समान आरोपों में सह-आरोपी डिस्चार्ज हो चुके हों तो एक आरोपी पर अकेले मुकदमा नहीं चल सकता : सुप्रीम कोर्ट

Praveen Mishra

20 May 2026 5:41 PM IST

  • समान आरोपों में सह-आरोपी डिस्चार्ज हो चुके हों तो एक आरोपी पर अकेले मुकदमा नहीं चल सकता : सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि यदि समान परिस्थितियों वाले सह-आरोपियों (Co-Accused) को पहले ही डिस्चार्ज किया जा चुका है, तो केवल एक आरोपी के खिलाफ मुकदमा जारी नहीं रखा जा सकता, खासकर तब जब उसके खिलाफ उपलब्ध साक्ष्य अन्य आरोपियों की तुलना में अधिक मजबूत न हों।

    अदालत ने कहा कि समान आरोपों वाले व्यक्तियों के साथ समान व्यवहार किया जाना आपराधिक न्यायशास्त्र (Criminal Jurisprudence) का मूल सिद्धांत है।

    जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की खंडपीठ ओडिशा के एक Forest Range Officer से जुड़े भ्रष्टाचार और आपराधिक साजिश मामले की सुनवाई कर रही थी।

    आरोप था कि अधिकारी ने अन्य अधिकारियों के साथ मिलकर कालिमेला और चित्रकोंडा क्षेत्रों में अवैध पेड़ कटाई की अनुमति दी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष के आरोप केवल सामान्य और अस्पष्ट (Vague & Omnibus) थे और उनमें आरोपी की व्यक्तिगत भूमिका स्पष्ट रूप से नहीं बताई गई थी।

    अदालत ने कहा कि मामले में दो वरिष्ठ भारतीय वन सेवा (IFS) अधिकारियों को पहले ही डिस्चार्ज किया जा चुका है, जबकि निर्णय प्रक्रिया में उनकी भूमिका अधिक महत्वपूर्ण थी।

    ऐसे में केवल एक अधिकारी के खिलाफ मुकदमा जारी रखना मनमाना होगा और संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन होगा।

    सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि आपराधिक मुकदमे को उत्पीड़न (Oppression) का माध्यम नहीं बनने दिया जा सकता। अदालत ने टिप्पणी की कि यदि उपलब्ध सामग्री किसी अपराध की स्पष्ट ओर गंभीर आशंका तक नहीं दिखाती, तो व्यक्ति को अनावश्यक रूप से आपराधिक मुकदमे की कठिन प्रक्रिया से नहीं गुजरना चाहिए।

    कोर्ट ने कहा कि कानून निर्दोष व्यक्ति की रक्षा के लिए ढाल (Shield) होना चाहिए, प्रताड़ना का हथियार नहीं।

    इन टिप्पणियों के साथ सुप्रीम कोर्ट ने Forest Range Officer के खिलाफ लंबित आपराधिक कार्यवाही रद्द करते हुए कहा कि केवल सामान्य आरोपों के आधार पर मुकदमा जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।

    Next Story