क्राइम सीन का री-एक्टमेंट हर स्थिति में 'खुद के खिलाफ गवाही देने के अधिकार' का उल्लंघन नहीं करेगा: सुप्रीम कोर्ट
Shahadat
21 May 2026 2:09 PM IST

यह देखते हुए कि जघन्य अपराधों की जांच में 'अपराध स्थल के री-एक्टमेंट' की तकनीक को काफी अहमियत मिल रही है, सुप्रीम कोर्ट ने इस तकनीक के पक्ष में फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि अपराध स्थल के री-एक्टमेंट को सिर्फ इसलिए असंवैधानिक बताकर पूरी तरह से खारिज नहीं किया जा सकता, क्योंकि इसमें आरोपी भी शामिल होता है।
कोर्ट ने साफ किया कि अपराध स्थल के री-एक्टमेंट में आरोपी की भागीदारी संविधान के अनुच्छेद 20(3) (खुद के खिलाफ गवाही देने के मौलिक अधिकार) का उल्लंघन तभी मानी जाएगी, जब इसके ज़रिए आरोपी को अपनी निजी जानकारी के आधार पर ऐसे तथ्य बताने के लिए मजबूर किया जाए, जो उसके खिलाफ ही इस्तेमाल हो सकते हैं; न कि तब, जब यह सिर्फ वैज्ञानिक विश्लेषण के लिए किया गया कोई निर्देशित शारीरिक प्रदर्शन हो।
जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने यह टिप्पणी की,
"...यह कोई आम नियम नहीं माना जा सकता कि अपराध स्थल का हर री-एक्टमेंट या प्रदर्शन अपने आप में आरोपी की 'निजी गवाही' ही है। अगर री-एक्टमेंट में आरोपी को सिर्फ चलने, कोई खास हरकत करने, या किसी दृश्य क्रम की नकल करने का निर्देश दिया जाता है तो ज़रूरी नहीं कि इसमें आरोपी की कोई शारीरिक अभिव्यक्ति या उसकी निजी जानकारी का खुलासा शामिल हो। इस लिहाज़ से, इसे 'निजी गवाही' नहीं माना जा सकता। हालांकि, अगर किसी तरह आरोपी को उन अपराधों को करके दिखाने के लिए उकसाया जाता है, जो उसने अपनी निजी जानकारी के आधार पर किए थे तो इसे 'गवाही देने के लिए मजबूर करना' (testimonial compulsion) माना जाएगा। साथ ही यह साक्ष्य अधिनियम (Evidence Act) की धारा 25 और 26 के दायरे में आएगा।"
कोर्ट ने आगे कहा,
"...अपराध स्थल के री-एक्टमेंट या प्रदर्शन पर आधारित सबूतों को स्वीकार न करने का कोई आम नियम बनाना खतरनाक होगा, क्योंकि ऐसा करने से जांच की एक बेहद असरदार और वैज्ञानिक तकनीक ही खत्म हो जाएगी। सही तरीका यह है कि एक संतुलित रास्ता अपनाया जाए और यह देखा जाए कि क्या री-एक्टमेंट सिर्फ संदिग्धों की शारीरिक विशेषताओं का विश्लेषण करने के लिए किया गया एक निर्देशित प्रदर्शन है, या फिर यह आरोपी की निजी जानकारी का ही कोई खुलासा है।"
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला एक महिला की हत्या से जुड़ा है, जिसका शव तमिलनाडु में एक जल-निकाय (पानी के स्रोत) के पास मिला था। अभियोजन पक्ष (Prosecution) ने आरोप लगाया कि आरोपी ने पीड़िता के शव को ठिकाने लगाने से पहले उसके साथ यौन उत्पीड़न किया और उसकी हत्या कर दी। जांच के दौरान, पुलिस ने अपराध स्थल और उसके आस-पास की सड़कों पर लगे कैमरों से मिले CCTV फुटेज पर काफी हद तक भरोसा किया था। चूंकि CCTV फुटेज में केवल आरोपी की हलचल और चलने का तरीका ही कैद हुआ था, इसलिए जांच एजेंसी ने आरोपी की गिरफ्तारी के बाद घटनास्थल का दोबारा नाट्य-रूपांतरण (Re-Enactment) किया। इस प्रक्रिया के दौरान, कथित तौर पर आरोपी को निर्देश दिया गया कि वह ठीक उसी तरह चले और हिले-डुले जैसा कि CCTV फुटेज में दिखाई देने वाला व्यक्ति कर रहा था। इसके बाद इस नाट्य-रूपांतरण के वीडियो को 'फोरेंसिक चाल विश्लेषण' (Forensic gait Analysis) के लिए भेजा गया, ताकि आरोपी के चलने के तरीके की तुलना मूल CCTV रिकॉर्डिंग में कैद व्यक्ति के चलने के तरीके से की जा सके।
