हाईकोर्ट ने एक बार फिर यूपी के 'गन कल्चर' पर निशाना साधा, बृज भूषण और अन्य लोगों के हथियारों के लाइसेंस की जानकारी मांगी

Shahadat

23 May 2026 9:54 AM IST

  • हाईकोर्ट ने एक बार फिर यूपी के गन कल्चर पर निशाना साधा, बृज भूषण और अन्य लोगों के हथियारों के लाइसेंस की जानकारी मांगी

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बुधवार को एक बार फिर उत्तर प्रदेश राज्य में फैले 'गन कल्चर' (हथियारों के चलन) पर निशाना साधा। कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि हथियारों का सार्वजनिक प्रदर्शन अक्सर सामाजिक सौहार्द को बिगाड़ता है और आम लोगों में डर और असुरक्षा की भावना पैदा करता है।

    जस्टिस विनोद दिवाकर की बेंच ने टिप्पणी की कि जिस समाज में हथियारबंद लोग अपनी ताकत दिखाकर और धमकियां देकर अपना दबदबा बनाते हैं, वह समाज न तो ज़्यादा आज़ाद होता है और न ही ज़्यादा शांतिपूर्ण।

    सिंगल जज ने आगे कहा,

    "...बल्कि, यह लोगों के भरोसे को खत्म करता है, सुरक्षा की भावना को कमज़ोर करता है और नागरिक शांति को भंग करता है... एक ऐसा कल्चर जो हथियारों और धमकियों को बढ़ावा देता है, उसे एक शांतिपूर्ण और कानून का पालन करने वाले समाज के लिए सही नहीं माना जा सकता।"

    यह देखते हुए कि असली आत्मरक्षा का मकसद जीवन की रक्षा करना और व्यवस्था बनाए रखना होता है, कोर्ट ने टिप्पणी की कि जो हथियार डराने-धमकाने का ज़रिया बन जाते हैं, वे असली सुरक्षा देने के बजाय डर को बढ़ावा देते हैं।

    बता दें, इस साल मार्च के बाद से यह दूसरी बार है, जब इस बेंच ने समाज में 'ताकत' और 'रसूख' दिखाने के लिए हथियारों के गलत इस्तेमाल के सिस्टम पर आपत्ति जताई।

    इससे पहले, 23 मार्च को जस्टिस दिवाकर, जो राज्य में निजी हथियारों के गलत इस्तेमाल से जुड़े एक मामले की सुनवाई कर रहे हैं, उन्होंने राय दी थी कि हथियारों तक बिना किसी रोक-टोक के पहुंच समाज के लिए एक गंभीर खतरा है।

    अपनी पिछली हिदायतों को याद करते हुए बेंच ने कहा कि उसने पहले राज्य सरकार से हथियारों के लाइसेंस देने और उनकी समीक्षा करने से जुड़ी अपनी नीति पर फिर से विचार करने को कहा था, खासकर उन लोगों के मामले में जिनका आपराधिक इतिहास रहा हो।

    उल्लेखनीय है कि बेंच ने राज्य के सभी DMs (ज़िलाधिकारियों) को यह निर्देश भी दिया था कि वे ज़िला-वार और पुलिस स्टेशन-वार उन हथियार लाइसेंस धारकों की जानकारी दें, जिनके खिलाफ दो या उससे ज़्यादा आपराधिक मामले दर्ज हैं। साथ ही अगर उनके परिवार के किसी सदस्य के पास भी हथियार का लाइसेंस है तो उसकी जानकारी भी दें।

    कोर्ट के आदेश का पालन करते हुए बेंच को बताया गया कि Arms Act, 1959 (हथियार कानून, 1959) और उसके तहत बनाए गए नियमों का पालन राज्य के सभी 75 ज़िलों के DMs और पुलिस कमिश्नरों/सीनियर पुलिस अधीक्षकों द्वारा पूरी ईमानदारी और सही भावना से नहीं किया जा रहा है। बेंच को यह भी बताया गया कि आज की तारीख तक 10,08,953 हथियारों के लाइसेंस दिए गए, और 20,960 परिवारों के पास एक से ज़्यादा हथियारों के लाइसेंस हैं; और 6,062 मामलों में उन लोगों को लाइसेंस दिए गए, जिनका आपराधिक इतिहास रहा है, जिसमें दो या उससे ज़्यादा आपराधिक मामले शामिल हैं।

