सह-आरोपियों को बाद में जमानत न मिलना, पहले से मिली जमानत रद्द करने का आधार नहीं: दिल्ली हाइकोर्ट
Amir Ahmad
28 Feb 2026 12:11 PM IST

दिल्ली हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी सह-आरोपी को बाद में जमानत से वंचित किया जाना पहले से जमानत पा चुके आरोपी की जमानत रद्द करने के लिए अपने आप में उपरांत उत्पन्न परिस्थिति नहीं माना जा सकता, जब तक यह आरोप न हो कि आरोपी ने जमानत की शर्तों का उल्लंघन किया, या मिली हुई स्वतंत्रता का दुरुपयोग किया।
जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने यह टिप्पणी करते हुए उस याचिका को खारिज किया, जिसमें 6.05 करोड़ रुपये के कथित धोखाधड़ी और जालसाजी मामले में एक आरोपी को दी गई अग्रिम जमानत को रद्द करने की मांग की गई। इस मामले की जांच आर्थिक अपराध शाखा, दिल्ली पुलिस द्वारा की जा रही है।
खंडपीठ ने कहा,
“सिर्फ इस आधार पर कि सह-आरोपियों को बाद में जमानत मिली या नहीं मिली, इसे अपने आप में ऐसी उपरांत उत्पन्न परिस्थिति नहीं माना जा सकता, जिससे पहले से दी गई जमानत रद्द की जा सके, जब तक कि आरोपी द्वारा स्वतंत्रता के दुरुपयोग का कोई आरोप न हो।”
शिकायतकर्ता कंपनी की ओर से दायर याचिका में तर्क दिया गया कि मामले की गंभीरता और कथित आपराधिक सामग्री के बावजूद आरोपी जमानत पर रहते हुए कथित अपराध से अर्जित लाभ का आनंद ले रहा है। यह भी कहा गया कि सेशन कोर्ट द्वारा जमानत देते समय जिन समानता के आधारों पर विचार किया गया था, वे बाद की परिस्थितियों में कमजोर पड़ गए।
हाइकोर्ट ने इन दलीलों को अस्वीकार करते हुए जमानत की वापसी और जमानत के निरस्तीकरण के बीच स्पष्ट अंतर बताया। अदालत ने दोहराया कि जमानत रद्द करना तभी उचित है, जब जमानत मिलने के बाद आरोपी का आचरण ऐसा हो, जिससे यह सिद्ध हो कि उसने शर्तों का उल्लंघन किया, जांच में सहयोग नहीं किया, साक्ष्यों से छेड़छाड़ की या स्वतंत्रता का दुरुपयोग किया।
अदालत ने कहा कि इस मामले में यह आरोप नहीं है कि आरोपी ने जमानत की किसी शर्त का उल्लंघन किया या जांच में शामिल होने से इनकार किया। साथ ही सेशन कोर्ट ने अग्रिम जमानत देते समय आरोपी की भूमिका का विस्तार से परीक्षण किया।
अंततः हाइकोर्ट ने कहा कि शिकायतकर्ता मूल रूप से मामले के तथ्यों और साक्ष्यों का पुनः मूल्यांकन चाहता है, जो इस स्तर पर स्वीकार्य नहीं है। इसी आधार पर जमानत रद्द करने की याचिका खारिज की गई।

