पूर्व और वर्तमान विधायकों को पेंशन-भत्ते देने वाला कानून वैध: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने खारिज की चुनौती

Amir Ahmad

18 May 2026 3:19 PM IST

  • पूर्व और वर्तमान विधायकों को पेंशन-भत्ते देने वाला कानून वैध: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने खारिज की चुनौती

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में उत्तर प्रदेश राज्य विधानमंडल (सदस्यों के वेतन, भत्ते और पेंशन) अधिनियम, 1980 की संवैधानिक वैधता बरकरार रखी। अदालत ने कहा कि वर्तमान और पूर्व विधायकों तथा विधान परिषद सदस्यों को पेंशन, भत्ते और अन्य सुविधाएं देने पर संविधान में कोई रोक नहीं है।

    जस्टिस राजन राय और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने जनहित याचिका खारिज करते हुए कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में ऐसी नीतिगत बातें विधायिका के विवेक और निर्णय के दायरे में आती हैं और अदालत को केवल स्पष्ट संवैधानिक उल्लंघन होने पर ही हस्तक्षेप करना चाहिए।

    अदालत ने कहा,

    “संविधान में ऐसी कोई बाधा नहीं है, जो राज्य विधानमंडल को अपने वर्तमान और पूर्व सदस्यों के लिए सामाजिक सुरक्षा संबंधी प्रावधान बनाने से रोकती हो।”

    यह जनहित याचिका गैर सरकारी संगठन 'लोक प्रहरी' की ओर से दाखिल की गई। याचिका में अधिनियम की विभिन्न धाराओं को चुनौती देते हुए कहा गया कि विधायकों और पूर्व विधायकों को पेंशन, यात्रा सुविधा, मेडिकल सुविधा और अन्य लाभ देना संविधान के विपरीत है।

    याचिकाकर्ता का तर्क था कि संविधान के अनुच्छेद 195 में केवल वेतन और भत्तों का उल्लेख है, जबकि “पेंशन” शब्द का कहीं जिक्र नहीं है। ऐसे में विधायक पद छोड़ने के बाद भी आर्थिक लाभ देना मनमाना और असंवैधानिक है।

    याचिका में यह भी कहा गया कि वर्ष 1952 में जहां विधायकों को केवल 200 रुपये वेतन और सीमित भत्ते मिलते थे, वहीं अब नकद रूप में ही 1.25 लाख रुपये से अधिक मासिक लाभ दिए जा रहे हैं। इसके अलावा मुफ्त यात्रा, आवास, मेडिकल, टेलीफोन और अन्य सुविधाएं अलग से मिलती हैं।

    याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि जनसेवा के लिए बनाया गया पद अब “आजीवन लाभ और विशेषाधिकार” का माध्यम बन गया है।

    हालांकि, हाईकोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि विधायिका ने अपने विवेक से सामाजिक सुरक्षा और संस्थागत निरंतरता के उद्देश्य से यह व्यवस्था बनाई है।

    खंडपीठ ने कहा कि पेंशन, पारिवारिक पेंशन, मेडिकल और यात्रा सुविधाएं उन सार्वजनिक दायित्वों और संवैधानिक जिम्मेदारियों को ध्यान में रखकर दी गईं, जो विधायक अपने कार्यकाल में निभाते हैं।

    अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक किसी नीति में स्पष्ट संवैधानिक निषेध या मनमानी न हो, तब तक केवल वैकल्पिक दृष्टिकोण के आधार पर उसे रद्द नहीं किया जा सकता।

    हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के 'लोक प्रहरी बनाम भारत संघ' फैसले का भी हवाला दिया और कहा कि पूर्व विधायकों को पेंशन एवं अन्य सुविधाएं देने की विधायिका की शक्ति पहले ही मान्य की जा चुकी है।

    अदालत ने कहा कि विधायक सामान्य सरकारी कर्मचारी नहीं होते, बल्कि वे कानून निर्माण, जनता का प्रतिनिधित्व और शासन की निगरानी जैसी विशिष्ट संवैधानिक जिम्मेदारियां निभाते हैं। इसलिए उनके लिए अलग व्यवस्था करना अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन नहीं माना जा सकता।

    खंडपीठ ने यह भी कहा कि लाभों की मात्रा तय करना पूरी तरह विधायिका का नीतिगत विषय है और न्यायपालिका “दूसरी विधायिका” बनकर इन फैसलों की समीक्षा नहीं कर सकती।

    अंत में अदालत ने कहा कि याचिका में उठाए गए अधिकांश मुद्दों पर पहले ही सुप्रीम कोर्ट के फैसलों से अंतिम निर्णय हो चुका है और दोबारा विवाद खड़ा करने का कोई आधार नहीं बनता।

    इन्हीं टिप्पणियों के साथ इलाहाबाद हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की।

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