हाईकोर्ट के समक्ष आरोपी ने इस पूरी प्रक्रिया को चुनौती देते हुए यह तर्क दिया कि उसे इस नाट्य-रूपांतरण में भाग लेने के लिए मजबूर करना संविधान के अनुच्छेद 20(3) का उल्लंघन है; यह अनुच्छेद किसी भी आरोपी को खुद के खिलाफ गवाह बनने के लिए मजबूर किए जाने से सुरक्षा प्रदान करता है।
इस तर्क को स्वीकार करते हुए मद्रास हाईकोर्ट ने यह माना कि किसी आरोपी से घटना का नाट्य-रूपांतरण करने के लिए कहना एक प्रकार की 'गवाही देने की बाध्यता' (Testimonial Compulsion) के समान है, क्योंकि ऐसा करने पर आरोपी प्रभावी रूप से अपराध के बारे में अपनी निजी जानकारी पर आधारित तथ्यों को ही सामने ला रहा होता है। इसलिए हाईकोर्ट ने इस नाट्य-रूपांतरण को पुलिस हिरासत में दिए गए 'इकबालिया बयान' (Confession) के ही समकक्ष माना।
राज्य सरकार ने हाईकोर्ट के इस निष्कर्ष को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।
निर्णय
हाईकोर्ट का फैसला रद्द करते हुए जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा द्वारा लिखे गए निर्णय में यह टिप्पणी की गई कि हाई कोर्ट ने आरोपी-प्रतिवादियों के इस तर्क को स्वीकार करके गलती की है कि इस नाट्य-रूपांतरण से उनके 'खुद के खिलाफ गवाही न देने के अधिकार' (right against self-incrimination) का उल्लंघन हुआ है। इसी आधार पर उसने घटनास्थल के पूरे नाट्य-रूपांतरण को ही खारिज कर दिया।
कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि घटनास्थल का नाट्य-रूपांतरण अपने आप में आरोपी के 'दोषी होने का ठोस प्रमाण' (Substantive Evidence) नहीं है। इसके विपरीत यह केवल एक "पुनः-निर्मित साक्ष्य" (Recreated Evidence) है, जिसका उद्देश्य अदालतों को घटना से जुड़े आस-पास के हालात—जैसे कि चलने-फिरने के तरीके, शारीरिक बनावट, या CCTV फुटेज में कैद दृश्य-साक्ष्य—को बेहतर ढंग से समझने में सहायता प्रदान करना है।
कोर्ट ने समझाया कि चूंकि आरोपी को केवल चलने, CCTV फुटेज में दिख रही हरकतों की नकल करने, या वैज्ञानिक तुलना के लिए शारीरिक विशेषताओं को दिखाने का निर्देश दिया गया, इसलिए इसमें कोई गवाही देने की बाध्यता शामिल नहीं है, क्योंकि आरोपी अपराध के बारे में अपनी निजी जानकारी नहीं बता रहा है। इस प्रकार, कोर्ट ने चाल विशेषज्ञ के विश्लेषण को स्वीकार किया, जो आरोपी की केवल एक शारीरिक विशेषता थी, न कि उसकी निजी गवाही।
कोर्ट ने टिप्पणी की,
“इस तरह के पुनर्मंचन के आधार पर चाल विश्लेषण जैसे विशेषज्ञ विश्लेषण किए जाते हैं, जिससे सबूत का एक अलग टुकड़ा सामने आता है, जिसके अलग निहितार्थ होते हैं। इस तरह के विशेषज्ञ सबूत आरोपी की निजी गवाही पर आधारित नहीं होते हैं, बल्कि ये केवल आरोपी की शारीरिक विशेषताओं का विश्लेषण होते हैं, जिनका इस्तेमाल ट्रायल के दौरान पहचान के मकसद से किया जा सकता है। इसलिए 'पुनर्मंचन' और 'पुनर्मंचन पर आधारित सबूत' के बीच की बारीक रेखा को समझना ज़रूरी है।”
संक्षेप में, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल तभी, जब आरोपी को अपनी खुद की याददाश्त के आधार पर यह दिखाने के लिए मजबूर किया जाता है कि उसने अपराध कैसे किया तो ही ऐसी प्रक्रिया अनुच्छेद 20(3) के साथ-साथ साक्ष्य अधिनियम की धारा 25 और 26 के तहत अस्वीकार्य मानी जाएगी।
परिणामस्वरूप, अपील स्वीकार कर ली गई।
Cause Title: THE STATE OF TAMIL NADU v PONNUSAMY AND ORS.

