हाईकोर्ट का रजिस्ट्रार जनरल किसी न्यायिक अधिकारी के खिलाफ खुद से अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू नहीं कर सकता: सुप्रीम कोर्ट

Shahadat

18 May 2026 4:28 PM IST

  • हाईकोर्ट का रजिस्ट्रार जनरल किसी न्यायिक अधिकारी के खिलाफ खुद से अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू नहीं कर सकता: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को फैसला सुनाया कि किसी न्यायिक अधिकारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई तब तक शुरू नहीं की जा सकती, जब तक कि उसे हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस या चीफ जस्टिस द्वारा गठित जजों की समिति द्वारा अधिकृत न किया गया हो। कोर्ट ने यह भी कहा कि रजिस्ट्रार जनरल के पास ऐसी कार्रवाई खुद से शुरू करने का कोई स्वतंत्र अधिकार नहीं है।

    चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की खंडपीठ ने उत्तराखंड की सिविल जज की बहाली को सही ठहराया। इस जज को विभागीय कार्रवाई के बाद सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। उन पर आरोप है कि उन्होंने अपने घर पर घरेलू सहायिका के तौर पर काम करने वाली नाबालिग लड़की के साथ शारीरिक दुर्व्यवहार किया।

    हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह आरोपों की मेरिट या विभागीय जांच में दर्ज निष्कर्षों की जांच नहीं कर रहा था, बल्कि मामले का फैसला इस शुरुआती मुद्दे पर कर रहा था कि क्या कार्रवाई खुद ही वैध रूप से शुरू की गई।

    कोर्ट उत्तराखंड हाईकोर्ट (अपने प्रशासनिक पक्ष की ओर से) द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें अधिकारी की बहाली करने वाले हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई।

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू से ही "अधिकार क्षेत्र संबंधी खामी" (jurisdictional infirmity) से ग्रस्त थी।

    कोर्ट ने कहा,

    "संविधान के अनुच्छेद 235 के तहत शक्ति, जहां तक ​​न्यायिक अधिकारियों पर अनुशासनात्मक नियंत्रण का संबंध है, स्पष्ट रूप से हाई कोर्ट और हाईकोर्ट के सामूहिक रूप में निहित है, जिसमें अनिवार्य रूप से माननीय चीफ जस्टिस और उनके साथी जज शामिल होंगे।"

    कोर्ट ने आगे फैसला सुनाया कि जब तक अनुशासनात्मक कार्रवाई को चीफ जस्टिस या उनके द्वारा विधिवत गठित जजों की समिति द्वारा अनुमोदित नहीं किया जाता, तब तक ऐसी कार्रवाई कानूनी रूप से शुरू नहीं की जा सकती।

    खंडपीठ ने कहा,

    "जब तक अनुशासनात्मक कार्रवाई को हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस, या उनके द्वारा गठित जजों की समिति द्वारा—उनके प्रतिनिधियों के रूप में—अनुमोदित नहीं किया जाता, तब तक कथित अनुशासनात्मक कार्रवाई, सभी उद्देश्यों और प्रयोजनों के लिए शुरू से ही अमान्य (void ab initio) मानी जाएगी।

    हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल के पास, न तो संवैधानिक योजना के तहत और न ही न्यायिक अधिकारियों को नियंत्रित करने वाले वैधानिक नियमों के तहत किसी न्यायिक अधिकारी के खिलाफ खुद से अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू करने का कोई अधिकार है। वह केवल चीफ जस्टिस और जजों की ओर से कार्य कर सकते हैं। चूंकि इस प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया, इसलिए R1 (प्रतिवादी) के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की पूरी बुनियाद ही कानून की नज़र में अस्तित्वहीन (non est) थी।"

    हाईकोर्ट की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट माधवी दीवान ने तर्क दिया कि विभागीय जांच में अधिकारी द्वारा गंभीर कदाचार (Misconduct) साबित हुआ था। यह तर्क दिया गया कि न्यायिक अधिकारी ने एक नाबालिग लड़की को झूठा शिकार बनाया, जिसे कथित तौर पर उसके शरीर पर 20 से ज़्यादा चोटों के साथ बचाया गया।

    इन दलीलों का ज़िक्र करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आरोपों की गंभीरता को माना, लेकिन कहा कि उसके सामने मुख्य मुद्दा यह था कि क्या जाँच कानून के अनुसार शुरू की गई।

    कोर्ट ने कहा कि एक बार जब उसे कार्यवाही शुरू करने में कोई बुनियादी कमी मिल गई तो आरोपों से जुड़े तथ्यों के विवाद या सज़ा के अनुपात पर विचार करना ज़रूरी नहीं था।

    कोर्ट ने कहा,

    "हमने पाया है कि इस मामले में जांच की कार्यवाही, बिल्कुल शुरुआत से ही, अधिकार क्षेत्र से जुड़ी एक कमी से ग्रस्त है, जो मामले की जड़ तक जाती है।"

    कोर्ट ने पाया कि जिस न्यायिक अधिकारी को 2008 में नियुक्त किया गया, उसे हाईकोर्ट के फ़ैसले के बाद पहले ही बहाल किया जा चुका था।

    व्यापक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, जिसमें अधिकारी का यह दावा भी शामिल था कि विवाद की शुरुआत से ही उसे कुछ वरिष्ठ न्यायिक अधिकारियों द्वारा उत्पीड़न का सामना करना पड़ा था, सुप्रीम कोर्ट ने उसे बहाल करने वाले आदेश में दखल देने से इनकार किया।

    प्रतिवादी की ओर से सीनियर वकील सोनिया माथुर पेश हुईं।

    Case : HIGH COURT OF UTTARAKHAND AT NAINITAL Vs DEEPALI SHARMA | SLP(C) No. 16520/2026

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