प्रशिक्षण पूरा किए बिना असम राइफल्स से मुक्त होने पर बहाली का अधिकार नहीं: गुवाहाटी हाइकोर्ट

Amir Ahmad

28 Feb 2026 1:53 PM IST

  • प्रशिक्षण पूरा किए बिना असम राइफल्स से मुक्त होने पर बहाली का अधिकार नहीं: गुवाहाटी हाइकोर्ट

    गुवाहाटी हाइकोर्ट की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि जिस अभ्यर्थी ने न तो अपना प्रशिक्षण सफलतापूर्वक पूरा किया हो और न ही असम राइफल्स अधिनियम, 2006 के तहत औपचारिक रूप से बल का सदस्य बना हो उसे सेवा में पुनर्बहाली का अधिकार प्राप्त नहीं है, विशेषकर तब जब उसने स्वयं लिखित आवेदन और शपथपत्र देकर सेवा से मुक्त होने का अनुरोध किया हो।

    जस्टिस उन्नी कृष्णन नायर और जस्टिस यारेनजुंगला लोंगकुमेर की खंडपीठ ने एकलपीठ के निर्णय को बरकरार रखते हुए अभ्यर्थी की अपील खारिज की।

    मामले के अनुसार, कर्मचारी चयन आयोग द्वारा असम राइफल्स में सिपाही (सामान्य ड्यूटी) पद के लिए भर्ती परीक्षा आयोजित की गई थी। अभ्यर्थी परीक्षा में सफल हुआ और उसे अस्थायी नियुक्ति आदेश मिला। अंतिम चयन और चिकित्सीय परीक्षण के बाद उसे नियुक्ति पत्र जारी किया गया और प्रशिक्षण केंद्र में रिपोर्ट करने का निर्देश दिया गया।

    लगभग 12 माह 16 दिन प्रशिक्षण लेने के बाद अभ्यर्थी के स्वयं के अनुरोध पर उसे मुक्त करने का प्रमाणपत्र जारी किया गया। बाद में असम राइफल्स नियम, 2010 के तहत औपचारिक रूप से सेवा से मुक्त करने का आदेश पारित किया गया। इसके पश्चात उसने पुनर्बहाली के लिए कई अभ्यावेदन दिए यह कहते हुए कि उसने मेडिकल लीव के लिए आवेदन करने की समझ में कागजातों पर हस्ताक्षर किए और उसे भ्रमित किया गया।

    उसकी मांग अस्वीकार होने पर उसने हाइकोर्ट में याचिका दायर की, जिसे एकलपीठ ने यह कहते हुए खारिज कर दिया कि उसने प्रशिक्षण पूरा नहीं किया और वह अधिनियम, 2006 के तहत बल का विधिवत सदस्य नहीं बना था। साथ ही यह भी पाया गया कि उसने नोटरी के समक्ष स्वेच्छा से आवेदन और शपथपत्र पर हस्ताक्षर किए।

    खंडपीठ ने नियुक्ति पत्र की शर्तों का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि अभ्यर्थी निर्धारित अवधि में प्रशिक्षण सफलतापूर्वक पूरा नहीं करता है तो उसकी सेवा बिना सूचना और बिना कारण बताए समाप्त की जा सकती है। इससे स्पष्ट है कि प्रशिक्षण पूर्ण किए बिना वह असम राइफल्स का सदस्य नहीं माना जा सकता।

    अदालत ने यह भी कहा कि यदि कोई व्यक्ति अधिनियम, 2006 के तहत बल का सदस्य बन जाता है तो वह निर्धारित प्राधिकारी की लिखित अनुमति के बिना अपने पद से त्यागपत्र नहीं दे सकता। लेकिन वर्तमान मामले में अभ्यर्थी अभी सदस्य बना ही नहीं था।

    नोटरीकृत शपथपत्र के संबंध में पीठ ने पाया कि अभ्यर्थी के हस्ताक्षर पृष्ठ के मध्य में थे और ऊपर-नीचे लेखन मौजूद था, जिससे यह संभव नहीं लगता कि खाली स्टांप पत्र पर हस्ताक्षर लेकर बाद में पाठ जोड़ा गया हो। साथ ही उसने तत्काल कोई आपत्ति भी दर्ज नहीं कराई। इसलिए यह माना गया कि उसे शपथपत्र की सामग्री की जानकारी थी।

    अंततः हाइकोर्ट ने कहा कि चूंकि अभ्यर्थी प्रशिक्षण सफलतापूर्वक पूरा कर बल में समाहित नहीं हुआ, इसलिए सेवा में पुनर्बहाली का प्रश्न ही नहीं उठता। इन टिप्पणियों के साथ खंडपीठ ने एकलपीठ के आदेश को सही ठहराते हुए अपील खारिज की।

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