S.133 CrPC | उपद्रव हटाने की कार्यवाही में पेश किया गया साक्ष्य विश्वसनीय होना चाहिए, न कि निर्णायक प्रकृति का: इलाहाबाद हाईकोर्ट
Shahadat
19 May 2026 10:17 AM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला दिया कि CrPC की धारा 133 के तहत परेशानी हटाने की कार्यवाही संक्षिप्त प्रकृति की होती है और इसमें कथित परेशानी से जुड़े आवेदन पर फैसला करने के लिए "कोई भी भरोसेमंद सबूत" चाहिए होता है, न कि निर्णायक सबूत।
जस्टिस डॉ. अजय कुमार-II ने फैसला दिया,
"CrPC की धारा 133 के तहत कार्यवाही संक्षिप्त प्रकृति की होती है। इसका मकसद सार्वजनिक शांति और अमन को होने वाले आसन्न खतरे के मामलों से निपटना होता है। इसका इस्तेमाल—या बल्कि दुरुपयोग—किसी संपत्ति के मालिक के कीमती अधिकार को खत्म करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। इसीलिए विधायिका ने अपनी समझदारी से ऐसे इनकार के समर्थन में 'कोई भी भरोसेमंद सबूत' शब्दों का इस्तेमाल किया। ऐसे मामले में CrPC की धारा 137(2) के तहत प्रावधान के अनुसार, सक्षम अदालत द्वारा उस अधिकार के अस्तित्व का मामला तय होने तक कार्यवाही रोक दी जाएगी। इन शब्दों का अर्थ और आशय निश्चित रूप से 'निर्णायक सबूत' शब्दों से अलग है।"
प्रतिवादी नंबर 2 ने धारा 133 के तहत एक आवेदन दायर किया, जिसमें याचिकाकर्ता द्वारा सार्वजनिक रास्ते से कथित अतिक्रमण (सीढ़ी) हटाने की मांग की गई। कार्यवाही में कुछ आगे-पीछे होने के बाद याचिकाकर्ता ने SDM के सामने अपनी आपत्तियां पेश कीं। SDM ने राजस्व निरीक्षक से आगे की रिपोर्ट मांगी, जिसके बाद एक आदेश पारित किया गया जिसमें याचिकाकर्ता को अतिक्रमण हटाने का निर्देश दिया गया।
SDM के आदेश के खिलाफ याचिकाकर्ता की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को कुशीनगर के सेशन जज ने खारिज किया। इसके बाद याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। यह दलील दी गई कि याचिकाकर्ता और प्रतिवादी नंबर 2 की संपत्ति के बीच का रास्ता जनता द्वारा इस्तेमाल नहीं किया जाता था और मानसून के दौरान उसमें से बारिश का पानी बहता था। इसलिए यह तर्क दिया गया कि याचिकाकर्ता द्वारा कोई अतिक्रमण नहीं किया गया।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले म्युनिसिपल काउंसिल, रतलाम बनाम वर्धिचंद और अन्य का हवाला देते हुए... और इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वली उद्दीन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में यह टिप्पणी की कि, जहां एक ओर CrPC की धारा 133 कार्यपालक मजिस्ट्रेट को सार्वजनिक रास्ते से अतिक्रमण या बाधा हटाने का आदेश देने का अधिकार देती है, वहीं उसे यह भी देखना चाहिए कि जिस व्यक्ति पर कानून का उल्लंघन करने का आरोप है, क्या उसने अपने पक्ष को साबित करने के लिए "कोई विश्वसनीय सबूत" पेश किया है। कोर्ट ने यह माना कि धारा 133 के तहत निर्णय लेने के उद्देश्य से निर्णायक सबूत होना अनिवार्य नहीं है, और कार्यपालक मजिस्ट्रेट द्वारा ऐसे सबूत की माँग नहीं की जा सकती।
कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता ने स्वयं ही उस रास्ते का अस्तित्व स्वीकार किया। कोर्ट ने यह माना कि एक बार जब रास्ते के अस्तित्व और उससे होकर बारिश के पानी के बहने की बात स्वीकार कर ली जाती है तो फिर उस पर किसी भी प्रकार का अतिक्रमण नहीं हो सकता।
इस बात पर गौर करते हुए कि राजस्व अधिकारियों ने यह पाया था कि दो घरों के बीच स्थित रास्ते पर सीढ़ियां बनाई गईं, कोर्ट ने यह निर्णय दिया कि याचिकाकर्ता ने सार्वजनिक रास्ते पर बाधा उत्पन्न की थी।
"जब CrPC की धारा 133 के तहत दायर याचिका से संबंधित उपरोक्त कानूनी सिद्धांतों के आलोक में वर्तमान मामले के रिकॉर्ड की जांच की जाती है तो यह स्पष्ट हो जाता है कि याचिकाकर्ता ने स्वयं ही अपनी याचिका में मौके पर दो फुट चौड़ी सड़क/गली के अस्तित्व को स्वीकार किया। इसलिए वर्तमान मामले में सार्वजनिक रास्ते के अस्तित्व को लेकर की गई उपरोक्त स्वीकारोक्ति के मद्देनज़र, कार्यपालक मजिस्ट्रेट पर CrPC की धारा 137 के तहत आवश्यक जाँच करने का कोई दायित्व नहीं था।"
तदनुसार, कोर्ट ने यह निर्णय दिया कि SDM के आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई औचित्य नहीं था। याचिका खारिज कर दी गई।
Case Title: Shambhu Singh v. State of U.P. and another

