पहली पत्नी के रहते हुआ विवाह शून्य, उसकी मृत्यु के बाद भी दूसरी पत्नी को फैमिली पेंशन का अधिकार नहीं: दिल्ली हाइकोर्ट

Amir Ahmad

26 Feb 2026 1:40 PM IST

  • पहली पत्नी के रहते हुआ विवाह शून्य, उसकी मृत्यु के बाद भी दूसरी पत्नी को फैमिली पेंशन का अधिकार नहीं: दिल्ली हाइकोर्ट

    दिल्ली हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि किसी पुरुष का दूसरा विवाह उसकी पहली शादी के रहते हुआ है तो वह विवाह कानूनन शून्य माना जाएगा। ऐसी दूसरी पत्नी को सेना पेंशन नियमावली 1961 के तहत फैमिली पेंशन का अधिकार नहीं मिलेगा, भले ही बाद में पहली पत्नी का निधन हो जाए।

    जस्टिस वी. कामेश्वर राव और जस्टिस मनमीत प्रीतम सिंह अरोड़ा की खंडपीठ ने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम (Hindu Marriage Act) की धारा 11 के अनुसार, यदि विवाह के समय पति या पत्नी में से किसी की पूर्व वैध शादी विद्यमान है तो दूसरा विवाह शून्य है।

    यह निर्णय विद्या देवी द्वारा दायर याचिका पर आया, जिसमें उन्होंने सशस्त्र बल अधिकरण के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें दिवंगत सिपाही उदय सिंह की विधवा के रूप में उनकी फैमिली पेंशन की मांग खारिज कर दी गई।

    याचिकाकर्ता का तर्क था कि चूंकि उदय सिंह की पहली पत्नी का वर्ष 2012 में निधन हो गया। इसलिए फैमिली पेंशन का अधिकार उन्हें मिलना चाहिए।

    हाइकोर्ट ने इस दलील को अस्वीकार करते हुए कहा कि जो विवाह प्रारंभ से ही शून्य था उसे पहली पत्नी की मृत्यु के बाद वैध नहीं माना जा सकता।

    अदालत ने कहा,

    “फैमिली पेंशन का अधिकार उसी पत्नी को है जिसका विवाह अधिकारी से विधि सम्मत हुआ हो।”

    अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि उदय सिंह ने अपने जीवनकाल में पहली शादी को समाप्त करने के लिए कोई कानूनी कदम नहीं उठाया था भले ही वे उससे अलग रह रहे हों। इसलिए दूसरी शादी कानून की नजर में वैध नहीं थी।

    खंडपीठ ने कहा,

    “उदय सिंह का याचिकाकर्ता के साथ किया गया दूसरा विवाह उनके 2011 में निधन तक अवैध ही रहा। वर्ष 2012 में पहली पत्नी सतवती देवी की मृत्यु से यह विवाह वैध नहीं हो जाता।”

    याचिकाकर्ता ने केंद्रीय सिविल सेवा पेंशन नियम, 2021 के तहत जारी कार्यालय ज्ञापन का भी हवाला दिया। हालांकि, सुनवाई के दौरान उनके एडवोकेट ने स्वीकार किया कि यह मामला सेना पेंशन नियमावली के अधीन आता है, इसलिए उक्त नियम लागू नहीं होते। अदालत ने यह भी कहा कि संबंधित ज्ञापन में भी ऐसे जीवनसाथी को अधिकार नहीं दिया गया, जिसका विवाह अधिकारी की मृत्यु के समय विधिसम्मत न हो।

    हाइकोर्ट ने माना कि अधिकरण ने याचिकाकर्ता के दावे को सही ढंग से खारिज किया। याचिका में कोई दम न पाते हुए अदालत ने उसे खारिज किया।

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