को रद्द करते हुए जस्टिस सुंदरेश द्वारा लिखे गए फ़ैसले में कहा गया कि एक बार BNSS लागू होने के बाद संज्ञान लिया गया तो धारा 223(1) के पहले प्रावधान का पालन करना अनिवार्य हो गया। कोर्ट ने एनफोर्समेंट डायरेक्टरेट की ओर से पेश हुए ASG SV राजू की इस दलील को खारिज किया कि मजिस्ट्रेट का शिकायत को नंबर देने और मामले को संज्ञान के लिए लिस्ट करने का काम एक जांच माना जाएगा, जिससे BNSS की धारा 531(2)(a) के तहत 'सेविंग्स क्लॉज़' (बचाव प्रावधान) लागू हो जाएगा और पुरानी CrPC व्यवस्था ही चलती रहेगी।

    कोर्ट ने फैसला दिया कि किसी शिकायत को रजिस्टर करने या नंबर देने का सिर्फ़ प्रशासनिक निर्देश BNSS की धारा 2(1)(k) के अर्थ में "जांच" नहीं माना जाएगा, क्योंकि उस चरण पर किसी भी तरह के न्यायिक विवेक का इस्तेमाल नहीं होता है। नतीजतन, कोर्ट ने फैसला दिया कि CrPC के तहत लंबित "अपील, आवेदन, ट्रायल, जांच या छानबीन" को सुरक्षित रखने वाला 'सेविंग्स क्लॉज़' इस मामले पर लागू नहीं होता है।

    असल में, कोर्ट ने ED की इस दलील को खारिज कर दिया कि शिकायत पर CrPC के नियम इसलिए लागू होते रहेंगे, क्योंकि इसे 1 जुलाई, 2024 से पहले दायर किया गया।

    कोर्ट ने टिप्पणी की,

    "भले ही PMLA के तहत शिकायत पहले दायर की गई। हालांकि, संज्ञान बाद में 02.07.2024 को लिया गया, जिस समय तक BNSS लागू हो चुका था। यह बात मानी हुई है कि संज्ञान लेते समय अपीलकर्ता की बात नहीं सुनी गई। किसी कानून का वह आदेश, जो किसी आरोपी के निष्पक्ष ट्रायल के अधिकार को सुनिश्चित करता है—जिसकी आज़ादी दांव पर लगी हो—उसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। इसलिए ASG की यह दलील कि संज्ञान के चरण पर सुनवाई न होने से हुए नुकसान को आरोपी को ही साबित करना होगा, स्वीकार नहीं की जा सकती; क्योंकि यह सिर्फ़ एक मामूली अनियमितता नहीं है, जिस पर BNSS की धारा 506 या 511 लागू हो जाए, बल्कि यह एक ऐसी गैर-कानूनी कार्रवाई है, जो पूरी कार्यवाही को ही रद्द कर देती है।"

    इसके अलावा, कोर्ट ने उस आदेश को भी गलत ठहराया, जिसमें अपीलकर्ता के उस आवेदन पर सुनवाई की अनुमति नहीं दी गई, जिसे BNSS की धारा 223(1) के पहले परंतुक (Proviso) के तहत दायर किया गया। यह आवेदन अपीलकर्ता ने BNSS के लागू होने के तुरंत बाद ही दायर किया था।

    न्यायालय ने कहा,

    “दरअसल, अपीलकर्ता ने सबसे पहले उक्त शर्त पर भरोसा करते हुए संज्ञान लेने वाले आदेश को वापस लेने के लिए आवेदन दायर किया था। यदि स्पेशल कोर्ट ने इसे स्वीकार कर लिया होता तो मुकदमा आगे बढ़ गया होता। यह कहना ही काफी है कि हुई किसी भी देरी के लिए अपीलकर्ता को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।”

    उपर्युक्त के आधार पर अपील स्वीकार की गई और संज्ञान लेने वाला आदेश रद्द कर दिया गया।

    स्पेशल कोर्ट को निर्देश दिया गया कि वह संज्ञान लेने के चरण से आगे बढ़ते हुए अपीलकर्ता को सुनवाई का अवसर प्रदान करे। उपर्युक्त प्रक्रिया इस निर्णय की प्रति प्राप्त होने की तारीख से 8 सप्ताह की अवधि के भीतर पूरी की जानी चाहिए।

    Cause Title: PARVINDER SINGH VERSUS DIRECTORATE OF ENFORCEMENT

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