    हालांकि, हाईकोर्ट के सामने यूपी सरकार का यह रुख था कि उसने हथियारों के सार्वजनिक प्रदर्शन और दुरुपयोग और आपराधिक संस्कृति के महिमामंडन की बुराई को पूरी तरह से खत्म करने के मकसद से एक बेहद सख्त 'ज़ीरो-टॉलरेंस' नीति अपनाई।

    खास बात यह है कि बेंच ने गौर किया कि इस रुख के बावजूद, स्थानीय पुलिस अधिकारी कुछ ऐसे प्रभावशाली लोगों का ब्योरा देने में नाकाम रहे हैं, जिनका "काफी सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव" है। ऐसे लोगों से जुड़ी ज़रूरी जानकारी छिपा ली गई।

    आदेश में जिन लोगों के नाम शामिल हैं, जिनके हथियारों के लाइसेंस की जानकारी कोर्ट ने मांगी, उनमें मौजूदा MLA रघुराज प्रताप सिंह, पूर्व एमपी धनंजय सिंह और पूर्व एमपी बृज भूषण सिंह शामिल हैं।

    इसके अलावा, कोर्ट ने श्री विनीत सिंह, श्री अजय मरहद, श्री सुजीत सिंह बेलवा, श्री उपेंद्र सिंह गुड्डू, श्री पप्पू भौकाली, श्री इंद्रदेव सिंह, श्री सुनील यादव, श्री फरार अज़ीम, श्री बादशाह सिंह, श्री संग्राम सिंह, श्री सुल्लू सिंह, श्री चुलबुल सिंह, श्री सन्नी सिंह, श्री छुनू सिंह और डॉ. उदय भान सिंह के बारे में भी जानकारी मांगी।

    हालांकि, बेंच ने साफ किया कि वह किसी भी व्यक्ति की साख या राजनीतिक और सामाजिक गतिविधियों पर कोई टिप्पणी नहीं कर रही है।

    कोर्ट ने कुछ अन्य प्रभावशाली लोगों के बारे में भी जानकारी मांगी, जिन्हें नोएडा, मेरठ, आगरा, बरेली, लखनऊ, प्रयागराज, वाराणसी, गोरखपुर और कानपुर में ज़ोन के हिसाब से बांटा गया।

    बेंच ने आदेश दिया,

    "हलफनामे में यह भी बताया जाए कि क्या ऐसे लोगों को कोई सरकारी सुरक्षा दी गई। अगर हां, तो सुरक्षा की श्रेणी क्या है, कितने पुलिसकर्मी तैनात किए गए और उन कर्मियों का पद क्या है? इस संबंध में अन्य ज़रूरी और उससे जुड़ी जानकारी का भी स्वागत किया जाएगा।"

    इसके साथ ही बेंच ने निर्देश दिया कि उसके आदेश की एक प्रति तत्काल अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह), सभी ज़िला मजिस्ट्रेटों, और सभी 75 ज़िलों के पुलिस आयुक्तों/वरिष्ठ पुलिस अधीक्षकों को सख़्त और प्रभावी अनुपालन के लिए भेजी जाए।

    संबंधित SSPs और पुलिस आयुक्तों को एक लिखित वचन देना होगा, जिसमें यह कहा गया हो कि कोई भी महत्वपूर्ण जानकारी छिपाई नहीं गई। साथ ही तथ्यों को जान-बूझकर दबाने के किसी भी मामले के लिए वे व्यक्तिगत रूप से ज़िम्मेदार होंगे। इस मामले की अगली सुनवाई 26 मई को होगी।

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