'इसके अस्तित्व पर ही सवाल उठाता है': इलाहाबाद हाईकोर्ट ने NHRC को हिरासत में हुई मौत का केस सिर्फ़ पुलिस के बयान पर बंद करने के लिए फटकारा

Shahadat

20 May 2026 9:31 AM IST

  • इसके अस्तित्व पर ही सवाल उठाता है: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने NHRC को हिरासत में हुई मौत का केस सिर्फ़ पुलिस के बयान पर बंद करने के लिए फटकारा

    यह देखते हुए कि एक दिव्यांग व्यक्ति की हिरासत में हुई मौत का 16 साल पुराना मामला गंभीर "संस्थागत विफलताओं" को उजागर करता है, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सोमवार को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) और UP पुलिस को फटकारा और मामले की सच्चाई सामने लाने में हाईकोर्ट की अपनी प्रक्रियागत देरी को भी स्वीकार किया।

    अपने 16-पृष्ठों के आदेश में कोर्ट ने NHRC की कड़ी आलोचना की कि उसने बिना किसी स्वतंत्र जाँच के, पुलिस के बयान को ही अंतिम सत्य मानकर 2009 के इस मामले को बंद कर दिया।

    जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने टिप्पणी की,

    "(NHRC) ने अपनी तरफ़ से स्वतंत्र जाँच के नाम पर कुछ भी नहीं किया। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जिस तरह से NHRC ने इस मामले की जांच की, वह बेहद निराशाजनक है... अगर NHRC को बस इतना ही करना था और हिरासत में हुई मौत का मामला पूरी तरह से पुलिस के बयान के आधार पर बंद कर देना था - जो कि इस मामले में एक पक्षकार है - और मृतक के परिवार के निष्पक्ष गवाहों से कोई स्वतंत्र सबूत नहीं जुटाने थे, तो यह NHRC के अस्तित्व पर ही सवाल उठाता है।"

    हालांकि, कोर्ट ने NHRC के वकील की दलीलें सुनने के बाद NHRC के आचरण पर अपने अंतिम निष्कर्ष सुरक्षित रख लिए।

    संक्षेप में कहें तो यह खंडपीठ NGO 'एसोसिएशन फॉर एडवोकेसी एंड लीगल इनिशिएटिव्स' (AALI), लखनऊ द्वारा दायर जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई कर रही थी। यह याचिका 2009 में दन्नाहार पुलिस स्टेशन (मैनपुरी ज़िला) के लॉकअप के अंदर, 40% शारीरिक दिव्यांगता वाले एक व्यक्ति, नाहर सिंह की मौत से संबंधित थी।

    जहां पुलिस ने दावा किया कि उसने अपनी चमड़े की बेल्ट का इस्तेमाल करके (लॉकअप के शौचालय वाले हिस्से में) खुद को फांसी लगा ली थी, वहीं कोर्ट ने पाया कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में बेल्ट के बकल के निशान के बजाय "गांठ का निशान" मिला था। इसके साथ ही श्वास नली (Trachea) की हड्डियां भी टूटी हुई मिली थीं। खंडपीठ ने इस बात पर ज़ोर दिया कि ये निशान फांसी लगाने के बजाय गला घोंटने के मामले में ज़्यादा संभावित होते हैं।

    खंडपीठ ने टिप्पणी की कि इस बात से एक उचित संदेह पैदा होता है कि मृतक का पहले पुलिस स्टेशन के अंदर ही गला घोंटा गया था। फिर हिरासत में हुई मौत या हत्या के आरोपों से बचने के लिए पुलिसकर्मियों द्वारा उसके शव को लटका दिया गया। हालांकि, बेंच इस बात से विशेष रूप से नाराज़ थी कि घटना स्थल और पोस्टमॉर्टम की वीडियोग्राफी और तस्वीरें पिछले 16 सालों से कोर्ट को उपलब्ध नहीं कराई जा रही थीं, ताकि कोर्ट आगे की कार्रवाई कर सके।

    NHRC के अलावा, बेंच ने इस मामले में सच्चाई का पता लगाने में हाईकोर्ट और राज्य पुलिस की पूरी तरह से विफलता पर भी आपत्ति जताई।

    अपनी भूमिका के बारे में बेंच ने कहा कि कोर्ट को 3 महीने के भीतर इस मामले को निपटा देना चाहिए था। वीडियोग्राफी पेश करने के लिए राज्य पर लगातार दबाव बनाना चाहिए था।

    बेंच ने टिप्पणी की,

    "परेशान करने वाली बात यह है कि सच्चाई का पता लगाने की इस कोशिश में सबसे पहले जो संस्था विफल रही, वह यह कोर्ट ही है। PIL का विषय ऐसा था कि इसमें तुरंत कार्रवाई और सबूतों को सुरक्षित रखने तथा उन्हें इस कोर्ट के सामने पेश करने के लिए बार-बार सुनवाई की ज़रूरत थी ताकि कोर्ट इस बात से संतुष्ट हो सके कि राज्य का यह दावा कि नाहर सिंह ने लॉक-अप के टॉयलेट में आत्महत्या कर ली थी, सच था, और उस कहानी का कोई दूसरा पहलू नहीं था।"

    बेंच ने आगे कहा कि इस मामले में 16 साल की प्रक्रियागत देरी ने पुलिस और राज्य को अपने "गलत कामों पर पर्दा डालने" का ऐसा मौका दे दिया है कि सच्चाई 'छिपी' ही रह गई।

    बेंच ने आगे कहा,

    "इस देरी के कारण अब वीडियोग्राफी वाले सबूतों को हासिल करने की इस कोर्ट की कोशिशें भी नाकाम होती दिख रही हैं।"

    इस मामले में पुलिस की भूमिका के बारे में बेंच ने टिप्पणी की कि हाई कोर्ट के सामने वीडियोग्राफी पेश करने की उनकी अनिच्छा "शायद किसी अपराध को छिपाने के लिए थी।"

    बेंच ने पाया कि राज्य के साथ बार-बार हुई बातचीत के दौरान, पुलिस/राज्य कोर्ट को यह समझाने में असमर्थ रहे कि क्या वे वीडियो रिकॉर्डिंग कभी पुलिस के कब्ज़े से बाहर भी गईं, जबकि पुलिस का दावा था कि सबूत NHRC को भेज दिए गए।

    नतीजतन, जब लापता वीडियो सबूतों को हासिल करने की बार-बार की कोशिशें नाकाम रहीं तो कोर्ट ने CBI को निर्देश दिया कि वह 60 दिनों के भीतर लापता वीडियो सबूतों को हासिल करे।

    हालांकि, CBI से कहा गया कि वह इस चरण में FIR दर्ज न करे और केवल वीडियो को कोर्ट के सामने पेश करे। इस मामले की अगली सुनवाई 10 अगस्त को होगी।

    Case title - Association For Advocacy And Legal Initiatives Lko. vs State Of U.P. Thru. Sec. Home Lko. And Others

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