शादीशुदा बेटी अगर अकेली कानूनी वारिस है तो वह एक्स-ग्रेटिया और लीव एनकैशमेंट पाने की हकदार: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

Shahadat

26 Feb 2026 9:21 AM IST

  • शादीशुदा बेटी अगर अकेली कानूनी वारिस है तो वह एक्स-ग्रेटिया और लीव एनकैशमेंट पाने की हकदार: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

    मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने माना कि अगर शादीशुदा बेटी मृतक की अकेली कानूनी वारिस है तो वह लीव एनकैशमेंट और एक्स-ग्रेटिया पेमेंट पाने की हकदार है।

    जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की डिवीज़न बेंच ने 14 नवंबर 1972 के नोटिफिकेशन का ज़िक्र करते हुए कहा,

    "यह नोटिफिकेशन शादीशुदा बेटी को इससे बाहर नहीं करता। यह नियम मरने वाले के कानूनी वारिसों के बीच झगड़े को सुलझाने के लिए बनाया गया, मतलब अगर मरने वाले के एक से ज़्यादा बेटे/बेटी हैं तो सबसे बड़ा बेटा ही एक्स-ग्रेसिया पाने का हक़दार है। दूसरा, अगर सबसे बड़ी बेटी शादीशुदा है तो वह एक्स-ग्रेसिया पाने के लिए बेटे को हटा सकती है। तीसरा, इस बात पर नोटिफिकेशन में कुछ नहीं कहा गया कि अगर शादीशुदा बेटी के अलावा कोई वारिस नहीं है तो एक्स-ग्रेसिया किसे मिलेगा। इसका मतलब है, अगर शादीशुदा बेटी मरने वाले की अकेली कानूनी वारिस है तो उसे इससे बाहर नहीं रखा गया।"

    नरसिंहपुर के डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में काम करने वाले ड्राइवर की बेटी ने याचिका दायर की थी, जिसमें रेस्पोंडेंट्स (हाईकोर्ट) के ऑर्डर को चैलेंज किया गया। उक्त ऑर्डर में उसे एक्स-ग्रेसिया और लीव इनकैशमेंट का पेमेंट करने से मना कर दिया गया।

    पिता की सर्विस के दौरान 9 मई, 2024 को मौत हो गई। अपनी ज़िंदगी में उन्होंने अपनी पत्नी को नॉमिनेट किया, लेकिन उनकी मौत उनसे पहले हो गई। इसलिए उन्होंने ऑफिशियल सर्विस रिकॉर्ड में नॉमिनेशन अपनी पत्नी से बदलकर अपनी बेटी (मौजूदा याचिकाकर्ता) कर दिया।

    याचिकाकर्ता ने अपने पिता की मौत के बाद रिटायरमेंट और सर्विस बेनिफिट्स के सेटलमेंट के लिए अप्लाई किया। उन्हें GPF और कर्मचारी ग्रुप इंश्योरेंस स्कीम के तहत रकम दी गई। हालांकि, एक्स-ग्रेशिया और लीव इनकैशमेंट पेमेंट इस आधार पर रिजेक्ट कर दिए गए कि शादीशुदा बेटी ऐसे बेनिफिट्स पाने की हकदार नहीं है।

    याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि इस आधार पर रिजेक्शन कि वह मृतक की शादीशुदा बेटी थी, मनमाना, गैर-कानूनी और संविधान के आर्टिकल 14 का उल्लंघन है।

    जवाब देने वालों के वकील ने दावा किया कि लागू नियमों के अनुसार, सिर्फ नॉमिनेशन से सभी सर्विस बेनिफिट्स का पूरा अधिकार नहीं मिल जाता है और मौजूदा पॉलिसी के तहत, शादीशुदा बेटी एलिजिबल कैटेगरी में नहीं आती थी।

    कोर्ट ने मीनाक्षी दुबे बनाम एम.पी. पूर्वक्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी लिमिटेड के केस पर भरोसा करते हुए इस बात पर ज़ोर दिया कि शादी के बाद भी बेटी परिवार का हिस्सा रहती है और उसे अपने पिता के परिवार से अलग नहीं माना जा सकता।

    कोर्ट ने आगे कहा,

    "किसी कर्मचारी को लीव एनकैशमेंट से वंचित करना भारतीय संविधान के आर्टिकल 300A का उल्लंघन है। कोर्ट ने कहा कि कर्मचारी ने अपनी कमाई हुई छुट्टी अपने नाम जमा करने का फैसला किया और एनकैशमेंट उसका अधिकार बन जाता है। एम्प्लॉयर किसी कर्मचारी को ऐसे अधिकार से मना नहीं कर सकता। लीव एनकैशमेंट का अधिकार एक कानूनी अधिकार है, जिसे साफ़ कानूनी नियम से खत्म नहीं किया जा सकता।"

    कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि लीव एनकैशमेंट, पेंशन और ग्रेच्युटी से जुड़े अधिकारों को कानूनी प्रक्रिया के बिना वंचित नहीं किया जा सकता और किसी कर्मचारी की मौत से रिटायरमेंट के समय मिले कर्मचारी के अधिकार खत्म नहीं होंगे।

    बेंच ने 14 नवंबर, 1972 के नोटिफिकेशन पर भरोसा करते हुए इस बात पर ज़ोर दिया कि नोटिफिकेशन शादीशुदा बेटी को विचार करने से नहीं रोकता है, बल्कि सिर्फ़ यह साफ़ करता है कि शादीशुदा बेटी ऐसे पेमेंट की हक़दार होगी अगर वह मरे हुए कर्मचारी की अकेली कानूनी वारिस है।

    इसके अलावा, कोर्ट ने एक्स ग्रेशिया पेमेंट के नेचर को साफ़ करते हुए कहा,

    "कर्मचारी की मौत के तुरंत बाद शायद उसी दिन उसे दिया गया एक्स ग्रेशिया दिखाता है कि यह रकम कर्मचारी के अंतिम संस्कार के लिए है। इसलिए इस आधार पर इसे मना नहीं किया जा सकता कि शादीशुदा बेटी इसका दावा नहीं कर सकती"।

    इस तरह कोर्ट ने माना कि शादीशुदा बेटी/याचिकाकर्ता एक्स ग्रेशिया और लीव इनकैशमेंट पेमेंट पाने की हक़दार है। इसलिए कोर्ट ने याचिका मंज़ूर कर ली और प्रतिवादी को 60 दिनों के अंदर बताई गई रकम का पेमेंट करने का निर्देश दिया।

    Case Title: Prasanna Namdev (Soni) v High Court of MP [WP-37546-2024]

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