एसिड अटैक पीड़ितों के पुनर्वास पर यूपी सरकार को हाईकोर्ट की फटकार, शीर्ष अधिकारियों को किया तलब
Amir Ahmad
19 May 2026 5:55 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एसिड अटैक पीड़ितों के पुनर्वास, मुआवजे और दीर्घकालिक सहायता को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार की कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराजगी जताई। अदालत ने कहा कि राज्य सरकार इस गंभीर मुद्दे को हल्के और लापरवाह तरीके से ले रही है और अब तक कोई ठोस पुनर्वास नीति तैयार नहीं की गई।
जस्टिस सरल श्रीवास्तव और जस्टिस गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने कहा कि एसिड अटैक पीड़ितों के लिए प्रभावी और समयबद्ध नीति बनाने के लिए सरकार की ओर से उच्च प्रशासनिक स्तर पर कोई ठोस प्रयास दिखाई नहीं देता।
अदालत ने इस मामले में उत्तर प्रदेश सरकार के प्रमुख सचिव (गृह) और प्रमुख सचिव (महिला एवं बाल कल्याण विभाग) को 25 मई को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का निर्देश दिया।
हाईकोर्ट ने अधिकारियों से विस्तृत जानकारी मांगी, जिसमें एसिड अटैक पीड़ितों के लिए प्रस्तावित मुआवजा, पुनर्वास और दीर्घकालिक सहायता की नीति, इलाज और पुनर्निर्माण सर्जरी की व्यवस्था, काउंसलिंग, शिक्षा और रोजगार सहायता की योजना, तथा पीड़ितों की चोटों और जीवनभर के प्रभाव को ध्यान में रखते हुए मुआवजे की राशि तय करने की प्रक्रिया शामिल है।
अदालत यह सुनवाई फरहा नामक पीड़िता की याचिका पर कर रही थी। याचिका में उन्होंने सरकार से अधिक मुआवजा और सरकारी नौकरी देने की मांग की।
पीड़िता ने अदालत को बताया कि जब वह मात्र 24 वर्ष की थीं तब उन पर एसिड अटैक हुआ। उन्हें केवल 6 लाख रुपये का मुआवजा दिया गया और उसके बाद पुनर्वास के लिए सरकार की ओर से कोई ठोस सहायता नहीं मिली।
याचिकाकर्ता की ओर से वकील अली कंबर जैदी, मादिया, मोहम्मद दानिश और मोहम्मद इलियास ने अदालत को बताया कि जुलाई 2025 में उत्तर प्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव को प्रतिनिधित्व दिया गया था, लेकिन आज तक उस पर कोई निर्णय नहीं लिया गया।
इससे पहले हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा था कि क्या एसिड अटैक पीड़ितों के लिए कोई नीति या दिशा-निर्देश बनाए गए और याचिकाकर्ता के पुनर्वास के लिए क्या कदम उठाए गए।
इसके जवाब में अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) की ओर से दाखिल हलफनामे पर अदालत ने असंतोष जताया। कोर्ट ने कहा कि हलफनामे में केवल विभागीय चर्चाओं का उल्लेख है, लेकिन उसमें कोई स्पष्ट नीति, समयसीमा, पुनर्वास व्यवस्था या वित्तीय ढांचा नहीं बताया गया।
अदालत ने कहा कि इस मुद्दे पर सरकार का रवैया उस गंभीरता को नहीं दर्शाता जिसकी आवश्यकता है।
पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के परिवर्तन केंद्र बनाम भारत संघ फैसले का हवाला देते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही ऐसे मामलों में अपर्याप्त मुआवजे पर चिंता जता चुकी है लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार ने अब तक कोई ठोस नीति तैयार नहीं की।
हाईकोर्ट ने कहा कि एसिड अटैक पीड़ितों को जीवनभर शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और आर्थिक पीड़ा झेलनी पड़ती है। ऐसे मामलों को केवल एकमुश्त मुआवजे तक सीमित नहीं रखा जा सकता।
अदालत ने कहा,
“राज्य की जिम्मेदारी केवल मामूली मुआवजा देने तक सीमित नहीं है। इसमें पुनर्वास, इलाज, पुनर्निर्माण सर्जरी, मानसिक परामर्श, शिक्षा, रोजगार सहायता और सम्मानजनक जीवन सुनिश्चित करने के उपाय भी शामिल हैं।”
पीठ ने यह भी कहा कि एसिड अटैक पीड़ित अक्सर न केवल शारीरिक क्षति झेलते हैं बल्कि आजीविका, सामाजिक स्वीकृति, विवाह, भावनात्मक सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन के अवसरों से भी वंचित हो जाते हैं।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना और नागरिकों की शारीरिक सुरक्षा सुनिश्चित करना राज्य का संवैधानिक दायित्व है। अदालत ने कहा कि ऐसे जघन्य अपराध होने पर सरकार की जिम्मेदारी केवल आरोपी के खिलाफ मुकदमा चलाने तक खत्म नहीं हो जाती।
अदालत ने जोर देकर कहा,
“राज्य का दायित्व यह भी है कि पीड़ितों के पुनर्वास और सम्मानजनक जीवन के लिए प्रभावी सहायता सुनिश्चित की जाए जैसा कि संविधान के अनुच्छेद 21 में गारंटी दी गई।”
मामले की अगली सुनवाई 25 मई को होगी।

