“कोई खुद को भगवान न बताए” बयान पर FIR; इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गौतम खट्टर को दी राहत
Praveen Mishra
21 May 2026 12:14 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूट्यूबर गौतम खट्टर को राहत देते हुए उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर में गिरफ्तारी से मिली अंतरिम सुरक्षा को 14 जुलाई तक बढ़ा दिया है। गौतम खट्टर पर 'श्री करौली शंकर महादेव बाबा' उर्फ 'करौली सरकार' के खिलाफ कथित आपत्तिजनक टिप्पणियां करने का आरोप है।
जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने मंगलवार को मामले की सुनवाई करते हुए शिकायतकर्ता पक्ष को जवाब दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया। अब मामले की अगली सुनवाई 14 जुलाई को होगी।
दरअसल, गौतम खट्टर ने कानपुर निवासी प्रियंका द्विवेदी द्वारा दर्ज कराई गई एफआईआर को रद्द करने की मांग करते हुए हाईकोर्ट का रुख किया है। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि खट्टर, जो स्वयं को 'सनातन महासंघ' का संस्थापक बताते हैं, ने सोशल मीडिया के माध्यम से भड़काऊ और घृणास्पद संदेश फैलाए।
एफआईआर के अनुसार, खट्टर ने 'श्री श्री 1008 पूर्ण गुरु श्री करौली शंकर दास जी महाराज' के महामंडलेश्वर पदाभिषेक से जुड़ा एक वीडियो साझा किया और कथित रूप से उनके खिलाफ अभद्र टिप्पणियां कीं, जिससे अनुयायियों की धार्मिक भावनाएं आहत हुईं।
शिकायत में यह भी आरोप है कि खट्टर ने हिंदू परंपरा में बच्चों का नाम राम, श्याम और शिव जैसे देवी-देवताओं के नाम पर रखने की प्रथा की आलोचना की तथा कहा कि जो लोग स्वयं को भगवान की तरह प्रस्तुत करते हैं, उन्हें “चौराहे पर जूतों से पीटना चाहिए।”
इन आरोपों के आधार पर कानपुर पुलिस ने गौतम खट्टर के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं तथा सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 67 के तहत मामला दर्ज किया है।
गौतम खट्टर की ओर से पेश अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने हाईकोर्ट में दलील दी कि कथित भाषण का आशय केवल इतना था कि कोई व्यक्ति स्वयं को भगवान के रूप में प्रस्तुत न करे। उन्होंने कहा कि यह महज एक राय (Opinion) की अभिव्यक्ति है और किसी भी कानून के तहत अपराध नहीं बनता।
याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि एफआईआर में ऐसा कोई आरोप नहीं है जिससे यह साबित हो कि खट्टर की मंशा जानबूझकर किसी समुदाय की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने की थी। अधिवक्ता ने तर्क दिया कि खट्टर के बयान संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से संरक्षित हैं।
इसके अलावा यह भी दलील दी गई कि वैमनस्य फैलाने से संबंधित अपराध लागू करने के लिए कम से कम दो अलग-अलग समुदायों या समूहों का होना आवश्यक है, जबकि वर्तमान मामले में ऐसा कोई तत्व मौजूद नहीं है जिससे शांति व्यवस्था भंग होने या समुदायों के बीच दुश्मनी फैलने का आरोप सिद्ध हो सके।

